पुरातन को युगानुकूल बनाकर नविन को देशानुकूल बनाने का विचार ही एकात्म मानव दर्शन : डॉ. श्री बजरंगलाल गुप्त

14 . 12 . 2014 आनंद, गुजरात  : एकात्म मानव दर्शन विषय पर भारतीय विचार मंच द्वारा आनंद (गुजरात ) में एक दिवसीय प्रांत स्तरीय कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन किया गया. उद्धघाटन सत्र में एकात्म मानव दर्शन अर्ध शताब्दी समिति, गुजरात प्रांत की घोषणा की गई.

अभ्याश वर्ग की भूमिका रखते हुए श्री श्रीकांत भाई काटदरे, संयोजक – प्रज्ञा प्रवाह (पश्चिम, मध्य एवं राजस्थान क्षेत्र ) ने कहाँ कि पंडित दीनदयाल जी द्वारा 1964 -65 में मुंबई, उदयपुर, विजयवाड़ा आदि स्थानो पर दिए गए भाषणो में एकात्म मानव दर्शन विषय रखा गया. आज जब विश्व विभिन्न वाद में बंटा हुआ है तब यह विचार किस प्रकार आधार बन सकता है और भारत किस प्रकार इस मार्ग पर चलकर विश्व कल्याण कर सकता है इसका विचार करने के लिए तथा कार्यकर्ताओ के प्रशिक्षण द्वारा विविध संगठनो के माध्यम से समाज में पहुंचे ऐसी कल्पना हैं.

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प्रथम सत्र में उद्बोधन करते हुए मा. डॉ. श्री बजरंग लाल गुप्त ( अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, रा. स्व. सघ ) ने कहाँ कि पंडित दीनदयालजी को समझने के लिए भारतीय मन और मानस चाहिए. मात्र परिचय, शब्दावली व् संकल्पनाओं से दीनदयालजी को नहीं समझा जा सकता. श्री बजरंग लालजी ने कहा की पंडित दीनदयालजी से जब अन्य वादो (ism) के विषय में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि पश्चिम विचार में मुलभुत खामियां है यह घोर प्रतिक्रिया से निकला है और प्रतिक्रिया से आया कोई भी विचार शाश्वत नहीं होता। पंडितजी ने बताया की हमारे वेद और पुराण में सभी कुछ हैं. पुरातन को युगानुकूल बनाकर नविन को देशानुकूल बनाने का विचार हमें पंडित दीनदयालजी ने दिया वही एकात्म मानव दर्शन हैं

उन्होंने कहाँ की विविधता Fact of Life हैं , पश्चिम में विविधता में  विभिन्नता ढूढ़ने का काम हुआ हैं. हमें विविधता में एकता ढूढ़ने का कार्य करना है. हमें समग्र समन्वित एकात्म विश्व दृष्टि लानी होगी। हमारी परंपरा में प्रकृति को भगवान माना जाता है जबकि पश्चिम में प्रकृति को दासी माना जाता है.

श्री बजरंगलालजी ने बताया की जब पंडितजी से पूछा गया कि मनुष्य क्या हैं ? तब पंडितजी ने बताया की मनुष्य यानि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारो का संकलन अतः मनुष्य कल्याण की योजना बनाते समय मनुष्य की आवश्यकताओं का विचार होना चाहिए मात्र शरीर की नहीं वरन इन चारो की  पूर्ति करने वाली योजना ही मनुष्य को सुखी बना सकती है यह ध्यान रखना आवश्यक हैं.

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व्यक्ति और समाज के बारे में उन्होंने कहाँ कि समाज व्यक्तियों से मिलकर बनता हैं. व्यक्ति मरणशील है जबकि समाज चलता रहता हैं. राष्ट्र एवं राज्य के विषय में पंडितजी ने राजनीती में रहते हुए भी बहुत हिम्मत से कहाँ की भारत सेक्युलर स्टेट नहीं हैं. हमारा आदर्श धर्मराज हैं और हमारे धर्मराज की संकल्पना धार्मिक नहीं हैं. उन्होंने दो बाते  भारपूर्वक कही एक राष्ट्र को जागृत करना और दूसरी विराट का जागरण करना.  उनके अनुसार संगठित कार्यशक्ति का निर्माण किये बिना कोई कार्य नहीं हो सकेगा. अंत में श्री बजरंगलालजी ने कहाँ कि पंडित दीनदयालजी को समझने के लिए भगवत गीता की तरह एकात्म मानव दर्शन का मनन करना होगा, यदि एक वाक्य में कहे तो अतीत का गौरव , वर्तमान का यथार्थ आकलन कर भविष्य की महत्वकांक्षा के साथ ले चिती के प्रकाश में निराश हुए बिना नवरचना का प्रयास करते रहना ही एकात्म मानव दर्शन.

अभ्यास वर्ग के अन्य वक्ता सुश्री इन्दुमति बहन काटदरे (सचिव, पुनरुथान ट्रस्ट) ने सुन्दर शब्दों में एकात्म मानव दर्शन में पारभाषित शब्दों के अर्थ की व्याख्या की. उन्होंने बताया की एकात्म यानि आत्मा एक संकल्पना है सचराचर मैं आत्मा एक ही है. यही भाव एकात्मता का भाव है. एकात्म भारत की पहचान हैं. शिक्षण के विषय पर इन्दुमति बहन ने कहाँ की शिक्षण धर्म का प्रतिनिधित्व करता है अतः शिक्षण कभी भी राज्य सत्ता के हाथ में नहीं होना चाहिए.

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विभिन्न संगठनो द्वारा इस विषय पर वर्षभर के आयोजन तथा सूचन संबंधी सत्र श्री यसवंतभाई चौधरी (प्रांत कार्यवाह, रा. स्व. संघ-गुजारत ) ने लिया। इस अवसर पर एकात्म मानव दर्शन – भारतीय चिंतन की आधुनिक प्रस्तुति का विमोचन भी किया गया.

डॉ. श्री जयंतीभाई भाडेसिया (प्रांत संघ चालक, गुजरात प्रांत ), श्री चिंतनभाई उपाध्याय  (प्रांत प्रचारक, गुजरात प्रांत ) सहित विभिन्न संगठनो के प्रमुख कार्यकर्त्ता इस अवसर पर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन श्री देवांग आचार्य (संयोजक, एकात्म मानव दर्शन अर्ध शताब्दी समिति, गुजरात प्रांत ) ने किया.

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