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हिन्दुत्व की राह पर चल कर ही भारत फिर बनेगा विश्व गुरु – डॉ. मोहन भागवत जी

कोलकत्ता. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भगिनी निवेदिता के 150वें जन्मदिवस पर कोलकत्ता में राष्ट्रवाद विषय पर आयोजित सम्मेलन में कहा कि स्वामी विवेकानंद जी ने जो राह चुनी थी, वह व्यक्ति व समाज को तैयार करने की थी. भगिनी निवेदिता ने स्वामी जी के आदेश का पूर्ण अनुशासन से पालन कर अपने लिए जो दिशा तय की, वह उस समय चल रही व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए थी.

भगिनी के जीवन में एक विशेष बात है कि वह जन्मता यूरोप की थी, परंतु उसने अपने मानस को संपूर्ण रूप से बदलते हुए भारत के साथ अपने आप को एकाकार किया. विदेश में जन्मे एक व्यक्ति ने अपनी भक्ति बल पर यह किया है तो क्या हम करोड़ों भारतवासी आज की तारीख में स्वतंत्र देश में अपनी भक्ति इतनी नहीं बढ़ा सकते कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति का जीवन भारत के साथ तन्मय हो जाए.

यह हमारा कर्तव्य बनता है और निवेदिता हमारे सामने आदर्श के रूप में है. हमें निवेदिता के जीवन का बारिकी से अध्ययन करना चाहिए. निवेदिता कहती थी कि भारत की सभी समस्याओं के मूल में भारत को अपने भारतपन का अहसास नहीं होना है. भारत की जनता को इसका अहसास कराना होगा. भगिनी कहती थीं कि भारत और भारतीयता का, भारत व आध्यात्मिकता का अटूट संबंध है. इसलिए भारत को कोई मिटा नहीं सकता. इस राष्ट्रीयता के धर्म को निभाना है तो अपना सारा स्वार्थ त्यागना होगा. देश को अखंड बनाना है तो धर्म, संप्रदाय के नाम पर होने वाली हिंसा को समाप्त करना होगा. देश के लिए आपसी मतभेद को भूल कर कार्य करना होगा.

सरसंघचालक जी ने कहा कि 1940 तक हम भारत को एक अखंड प्राचीन राष्ट्र मानते थे. लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में हुए रक्तपात के बाद यह विचारधारा टूट गई. हम भारत को सांस्कृतिक राष्ट्र मानना भूल गए. इससे ही देश को नुकसान हुआ है. सब क्षेत्रों में भारतीयों को भारत के लिए दिग्विजय करना पड़ेगा. उस दिग्विजय को कर सकने के लिए और अपने धर्म को नई अभिव्यक्ति देने के लिए विश्व में जो लेने लायक हो, उसे लेकर भारतीय रूप देकर अपनाने के लिए संगठन की कला सीखनी पड़ेगी. संगठन की कला सीखने के लिए संवेदनशील, चारित्र संपन्न, आत्मीय व्यवहार को सारे समाज को सीखना पड़ेगा. अपने जीवन से प्रारंभ करके अपने परिवार, गांव, मौहल्ले के जीवन से होते हुए संपूर्ण सामाजिक जीवन को हम ऐसा खड़ा करेंगे कि भारत के राष्ट्रीयता का वो सनातन क्षुण प्रवाह अजयसर रूप लेकर फिर से बहने लगेगा और सारी दुनिया उसके सामने नतमस्तक होकर फिर एक बार विश्व गुरू सिंहासन पर अपनी भारत माता को बिठाएगी. दो हस्तों से अभय प्रदान करने वाली उस भारतमाता के रूप को इसी जीवन में इन्हीं आंखों से देखने के लिए भगिनी निवेदिता के उस उपदेश को समझ कर अपने जीवन का अंग बनाने की आवश्यकता है.

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