सबके जीवन की चिंता करते हुए अपने कर्तव्यों को धारण करना ही धर्म है – श्री मोहन भागवत जी

हरियाणा प्रान्त के रोहतक में तरुणोंदय शिविर-2015 में अपने तीन-दिवसीय प्रवास पर पूज्यनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने स्थानीय पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित चिकित्सक एवं प्राध्यापक विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म शाश्वत है और यह सभी के लिए कल्याणकारी है। गोष्ठी का विषय ‘वर्तमान परिवेश में हिंदुत्व की प्रासंगिकता’ था।

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि पूजा पद्धति कोई भी हो, धर्म जोडऩे का कार्य करता है। सबके जीवन की चिंता करते हुए अपने कर्तव्यों को धारण करना ही धर्म है। धर्म को संकुचित दायरे में बांधना ठीक नहीं है। देश, काल की परिस्थिति के अनुसार मूल्य और परिस्थितियां बदलती हैं लेकिन सत्य हमेशा रहता है। धर्म वह है, जिसके मूल में समभाव हो। महात्मा बुद्ध ने भी कहा कि धर्म सदा, सर्वदा सबके लिए कल्याणकारी होता है। बिना स्वार्थ के हमे अपना जीवन सेवा व परोपकार के दायरे में जीना चाहिए और प्रेम व कट्टरता के नाम पर संघर्ष नहीं होना चाहिए। सेवा, सहनशीलता, कृतज्ञता जैसे मूल्य हिंदुत्व की पहचान हैं। सेवा करते समय सीमाएं नहीं देखी जातीं।

उन्होंने कहा कि सनातन मूल्य आधारित संस्कृति पर सबका अधिकार है। भारत के दर्शन में आत्मीयता का भाव है। समन्वय की मान्यता व विरासत को भारतीयों को पहचानना चाहिए और अपनी विरासत पर गर्व करना चाहिए। विदेशी आक्रमण व भारतीस समाज को मूल से विस्मृत किए जाने के प्रयासों के चलते भारतीय समाज में कुछ कमजोरियां आईं लेकिन अब समाज के आचरण में मूल्य व बल दोनों को बढ़ाना पड़ेगा ताकि भारत को उत्कर्ष की राह पर पुन: ले जाया जा सके। यही एकमेव उपयुक्त विचार है जो विश्व को राह भी दिखाएगा।

भारतीय संस्कृति भेद व संघर्ष को नहीं मानती। हमे प्रकृति के प्रति भी कृतज्ञता का भाव रखते हुए उसका दोहन करना होगा न कि शोषण । हमें भेद मिटाने होंगे। अपना इतिहास जानना होगा और अपना खोज करके सत्य सभी को बताना होगा।

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