कुंठित मानसिकता की ‘माई चॉइस’ – सिद्धार्थ शंकर गौतम

हाल ही में फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के 2:35 मिनट के ‘माई चॉइस’ नामक वीडियो ने इंडिया और भारत के बीच फैली भ्रांतियों और उनकी सोच को उजागर किया है। हालांकि वीडियो में जिस तरह के प्रश्न उठाए गए हैं, मसलन शारीरिक संबंधों को लेकर जिस खुलेपन और सोच की बात की गई है, वह भारतीय संस्कृति से बिल्कुल मेल नहीं खाते। अभिजात्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा जहां दीपिका की इस पहल को क्रांतिकारी बता रहा है वहीं फिल्म अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा और लेखिका शोभा डे ने इसे नारी जगत के लिए अहितकारी बताया है। देखा जाए तो दीपिका जिस आज़ादी की मांग कर रही हैं, वह इंडिया में रहने वाली उन जैसी अमीरजादियों के लिए तो सहज, सुलभ हो सकती है किन्तु भारत की मध्यमवर्गीय महिला, जो मां, बहन, बेटी, पत्नी जैसे खूबसूरत रिश्तों को बखूबी निभा रही है, उसका अपमान है। दरअसल थोथे नारीवाद की आड़ में दीपिका ने इस वीडियो द्वारा खुद को स्थापित और लोकप्रिय करने का बेवकूफी भरा प्रयास किया है। जिन कथित महान लोगों को दीपिका का यह कदम क्रांतिकारी लग रहा है, उन्हें ज़रा दीपिका की पिछली जिंदगी में झांक लेना चाहिए। हालांकि किसी की निजता का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी है किन्तु जो व्यक्ति समाज के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करता हो, उससे इस प्रकार की अश्लील और निरर्थक बकवास की उम्मीद नहीं की जा सकती। दीपिका की अदाकारी से प्रभावित सैकड़ों युवा लडकियां यदि उनकी तरह ‘माई चॉइस’ का झंडा बुलंद करने लगें तो सोचिए समाज किस दिशा में जाएगा?

दरअसल हमारे समाज में महिलाओं को भोग की वस्तु समझने की जो स्वाभाविक परंपरा रही है, उसमें बदलाव होना चाहिए किन्तु विरोध के स्तर पर नहीं अपितु वैचारिक स्तर पर। बाज़ारवाद ने नारी देह को जिस उन्मुक्तता के साथ परोसा है, उसने समाज को कुंठाग्रस्त कर दिया है। रही-सही कसर थोथे नारीवाद के बुलंद झंडे से पूरी कर दी है। लड़कों की तरह दिखने की चाह और उनकी तरह आज़ादी को लड़कियों की बड़ी संख्या ने बिना सोचे-समझे आधुनिकता समझ खुद को पथभ्रष्ट कर लिया है। शराब-सिगरेट से लेकर तन की आज़ादी के भाव ने उन्हें परंपराओं और सामाजिक बंधनों से तो मुक्त किया किन्तु वे कुंठित होकर स्वयं का वजूद भी बिसरा बैठीं। अरे, ईश्वर ने मां बनने का जो नायाब एहसास महिलाओं को दिया है, उसकी अपेक्षा पुरुषों की तमाम आज़ादी, आधुनिकता, रुतबा सभी कमतर है। महिला का एक मां रूप ही पुरुषों के तमाम रिश्तों पर भारी पड़ता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता भी महिलाओं को मातृ शक्ति के रूप में देखती है। हमारी संस्कृति में यदि देवताओं के नाम भी लिए जाते हैं तो पहले शक्तिस्वरुपा उनकी पत्नियों के नाम लिए जाते हैं, जैसे सीताराम, राधे कृण्ण इत्यादि। सामाजिक तौर पर भी देखें तो घर की मालकिन महिलाएं ही हुआ करती हैं। ऐसी संस्कृति के बीच यदि दीपिका जैसी अभिनेत्रियां खुद को रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती हैं तो यह विशुद्ध रूप से उनके व्यावसायिक हितों का मामला है।
मेरी चिंता का विषय यह है कि आखिर दीपिका और उन जैसी तमाम अभिनेत्रियां व इनको संरक्षण दे रहा समाज स्त्री जाति की किस स्वतंत्रता व उन्मुक्तता का समर्थन कर रहा है? क्या इनके अनोखे व समाज में वर्जित माने जाने वाले कारनामे स्त्रियों की घरेलू व पालक छवि के साथ अन्याय नहीं कर रहे हैं? आखिर इनको बढ़ावा देकर युवा पीढ़ी क्या दर्शाना चाहती है? यह तो दीगर है कि इनके प्रशंसकों में युवा वर्ग का एक बड़ा समूह है जिसकी दम पर इनकी ऊल-जुलूल हरकतों को समाज बर्दाश्त कर रहा है। वैसे भी भीड़ की ताकत के आगे किसकी चलेगी? पर क्या इनकी इस अति-उन्मुक्त छवि की वजह से आम स्त्री से लेकर किशोर युवतियों के प्रति पुरुषों की मानसिकता में बदलाव नहीं आ रहा? यक़ीनन ऐसा हो रहा है। कामुकता का ओछा आवरण ओढ़ इन्होने स्वयं की राह तो आसान कर ली किन्तु अनगिनत महिलाओं-युवतियों के लिए परेशानी पैदा कर दी है। छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार व यौन शोषण के बढ़ते मामले यक़ीनन इनकी देन नहीं हैं लेकिन इनके अश्लील कर्मों की वजह से इनमें बढोतरी अवश्य हो रही है। और हैरानी की बात तो देखिए; इन्हें अपने कुकर्मों का पछतावा भी नहीं है। प्रचार-प्रसार की भूख ने इनके शरीर को तो मैला किया है, इनकी आत्मा तक मर गई है।
मुझे नहीं लगता कि अभी हमारे समाज में इतनी उन्मुक्तता या बेशर्मी ने घर कर लिया है कि परिवार इसे सामान्य घटना मान इसपर ध्यान ही न दें। कहीं न कहीं इससे स्वच्छ पारिवारिक माहौल पर भी बुरा असर पड़ता है। वैसे भी चमक-धमक की इस चकाचौंध दुनिया में संस्कारों का ख़ास महत्व नहीं बचा है। बच्चे माता-पिता से अच्छे संस्कार सीखने की बजाए बुरी आदतें जल्दी सीख रहे हैं।  इसमें दोष उनका भी नहीं है, जिसे इनकी वर्जित हरकतों पर रोक लगानी चाहिए वही चुप हैं तो इनका तो हौसला बढेगा ही। इनके स्व अनुशासन व संस्कारों की बात करना तो बेमानी है क्योंकि यदि इनमें संस्कारों का पुट होता तो ये इस तरह समाज में नग्नता को बढ़ावा नहीं देतीं। खैर, इनसे तो उम्मीद है नहीं; कम से कम जिम्मेदार तो इनपर रोक लगाएं। धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा पर लड़ने वाला समाज क्या अपने परिवार, बेटियों व स्त्री जाति के सम्मान की खातिर इनके विरोध में खड़ा होगा? क्या समाज के कथित ठेकेदार इनकी नकेल कसने का साहस दिखा पाएंगे? सवाल है तो तीखा पर उत्तर मिलेगा इसमें मुझे संदेह है? हालांकि इनकी उन्मुक्तता को सम्पूर्ण स्त्री जाति से नहीं जोड़ा जा सकता फिर भी इन्होंने अपने कारनामों से समाज के वातावरण को दूषित किया है जिसके लिए इन्हें माफ़ नहीं किया जा सकता।

सिद्धार्थ शंकर गौतम 

०९४२४०३८८०१ 

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