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देश की स्वाधीनता के लिए जिसने भी त्याग और बलिदान दिया, वह धन्य है; पर जिस घर के सब सदस्य फांसी चढ़ गये, वह परिवार सदा के लिए पूज्य है। चाफेकर  बंधुओं का परिवार ऐसा ही था।

1897 में पुणे में भयंकर प्लेग फैल गया। इस बीमारी को नष्ट करने के बहाने से वहां का प्लेग कमिश्नर सर वाल्टर चार्ल्स रैण्ड मनमानी करने लगा। उसके अत्याचारों से पूरा नगर त्रस्त था। वह जूतों समेत रसोई और देवस्थान में घुस जाता था। उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए चाफेकर बंधु दामोदर एवं बालकृष्ण ने 22 जून, 1897 को उसका वध कर दिया।

इस योजना में उनके दो मित्र गणेश शंकर और रामचंद्र द्रविड़ भी शामिल थे। ये दोनों सगे भाई थे; पर जब पुलिस ने रैण्ड के हत्यारों के लिए 20,000 रु. पुरस्कार की घोषणा की, तो इन दोनों ने मुखबिरी कर दामोदर हरि चाफेकर को पकड़वा दिया, जिसे 18 अपै्रल, 1898 को फांसी दे गयी। बालकृष्ण की तलाश में पुलिस निरपराध लोगों को परेशान करने लगी। यह देखकर उसने आत्मसमर्पण कर दिया।

इनका एक तीसरा भाई वासुदेव भी था। वह समझ गया कि अब बालकृष्ण को भी फांसी दी जाएगी। ऐसे में उसका मन भी केसरिया बाना पहनने को मचलने लगा। उसने मां से अपने बड़े भाइयों की तरह ही बलिपथ पर जाने की आज्ञा मांगी। वीर माता ने अश्रुपूरित नेत्रों से उसे छाती से लगाया और उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख दिया।

अब वासुदेव और उसके मित्र महादेव रानडे ने दोनों द्रविड़ बंधुओं को उनके पाप की सजा देने का निश्चय किया। द्रविड़ बन्धु पुरस्कार की राशि पाकर खाने-पीने में मस्त थे। आठ फरवरी, 1899 को वासुदेव तथा महादेव पंजाबी वेश पहन कर रात में उनके घर जा पहुंचे। वे दोनों अपने मित्रों के साथ ताश खेल रहे थे। नीचे से ही वासुदेव ने पंजाबी लहजे में उर्दू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुम दोनों को बु्रइन साहब थाने में बुला रहे हैं।

थाने से प्रायः इन दोनों को बुलावा आता रहता था। अतः उन्हें कोई शक नहीं हुआ और वे खेल समाप्त कर थाने की ओर चल दिये। मार्ग में वासुदेव और महादेव उनकी प्रतीक्षा में थे। निकट आते ही उनकी पिस्तौलें गरज उठीं। गणेश की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गयी और रामचंद्र चिकित्सालय में जाकर मरा। इस प्रकार दोनों को देशद्रोह का समुचित पुरस्कार मिल गया।

पुलिस ने शीघ्रता से जाल बिछाकर दोनों को पकड़ लिया। वासुदेव को तो अपने भाइयों को पकड़वाने वाले गद्दारों से बदला लेना था। अतः उसके मन में कोई भय नहीं था। अब बालकृष्ण के साथ ही इन दोनों पर भी मुकदमा चलाया गया। न्यायालय ने वासुदेव, महादेव और बालकृष्ण की फांसी के लिए क्रमशः आठ, दस और बारह मई, 1899 की तिथियां निश्चित कर दीं।

आठ मई को प्रातः जब वासुदेव फांसी के तख्ते की ओर जा रहा था, तो मार्ग में वह कोठरी भी पड़ती थी, जिसमें उसका बड़ा भाई बालकृष्ण बंद था। वासुदेव ने जोर से आवाज लगाई, ‘‘भैया, अलविदा। मैं जा रहा हूं।’’ बालकृष्ण ने भी उतने ही उत्साह से उत्तर दिया, ‘‘हिम्मत से काम लेना। मैं बहुत शीघ्र ही आकर तुमसे मिलूंगा।’’

इस प्रकार तीनों चाफेकर बंधु मातृभूमि की बलिवेदी पर चढ़ गये। इससे प्रेरित होकर 16 वर्षीय किशोर विनायक दामोदर सावरकर ने एक मार्मिक कविता लिखी और उसे बार-बार पढ़कर सारी रात रोते रहे।

#ChapekarBrothers  #vskgujarat.com

मातृभूमि की सेवा के लिए व्यक्ति की शिक्षा, आर्थिक स्थिति या अवस्था कोई अर्थ नहीं रखती। दिल्लीवासी क्रांतिवीर अवधबिहारी ने केवल 25 वर्ष की अल्पायु में ही अपना शीश मां भारती के चरणों में समर्पित कर दिया।

अवधबिहारी का जन्म चांदनी चैक, दिल्ली के मोहल्ले कच्चा कटरा में 14 नवम्बर, 1889 को हुआ था। इनके पिता श्री गोविन्दलाल श्रीवास्तव जल्दी ही स्वर्ग सिधार गये। अब परिवार में अवधबिहारी, उनकी मां तथा एक बहिन रह गयी। निर्धनता के कारण प्रायः इन्हें भरपेट रोटी भी नहीं मिल पाती थी; पर अवधबिहारी बहुत मेधावी थे। गणित में सदा उनके सौ प्रतिशत नंबर आते थे। उन्होंने सब परीक्षाएं प्रथम श्रेणी और कक्षा में प्रथम आकर उत्तीर्ण कीं।

छात्रवृत्ति और ट्यूशन के बल पर अवधबिहारी ने सेंट स्टीफेंस काॅलिज से 1908 में प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक लेकर बी.ए किया। उनकी रुचि पढ़ाने में थी, अतः वे लाहौर गये और सेंट्रल टेªनिंग काॅलिज से बी.टी की परीक्षा उत्तीर्ण की। टेªनिंग काॅलिज के एक अंग्रेज अध्यापक ने इनकी प्रतिभा और कार्यक्षमता देखकर कहा था कि ऐसे बुद्धिजीवी युवकों से अंग्रेजी शिक्षा और सभ्यता के प्रसार में बहुत सहायता मिल सकती है; पर उन्हें क्या पता था कि वह युवक आगे चलकर ब्रिटिश शासन की जड़ें हिलाने में ही लग जाएगा।

शिक्षा पूरी कर अवधबिहारी दिल्ली में संस्कृत हाईस्कूल में अध्यापक हो गये; पर वह सरकारी विद्यालय स्वाधीनता के उनके कार्य में बाधक था। अतः उसे छोड़कर वे लाला हनुमन्त सहाय द्वारा स्थापित नेशनल हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। दिल्ली में उनकी मित्रता मास्टर अमीरचंद आदि क्रांतिकारियों से हुई, जो बम-गोली के माध्यम से अंग्रेजों को देश से भगाना चाहते थे।

मास्टर अमीरचन्द, लाला हनुमन्त सहाय, मास्टर अवध बिहारी, भाई बालमुकुन्द और बसन्त कुमार विश्वास द्वारा लार्ड हार्डिंग नामक ब्रिटिश वायसराय को जान से मार डालने की एक क्रान्तिकारी योजना बनाई . 23 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली में वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभायात्रा  में इन्होंने एक भीषण बम फेंका। वायसराय हाथी पर बैठा था। निशाना चूक जाने से वह मरा तो नहीं; पर बम से उसके कंधे, दायें नितम्ब और गर्दन में भारी घाव हो गये। शासन ने इसकी जानकारी देने वाले को एक लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की। शासन ने कुछ लोगों को पकड़ा, जिनमें से दीनानाथ के मुखबिर बन जाने से इस विस्फोट में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गये।  मास्टर अमीरचन्द, लाला हनुमन्त सहाय, मास्टर अवध बिहारी, भाई बालमुकुन्द और बसन्त कुमार विश्वास द्वारा लार्ड हार्डिंग नामक ब्रिटिश वायसराय को जान से मार डालने की एक क्रान्तिकारी योजना थी

न्यायालय में अवधबिहारी पर यह आरोप लगाया गया कि बम में प्रयुक्त टोपी उन्होंने ही बसंतकुमार के साथ मिलकर लगायी थी। उन दिनों देश में अनेक विस्फोट हुए थे। अवधबिहारी को उनमें भी शामिल दिखाया गया। सजा सुनाते हुए न्यायाधीश ने लिखा – अवधबिहारी जैसा शिक्षित और मेधावी युवक किसी भी जाति का गौरव हो सकता है। यह साधारण व्यक्ति से हजार दर्जे ऊंचा है। इसे फांसी की सजा देते हुए हमें दुख हो रहा है। 11 मई, 1915 इनकी फांसी की तिथि निर्धारित की गयी।

फांसी से पूर्व इनकी अंतिम इच्छा पूछी गयी, तो इन्होंने कहा कि अंग्रेजी साम्राज्य का नाश हो। जेल अधिकारी ने कहा कि जीवन की इस अंतिम वेला में तो शांति रखो। अवधबिहारी ने कहा, ‘‘कैसी शांति ? मैं तो चाहता हूं भयंकर अशांति फैले, जिसमें यह विदेशी शासन और भारत की गुलामी भस्म हो जाए। क्रांति की आग से भारत कुंदन होकर निकले। हमारे जैसे हजार-दो हजार लोग नष्ट भी हो जाएंगे, तो क्या ?’’

यह कहकर उन्होंने फंदा गले में डाला और वन्दे मातरम् कहकर रस्सी पर झूल गये। उस कारागार और फांसीघर के स्थान पर आजकल मौलाना आजाद मैडिकल कॉलिज बना है।

#AvadhBihari

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतवासियों ने एक दिन के लिए भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। आक्रमणकारी चाहे जो हो; भारतीय वीरों ने संघर्ष की ज्योति को सदा प्रदीप्त रखा। कभी वे सफल हुए, तो कभी अहंकार, अनुशासनहीनता या जातीय दुरभिमान के कारण विफलता हाथ लगी।

अंग्रेजों को भगाने का पहला संगठित प्रयास 1857 में हुआ। इसके लिए 31 मई को देश की सब छावनियों में एक साथ धावा बोलने की योजना बनी थी; पर दुर्भाग्यवश यह विस्फोट मेरठ में 10 मई को ही हो गया। अतः यह योजना सफल नहीं हो सकी और स्वतन्त्रता 90 साल पीछे खिसक गयी।

1856 के बाद अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूस दिये, जिन्हें मुंह से खोलना पड़ता था। हिन्दू गाय को पूज्य मानते थे और मुसलमान सुअर को घृणित। इस प्रकार अंग्रेज दोनों को ही धर्मभ्रष्ट कर रहे थे। सैनिकों को इसके बारे में कुछ पता नहीं था।

दिल्ली से 70 कि.मी. दूर स्थित मेरठ उन दिनों सेना का एक प्रमुख केन्द्र था। वहां छावनी में बाबा औघड़नाथ का प्रसिद्ध शिवमन्दिर था। इसका शिवलिंग स्वयंभू है। अर्थात वह स्वाभाविक रूप से धरती से ही प्रकट हुआ है। इस कारण मन्दिर की सैनिकों तथा दूर-दूर तक हिन्दू जनता में बड़ी मान्यता थी।

मन्दिर के शान्त एवं सुरम्य वातावरण को देखकर अंग्रेजों ने यहां सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र बनाया। भारतीयों का रंग अपेक्षाकृत सांवला होता है, इसी कारण यहां स्थित पल्टन को ‘काली पल्टन’ और इस मन्दिर को ‘काली पल्टन का मन्दिर’ कहा जाने लगा। मराठों के अभ्युदय काल में अनेक प्रमुख पेशवाओं ने अपनी विजय यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व यहां पूजा-अर्चना की थी। इस मन्दिर में क्रान्तिकारी लोग दर्शन के बहाने आकर सैनिकों से मिलते और योजना बनाते थे। कहते हैं कि नानासाहब पेशवा भी साधु वेश में हाथी पर बैठकर यहां आते थे। इसलिए लोग उन्हें ‘हाथी वाले बाबा’ कहते थे।

नानासाहब, अजीमुल्ला खाँ, रंगो बापूजी गुप्ते आदि ने 31 मई को क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना बनाई थी। छावनियों व गांवों में रोटी और कमल द्वारा सन्देश भेजे जा रहे थे; पर अचानक एक दुर्घटना हो गयी। 29 मार्च को बंगाल की बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे के नेतृत्व में कुछ सैनिकों ने समय से पूर्व ही विद्रोह का बिगुल बजाकर कई अंग्रेज अधिकारियों का वध कर दिया।

इसकी सूचना मेरठ पहुंचते ही अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों से शस्त्र रखवा लिये। सैनिकों को यह बहुत खराब लगा। वे स्वयं को पहले ही अपमानित अनुभव कर रहे थे। क्योंकि मेरठ के बाजार में घूमते समय अनेक वेश्याओं ने उन पर चूडि़यां फेंककर उन्हें कायरता के लिए धिक्कारा था।

बंगाल में हुए विद्रोह से उत्साहित तथा वेश्याओं के व्यवहार से आहत सैनिकों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने 31 मई की बजाय 10 मई, 1857 को ही हल्ला बोलकर सैकड़ों अंग्रेजों को मार डाला। उनके नेताओं ने अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम बताते हुए उन्हें बहुत समझाया; पर वे नहीं माने।

मेरठ पर कब्जा कर वे दिल्ली चल दिये। कुछ दिन तक दिल्ली भी उनके कब्जे में रही। इस दल में लगभग 250 सैनिक वहाबी मुस्लिम थे। उन्होंने दिल्ली जाकर बिना किसी योजना के उस बहादुरशाह ‘जफर’ को क्रान्ति का नेता घोषित कर दिया, जिसके पैर कब्र में लटक रहे थे। इस प्रकार समय से पूर्व योजना फूटने से अंगे्रज संभल गये और उन्होंने क्रान्ति को कुचल दिया।

मेरठ छावनी में प्राचीन सिद्धपीठ का गौरव प्राप्त ‘काली पल्टन का मन्दिर’ आज नये और भव्य स्वरूप में खड़ा है। 1996 ई. में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के हाथों मन्दिर का पुनरुद्धार हुआ।

#1857Kranti

देश की स्वाधीनता के लिए जिसने भी त्याग और बलिदान दिया, वह धन्य है; पर जिस घर के सब सदस्य फांसी चढ़ गये, वह परिवार सदा के लिए पूज्य है। चाफेकर  बंधुओं का परिवार ऐसा ही था।

1897 में पुणे में भयंकर प्लेग फैल गया। इस बीमारी को नष्ट करने के बहाने से वहां का प्लेग कमिश्नर सर वाल्टर चार्ल्स रैण्ड मनमानी करने लगा। उसके अत्याचारों से पूरा नगर त्रस्त था। वह जूतों समेत रसोई और देवस्थान में घुस जाता था। उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए चाफेकर बंधु दामोदर एवं बालकृष्ण ने 22 जून, 1897 को उसका वध कर दिया।

इस योजना में उनके दो मित्र गणेश शंकर और रामचंद्र द्रविड़ भी शामिल थे। ये दोनों सगे भाई थे; पर जब पुलिस ने रैण्ड के हत्यारों के लिए 20,000 रु. पुरस्कार की घोषणा की, तो इन दोनों ने मुखबिरी कर दामोदर हरि चाफेकर को पकड़वा दिया, जिसे 18 अपै्रल, 1898 को फांसी दे गयी। बालकृष्ण की तलाश में पुलिस निरपराध लोगों को परेशान करने लगी। यह देखकर उसने आत्मसमर्पण कर दिया।

इनका एक तीसरा भाई वासुदेव भी था। वह समझ गया कि अब बालकृष्ण को भी फांसी दी जाएगी। ऐसे में उसका मन भी केसरिया बाना पहनने को मचलने लगा। उसने मां से अपने बड़े भाइयों की तरह ही बलिपथ पर जाने की आज्ञा मांगी। वीर माता ने अश्रुपूरित नेत्रों से उसे छाती से लगाया और उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख दिया।

अब वासुदेव और उसके मित्र महादेव रानडे ने दोनों द्रविड़ बंधुओं को उनके पाप की सजा देने का निश्चय किया। द्रविड़ बन्धु पुरस्कार की राशि पाकर खाने-पीने में मस्त थे। आठ फरवरी, 1899 को वासुदेव तथा महादेव पंजाबी वेश पहन कर रात में उनके घर जा पहुंचे। वे दोनों अपने मित्रों के साथ ताश खेल रहे थे। नीचे से ही वासुदेव ने पंजाबी लहजे में उर्दू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुम दोनों को बु्रइन साहब थाने में बुला रहे हैं।

थाने से प्रायः इन दोनों को बुलावा आता रहता था। अतः उन्हें कोई शक नहीं हुआ और वे खेल समाप्त कर थाने की ओर चल दिये। मार्ग में वासुदेव और महादेव उनकी प्रतीक्षा में थे। निकट आते ही उनकी पिस्तौलें गरज उठीं। गणेश की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गयी और रामचंद्र चिकित्सालय में जाकर मरा। इस प्रकार दोनों को देशद्रोह का समुचित पुरस्कार मिल गया।

पुलिस ने शीघ्रता से जाल बिछाकर दोनों को पकड़ लिया। वासुदेव को तो अपने भाइयों को पकड़वाने वाले गद्दारों से बदला लेना था। अतः उसके मन में कोई भय नहीं था। अब बालकृष्ण के साथ ही इन दोनों पर भी मुकदमा चलाया गया। न्यायालय ने वासुदेव, महादेव और बालकृष्ण की फांसी के लिए क्रमशः आठ, दस और बारह मई, 1899 की तिथियां निश्चित कर दीं।

आठ मई को प्रातः जब वासुदेव फांसी के तख्ते की ओर जा रहा था, तो मार्ग में वह कोठरी भी पड़ती थी, जिसमें उसका बड़ा भाई बालकृष्ण बंद था। वासुदेव ने जोर से आवाज लगाई, ‘‘भैया, अलविदा। मैं जा रहा हूं।’’ बालकृष्ण ने भी उतने ही उत्साह से उत्तर दिया, ‘‘हिम्मत से काम लेना। मैं बहुत शीघ्र ही आकर तुमसे मिलूंगा।’’

इस प्रकार तीनों चाफेकर बंधु मातृभूमि की बलिवेदी पर चढ़ गये। इससे प्रेरित होकर 16 वर्षीय किशोर विनायक दामोदर सावरकर ने एक मार्मिक कविता लिखी और उसे बार-बार पढ़कर सारी रात रोते रहे।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का वक्तव्य

7 मई, 2021

लोकतंत्र में चुनावों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है. चुनावों के इसी क्रम में पश्चिम बंगाल का चुनाव अभी-अभी सम्पन्न हुआ है. बंगाल के सम्पूर्ण समाज ने इसमें बढ़-चढ़ कर सहभाग लिया है. चुनावों में स्वाभाविक ही पक्ष-विपक्ष, आरोप-प्रत्यारोप कभी-कभी भावावेश में मर्यादाओं को भी पार कर देता है. पर, हमें यह सदैव स्मरण रखना होगा कि सभी दल अपने ही देश के दल हैं और चुनावों की प्रक्रिया में भाग लेने वाले प्रत्याशी, समर्थक, मतदाता सभी अपने ही देश के नागरिक हैं.

चुनाव परिणाम के तुरंत बाद उन्मुक्त होकर अनियंत्रित तरीक़े से हुई राज्यव्यापी हिंसा न केवल निंदनीय है, बल्कि पूर्व नियोजित भी है. समाज-विघातक शक्तियों ने महिलाओं के साथ घृणास्पद बर्बर व्यवहार किया, निर्दोष लोगों की क्रूरतापूर्ण हत्याएँ कीं, घरों को जलाया, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों-दुकानों को लूटा एवं हिंसा के फलस्वरूप अनुसूचित जाति-जनजाति समाज के बंधुओं सहित हज़ारों लोग अपने घरों से बेघर होकर प्राण-मान रक्षा के लिए सुरक्षित स्थानों पर शरण के लिए मजबूर हुए हैं. कूच-बिहार से लेकर सुंदरबन तक सर्वत्र जन सामान्य में भय का वातावरण बना हुआ है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस वीभत्स हिंसा की कठोर शब्दों में निंदा करता है. हमारा यह सुविचारित मत है कि चुनाव-परिणामों के पश्चात अनियंत्रित चल रही हिंसा भारत की सह-अस्तित्व और सबके मतों का सम्मान करने की परंपरा के साथ-साथ भारतीय संविधान में अंकित एक जन और लोकतंत्र की मूल भावना के भी विपरीत है.

इस पाशविक हिंसा का सर्वाधिक दुखद पक्ष यह है कि शासन और प्रशासन की भूमिका केवल मूक दर्शक की ही दिखाई दे रही है. दंगाइयों को ना ही कोई डर दिखाई दे रहा है और ना ही शासन-प्रशासन की ओर से नियंत्रण की कोई प्रभावी पहल दिखाई दे रही है.

शासन-व्यवस्था कोई भी हो, किसी भी दल की हो, उस का सर्वप्रथम दायित्व समाज में क़ानून-व्यवस्था के द्वारा शांति और सुरक्षा का वातावरण बनाना, अपराधी और समाज-विरोधी तत्वों के मन में शासन का भय पैदा करना और हिंसक गतिविधियाँ करने वालों को दंड सुनिश्चित करना होता है. चुनाव को दल जीतते हैं, पर, निर्वाचित सरकार पूरे समाज के प्रति जवाबदेह होती है. हम नव निर्वाचित सरकार से यह आग्रह करते हैं कि उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता राज्य में चल रही हिंसा को तुरंत समाप्त कर क़ानून का शासन स्थापित करना, दोषियों को अविलंब गिरफ्तार कर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना, हिंसा-पीड़ितों के मन में विश्वास और सुरक्षा का भाव पैदा कर पुनर्वास के लिए आवश्यक कदम उठाना, होनी चाहिए. हम केंद्र सरकार से भी आग्रह करते है कि वह बंगाल में शान्ति क़ायम करने हेतु आवश्यक हर सम्भव कदम उठाए एवं यह सुनिश्चित करे कि राज्य सरकार भी इसी दिशा में कार्रवाई करे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज के सभी प्रबुद्ध जनों, सामाजिक-धार्मिक-राजनैतिक नेतृत्व का भी आहवान करता है कि इस संकट की घड़ी में वे पीड़ित परिवारों के साथ खड़े हो कर विश्वास का वातावरण बनाएं, हिंसा की कठोर शब्दों में निंदा करें एवं समाज में सद्भाव और शांति व भाईचारे का वातावरण खड़ा करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायें.

अल्लूरि सीताराम राजू आन्ध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले के मोगल्लु ग्राम में 4 जुलाई, 1897 को जन्मे थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा राजमुंन्दरी व राजचन्द्रपुरम् में हुई। छात्र जीवन में ही उनका सम्पर्क निकट के वनवासियों से होने लगा था। उनका मन पढ़ाई में विशेष नहीं लगता था। कुछ समय के लिए उनका मन अध्यात्म की ओर झुका। उन्होंने आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन किया; पर उनका मन वहाँ भी नहीं लगा। अतः निर्धन वनवासियों की सेवा के लिए उन्होंने संन्यास ले लिया और भारत भ्रमण पर निकल पड़े।

भारत भ्रमण के दौरान उन्हें गुलामी की पीड़ा का अनुभव हुआ। अब उन्होंने निर्धन सेवा के साथ स्वतन्त्रता प्राप्ति को भी अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। कृष्णादेवी पेठ के नीलकंठेश्वर मंदिर में उन्होंने अपना डेरा बनाकर साधना प्रारम्भ कर दी। जातिगत भेदों से ऊपर उठकर थोड़े ही समय में उन्होंने आसपास की कोया व चेन्चु जनजातियों में अच्छा सम्पर्क बना लिया। अल्लूरि राजू ने उनके बीच संगठन खड़ा किया तथा नरबलि, शराब, अन्धविश्वास आदि कुरीतियों को दूर करने में सफल हुए।

इस प्रारम्भिक सफलता के बाद राजू ने उनके मन में गुलामी के विरुद्ध संघर्ष का बीजारोपण किया। लोग अंग्रेजों के अत्याचार से दुःखी तो थे ही, अतः सबने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध शंखनाद कर दिया। वनवासी युवक तीर कमान, भाले, फरसे जैसे अपने परम्परागत शस्त्रों को लेकर अंग्रेज सेना का मुकाबला करने लगे। अगस्त, 1922 में राजू एवं उनके वनवासी क्रान्तिवीरों ने चितापल्ली थाने पर हमलाकर उसे लूट लिया। भारी मात्रा में आधुनिक शस्त्र उनके हाथ लगे। अनेक पुलिस अधिकारी भी हताहत हुए।

अब तो राजू की हिम्मत बढ़ गयी। उन्होंने दिनदहाड़े थानों पर हमले प्रारम्भ कर दिये। वे अपने साथियों को छुड़ाकर शस्त्र लूट लेते थे। यद्यपि यह लड़ाई दीपक और तूफान जैसी थी, फिर भी कई अंग्रेज अधिकारी तथा सैनिक इसमें मारे गये। आन्ध्र के कई क्षेत्रों से अंग्रेज शासन समाप्त होकर राजू का अधिकार हो गया। उन्होंने ग्राम पंचायतों का गठन किया, इससे स्थानीय मुकदमे शासन के पास जाने बन्द हो गये। लोगों ने शासन को कर देना भी बन्द कर दिया। अनेक उत्साही युवकों ने तो सेना के शस्त्रागारों को ही लूट लिया।

अंग्रेज अधिकारियों को लगा कि यदि राजू की गतिविधियों पर नियन्त्रण नहीं किया गया, तो बाजी हाथ से बिल्कुल ही निकल जाएगी। उन्होंने राजू का मुकाबला करने के लिए गोदावरी जिले में असम से सेना बुला ली। राजू के साथियों के पास तो परम्परागत शस्त्र थे, जिनसे आमने-सामने का मुकाबला हो सकता था; पर अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार थे। फिर भी राजू ने मुकाबला जारी रखा। पेड्डावलसा के संघर्ष में उनकी भारी क्षति हुई; पर राजू बच निकले। अंग्रेज फिर हाथ मलते रह गये।

जब बहुत समय तक राजू हाथ नहीं आये, तो अंग्रेज उनके समर्थकों और निरपराध ग्रामीणों पर अत्याचार करने लगेे। यह देखकर राजू से न रहा गया और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेज तो यही चाहते थे। उन्होंने 7 मई, 1924 को राजू को पेड़ से बाँधकर गोली मार दी। इस प्रकार एक क्रान्तिकारी, संन्यासी, प्रभुभक्त और समाज-सुधारक का अन्त हुआ।

#AlluriSitaramaRaju

नेपाल में भी भारत की तरह धार्मिक कथा कहने और सुनने की व्यापक परम्परा है। 1958 में जन्मे पंडित नारायण प्रसाद पोखरेल वहां ‘वाचन शिरोमणि’ के नाते विख्यात थे। उनका कथा कहने और उसकी व्याख्या करने का ढंग निराला था। वे कथा में स्थानीय लोकजीवन के संदर्भों का व्यापक प्रयोग करते थे। इस कारण हजारों लोग मंत्रमुग्ध होकर घंटो तक उनकी कथा सुनते थे; पर इसी से वे माओवादियों की आंख में कांटे की तरह चुभने लगे।

श्री पोखरेल का जन्म गोरखा जिले में एक धर्मप्रेमी कृषक परिवार में हुआ था। पारिवारिक संस्कारों के कारण वे बचपन में ही संस्कृत पढ़ने के लिए काशी आ गये। कथा में रुचि होने के कारण शिक्षा पूर्ण कर वे वृन्दावन आकर कथा बोलने का अभ्यास करने लगे। इसके बाद वापस नेपाल जाकर उन्होंने इसे ही अपना  जीवन-कार्य बना लिया। कुछ ही समय में वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।

1999 में श्री पोखरेल का संपर्क विश्व भर में हिन्दुओं को संगठित करने वाली संस्था ‘विश्व हिन्दू महासंघ’ से हुआ। उस साल महासंघ की नेपाल इकाई का अधिवेशन पोखरा में हुआ था। इसमें उन्हें नेपाल इकाई का अध्यक्ष चुना गया। उनके नेतृत्व में महासंघ का कार्य बहुत तेजी से आगे बढ़ा। इसके 3,000 आजीवन सदस्य तथा आठ जिलों में स्थायी कार्यालय बन गये।

श्री पोखरेल कथा के माध्यम से आने वाले धन का समाज हित में ही उपयोग करते थे। उन्होंने नेपाल के 65 जिलों में 525 स्थानों पर भागवत कथा के द्वारा दो अरब रुपया एकत्र किया। इससे उन्होंने सैकड़ों प्राथमिक, माध्यमिक एवं महिला विद्यालय, महाविद्यालय, चिकित्सालय, धर्मशाला, महिला उत्थान केन्द्र, बाल कल्याण केन्द्र, मंदिर तथा सड़कों आदि का निर्माण कराया।

नेपाल के सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में यह पहला उदाहरण था कि किसी ने शासन या विदेशी सहयोग के बिना, केवल भागवत कथा द्वारा समाज की इतनी सेवा की। इससे पूरे समाज और धनपतियों को एक नयी दिशा प्राप्त हुई। वेस्ट इंडीज के हिन्दू सम्मेलन में श्री पोखरेल नेपाल के प्रतिनिधि के नाते गये थे। वहां उनकी भेंट श्री अशोक सिंहल से हुई। प्रथम भेंट में ही वे अशोक जी से प्रभावित होकर ‘विश्व हिन्दू परिषद’ से भी जुड़ गये।

उनके ध्यान में आया कि हिन्दू धर्म को मिटाने का षड्यन्त्र पूरे विश्व में चल रहा है। चर्च, इस्लाम और वामपंथी सब मिलकर यह कार्य कर रहे हैं। इससे उनके कार्य की गति और बढ़ गयी; पर हिन्दू धर्म के विरोधी माओवादी इससे रुष्ट हो गये।

जिला रुपन्देही के रामापुर ग्राम में कथा के दौरान छह मई, 2006 को मोटर साइकिल पर सवार दो आतंकियों ने उन पर कई गोलियां दाग दीं। इस प्रकार नेपाल के एक प्रखर हिन्दू नेता और प्रख्यात कथावाचक का असामयिक निधन हो गया। 2009 में नेपाल शासन ने उन्हें ‘धर्म बलिदानी’ की उपाधि दी।

भारतीय स्वतंत्रता संगाम की महान क्रान्तिकारिणी प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई 1911 को तत्कालीन पूर्वी भारत (और अब बांग्लादेश) में स्थित चटगाँव के एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता नगरपालिका के क्लर्क थे।  उन्होने सन् १९२८ में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की। इसके बाद सन् 1929 में उन्होने ढाका के इडेन कॉलेज में प्रवेश लिया और इण्टरमिडिएट परीक्षा में पूरे ढाका बोर्ड में पाँचवें स्थान पर आयीं। दो वर्ष बाद प्रीतिलता ने कोलकाता के बेथुन कॉलेज से दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तिर्ण की। कोलकाता विश्वविद्यालय के ब्रितानी अधिकारियों ने उनकी डिग्री को रोक दिया। उन्हें ८० वर्ष बाद मरणोपरान्त यह डिग्री प्रदान की गयी। शिक्षा उपरान्त उन्होंने परिवार की मदद के लिए एक पाठशाला में नौकरी शुरू की।

​पाठशाला की नौकरी करते हुए उनकी भेट प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई। प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बनी।  प्रीतिलता जब सूर्यसेन से मिली तब वे अज्ञातवास में थे। उनका एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था। उनको फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी। उनसे मिलना आसान नही था। लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली और किसी अधिकारी को उन पर सशंय भी नही हुआ। यह था, उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण। इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व कि इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बनी।

पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था घिरे हुए क्रान्तिकारियो में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे। सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया। अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये। सूर्यसेन की गोली से कैप्टन कैमरान मारा गया। सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते – लड़ते भाग गये। क्रांतिकारी सूर्यसेन पर 10 हजार रूपये का इनाम घोषित था। दोनों एक सावित्री नाम की महिला के घर गुप्त रूप से रहे। वह महिला क्रान्तिकारियो को आश्रय देने के कारण अंग्रेजो का कोपभाजन बनी। सूर्यसेन ने अपने साथियो का बदला लेने की योजना बनाई। योजना यह थी की पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच – गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए।

प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी वह पहुचे। 24 सितम्बर 1932 की रात इस काम के लिए निश्चित की गयी। हथियारों से लैस प्रीतिलता ने आत्म सुरक्षा के लिए पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था। पूरी तैयारी के साथ वह क्लब पहुची। बाहर से खिड़की में बम लगाया। क्लब की इमारत बम के फटने और पिस्तौल की आवाज़ से कापने लगी। नाच – रंग के वातावरण में एकाएक चीखे सुनाई देने लगी। 13 अंग्रेज जख्मी हो गये और बाकी भाग गये। इस घटना में एक यूरोपीय महिला मारी गयी। थोड़ी देर बाद उस क्लब से गोलीबारी होने लगी। प्रीतिलता के शरीर में एक गोली लगी। वे घायल अवस्था में भागी लेकिन फिर गिरी और पोटेशियम सायनाइड खा लिया। उस समय उनकी उम्र 21 साल थी। इतनी कम उम्र में उन्होंने झांसी की रानी का रास्ता अपनाया और उन्ही की तरह अंतिम समय तक अंग्रेजो से लड़ते हुए स्वंय ही मृत्यु का वरण कर लिया।

प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद अंग्रेज अधिकारियों को तलाशी लेने पर जो पत्र मिले उनमे छपा हुआ पत्र था। इस पत्र में छपा था की ” चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी।”​

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सरसेनापति मार्तण्डराव जोग 

नागपुर के डोके मठ में 9-10 नवम्बर, 1929 को हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में डा. हेडगेवार को आद्य सरसंघचालक, श्री बालासाहब हुद्दार को सरकार्यवाह तथा श्री मार्तंडराव जोग को सरसेनापति घोषित किया गया था। 1899 में एक उद्योगपति परिवार में जन्मे श्री जोग नागपुर में शुक्रवार पेठ स्थित ‘जोगबाड़ा’ के निवासी थे। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था। कैंसर जैसे भीषण रोग को उन्होंने अपने मनोबल से परास्त कर दिया था। इस कारण लोग उन्हें ‘डाॅक्टर आॅफ दि कैंसर’ भी कहते थे। यद्यपि वे इसका श्रेय अपने बाड़े के विशाल पीपल के वृक्ष और मारुति मंदिर को देते थे।

श्री जोग की संघ और कांग्रेस के प्रति समान निष्ठा थी। वे नागपुर में कांग्रेस सेवा दल के प्रमुख थे। हिन्दू महासभा तथा कांग्रेस के तत्कालीन सभी प्रमुख नेता उनके पास जाते रहते थे। 1930 में वे कारावास में भी रहे। भगवा पगड़ी बांधने वाले श्री जोग कांग्रेस के कार्यक्रमों में सफेद खादी की गांधी टोपी तथा संघ के कार्यक्रम में सगर्व गणवेश की काली टोपी पहनते थे।

हिन्दुत्वप्रेमी होने के कारण श्री जोग की डा. हेडगेवार से गहरी मित्रता थी। संघ की स्थापना वाली बैठक में वे किसी कारण उपस्थित नहीं हो सके; पर अगले दिन उन्होंने डा. जी से मिलकर इस कार्य को समर्थन और सहयोग का आश्वासन दिया। डा. जी उनसे कुछ अधिक सक्रियता की आशा करते थे; पर वे अपने कारोबार तथा अन्य सामाजिक कामों में व्यस्त रहते थे।

एक बार शरद पूर्णिमा की रात में साढ़े ग्यारह बजे डा. हेडगेवार ने उन्हें किसी काम से आवाज दी; पर उन्होंने आने से साफ मना कर दिया। डा. जी लौट गये; पर श्री जोग सारी रात पछतावे की आग में जलते रहे। अगले दिन उन्होंने डा. जी से अपनी इस भूल के लिए क्षमा मांगी और फिर वे आजीवन डा. हेडगेवार के अनुगामी बने रहे। वे डा. जी के साथ घर-घर जाकर शाखा के लिए बाल और तरुणों को जुटाते थे। संघ शिक्षा वर्ग की व्यवस्था में भी वे लगातार सक्रिय रहते थे।

यद्यपि वे निष्ठावान कांग्रेसी थे; पर साथ ही गर्वीले हिन्दू भी थे। अतः नागपुर के विजयादशमी पथ संचलन में वे घोड़े पर सवार होकर एक हाथ में तलवार तथा दूसरे में भगवा झंडा लेकर चलते थे। नागपुर के सार्वजनिक गणेशोत्सव में भी उनके परिवार की बड़ी भूमिका रहती थी। श्री गुरुजी तथा श्री बालासाहब देवरस उनके घर जाकर प्रायः उनसे परामर्श करते थे। संघ शिक्षा वर्ग के अंतिम दिन सब शिक्षार्थी उनके बाड़े में भोजन पर आमन्त्रित रहते थे।

1948 में गांधी जी की हत्या के बाद कांग्रेसियों ने उनके गुब्बारे के कारखाने को जला दिया। आग घर तक पहुंचने से पूर्व ही आजाद हिन्द सेना के मेजर जोशी ने यह षड्यन्त्र विफल कर दिया। जब दुबारा यह प्रयास हुआ, तो श्री जोग स्वयं बंदूक लेकर आ गये। इससे डरकर गुंडे भाग गये।

कृषि विशेषज्ञ श्री जोग के घर में गाय, भैंस और कुत्तों के साथ एक चीते का बच्चा भी पलता था। उनका विशाल पुस्तकालय साहित्य प्रेमियों का मंदिर था। 1975 के प्रतिबंध काल में जब सभी प्रमुख कार्यकर्ता जेल चले गये, तो डा0 हेडगेवार की समाधि की दुर्दशा होने लगी। इस पर श्री जोग ने विनोबा भावे और मुख्यमंत्री श्री चह्नाण से मिलकर उसकी देखभाल की व्यवस्था कराई।

चार मई, 1981 को अनेक प्रतिभाओं के धनी, संघ के पहले और एकमात्र सरसेनापति श्री मार्तंडराव जोग का निधन हुआ।

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दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्मित तथा सन् 1913 में प्रदर्शित फिल्म “राजा हरिश्चन्द्र” को भारत की पहली फीचर फिल्म होने का श्रेय प्राप्त है। “राजा हरिश्चन्द्र” चार रीलों की लम्बाई वाली एक मूक फिल्म है। इस फिल्म की कहानी हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में वर्णित राजा हरिश्चन्द्र की कथा पर आधारित है। अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित चलचित्र ‘दि लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ को देखकर दादा साहेब फालके इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भारत में फिल्म बनाने का निर्णय कर डाला। चूँकि उस जमाने में भारत में फिल्म निर्माण के विषय में नहीं के बराबर ही जानकारी थी इसलिये इंगलैंड में रहकर फिल्म निर्माण की कला सीखी।

फिल्म निर्माण कला सीख कर वापस भारत आने पर दादा साहेब फाल्के ने “राजा हरिश्चन्द्र” फिल्म बनाना शुरू किया। किन्तु उस जमाने में फिल्म बनाना आसान नहीं था क्योंकि लोग फिल्मों को अंग्रेजों का जादू-टोना समझते थे। फिल्म के लिये कलाकार मिलना मुश्किल होता था। किसी प्रकार से पुरुष कलाकार तो मिल जाते थे किन्तु महिला कलाकार मिल ही नहीं पाते थे क्योंकि महिलाओं का नाटक, नौटंकी, फिल्मों आदि में काम करना वर्जित माना जाता था। पुरुष कलाकारों को ही महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिला-चरित्रों को निभाना पड़ता था। दादा साहेब फाल्के ने जब यह फिल्म ब्नानी शुरू की तो उन्हे तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिली, उन्होने मजबूर हो के एक युवक सालुंके से ये भूमिका करवायी।  “राजा हरिश्चन्द्र” के निर्माण के दौरान दादा साहेब फाल्के के समक्ष अनेक बाधाएँ आईं किन्तु उन्होंने अडिग रहकर अपनी फिल्म बनाने में सफलता प्राप्त कर ही लिया और फिल्म 3 मई 1913 को प्रदर्शित हो गई।

प्रदर्शित होने पर “राजा हरिश्चन्द्र” ने इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त की कि मुंबई (उन दिनों बंबई) के गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा के सामने सड़कों पर लोगों की विशाल भीड़ इकट्ठी हो जाया करती थी। इस फिल्म की इतनी अधिक मांग बढ़ी कि ग्रामीण क्षेत्रों में इसके प्रदर्शन के लिये दादा साहेब फाल्के को फिल्म के और भी कई प्रिंट बनाने पड़े। फिल्म ने जबरदस्त सफलता प्राप्त की और दादा साहेब फाल्के एक फिल्म निर्माता के रूप में स्थापित हो गये और भारतीय फिल्म उद्योग के लिये एक रास्ता खुल गया।

उल्लेखनीय है कि दादा साहेब फाल्के का असली नाम ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ था और उन्हें भारतीय फिल्म उद्योग का पितामह माना जाता है। आज भारत सरकार के द्वारा फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदानकर्ता को ’दादा साहब फालके’ सम्मान द्वारा नवाजा जाता है जो कि इस क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान है।

#RajaHaishchandra