11 November

गुरु तेग बहादुर – शहीदी दिवस / 11 नवंबर, 1675

यह गाथा है-वीर योद्धा, कुशल संगठक, राष्ट्र नायक और महान साधक नवें गुरु तेगबहादुर की। उनके बलिदान ने हमें हिन्दुत्व की साधना और धर्म रक्षा के लिये प्रेरित किया । उस समय क्रूर मुगल औरंगजेब के अत्याचार चरम सीमा पर थे. हिन्दुओं पर उसने जजिया कर लगा दिया.  अपने पूरे राज्य में उस विदेशी आक्रमणकारी ने हिन्दू उत्सवों पर पाबन्दी लगा दी . उसने काशी विश्वनाथ, कृष्ण जन्मभूमि तथा सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिरों को ध्वस्त कर दिया. अकेले मेवाड़ में कोई ढाई सौ प्रसिद्ध देव स्थानों को उस पाखण्डी ने तुड़वा दिया.

ऐस में गुरु तेगबहादुर को देशभर में घूम कर समाज का मनोबल टिकाये रखने की जरूरत लगी. अतः भाद्रपद विक्रमी 1722 में वे आनन्दपुर साहिब से निकल पड़े. उनके साथ उनके शिष्य थे- भाई दयालदास,  भाई मतिदास,  भाई सतीदास,  भाई जेठा,  भाई गुरुदास आदि . धमधाण (जींद) में औरंगजेब के हुक्म से आलम खॉं रूहेला ने सभी को बन्दी बना लिया और दिल्ली पहुँचा दिया. औरंगजेब ने नवम गुरु को इस्लाम स्वीकार करने को कहा तो गुरुजी ने निर्भयता से उत्तर दिया-
“”हिन्दू धर्म रखहिं जग मांही । तुमरे करे विनस है नाहीं ।।””
(हम हिन्दू धर्म की रक्षा करेंगे तथा तुम्हारी कोशिशों के बाद भी हम नष्ट होने वाले नहीं है.)

वध का हुक्म

औरंगजेब यह सुनकर गुस्से में अपने होश खो बैठा और गुरु तेगबहादुर का वध करने का हुक्म दे दिया. मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह ने बीच-बचाव कर औरंगजेब को गुरु जी को रिहा करने के लिए मना लिया.  मुगलों की गुलामी के बावजूद रामसिंह का कुछ तो हिन्दुत्व बचा हुआ था. अब गुरु तेगबहादुर ने फिर से अपनी यात्रा आरम्भ कर दी.  कुरुक्षेत्र, मथुरा, आगरा, लखनऊ होते वे अयोध्या पहुँचे. हर जगह  उनके दर्शनों के लिए लोग उमड़ पड़ते.  गुरू जी लोगों को ढाढस बंधाते,  अत्याचारी विदेशी शासन से शीघ्र मुक्त होने की बात बताते व आगे बढ़ जाते. छत्रपति शिवाजी महाराज के द्वारा औरंगजेब के मान- मर्दन के समाचारों से उन्हें प्रसन्नता हो रही थी. देश भर की हिन्दू-शक्ति संगठित होकर हमलावरों को देश से मार भगाये-यह कल्पना काफी दिनों से उनके मन में थी.  इस बीच औरंगजेब ने काशी, प्रयाग,  हरिद्वार व कश्मीर के ब्राह्मणों पर नृशंस अत्याचार शुरू कर दिये. कश्मीरी पण्डितों ने अपनी रक्षा के लिए गुरू तेगबहादुर के दरबार में जाने का विचार किया.

आपसे बढ़ कर कौन

चार वर्ष बाद गुरूदेव फिर से आनन्दपुर लौटे.  कुछ ही दिनों बाद कश्मीरी पण्डित आनन्दपुर साहिब पहुँचे. प्रतिदिन हजारों हिन्दुओं की हत्या,  मुसलमान बनाने के लिए किये जा रहे अत्याचार तथा मंदिरों को ध्वस्त करने की घटनायें गुरू दरबार में बता कर पण्डितों ने गुरु जी से सुरक्षा देने की गुहार की . गुरू तेगबहादुर का तो जीवन-कार्य ही अपने हिन्दू धर्म की रक्षा करने का भगीरथ प्रयत्न था. सारी बातें सुन कर वे सोच में पड़ गये. कुछ समय के मनोमन्थन के बाद वे बोल उठे- “इस समय देश और धर्म की रक्षा का एकमात्र उपाय किसी महापुरूष का बलिदान है. ‘ उन्होंने कश्मीरी पण्डितों से कहा- “देवताओं जाकर औरंगजेब से कह दो कि यदि तेगबहादुर को मुसलमान बना लिया तो बाकी सब मुसलमान बन जायेंगे. ‘ यह कह कर गुरुजी दिल्ली जाने की तैयारी करने लगे. 

और बन्दी बना लिये गये

औरंगजेब को जब कश्मीर के पण्डितों ने गुरु तेगबहादुर का संदेश दिया तो वह मन ही मन पुलकित हो उठा . उधर गुरु तेगबहादुर ने आषाढ़ कृष्ण एकादशी को गोविन्दराय को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और दो दिन बाद दिल्ली की ओर चल पड़े.  भाई मतिदास,  सतीदास,  दयालदास तथा बाबा गुरुदित्ता उनके साथ थे. गुरू जी ओंकार सतनाम का जाप करते हुए दिल्ली की ओर बढ़ते जा रहे थे कि रास्ते में मलिकपुर रंगड़ा गॉंव में सरहिन्द के सूबेदार ने गुरू जी को बन्दी बना लिया.  उस समय औरंगजेब दिल्ली से बाहर था. अतः चार महिने तक गुरु तेगबहादुर सरहिन्द के कैदखाने में रहे. औरंगजेब के दिल्ली लौटने के बाद गुरू जी व उनके तीनों साथियों को दिल्ली लाया गया. गुरू तेगबहादुर के मुसलमान बनने से दृढ़तापूर्वक मना कर देने के साथ ही उनको भीषण यातनाऐं देने का सिलसिला शुरू हो गया. तीन दिनों तक उनको व उनके शिष्यों को पानी की एक बूंद तक नहीं दी गई.  मस्तक पर जलती बालू डाली गई तथा तपते लोहे के खम्भे से पीठ सटाकर खड़ा कर दिया गया पर गुरू जी और उनके तीनों शिष्य शान्त भाव से ये यातनाएं सहते रहे.


आखिर मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पंचमी (11 नवम्बर 1675) आ गई. गुरूवार का दिन था,  दिल्ली की कोतवाली के पास गुरूदेव व उनके शिष्यों को लाया गया. गुरु तेगबहादुर को अपने निश्चय से डिगाने के लिए भाई मतिदास को आरे से चिरवाया गया. इसके बाद भाई दयालदास को खौलते पानी से भरे देग में डाल दिया गया.  गुरू तेगबहादुर अधमुंदी आंखों से यह सब देख रहे थे तथा अपने शिष्यों के बलिदान की प्रशंसा कर रहे थे. अब बारी थी भाई सतीदास की. उन्हें रूई में पूरी तरह लपेटा गया और रूई में आग लगा दी गई.  गुरू जी ने धन्य-धन्य कहा.

अब जल्लाद गुरू तेगबहादुर का वध करने को उद्यत हुआ. गुरू जी शान्ति के साथ जापु जी का पाठ कर रहे थे. निर्विकार भाव से उन्होंने कहा- ” हिन्दू धर्म के काज आज मम देह लटेगी’  और हाथ बॉध कर धर्म रक्षा के लिए अपना शीश देने की तैयारी कर ली.  गुरू तेगबहादुर के इस अप्रतिम बलिदान ने हिन्दू समाज में प्राण फूंक दिये । दिल्ली के चांदनी चौक में उसी स्थान पर बना हुआ गुरुद्वारा शीश गंज आज भी हमें गुरु तेगबहादुर के बलिदान (शीशदान) की याद दिलाता है. 

Reference from : http://www.sikh-history.com/sikhhist/martyrs/nanak9martyr.html

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