Dilip-Dharurkar

नतद्रष्ट पर्यावरणवादियों को पवित्रता अभी याद आई ? – दिलीप धारूरकर

भारत के विरोधियों ने मानो पर्यावरण, पुनर्वास जैसे शब्दों का प्रयोग कूटशब्द की तरह इस देश की अस्मिता,  विकास और संस्कृति को विरोध करने के लिए करने की जैसै ठान ली है। प्राकृतिक संसाधनों  और तेज बुद्धी धारण  करनेवाले मानव संसधाधनों का वरदान प्राप्त भारत आनेवाले कुछ दिनों में विश्व की महासत्ता होगा, यह भविष्यवाणी जबसे कुछ लोगों ने करना शुरू किया है, तब से दुनिया के कुछ कुटील लोगों ने भारत के कुछ लोगों को हाथों में लेकर एक षडयंत्र शुरू किया है। इस तरह का  काम करनेवाले लोगों को पुरस्कार, पैसा, मान्यता सब कुछ दुनिया से तय करके दिया जाता है। उन्हें सिर्फ इतना करना होता है, कि भारत में कही सांस्कृतिक अस्मिता जागृत होती है, तो वहां कुछ बहाना बनाकर विक्षेप बनाएं। अगर भारत में विकास के काम होते हो, तो  चाहे कुछ करके भारत के ही लोगों को उसके विरोध में भड़काकर  आंदोलन खड़ा करना और विकास की प्रक्रिया रोक लेना! यह सब करते हुए आसान विषय है पर्यावरण और पुनर्वास! अलग संदर्भ में पर्यावरण, प्रकृति,वसुंधरा, प्रदूषण की समस्या  जैसे विषय भारतीय जनता के समक्ष किसी सुविचार की तरह रखे जाते है। जैसे ही सांस्कृतिक, राष्ट्रीय अस्मिता का विषय सामने आता है, तो उसे विरोध करने के लिए इस तरह से तैयार की गई पृष्ठभूमि का उपयोग किया जाता है। इस सबको मदद करनेवाली ‘एनजीओ’ नामक लुटेरो संस्थाओं की एक व्यवस्था  भी खड़ी की गई है। विदेशों से हजारों डॉलर दान, पुरस्कारों के रूप में देकर यह रचना पोषित की गई है। विदेशी मालिकों अथवा मेहरबानों का उद्देश ध्यान में लेकर यह पूरी की पूरी लुटेरी व्यवस्था, छू कहने की प्रतीक्षा किए बिना, टूट पड़ती है जब भी विकास, संस्कृति, गौरव जैसे विषय सामने आते है। वह भौंकना शुरू करती है। न्यायालयों, लवादों के दरवाजे पर दस्तक देती है और शोर मचाकर अफवाहें फैलाती है, कि कुछ तो भयंकर चल रहा है जिससे गौरव की भावना की जगह अपराधभाव तैयार होता है!श्री श्री रवि शंकर की ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ की 35वीं वर्षगांठ पर दिल्ली में आयोजित विश्वस्तरीय सांस्कृतिक उत्सव को पर्यावरण के नाम पर इसी तरह विरोध किया गया। खुली आंख से और खोजी नज़र से उसकी अधिक खबर लेनी चाहिए।

‘आर्ट ऑफ लिविंग’ की वर्षगांठ पर आयोजित इस विश्व सांस्कृतिक महोत्सव में लाखों भक्त उपस्थित रहेंगे, हजारों कलाकार अपनी कला प्रदर्शित करेंगे, उसके लिए हजारों वर्ग फीट जगह लगेगी, यह कोई नई अथवा अचानक से निश्चित होनेवाली बात नहीं थी। कुछ महीने पहले प्रदूषण नियंत्रण निगम, नई दिल्ली विकास प्राधिकरण से आवश्यक अनुमतियां लेकर ही इस स्थान पर कार्यक्रम की तैयारी शुरू हो चुकी थी। लेकिन  सभी तैयारियां पूरी होने के बाद, करोड़ों रुपये खर्च करते हुए दुनियाभर में आमंत्रण भेजे जाने के बाद, विश्व के लाखों भक्तों द्वारा अपने कार्यक्रम के निश्चित करने के बाद कार्यक्रम में आने का नियोजन करने के बाद, इस कार्यक्रम का भव्य मंच, आसन व्यवस्था, पार्किंग लॉट आदी सारी तैयारी होने के बाद कार्यक्रम शुरू होने के कुछ घंटा पहले, 9 मार्च को ग्रीन टिब्यूनल  ने यमुना जिये अभियान नामक एनजीओ द्वारा दायर याचिका का निर्णय करते हुए आदेश दिया, कि पांच करोड़ रुपये दो और कार्यक्रम करो। पांच करोड़ रुपये इतनी मामूली रकम नहीं है, कि जो आसानी से जेब में हाथ ड़ालकर दी जाए। कार्यक्रम की नब्बे प्रतिशत से अधिक तैयारी होने के बाद इस तरह का निर्णय देना,यह एक तरह से परीक्षा ही थी। तब ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ ने भूमिका ली, कि हम जेल में जाएंगे, लेकिन जुर्माना नहीं देंगे। रविशंकर के कार्यक्रम की भव्यता, उसमें व्याप्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश भारतीय सभ्यता की महत्ता विश्व में प्रसारित करने का अवसर आदी सब पीछे होकर एक विपरीत चर्चा इस टिब्यूनल  के पास गई याचिका के कारण शुरू हुई। विघ्नसंतोषी  लोगों का काम हो गया। शरद यादव से लेकर गुलाम नबी तक हिंदुत्व के विरोधकों की सेक्युलर कांवकांव तुरंत शुरू हो गई!

अब इसमें तथ्य क्या यह है, इसकी सच्चाई जमीन पर आकर देखनी होगी। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने नियमों का हवाला देते हुए, इस ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष जो निवेदन किया है, उसमें कहा है, ‘किसी भी नदी के पूरक्षेत्र में जब पानी नहीं होता तब अस्थाई रुप का मंच अथवा अन्य रचना खड़ी करने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं होती’। अगर ऐसा है, तो यमुना नदी के पर्यावरण के लिए करनेवाला गैर सरकारी संगठन कैसे ग्रीन टिब्यूनल  के पास पहुंचा? दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पहले ही कार्यक्रम करने की अनुमति दी थी।

यमुना नदी का खयाल रखनेवाला यह पर्यावरणवादी गैर सरकारी संगठन अन्य समय में क्या करता है? अगर वह कुछ करती तो यमुना नदी की जो दुर्गति हुई है क्या वह हो सकती थी ? एक पर्यावरण विश्लेषक सोपान जोशी ने बीबीसी पर यमुना की दुर्गति का किस तरह वर्णन कियाहै इसे देखें। ‘‘अगर वे कभी दिल्ली की यमुना तक आएं तो पाएंगे कि, उसकी दुर्गंध उनकी नाक को सड़ांध से भर देगी. नदी में हिमालय का पानी कतई नहीं बहता. उसमें केवल दिल्ली के शौचालयों से बह कर आया मल-मूत्र अटा रहता है. यदि यमुना के किनारे-किनारे वे वृंदावन तक चले गए तो उन्हें कुछ और अप्रिय अनुभूतियां होंगी।’’ श्रीकृष्ण का जन्म, कालियामर्दन जैसे संदर्भ देकर वे आगे लिखते है, ”आज के संदर्भ में हमारा शहर  कालिया नाग का रूप ले चुका है। कृष्ण लीला के केन्द्र में रही यमुना को, जैसे कालिया नागों ने अपने नाम रजिस्टर करा लिया है. आज उसी बृजभूमि की यमुना में आर्थिक विकास का सड़ा हुआ अर्क बहता है. पीना और नहाना तो बहुत दूर की बात है, यमुना का पानी इतना दूषित है कि उसे छूना तक बीमारी को आमंत्रण देना है.’ अब यमुना की हालत जैसे जोशी साहब कहते है वैसी हो, तो पानी न होने के समय में बाढ़क्षेत्र में  श्री श्री रवि शंकर की ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का कार्यक्रम वहां की जमीन समतर करते हुए, स्वच्छ करते हुए, बदबू दूर करते हुए होनेवाला हो तो पर्यावरण को खतर हो सकता है, यह तर्क चाहे कुछ करो गले नहीं उतरता। भारतीय संस्कृति की जयजयकार होगी, दुनियाभर से लोग आकर यह गर्व करनेलायक विरासत मन में लेकर जाएंगे, नरेंद्र मोदी वहां आकर एक प्रभावी भाषण देकर जाएंगे, यह सब  हिंदुत्वविरोधकों के पेट में मरोड़ लानेवाल था, इसलिए पर्यावरण का नाम लेकर उन्होंने इस तरह अपशकुन करने का प्रयास किया।

ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष जब इस विषय की चर्चा शुरू हुई, तब और कुछ ज्वलंत सत्य सामने आए जो समाचारों में अधिक प्रसिद्ध नहीं हुए।  न्यायाधिकरण के समक्ष आपत्ति उठाते हुए यह तर्क किया गया, कि पर्यावरण के कारण से पिछले 25 वर्षों में इस बाढ़क्षेत्र में किसी भी प्रकार का कार्यक्रम अथवा निर्माण को अनुमति नहीं दी गई। लेकिन सच्चाई कुछ और है। बीबीसी हिंदी डॉट पर इस संदर्भ में समाचार में आरजू सिद्दिकी ने दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुख्य आयुक्त जे.पी. अग्रवाल के कहे अनुसार लिखा है, ‘‘अक्षरधाम और दिल्ली ट्रान्सपोर्ट कार्पोरेशन (डीटीसी) का मिलेनियम बस डेपो इसी जगह में हुआ है, उससे पर्यावरण को कौन सा खतरा हुआ  है?’’ जे. पी. अग्रवाल ने आगे कहा, ”इस बाढ़क्षेत्र में कई अनधिकृत कालनियां हुई है,  लोग रह रहे हैं, खेती की जा रही है। इनसे पर्यावरण को अगर कोई खतरा नहीं है, तो इस कार्यक्रम से कौन सा खतरा होनेवाला है?” यमुना के बाढ़क्षेत्र में जब पर्यावरण की बर्बादी हो रही थी, लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार थी और अब  केजरीवाल की ‘बेमिसाल’ सरकार है, यह उल्लेखनीयहै!

क्या यह एनजीओ, जिसे आज यमुना के किनारे एक अस्थाई दो दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन से खतरा होने की चिंताहो रही है, कुंभकर्ण की तरह सो गई थी जब यह मिलेनियम बस डिपो, अनधिकृत कालनियां और अक्षरधाम जैसी चीज़ें बन रही थी?

भारतीय संस्कृति के किसी भी कार्यक्रम का नाम लेते ही इन नतद्रष्ट लोगों को पर्यावरण याद आता है। होली आते ही लकड़ियां जलेगी इसलिए इनका दिल पसीज जाता है और होली से पहले ही यह चिल्लाना शुरू करते है। दशहरा आते ही आपटा वृक्ष के पत्ते न तोड़ने की अक्ल इन्हें आती है, दिवाली आते ही पटाखे फटने से पहले इन्हें खांसी आती है, नागपंचमी आते ही नाग की पूजा न करें, वटपौर्णिमा पर बरगद को धागे न बांधे…ऐसे कई उदाहरण है! हालांकि, अन्य कई बातों के लिए उन्हें पर्यावरण की कभी याद नहीं आती। कान फाड़नेवाली आवाज में लाऊडस्पीकर से रोज़ अज़ान दी जाती है, तब ध्वनिप्रदूषण होने की चिंता भी इन सेकुलर मनों को छूती तक नहीं। रास्ते में, कार्यालय में, रेल्वे में, जहां मिले वहां समय पर सार्वजनिक व्यवहार रोककर प्रार्थना की जाती है  तब इन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। लाखों लोग एकत्र आकर इज़्तेमा करते है तब पर्यावरण का विषय इनके मनों को छूता तक नहीं।

पूरी दुनिया के वैज्ञानिक जिसकी खोज नहीं कर सके ऐसी एक खोज भारतीय सभ्यता ने की है –  वह है मानवी ताकत की खोज! मन की शक्ति अणुशक्ती से बड़ी है। यमुना मे किसी एक कार्यक्रम पर वह निर्भर नहीं है। ऐसे चाहे कितने की कार्यक्रमों, संस्कृति, विकास के नाम पर आयोजित किए हुए कार्यक्रमों को ये नतद्रष्ट चाहे जितना अपशकुन करें, मन की ताकत जगानेवाली और मन-मन में पोखरण की अणुभट्टी प्रज्वलित करनेवाली प्रयोगशाला उससे बाधित नहीं होनेवाली! इस विरोध के कारण वह अधिक दृढ़ता से खड़ी रहेगी। सिर्फ इतना है, कि ऐसे विरोध से, टिब्यूनल  की तरह न्यायालयीन निर्णय से किसी के मन में संदेह उठने का कारण नहीं है, कि क्या श्री श्री रविशंकर अथवा भारतीय संस्कृति कहीं गलत तो नहीं? भारतीय सभ्यता ने हमेशा व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेष्टी में निरामय संवाद तथा समन्वय का विचार किया है। यहां के मंत्रोच्चारण में, अग्निहोत्र में, यज्ञसंस्था में, तीज-त्यौहारों में, आचरण में हमेशा पर्यावरण से नाता बनाने का प्रयास है। ध्यान में लेना होगा, की फैशनेबल पर्यावरणवादियों की तुलना में यह आंदोलन लाखों गुना आगे है!

दिलीप धारूरकर 9422202024

विश्र्व संवाद केंद्र

(पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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