वीर तानाजी मालुसरे का अप्रितम बलिदान (कोढ़ाणा / सिंहगढ़ विजय) – 4 फरवरी 1670

तानाजी मालुसरे शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और वीर निष्ठावान सरदार थे । उनके पुत्र के विवाह की तैयारी हो रही थी । चारों ओर उल्लास का वातावरण था। तभी शिवाजी महाराज का संदेश उन्हें मिला – माता जीजाबाई ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक कोढ़ाणा दुर्ग पर मुसलमानों के हरे झंडे को हटा कर भगवा ध्वज नहीं फहराया जाता तब तक वे अन्न – जल ग्रहण नहीं करेंगी । तुम्हें सेना लेकर इस दुर्ग पर आक्रमण करना है और अपने अधिकार में लेकर भगवा ध्वज फहराना है.

स्वामी का संदेश पाकर तानाजी ने सबको आदेश दिया – विवाह के बाजे बजाना बन्द करों , युद्ध के बाजे बजाओं । अनेक लोगों ने तानाजी से कहा – अरे , पुत्र का विवाह तो हो जाने दो , फिर शिवाजी के आदेश का पालन कर लेना । परन्तु , तानाजी ने ऊँची आवाज में कहा – नहीं , पहले कोण्डाणा दुर्ग का विवाह होगा , बाद में पुत्र का विवाह । यदि मैं जीवित रहा तो युद्ध से लौटकर विवाह का प्रबंध करूँगा । यदि मैं युद्ध में काम आया तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे । बस , युद्ध निश्चित हो गया । सेना लेकर तानाजी शिवाजी के पास पुणे चल दिये उनके साथ उनका भाई तथा अस्सी वर्षीय शेलार मामा भी गए । पुणे में शिवाजी ने तानाजी से परामर्श किया और अपनी सेना उनके साथ कर दी.

दुर्गम कोढ़ाणा दुर्ग पर तानाजी के नेतृत्व में हिन्दू वीरों ने रात में आक्रमण कर दिया । भीषण युद्ध हुआ । कोढ़ाणा का दुर्गपाल उदयभानु था। इसके साथ लड़ते हुए तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए। थोड़ी ही देर में शेलार मामा के हाथों उदयभानु भी मारा गया.

सूर्योदय होते – होते कोढ़ाणा दुर्ग पर भगवा ध्वज फहर गया । शिवाजी यह देखकर प्रसन्न हो उठे । परन्तु , जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके आदेश का पालन करने में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए है , तब उनके मुख से निकल पड़ा –  “गढ़ आला पण सिंह गेला “ गढ़ तो हाथ में आया , परन्तु मेरा सिंह ( तानाजी ) चला गया । उसी दिन से कोढ़ाणा दुर्ग का नाम सिंहगढ़ हो गया.

तानाजी जैसे स्वामी भक्त वीर तथा क्षत्रपति शिवाजी जैसे वीर स्वामी को कोटि – कोटि नमन.

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