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कानून को आचरण में लाने के लिए धर्म का जागृत होना आवश्यक – डॉ. मोहन भागवत

मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “समाज के लिए कानून बनाए जाते हैं. परन्तु जो कानून में है, उसे आचरण में लाने के लिए धर्म का जागृत होना आवश्यक है. समाज धर्म से चलता है. धर्म का अर्थ पूजा नहीं, बल्कि धर्म का अर्थ मानवता है. मानवता धर्म का आचरण कैसा होना चाहिए, यह बताने वाला यह कार्यक्रम है. इस कार्यक्रम के माध्यम से हमने आज मानवता का अनुभव किया है. यह मानवता धर्म हमारे भी प्रत्यक्ष आचरण में आना चाहिए. अपनी क्षमता के अनुसार हमें यह कार्य करना चाहिए. धन, श्रम, कल्पना, योजना आदि मार्गों से यह कार्य किया जा सकता है, करना ही चाहिए. इन विशेष व्यक्तियों ने किन्तु-परन्तु का कोई पर्याय हमारे लिए शेष नहीं रखा है”.

सरसंघचालक जी नूतन गुलगुले फाउंडेशन द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में संबोधित कर रहे थे. नूतन गुलगुले फाउंडेशन (एनजीएफ) ने विशेष उपलब्धि हासिल करने वाले दिव्यांगजनों और दिव्यांगजनों के लिए कार्यरत संस्थाओं को सम्मानित करने के लिये मुंबई के रविंद्र नाट्य मंदिर में समारोह का आयोजन किया था.

समारोह में ध्येयपूर्ति पुरस्कार 2018 से 14 व्यक्तियों को सम्मानित किया गया. मंच पर सारस्वत बैंक के अध्यक्ष गौतम ठाकुर, ज्येष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रेखा डावर और नूतन गुलगुले और पुष्कर गुलगुले उपस्थित थे. अपने दिव्यांग पुत्र पुष्कर का पालन करते समय आई कठिनाइयों को लांघकर नूतन और विनायक गुलगुले दम्पति ने संस्था की स्थापना की थी. इस वर्ष कृषि, उद्योग, वैद्यकीय, विधि ऐसे विविध क्षेत्रों में यशस्वी दिव्यांग व्यक्तियों को सम्मानित किय गया. माँ-पुत्र, दिव्यांग कुटुंब, ध्येयपूर्ति मृत्यु पश्चात पुरस्कार आदि सम्मान दिए गए.

सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि आज हमें धर्म का दर्शन हुआ है. धर्म सबको जोड़ता है, उन्नत करता है. कहीं भी अमंगल न करते हुए, हम पर सुख की वर्षा करता है. हाल ही में मुझे राजकोट में हुए साधु – सत्पुरुषों के एक सम्मलेन में उपस्थित रहने का अवसर मिला. वहाँ पर मेरे मन में जो भाव उत्पन्न हुए, उन्हीं का अनुभव मुझे आज यहाँ पर हो रहा है. अपनी कठिनाईयों को महत्व दिए बिना मेरे सामने बैठे व्यक्तियों ने अपना जीवन उन्नत किया है. साथ ही मानवता का धर्म निभाते समय समाज के अभावग्रस्त व्यक्तियों की उन्नति के लिए भी कष्ट उठाए हैं. “तमसो मा ज्योतिर्गमय” यह प्रार्थना इन दिव्यांग व्यक्तियों ने सार्थक की है.

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