स्वदेशी ज्ञान परंपरा पर स्वाभिमान जागृत करना चाहिये – श्री दत्तात्रय होसबाले

भोपाल (विसंके). भारतीय सनातन विचारधारा की युगानुकूल प्रस्तुति है, दीनदयाल जी उपाध्याय का एकात्म मानववाद. अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण समारोह में वक्ताओं द्वारा व्यक्त विचारों का यही सार था. निबंध प्रतियिगिता का विषय था – “एकात्म मानववाद के विशेष सन्दर्भ में आर्थिक विकास”. विश्व हिन्दू परिषद् के मार्गदर्शक अशोक सिंघल द्वारा प्रयाग में अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ की स्थापना स्वयं का भवन प्रदान कर की गई है. वर्तमान में अनुसन्धान पीठ के अध्यक्ष वरिष्ठ भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी है. वक्ताओं में उक्त दोनों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबाले भी सम्मिलित थे.

कार्यक्रम का प्रारम्भ कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष व सेना के पूर्व लेफ्टीनेंट जनरल मिलन नायडू के स्वागत भाषण से हुआ. तत्पश्चात राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता के विजेता विद्याधर बुद्धिराजू एवं भारत शास्त्री को पुरस्कृत किया गया.

अपने प्रस्ताविक भाषण में पीठ के निदेशक डॉ. चंद्रप्रकाश सिंह ने कहा कि सर्वप्रथम दीनदयाल जी ने 1965 में आयोजित जनसंघ के विजयवाड़ा अधिवेशन में एकात्म मानववाद की संकल्पना को प्रस्तुत किया था. उक्त विचार के पचासवें वर्ष में स्व. दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि 11 फरवरी को कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. दीनदयाल जी 11 फरवरी 1968 को ही हमारे बीच से गये थे. हमारे यहाँ जब कहा जाता है “अहं ब्रह्मोस्मि” मैं ब्रह्म हूँ, तब उसमें अहंकार नहीं होता, क्योंकि अगले ही क्षण सामने वाले से कहा जाता है – “तत्वमसि” तुम भी ब्रह्म हो. जिस प्रकार हर जीवित प्राणी में आत्मा होती है, उसी प्रकार राष्ट्र की आत्मा है चिति. जब चैतन्यता का अभाव होता है, तभी अनेक विकृतियों का जन्म होता है. पूंजीवाद, साम्यवाद के पेंडुलम के बीच झूलते विश्व को मार्ग दिखाने वाला तीसरा चिंतन है एकात्म मानववाद. व्यक्ति के विकास से लेकर सम्पूर्ण सृष्टि के विकास की संकल्पना इसमें समाहित है. अर्थ के अभाव व अर्थ के प्रभाव का अर्थायाम भी इसमें वर्णित किया गया है .

डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि विगत 50-100 वर्षों में अनेक विचार असफल हुये. कम्युनिज्म आज भारत को छोड़कर कहीं नहीं बचा. चाईना ने उसे छोड़कर बाजार प्रणाली अपना ली. एक समय वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता नम्बूदरीपाद सोवियत संघ का उदाहरण देते हुये कहा करते थे कि वहां न गरीबी है, न बेरोजगारी. स्वर्ग है. वह सोवियत संघ 16 देशों में बिखर गया. जवाहरलाल ने 47 के बाद गांधी, पटेल के विरोध के बाबजूद यही मॉडल देश पर थोपा. प्लानिंग कमीशन के माध्यम से कृषि संसाधनों को चूसकर औद्योगिकरण को बढ़ावा दिया गया.

अंग्रेजों के समय में 1857 का जो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ, वह वस्तुतः किसान विद्रोह ही था. रानी झांसी व पेशवा जैसे नायकों का किसानों ने पूरा साथ दिया था. उस संघर्ष को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने किसानों की कमर तोड़ने के लिये जमींदारी प्रथा प्रारम्भ की, उन्हें वसूली अधिकार दिये गये. हमें प्रशासन चलाने को खर्चा चाहिये, इसलिये कुछ भी करो पर किसानों से लगान वसूलो, जो न दे उसकी जमीन छीन लो. उससे काम न चले तो उसके भाई की भी जमीन छीन लो. जवाहरलाल आजादी के बाद भी उसी मार्ग पर आगे बढे़.

उस समय साम्यवाद, समाजवाद व पूंजीवाद से इतर भारतीय संस्कृति आधारित दीनदयाल जी का यह विचार लोगों के लिये कल्पनातीत था. दीनदयाल जी अकस्मात् स्वर्गवासी हो जाने के कारण इस विचार पर शोध नहीं हो सका. दत्तोपंत जी ने इस दिशा में प्रयत्न भी किया. नाना जी देशमुख ने वकल्पिक शोध व अनुसंधान के लिये दीनदयाल शोध संस्थान का गठन किया. किन्तु आपातकाल में वह बिल्डिंग ही जब्त कर ली गई. बाद में दिल्ली के स्थान पर उसे चित्रकूट में प्रारम्भ किया गया, किन्तु दिशा बदल गई, वह शोध के स्थान पर ग्रामोत्थान प्रकल्प हो गया. अब श्रद्धेय अशोक जी सिंघल के प्रयत्नों से पुनः यह प्रयत्न हो रहा है. इस विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन होना चाहिए.

दीनदयाल जी का विचार कम्युनिस्टों व पूंजीपतियों के लिये खतरा था. दीनदयाल जी की ह्त्या में केजीबी का हाथ था. यह कितना संदेहास्पद है कि जिस बोगी में उनका रिजर्वेशन था, उसमें उनके अतिरिक्त सारे यात्री फर्जी थे. किसी का भी असली पहचान पत्र नहीं था, जो पते लिखाये गये थे वे भी गलत थे.

हमें अब उस विचार को अपनाना चाहिये. पश्चिम में समृद्धि होने के बाद भी वहां के लोगों को मानसिक शान्ति नहीं है. इसीलिये अनेकों आस्कर अवार्ड विजेता प्रसिद्ध अमरीकी अभिनेत्री जूलिया रोबर्ट भारत आई और साधारण महिला की तरह गुरू के आश्रम में रही. वापस अमरीका गई तो प्रेस कांफ्रेंस की. अपने पति व दो बच्चों के साथ पत्रकारों से कहा कि जीवन में पहली बार, आज मैं सुखी हूँ. इसका कारण है – हिन्दू धर्म, इसलिये अब मैं हिन्दू हूँ.

कम्युनिज्म हो अथवा पूंजीवाद, इन पश्चिमी विचारों में एक ही आयाम है – कैसे धन कमायें. भौतिकवाद से मनुष्य संतुष्ट नहीं हो सकता. सुखी होने के लिये केवल भौतिक विकास पर्याप्त नहीं है. जो समाज धनपतियों को उच्च स्थान देगा, वह आगे नहीं बढ़ सकता. पुरातन काल में 46 संस्कृतियाँ थीं. उनमें से ग्रीस, रोमन, यूनान आदि 45 समाप्त हो गईं, क्योंकि उन संस्कृतियों में भौतिकवाद था. केवल हिन्दू संस्कृति बची है. जहां भौतिकवाद, वहां लालच और भ्रष्टाचार. जब तक भौतिकवाद रहेगा, भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता. उनके धर्मगुरू भी डायमंड और रूबी के नेकलस पहनते हैं. हमारे उच्चतम साधू केवल सादा भगवा कपड़ा धारण करते हैं. यह भारत की विशेषता है कि यहाँ धन को उच्च नहीं मानते.

हमारे यहाँ पैसा बनाने वाला भी उसे दिखाता नहीं है, क्योंकि सादगी यहाँ का जीवनमूल्य है. किन्तु नई पीढी बदल रही है. अहमदाबाद के आईआईएम में बड़े कम्पीटीशन के बाद प्रवेश मिलता है. मैंने वहां के छात्रों से पूछा कि यहाँ क्यों आये, तो उनका जबाब था – नौकरी, फाईनेंस थ्योरी या इन्वेस्टर कंट्रोल सीखने नहीं, केवल यहाँ से निकलने के बाद नौकरी मिल जायेगी, इसलिए जाते हैं. बेलेन्टाईन डे व नाईट क्लब हमारी कमजोरी बन रहे हैं.

हमारा समाज वर्ण के जन्म से जुड़ने के बाद कमजोर हुआ है. पहले ज्ञान के लिये शोध करने वाले सबसे उच्च माने जाते थे. उनके पास धन नहीं, शस्त्र नहीं, पर वे नीति बनाते थे. शस्त्र वाले क्षत्रिय उनसे पूछकर सब करते थे. हमारे आचार्य राजा को सलाह देते थे. जो धन कमाते थे उनका यश, उनका नाम दान से होता था. मछुआरे की बेटी से पैदा हुए वेदव्यास, दलित बाल्मीकि, पेड़ काटने वाले लकडहारे कालीदास, क्षत्रिय विश्वामित्र ब्राह्मण कहलाये. उस समय शास्त्र, शस्त्र व धन का विकेंद्रीकरण समाज में था. बीच में यह विकृति आ गई. अच्छा तो यह है कि स्वयं को हिन्दू कहें, और कुछ न कहें. भौतिक विकास व आध्यात्म का समन्वय ही एकात्म मानववाद का आधार है. दीनदयाल जी ने बीज रूप में जिस विचार को दिया उसे सिंचित हमें करना चाहिये. इस पर अधिक से अधिक चर्चा व शोध होना चाहिये.

कुछ और बातें इसके साथ जोड़ी जा सकती है. जैसे अंग्रेजी के स्थान पर संस्कृत, भारत की सभी 16 भाषाओं में संस्कृत के शब्द हैं. तमिल में 60 प्रतिशत शब्द तो बंगाली व मलयालम में 90 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं. यहाँ तक कि अंग्रेजी के सबसे बड़े पैरोकार करूणानिधि का नाम भी संस्कृत में ही है. देवनागरी स्कूलों में अनिवार्य की जानी चाहिये. अमेरिका में 20 वर्ष तक शोध हुआ कि कम्प्युटर में आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस किस भाषा में फीड की जा सकती है, तो निष्कर्ष निकला – संस्कृत. नासा में संस्कृत अनिवार्य की गई है. पर हमारे देश में स्थिति विचित्र है. यहाँ कहेंगे तो कम्युनल कहा जाएगा. यूनीफोर्म सिविल कोड का अर्थ होता है, सबके लिये एक क़ानून. अब इससे ज्यादा समाजवादी शब्द क्या होगा ? पर यह मुद्दा उठाएंगे तो कहा जाएगा कम्युनल.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह दत्तात्रय होसबाले जी ने इस अवसर पर कहा कि 71 में डॉ. स्वामी ने स्वदेशी का प्लान जनसंघ के सामने रखा था. आज जब देश उसे छोड़ रहा है, आप तो न छोड़ें. आज अगर भारत में पश्चिमीकृत लोग हैं तो पश्चिम में ऐसे लोग भी हैं जो विचार कर रहे हैं कि हमारा रास्ता ठीक है या नहीं. सारा विश्व एक चौराहे पर खड़ा है. भारत में प्राचीन मनीषियों ने जो विचार प्रतिपादित किये, वे आज भी प्रासंगिक हैं. गांधी जी ने जो सात पाप बताये थे. महर्षि अरविंद ने अपनी सुपर ह्यूमन संकल्पना में अभ्युदय व निःश्रेयस की बात की. अम्बेडकर ने संविधान बनाने के बाद कहा कि उपनिषद् व बौद्ध ग्रंथों के आधार पर समानता का सिद्धांत और इसीलिये एक व्यक्ति एक वोट.

हम सबके अन्दर एक दिव्यांश है, इसलिये हम सब एक हैं. पश्चिम पाप की औलाद मानता है तो हमारे मनीषी कहते हैं वयं अमृतस्य पुत्राः. हम सब अमृत के पुत्र हैं. किन्तु दुर्भाग्य से हमने स्वदेशी विचार को छोड़कर पश्चिम ने जो परोसा, उसे ही ठीक ज्ञान मान लिया. अर्थ शास्त्र, मनोविज्ञान, इकोनोमिक्स, सोशल साईंस सबका मूल पश्चिम, हमारे मूल ज्ञान का शोध बंद हो गया. स्वतंत्रता के बाद यह कार्य क्यों नहीं हुआ ? क्या केवल कुछ लोगों को एमपी, एमएलए बनाने को ही आजाद हुये थे ?

हीन भावना को हटाकर स्वदेशी ज्ञान परंपरा पर स्वाभिमान जागृत करना चाहिये. यह वह ज्ञान है जो दुनिया को भी देने योग्य है. संपत्ति सृजन, वितरण व कंज्म्पशन के विचार में भारत व पश्चिम में समानता है. अगर यह व्यक्ति के हैं तो पूंजीवाद, व राज्य के हैं तो साम्यवाद. भारत का चिंतन गरीबी में रहना नहीं है. गरीबी अलग है सादगी अलग. स्वयं को अजर अमर मानकर ज्ञान और धन दोनों की साधना करना. किन्तु आचरण यह मानकर करना कि पल की खबर नहीं है, कब मृत्यु आकर बाल पकड़ लेगी. हमारे यहाँ गरीबी की नहीं सादगी की पूजा होती है. भ्रम से बाहर आना ही स्वतंत्रता. अर्थ और जीवन में नाव और पानी जैसा सम्बन्ध है. जीवन चलाने के लिये अर्थ उसी प्रकार आवश्यक है जैसे नाव को चलने के लिये पानी जरूरी. किन्तु अगर पानी नाव में आने लगे तो नाव डूब जाएगी, उसी प्रकार धन जीवन को प्रभावित करने लगे तो विकृति आएगी.

मालवीय जी ने कहा कि न्यासिता चाहिये. अर्जित संपत्ति का उपभोग भी न्यासी की तरह करो, स्वामी की तरह नहीं. तभी भामाशाह जन्म लेते हैं. बाहुबली जन्म लेते हैं जो अपना राज्य भाई को सोंपकर चले जाते हैं. कमलपत्र पर पानी जैसा व्यवहार. किन्तु इसके लिये संस्कार की आवश्यकता है और उसके लिये सामाजिक माहौल चाहिये. दुर्भाग्य से इस विचार को आगे नहीं बढ़ाया गया. स्वदेशी देश की जनता के प्रति धार्मिक कर्तव्य है. 1907 में मालवीय जी ने “अभ्युदय” पत्र इसीलिये प्रारम्भ किया था तो गांधी जी ने इसीलिये 1909 में “हिंद्स्वराज” लिखी. पश्चिम के विचार के सम्मुख बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाया. विश्व मानव के विषय में दीनदयाल जी ने गांधी के विचारों को ही आगे बढाया. मानव अलग अलग भागों का जोड़ नहीं है. उसमें एकात्म है. विश्व यंत्र नहीं एक सजीव इकाई है. एकोहम बहुश्यामः. ब्रह्म की इच्छा हुई कि मैं एक से बहुत हो जाऊं और वह हो गया. सम्पूर्ण विश्व उस एक से ही उत्पन्न है. इस भारतीय चिंतन को दीनदयाल जी ने आग्रह पूर्वक रखा.

सुख क्या है ? फोर्ड की पोती भारत के आश्रम में रहती है. बोरेन बफे ने बिलगेट फाउंडेशन को अपनी संपत्ति दान कर दी. परिश्रम व ज्ञान द्वारा संपत्ति का संचय करना चाहिये, किन्तु उपभोग के लिये संस्कार आवश्यक है, उपभोग पर नियंत्रण आवश्यक. व्यक्ति का विचार अहंकार है, किन्तु दूसरा ब्रह्म है, यह कहने से अहंकार नष्ट होता है. हर धर्मग्रन्थ में अलग अलग ढंग से यही बात कही गई है. आज इन विषयों का अध्ययन व शोध आवश्यक है. भारत की नियति है, सारे ब्रह्माण्ड की उन्नति. आने वाले कुछ वर्षों में सृष्टि व परंपरा को बचाते हुये हम आधुनिक भी बनें, और संतुलन रखते हुये आगे बढ़ें.

अशोक सिंघल जी ने कहा कि स्वतंत्रता का प्रारम्भ समाजवाद से हुआ. जवाहरलाल जी उसके पीछे दीवाने थे. उनका मानना था कि सरकार सब काम करेगी. आगे चलकर कांग्रेस के लोगों ने ही इसे गलत माना और नरसिंहाराव पूंजीवाद पर आ गये. सब काम सरकार करेगी तो सम्पन्नता नहीं आयेगी. मैंने नरसिंहाराव से पूछा कि लिबरालाईजेशन व ग्लोबलाईजेशन के जिस मार्ग पर ले जाना चाहते हो, वह सही है क्या ? उस रास्ते से देश के सवा सौ करोड़ लोगों को सामान्य सुख सुविधा प्राप्त होगी क्या ? आज अमीर और अमीर बन रहा है, गरीब और गरीब होता जा रहा है. यही सौगात बाजारवाद से मिली है.

विदेशी शक्तियों के अन्धानुकरण से सरवाईवल ऑफ़ फिटेस्ट होता है, सर्वे भवन्तु सुखिनः नहीं. मुझे मेक इन इंडिया पर नहीं मेड इन इंडिया पर यकीन है. दो रास्ते दुनिया ने देख लिये, तीसरा रास्ता है दीनदयाल जी का. प्राचीन वैदिक सनातन धर्म की परंपरा शास्वत है, जिसमें किसी के प्रति अन्याय नहीं, सबके लिये न्याय है. दीनदयाल जी ने सब काम छोड़कर अध्ययन किया व हम सबके लिये एकात्म मानववाद का निर्माण किया. इस मार्ग पर चलने वाली देश की नीतियाँ बनेंगी, तभी निचले स्तर के व्यक्ति को भी न्याय मिलेगा. सुख सुविधा मिलेगी. यह विषय केवल कुछ निबंध लिखकर, एकेडमिक प्रयत्न से नहीं हल होगा, सभी विश्वविद्यालयों में इस पर चिंतन हो. दुनिया के जो पैटर्न अपनाये गये हैं, वे हमारे लिये उपयुक्त हैं क्या ?

अमरीका में कई थिंक टेंक हैं जो सरकार को सलाह देते हैं. सरकार की नीति अच्छी हो तो आसमान में फैला देते हैं और अगर गलत हो तो डस्टबिन में फेंक देते हैं. भारत में ऐसा कोई प्रयास नहीं होता. भारत के थिंक टेंक विदेशों के लिये काम करते हैं. एक बार अरुण शौरी बोल रहे थे कि सारी नीतियाँ विदेशों को सहारा देने वाली हैं. विचारों का अकाल पडा हुआ है. यह अकाल समाप्त हो सकता है.

विश्वविद्यालयों में अच्छे विचारवान ढूंढें जा सकते हैं. केवल कुछ आईएएस और प्रधानमंत्री नीतियाँ बनायें, यह पर्याप्त नहीं है. इस प्रकार तो हम अज्ञान के अन्धकार की ओर जा रहे हैं. हम अज्ञान में डूबे रहे तो दूसरे लाभ उठाते रहेंगे. जैसे पहले इस्लाम ने, फिर अंग्रेजों ने और उसके बाद अपने ही देशवासियों ने उठाया. यह प्रक्रिया समाप्त होनी चाहिये.

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