Bipin

​भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रतिष्ठित नेता ​बिपिन चंद्र पाल / पूण्य तिथि – 20 मई

​भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रतिष्ठित नेता और बंगाल पुनर्जागरण के मुख्य वास्तुकार बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर, 1858 को आज के बांग्लादेश में हुआ था. संपन्न हिंदू वैष्णव परिवार से संबंधित बिपिन चंद्र पाल एक राष्ट्रभक्त होने के साथ-साथ एक उत्कृष्ट वक्ता, लेखक और आलोचक भी थे. पाल उन महान विभूतियों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई. वे मशहूर लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक एवं विपिनचन्द्र पाल) तिकड़ी का हिस्सा थे.  इस तिकड़ी ने अपने तीखे प्रहार से अंग्रेजी हुकुमत की चूलें हिला दी थी. उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक भी माना जाता है.
उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन बड़ा योगदान दिया जिसे बड़े पैमाने पर जनता का समर्थन मिला। लाल-बाल-पाल की इस तिकड़ी ने महसूस किया कि विदेशी उत्पादों से देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ रही है और लोगों का काम भी छिन रहा है। अपने ‘गरम’ विचारों के लिए मशहूर पाल ने स्वदेशी आन्दोलन को बढ़ावा दिया और ब्रिटेन में तैयार उत्पादों का बहिष्कार, मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़ों से परहेज तथा औद्योगिक तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल आदि हथिआरों से ब्रिटिश हुकुमत की नीद उड़ा दी।

महात्मा गांधी के राजनीति में आने से पहले वर्ष 1905 में  लाल बाल पाल  (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) पहला ऐसा क्रांतिकारी गुट था जिसने बंगाल विभाजन के समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उपद्रव छेड़ा था.  वर्ष 1907 में जब बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए गए उस समय बिपिन चंद्र पाल भी इंग्लैंड चले गए और वहां जाकर इंडिया हाउस के साथ जुड़ गए तथा स्वराज नामक पत्रिका की स्थापना की.

उन्होंने कई मौक़ों पर महात्मा गांधी जैसे नेताओं की आलोचना भी की और उनके विचारों का विरोध भी किया। सन 1921 में गांधीजी की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, ‘’आप के विचार तार्किक नहीं बल्कि जादू पर आधारित हैं”।

बिपिन चंद्र पाल कई प्रतिष्ठित और चर्चित बंगाली नेताओं के संपर्क में आए. ब्रह्म समाज में रहते हुए बिपिन चंद्र पाल केशव चंद्र और सिबनाथ शास्त्री के बेहद करीबी बन गए थे. वंदे मातरम् राजद्रोह मामले में उन्होंने  अरबिन्दो घोष के ख़िलाफ़ गवाही देने से इंकार कर दिया जिसके कारण उन्हें 6 महीने की सजा हुई।

20 मई 1932 को इस महान क्रन्तिकारी का कोलकाता में निधन हो गया।

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