धर्म आंखें खोलता है और जो आंख बंद करे वह अधर्मी कहलाता है – डॉ.कृष्ण गोपाल

उत्तर बिहार. बिहार के छपरा में राष्ट्र की सेवा के प्रति समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व सरसंघचालक रज्जू भैया की स्मृति में व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया. स्थानीय ब्रजकिशोर किंडर गार्टन के सभा कक्ष में आयोजित व्याख्यानमाला का विधिवत उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी द्वारा रज्जू भैया के चित्र के समझ दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया.

सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि धर्म आंखें खोलता है और जो आंख बंद कर ले, वह अधर्मी कहलाता है. उन्होंने भारत दर्शन और पश्चिमी सभ्यता के बीच तुलनात्मक संबंधों को बताते कहा कि हमारे यहां जो उत्पन्न हुआ वह धर्म है और पश्चिम में रिलिजन कहा जाता है. सभी कहते है धर्म समान है, लेकिन वह अज्ञानता में ऐसा बोलते है. इसलिए लोगों को यह बताना आवश्यक है कि धर्म क्या है ? सांप्रदाय क्या है ? पंथ क्या है? उन्होंने कहा कि वास्तव में धर्म नीति, न्याय को बताता है, दायित्व को बताता है, कर्तव्य को बताता है, सत्य और असत्य के विवेक का दर्शन कराता है. धरती पर सभी का धर्म होता है. माता का, पिता, पुत्री का, पुत्र का सबका धर्म होता है और सब इसका निर्वहन करते है.

उन्होंने कहा कि धर्म शास्वत सिद्धांत है जो सबके लिये बेहद आवश्यक है. सभी के जीवन में धर्म के मौलिक तत्वों को लाने की छूट है. इसलिए धर्म के दर्शन को समझना आवश्यक है. उन्होंने भारत और पश्चिम के भगवान की तुलना करते कहा कि भारत में परमात्मा एक है जो ऊपर है, लेकिन लाखों करोड़ों में व्याप्त है, यह वेद कहता है. ईश्वर की यह व्याख्या पश्चिम में नहीं हैं, इस अंतर को समझना आवश्यक है. उन्होंने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते कहा कि यहां के लोग “सर्वे भवन्तु सुखिना कहते है” यानी पूरा विश्व सुखी रहे, सारे लोग सुखी रहें. चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो भारत में कोई मौलिक दर्शन का विरोध नहीं करता. यहां की परंपरा सभी देवी देवताओं को मानती है.

गोपाल जी ने कहा कि संप्रदाय के स्थापत्य के लिये आदेश का निर्वहन करते है. वे जहां गये साम्राज्य स्थापित करने के लिये लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते थे. गरीबी, भूख, बीमारी एवं शिक्षा के हथियार बनाकर प्रलोभन देकर कार्य किया जाता था. 21 वीं सदी में जनता जागरूक है. अमेरिका के 67 प्रतिशत लोग हिन्दुत्व पर विश्वास करते है, यह सर्वे से सिद्ध हुआ है, अगर भगवान एक है तो उसके पाने के रास्ते हजार हो सकते है. दुनिया में भारत के योग की महत्ता को को माना है और विश्व में 21 जून को योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. एक सांप्रदाय को हम पूरे विश्व में स्थापित नहीं कर सकते, इसलिए पाश्चात्य जगत के लोगों को पुनः विचार करने की आवश्यकता है.

उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन के लोग सेनापति को नहीं मानते जो जंग में विजय पा कर आता है, बल्कि यहां के लोग उसे मानते है जो स्वयं पर विजय पाकर समर्पण भाव रखता है. हमें पूजा पाठ, कर्मकांड की बजाय नैतिक मूल्यों को तवज्जो देने की जरूरत है. सत्य को ग्रहण करना आवश्यक है.

डॉ. वैधनाथ मिश्र ने मुख्य वक्ता का अभिनंदन, मंच संचालन अवधकिशोर मिश्र ने किया. क्षेत्र कार्यवाह मोहन जी, उत्तर प्रांत कार्यवाह अभय कुमार गर्ग, प्रांत सह प्रमुख कैलाश चंद्र, सह कार्यवाह रजनीश शुक्ला, विभाग प्रचारक राजा राम जी, विभाग संघ चालक विजय कुमार सिंह आदि उपस्थित थे.

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