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“बाबासाहेब” एक अनुकरणीय व्यक्तित्व – प्रवीण गुगनानी

हिन्दू समाहित जाति व्यवस्था को लेकर बोधिसत्व बाबा साहेब का जिस प्रकार का मुखर विरोध रहा वह किसी से छुपा नहीं है और यह विरोध उनकें द्वारा एक दीर्घ रचना संसार के रूप में प्रकट हुआ है. जाति व्यवस्था को ही लेकर महात्मा गांधी से उनका विरोध भी सर्व विदित है. किन्तु एक वाक्य है […]

13 April 2017
 
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कश्मीर के चुनाव में अब्दुल्ला परिवार की रणनीति – डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पिछले चार पाँच महीनों से महरूम शेख़ अब्दुल्ला का परिवार  कश्मीर घाटी में बहुत बैचेन हो उठा था । घाटी में अब जब महरूम शेख अब्दुल्ला के परिवार की बात चलती है तो उसमें केवल दो का नाम ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ पाता है । सर्वप्रथम शेख़ अब्दुल्ला के सुपुत्र फारुक अब्दुल्ला का […]

2 April 2017
 
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हिन्दू धर्म के आदि रक्षक संत रैदास – प्रवीण गुगनानी

10 फर. माघ पूर्णिमा, संत रविदास जयंती पर विशेष – लगभग सवा छः सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी के मड़ुआडीह ग्राम में संतोख दास और कर्मा देवी के परिवार में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म […]

9 February 2017
 
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तीन तलाक के मुद्दे पर प्रगतिशील बनें मुस्लिम समाज – प्रवीण गुगनानी

तीन तलाक पर प्रगतिशील बने मुस्लिम समाज : भारत में समान नागरिक संहिता पर विवाद कोई नया मामला नहीं है. केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक के विरोध में न्यायालय में हलफनामा दर्ज कराने के बाद यह विवाद पुनः उभर गया है. अब आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने तीन तलाक के मुद्दे पर विधि […]

14 October 2016
 
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क्या है मूलनिवासी अवधारणा ? – प्रवीण गुगनानी

9 अगस्त मूलनिवासी दिवस पर विशेष – भारतीय दलित व जनजातीय समाज में इन दिनों एक नया शब्द चल पड़ा है, – मूलनिवासी. इस मूलनिवासी शब्द के नाम पर एक प्राचीन षड्यंत्र को नए रूप, नए कलेवर और नए आवरण में बांधकर एक विद्रूप वातावरण उत्पन्न करनें का प्रयास किया जा रहा है. मुझे लगता […]

8 August 2016
 
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मोजाम्बिक से हिंदमहासागर में सशक्त भारत – प्रवीण गुगनानी

भारतीय वैश्विक नेता महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से खासे सम्बंध रहे हैं. उस नाते से भारत में सदैव ही दक्षिण अफ्रीका का व अफ्रीका में महात्मा गांधी का सशक्त व सम्मानीय उल्लेख होता रहा है. इस स्थिति के बाद भी साढ़े तीन दशक के बाद नमो के रूप में कोई भारतीय प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका […]

14 July 2016
 
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अात्मघाती हमलावर मजहबी हैं या विक्षप्त ?

साभार न्यूज़ भारती (ओर्गेनाइजर में प्रकाशित प्रख्यात लेखिका मारिया विर्थ के अंग्रेजी लेख का हिन्दी रूपांतर) इतिहास के पन्नों में ईसाई धर्म और इस्लाम दोनों को भी साम्यवाद, फासीवाद और नाजीवाद के समान इंसानी जिंदगियां छीनने का दोषी मानकर दर्ज किया गया है! इसमें कोई शक नहीं है कि आज की दुनिया में भी यह […]

8 July 2016
 
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जाति व्यवस्था बनाम बाबासाहेब और गांधी – प्रवीण गुगनानी

जात जात के फेर में उलझ रहे सब लोग | मनुष्यता को खा रहा, रैदास जात का रोग || जात-जात में जात है, ज्यों केले में पात | रैदास मानस न जुड़ सकें, जब तक जात न जात || – संत रैदास बाबासाहेब अम्बेडकर के विचार विश्व का प्रारम्भ इस उनके इस कथन से माना […]

18 April 2016
 
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नतद्रष्ट पर्यावरणवादियों को पवित्रता अभी याद आई ? – दिलीप धारूरकर

भारत के विरोधियों ने मानो पर्यावरण, पुनर्वास जैसे शब्दों का प्रयोग कूटशब्द की तरह इस देश की अस्मिता,  विकास और संस्कृति को विरोध करने के लिए करने की जैसै ठान ली है। प्राकृतिक संसाधनों  और तेज बुद्धी धारण  करनेवाले मानव संसधाधनों का वरदान प्राप्त भारत आनेवाले कुछ दिनों में विश्व की महासत्ता होगा, यह भविष्यवाणी […]

16 March 2016
 
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मुगल शासकों को महान बताना देश का अपमान है, जानिए क्यूँ ?

कुछ चाटुकार सेकुलरवादियों तथा वामपंथी इतिहासकारों ने मुगल शासनकाल में भारतीय राष्ट्रीयता की विवेचना तथा स्वरूप को तथ्यरहित तथा मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया है। इन्होंने मुगल शासनकाल को भारत का ‘ शानदार युग’   तथा मुगल शासकों को ‘ महान ‘   बताया है। भारत के मुगल शासकों में पहले छह शासक ( 1526-1707) ही […]

9 February 2016