Category Archives: Important Day

देश की स्वाधीनता के लिए जिसने भी त्याग और बलिदान दिया, वह धन्य है; पर जिस घर के सब सदस्य फांसी चढ़ गये, वह परिवार सदा के लिए पूज्य है। चाफेकर  बंधुओं का परिवार ऐसा ही था।

1897 में पुणे में भयंकर प्लेग फैल गया। इस बीमारी को नष्ट करने के बहाने से वहां का प्लेग कमिश्नर सर वाल्टर चार्ल्स रैण्ड मनमानी करने लगा। उसके अत्याचारों से पूरा नगर त्रस्त था। वह जूतों समेत रसोई और देवस्थान में घुस जाता था। उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए चाफेकर बंधु दामोदर एवं बालकृष्ण ने 22 जून, 1897 को उसका वध कर दिया।

इस योजना में उनके दो मित्र गणेश शंकर और रामचंद्र द्रविड़ भी शामिल थे। ये दोनों सगे भाई थे; पर जब पुलिस ने रैण्ड के हत्यारों के लिए 20,000 रु. पुरस्कार की घोषणा की, तो इन दोनों ने मुखबिरी कर दामोदर हरि चाफेकर को पकड़वा दिया, जिसे 18 अपै्रल, 1898 को फांसी दे गयी। बालकृष्ण की तलाश में पुलिस निरपराध लोगों को परेशान करने लगी। यह देखकर उसने आत्मसमर्पण कर दिया।

इनका एक तीसरा भाई वासुदेव भी था। वह समझ गया कि अब बालकृष्ण को भी फांसी दी जाएगी। ऐसे में उसका मन भी केसरिया बाना पहनने को मचलने लगा। उसने मां से अपने बड़े भाइयों की तरह ही बलिपथ पर जाने की आज्ञा मांगी। वीर माता ने अश्रुपूरित नेत्रों से उसे छाती से लगाया और उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख दिया।

अब वासुदेव और उसके मित्र महादेव रानडे ने दोनों द्रविड़ बंधुओं को उनके पाप की सजा देने का निश्चय किया। द्रविड़ बन्धु पुरस्कार की राशि पाकर खाने-पीने में मस्त थे। आठ फरवरी, 1899 को वासुदेव तथा महादेव पंजाबी वेश पहन कर रात में उनके घर जा पहुंचे। वे दोनों अपने मित्रों के साथ ताश खेल रहे थे। नीचे से ही वासुदेव ने पंजाबी लहजे में उर्दू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुम दोनों को बु्रइन साहब थाने में बुला रहे हैं।

थाने से प्रायः इन दोनों को बुलावा आता रहता था। अतः उन्हें कोई शक नहीं हुआ और वे खेल समाप्त कर थाने की ओर चल दिये। मार्ग में वासुदेव और महादेव उनकी प्रतीक्षा में थे। निकट आते ही उनकी पिस्तौलें गरज उठीं। गणेश की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गयी और रामचंद्र चिकित्सालय में जाकर मरा। इस प्रकार दोनों को देशद्रोह का समुचित पुरस्कार मिल गया।

पुलिस ने शीघ्रता से जाल बिछाकर दोनों को पकड़ लिया। वासुदेव को तो अपने भाइयों को पकड़वाने वाले गद्दारों से बदला लेना था। अतः उसके मन में कोई भय नहीं था। अब बालकृष्ण के साथ ही इन दोनों पर भी मुकदमा चलाया गया। न्यायालय ने वासुदेव, महादेव और बालकृष्ण की फांसी के लिए क्रमशः आठ, दस और बारह मई, 1899 की तिथियां निश्चित कर दीं।

आठ मई को प्रातः जब वासुदेव फांसी के तख्ते की ओर जा रहा था, तो मार्ग में वह कोठरी भी पड़ती थी, जिसमें उसका बड़ा भाई बालकृष्ण बंद था। वासुदेव ने जोर से आवाज लगाई, ‘‘भैया, अलविदा। मैं जा रहा हूं।’’ बालकृष्ण ने भी उतने ही उत्साह से उत्तर दिया, ‘‘हिम्मत से काम लेना। मैं बहुत शीघ्र ही आकर तुमसे मिलूंगा।’’

इस प्रकार तीनों चाफेकर बंधु मातृभूमि की बलिवेदी पर चढ़ गये। इससे प्रेरित होकर 16 वर्षीय किशोर विनायक दामोदर सावरकर ने एक मार्मिक कविता लिखी और उसे बार-बार पढ़कर सारी रात रोते रहे।

#ChapekarBrothers  #vskgujarat.com

अल्लूरि सीताराम राजू आन्ध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले के मोगल्लु ग्राम में 4 जुलाई, 1897 को जन्मे थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा राजमुंन्दरी व राजचन्द्रपुरम् में हुई। छात्र जीवन में ही उनका सम्पर्क निकट के वनवासियों से होने लगा था। उनका मन पढ़ाई में विशेष नहीं लगता था। कुछ समय के लिए उनका मन अध्यात्म की ओर झुका। उन्होंने आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन किया; पर उनका मन वहाँ भी नहीं लगा। अतः निर्धन वनवासियों की सेवा के लिए उन्होंने संन्यास ले लिया और भारत भ्रमण पर निकल पड़े।

भारत भ्रमण के दौरान उन्हें गुलामी की पीड़ा का अनुभव हुआ। अब उन्होंने निर्धन सेवा के साथ स्वतन्त्रता प्राप्ति को भी अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। कृष्णादेवी पेठ के नीलकंठेश्वर मंदिर में उन्होंने अपना डेरा बनाकर साधना प्रारम्भ कर दी। जातिगत भेदों से ऊपर उठकर थोड़े ही समय में उन्होंने आसपास की कोया व चेन्चु जनजातियों में अच्छा सम्पर्क बना लिया। अल्लूरि राजू ने उनके बीच संगठन खड़ा किया तथा नरबलि, शराब, अन्धविश्वास आदि कुरीतियों को दूर करने में सफल हुए।

इस प्रारम्भिक सफलता के बाद राजू ने उनके मन में गुलामी के विरुद्ध संघर्ष का बीजारोपण किया। लोग अंग्रेजों के अत्याचार से दुःखी तो थे ही, अतः सबने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध शंखनाद कर दिया। वनवासी युवक तीर कमान, भाले, फरसे जैसे अपने परम्परागत शस्त्रों को लेकर अंग्रेज सेना का मुकाबला करने लगे। अगस्त, 1922 में राजू एवं उनके वनवासी क्रान्तिवीरों ने चितापल्ली थाने पर हमलाकर उसे लूट लिया। भारी मात्रा में आधुनिक शस्त्र उनके हाथ लगे। अनेक पुलिस अधिकारी भी हताहत हुए।

अब तो राजू की हिम्मत बढ़ गयी। उन्होंने दिनदहाड़े थानों पर हमले प्रारम्भ कर दिये। वे अपने साथियों को छुड़ाकर शस्त्र लूट लेते थे। यद्यपि यह लड़ाई दीपक और तूफान जैसी थी, फिर भी कई अंग्रेज अधिकारी तथा सैनिक इसमें मारे गये। आन्ध्र के कई क्षेत्रों से अंग्रेज शासन समाप्त होकर राजू का अधिकार हो गया। उन्होंने ग्राम पंचायतों का गठन किया, इससे स्थानीय मुकदमे शासन के पास जाने बन्द हो गये। लोगों ने शासन को कर देना भी बन्द कर दिया। अनेक उत्साही युवकों ने तो सेना के शस्त्रागारों को ही लूट लिया।

अंग्रेज अधिकारियों को लगा कि यदि राजू की गतिविधियों पर नियन्त्रण नहीं किया गया, तो बाजी हाथ से बिल्कुल ही निकल जाएगी। उन्होंने राजू का मुकाबला करने के लिए गोदावरी जिले में असम से सेना बुला ली। राजू के साथियों के पास तो परम्परागत शस्त्र थे, जिनसे आमने-सामने का मुकाबला हो सकता था; पर अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार थे। फिर भी राजू ने मुकाबला जारी रखा। पेड्डावलसा के संघर्ष में उनकी भारी क्षति हुई; पर राजू बच निकले। अंग्रेज फिर हाथ मलते रह गये।

जब बहुत समय तक राजू हाथ नहीं आये, तो अंग्रेज उनके समर्थकों और निरपराध ग्रामीणों पर अत्याचार करने लगेे। यह देखकर राजू से न रहा गया और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेज तो यही चाहते थे। उन्होंने 7 मई, 1924 को राजू को पेड़ से बाँधकर गोली मार दी। इस प्रकार एक क्रान्तिकारी, संन्यासी, प्रभुभक्त और समाज-सुधारक का अन्त हुआ।

#AlluriSitaramaRaju

नेपाल में भी भारत की तरह धार्मिक कथा कहने और सुनने की व्यापक परम्परा है। 1958 में जन्मे पंडित नारायण प्रसाद पोखरेल वहां ‘वाचन शिरोमणि’ के नाते विख्यात थे। उनका कथा कहने और उसकी व्याख्या करने का ढंग निराला था। वे कथा में स्थानीय लोकजीवन के संदर्भों का व्यापक प्रयोग करते थे। इस कारण हजारों लोग मंत्रमुग्ध होकर घंटो तक उनकी कथा सुनते थे; पर इसी से वे माओवादियों की आंख में कांटे की तरह चुभने लगे।

श्री पोखरेल का जन्म गोरखा जिले में एक धर्मप्रेमी कृषक परिवार में हुआ था। पारिवारिक संस्कारों के कारण वे बचपन में ही संस्कृत पढ़ने के लिए काशी आ गये। कथा में रुचि होने के कारण शिक्षा पूर्ण कर वे वृन्दावन आकर कथा बोलने का अभ्यास करने लगे। इसके बाद वापस नेपाल जाकर उन्होंने इसे ही अपना  जीवन-कार्य बना लिया। कुछ ही समय में वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।

1999 में श्री पोखरेल का संपर्क विश्व भर में हिन्दुओं को संगठित करने वाली संस्था ‘विश्व हिन्दू महासंघ’ से हुआ। उस साल महासंघ की नेपाल इकाई का अधिवेशन पोखरा में हुआ था। इसमें उन्हें नेपाल इकाई का अध्यक्ष चुना गया। उनके नेतृत्व में महासंघ का कार्य बहुत तेजी से आगे बढ़ा। इसके 3,000 आजीवन सदस्य तथा आठ जिलों में स्थायी कार्यालय बन गये।

श्री पोखरेल कथा के माध्यम से आने वाले धन का समाज हित में ही उपयोग करते थे। उन्होंने नेपाल के 65 जिलों में 525 स्थानों पर भागवत कथा के द्वारा दो अरब रुपया एकत्र किया। इससे उन्होंने सैकड़ों प्राथमिक, माध्यमिक एवं महिला विद्यालय, महाविद्यालय, चिकित्सालय, धर्मशाला, महिला उत्थान केन्द्र, बाल कल्याण केन्द्र, मंदिर तथा सड़कों आदि का निर्माण कराया।

नेपाल के सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में यह पहला उदाहरण था कि किसी ने शासन या विदेशी सहयोग के बिना, केवल भागवत कथा द्वारा समाज की इतनी सेवा की। इससे पूरे समाज और धनपतियों को एक नयी दिशा प्राप्त हुई। वेस्ट इंडीज के हिन्दू सम्मेलन में श्री पोखरेल नेपाल के प्रतिनिधि के नाते गये थे। वहां उनकी भेंट श्री अशोक सिंहल से हुई। प्रथम भेंट में ही वे अशोक जी से प्रभावित होकर ‘विश्व हिन्दू परिषद’ से भी जुड़ गये।

उनके ध्यान में आया कि हिन्दू धर्म को मिटाने का षड्यन्त्र पूरे विश्व में चल रहा है। चर्च, इस्लाम और वामपंथी सब मिलकर यह कार्य कर रहे हैं। इससे उनके कार्य की गति और बढ़ गयी; पर हिन्दू धर्म के विरोधी माओवादी इससे रुष्ट हो गये।

जिला रुपन्देही के रामापुर ग्राम में कथा के दौरान छह मई, 2006 को मोटर साइकिल पर सवार दो आतंकियों ने उन पर कई गोलियां दाग दीं। इस प्रकार नेपाल के एक प्रखर हिन्दू नेता और प्रख्यात कथावाचक का असामयिक निधन हो गया। 2009 में नेपाल शासन ने उन्हें ‘धर्म बलिदानी’ की उपाधि दी।

भारतीय स्वतंत्रता संगाम की महान क्रान्तिकारिणी प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई 1911 को तत्कालीन पूर्वी भारत (और अब बांग्लादेश) में स्थित चटगाँव के एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता नगरपालिका के क्लर्क थे।  उन्होने सन् १९२८ में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की। इसके बाद सन् 1929 में उन्होने ढाका के इडेन कॉलेज में प्रवेश लिया और इण्टरमिडिएट परीक्षा में पूरे ढाका बोर्ड में पाँचवें स्थान पर आयीं। दो वर्ष बाद प्रीतिलता ने कोलकाता के बेथुन कॉलेज से दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तिर्ण की। कोलकाता विश्वविद्यालय के ब्रितानी अधिकारियों ने उनकी डिग्री को रोक दिया। उन्हें ८० वर्ष बाद मरणोपरान्त यह डिग्री प्रदान की गयी। शिक्षा उपरान्त उन्होंने परिवार की मदद के लिए एक पाठशाला में नौकरी शुरू की।

​पाठशाला की नौकरी करते हुए उनकी भेट प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई। प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बनी।  प्रीतिलता जब सूर्यसेन से मिली तब वे अज्ञातवास में थे। उनका एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था। उनको फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी। उनसे मिलना आसान नही था। लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली और किसी अधिकारी को उन पर सशंय भी नही हुआ। यह था, उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण। इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व कि इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बनी।

पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था घिरे हुए क्रान्तिकारियो में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे। सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया। अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये। सूर्यसेन की गोली से कैप्टन कैमरान मारा गया। सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते – लड़ते भाग गये। क्रांतिकारी सूर्यसेन पर 10 हजार रूपये का इनाम घोषित था। दोनों एक सावित्री नाम की महिला के घर गुप्त रूप से रहे। वह महिला क्रान्तिकारियो को आश्रय देने के कारण अंग्रेजो का कोपभाजन बनी। सूर्यसेन ने अपने साथियो का बदला लेने की योजना बनाई। योजना यह थी की पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच – गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए।

प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी वह पहुचे। 24 सितम्बर 1932 की रात इस काम के लिए निश्चित की गयी। हथियारों से लैस प्रीतिलता ने आत्म सुरक्षा के लिए पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था। पूरी तैयारी के साथ वह क्लब पहुची। बाहर से खिड़की में बम लगाया। क्लब की इमारत बम के फटने और पिस्तौल की आवाज़ से कापने लगी। नाच – रंग के वातावरण में एकाएक चीखे सुनाई देने लगी। 13 अंग्रेज जख्मी हो गये और बाकी भाग गये। इस घटना में एक यूरोपीय महिला मारी गयी। थोड़ी देर बाद उस क्लब से गोलीबारी होने लगी। प्रीतिलता के शरीर में एक गोली लगी। वे घायल अवस्था में भागी लेकिन फिर गिरी और पोटेशियम सायनाइड खा लिया। उस समय उनकी उम्र 21 साल थी। इतनी कम उम्र में उन्होंने झांसी की रानी का रास्ता अपनाया और उन्ही की तरह अंतिम समय तक अंग्रेजो से लड़ते हुए स्वंय ही मृत्यु का वरण कर लिया।

प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद अंग्रेज अधिकारियों को तलाशी लेने पर जो पत्र मिले उनमे छपा हुआ पत्र था। इस पत्र में छपा था की ” चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी।”​

#PritilataWaddedar   #vskgujarat

सरसेनापति मार्तण्डराव जोग 

नागपुर के डोके मठ में 9-10 नवम्बर, 1929 को हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में डा. हेडगेवार को आद्य सरसंघचालक, श्री बालासाहब हुद्दार को सरकार्यवाह तथा श्री मार्तंडराव जोग को सरसेनापति घोषित किया गया था। 1899 में एक उद्योगपति परिवार में जन्मे श्री जोग नागपुर में शुक्रवार पेठ स्थित ‘जोगबाड़ा’ के निवासी थे। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था। कैंसर जैसे भीषण रोग को उन्होंने अपने मनोबल से परास्त कर दिया था। इस कारण लोग उन्हें ‘डाॅक्टर आॅफ दि कैंसर’ भी कहते थे। यद्यपि वे इसका श्रेय अपने बाड़े के विशाल पीपल के वृक्ष और मारुति मंदिर को देते थे।

श्री जोग की संघ और कांग्रेस के प्रति समान निष्ठा थी। वे नागपुर में कांग्रेस सेवा दल के प्रमुख थे। हिन्दू महासभा तथा कांग्रेस के तत्कालीन सभी प्रमुख नेता उनके पास जाते रहते थे। 1930 में वे कारावास में भी रहे। भगवा पगड़ी बांधने वाले श्री जोग कांग्रेस के कार्यक्रमों में सफेद खादी की गांधी टोपी तथा संघ के कार्यक्रम में सगर्व गणवेश की काली टोपी पहनते थे।

हिन्दुत्वप्रेमी होने के कारण श्री जोग की डा. हेडगेवार से गहरी मित्रता थी। संघ की स्थापना वाली बैठक में वे किसी कारण उपस्थित नहीं हो सके; पर अगले दिन उन्होंने डा. जी से मिलकर इस कार्य को समर्थन और सहयोग का आश्वासन दिया। डा. जी उनसे कुछ अधिक सक्रियता की आशा करते थे; पर वे अपने कारोबार तथा अन्य सामाजिक कामों में व्यस्त रहते थे।

एक बार शरद पूर्णिमा की रात में साढ़े ग्यारह बजे डा. हेडगेवार ने उन्हें किसी काम से आवाज दी; पर उन्होंने आने से साफ मना कर दिया। डा. जी लौट गये; पर श्री जोग सारी रात पछतावे की आग में जलते रहे। अगले दिन उन्होंने डा. जी से अपनी इस भूल के लिए क्षमा मांगी और फिर वे आजीवन डा. हेडगेवार के अनुगामी बने रहे। वे डा. जी के साथ घर-घर जाकर शाखा के लिए बाल और तरुणों को जुटाते थे। संघ शिक्षा वर्ग की व्यवस्था में भी वे लगातार सक्रिय रहते थे।

यद्यपि वे निष्ठावान कांग्रेसी थे; पर साथ ही गर्वीले हिन्दू भी थे। अतः नागपुर के विजयादशमी पथ संचलन में वे घोड़े पर सवार होकर एक हाथ में तलवार तथा दूसरे में भगवा झंडा लेकर चलते थे। नागपुर के सार्वजनिक गणेशोत्सव में भी उनके परिवार की बड़ी भूमिका रहती थी। श्री गुरुजी तथा श्री बालासाहब देवरस उनके घर जाकर प्रायः उनसे परामर्श करते थे। संघ शिक्षा वर्ग के अंतिम दिन सब शिक्षार्थी उनके बाड़े में भोजन पर आमन्त्रित रहते थे।

1948 में गांधी जी की हत्या के बाद कांग्रेसियों ने उनके गुब्बारे के कारखाने को जला दिया। आग घर तक पहुंचने से पूर्व ही आजाद हिन्द सेना के मेजर जोशी ने यह षड्यन्त्र विफल कर दिया। जब दुबारा यह प्रयास हुआ, तो श्री जोग स्वयं बंदूक लेकर आ गये। इससे डरकर गुंडे भाग गये।

कृषि विशेषज्ञ श्री जोग के घर में गाय, भैंस और कुत्तों के साथ एक चीते का बच्चा भी पलता था। उनका विशाल पुस्तकालय साहित्य प्रेमियों का मंदिर था। 1975 के प्रतिबंध काल में जब सभी प्रमुख कार्यकर्ता जेल चले गये, तो डा0 हेडगेवार की समाधि की दुर्दशा होने लगी। इस पर श्री जोग ने विनोबा भावे और मुख्यमंत्री श्री चह्नाण से मिलकर उसकी देखभाल की व्यवस्था कराई।

चार मई, 1981 को अनेक प्रतिभाओं के धनी, संघ के पहले और एकमात्र सरसेनापति श्री मार्तंडराव जोग का निधन हुआ।

#RSS

दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्मित तथा सन् 1913 में प्रदर्शित फिल्म “राजा हरिश्चन्द्र” को भारत की पहली फीचर फिल्म होने का श्रेय प्राप्त है। “राजा हरिश्चन्द्र” चार रीलों की लम्बाई वाली एक मूक फिल्म है। इस फिल्म की कहानी हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में वर्णित राजा हरिश्चन्द्र की कथा पर आधारित है। अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित चलचित्र ‘दि लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ को देखकर दादा साहेब फालके इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भारत में फिल्म बनाने का निर्णय कर डाला। चूँकि उस जमाने में भारत में फिल्म निर्माण के विषय में नहीं के बराबर ही जानकारी थी इसलिये इंगलैंड में रहकर फिल्म निर्माण की कला सीखी।

फिल्म निर्माण कला सीख कर वापस भारत आने पर दादा साहेब फाल्के ने “राजा हरिश्चन्द्र” फिल्म बनाना शुरू किया। किन्तु उस जमाने में फिल्म बनाना आसान नहीं था क्योंकि लोग फिल्मों को अंग्रेजों का जादू-टोना समझते थे। फिल्म के लिये कलाकार मिलना मुश्किल होता था। किसी प्रकार से पुरुष कलाकार तो मिल जाते थे किन्तु महिला कलाकार मिल ही नहीं पाते थे क्योंकि महिलाओं का नाटक, नौटंकी, फिल्मों आदि में काम करना वर्जित माना जाता था। पुरुष कलाकारों को ही महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिला-चरित्रों को निभाना पड़ता था। दादा साहेब फाल्के ने जब यह फिल्म ब्नानी शुरू की तो उन्हे तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिली, उन्होने मजबूर हो के एक युवक सालुंके से ये भूमिका करवायी।  “राजा हरिश्चन्द्र” के निर्माण के दौरान दादा साहेब फाल्के के समक्ष अनेक बाधाएँ आईं किन्तु उन्होंने अडिग रहकर अपनी फिल्म बनाने में सफलता प्राप्त कर ही लिया और फिल्म 3 मई 1913 को प्रदर्शित हो गई।

प्रदर्शित होने पर “राजा हरिश्चन्द्र” ने इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त की कि मुंबई (उन दिनों बंबई) के गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा के सामने सड़कों पर लोगों की विशाल भीड़ इकट्ठी हो जाया करती थी। इस फिल्म की इतनी अधिक मांग बढ़ी कि ग्रामीण क्षेत्रों में इसके प्रदर्शन के लिये दादा साहेब फाल्के को फिल्म के और भी कई प्रिंट बनाने पड़े। फिल्म ने जबरदस्त सफलता प्राप्त की और दादा साहेब फाल्के एक फिल्म निर्माता के रूप में स्थापित हो गये और भारतीय फिल्म उद्योग के लिये एक रास्ता खुल गया।

उल्लेखनीय है कि दादा साहेब फाल्के का असली नाम ’धुंडीराज गोविन्द फालके’ था और उन्हें भारतीय फिल्म उद्योग का पितामह माना जाता है। आज भारत सरकार के द्वारा फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदानकर्ता को ’दादा साहब फालके’ सम्मान द्वारा नवाजा जाता है जो कि इस क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान है।

#RajaHaishchandra

सत्यजित राय भारतीय फिल्म निर्माता थे जो 20 वी शताब्दी में अपनी महानतम फिल्म निर्माणों के लिये जाने जाते है. राय का जन्म कलकत्ता के बंगाली परिवार में हुआ था, उनका परिवार कला और साहित्य से जुड़ा हुआ था. उन्होंने एक कमर्शियल आर्टिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुवात की थी. और बाद में फ्रेंच फिल्म निर्माता जीन रेनिओर और वित्टोरियो दे सिका की इटालियन फिल्म बाइसिकल थीव्स (1948) में लन्दन यात्रा के  बाद वे एक बेहतरीन भारतीय फिल्म निर्माता बने.

सत्यजित राय ने 36 फिल्मो का निर्देशन किया है, जिनमे फीचर फिल्म, डाक्यूमेंट्री और लघु फिल्म शामिल है. इसके साथ ही वे काल्पनिक कहानी लेखक, प्रकाशक, चित्रकार, सुलेखक, संगीत कंपोजर, ग्राफ़िक डिज़ाइनर भी थे. उन्होंने बहोत सी लघु कथाये और उपन्यास और बच्चो पर आधारित किताबे भी लिखी है. फेलुदा, द स्लयूथ और प्रोफेसर शोंकू उनकी कहानियो के कुछ प्रसिद्ध पात्र है. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा उन्हें डिग्री से भी सम्मानित किया गया है.

सत्यजित राय की पहली फिल्म पथेर पांचाली (1995) ने बहोत से इंटरनेशनल अवार्ड जीते जिसमे 1956 के कैनंस फिल्म फेस्टिवल में दिया गया बेस्ट ह्यूमन डाक्यूमेंट्री अवार्ड भी शामिल है. इस फिल्म के साथ अपराजितो (1956) और अपुर संसार (1959) को भी कई पुरस्कार मिले. राय खुद स्क्रिप्टिंग, कास्टिंग, स्कोरिंग और एडिटिंग और डिजाइनिंग करते थे. अपने फ़िल्मी करियर में राय को बहोत से पुरस्कार मिले, जिसमे दादासाहेब फालके पुरस्कार, 32 इंडियन नेशनल फिल्म अवार्ड, कुछ इंटरनेशनल फिल्म अवार्ड और 1992 में दिया गया अकादमी पुरस्कार शामिल है. 1992 में ही भारत सरकार ने उन्हें भारत के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया था.

#Satyajeetray

भारत मे ब्रिटिश राज के समय , ब्रिटिश ईसाई हिन्दू धर्म की कटु निंदा करके हिन्दुओं को ईसाई मत में मतांतरित करने के अभियान में जुटे थे। हिन्दू संतों की निंदा के लिए उन्होंने तर्क दिया कि ये सिर्फ आत्ममोक्ष के लिए तपस्या करते हैं, समाज को इनसे क्या मिलता है। ईसाई मिशनरियों और संस्थानों की समाज सेवा का ढोल पीटने वाले ईसाइयों और हिन्दू संतों की भत्र्सना का जवाब देने का विचार स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने किया। और कहा, “जो गरीब, कमजोर और बीमार में शिव के दर्शन करता है, वही सही अर्थों में शिव की पूजा करता है’ “जीवे सेवा शिवेर सेवा’। स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन का ध्येय वाक्य बन गया, “आत्मनो मोक्षार्थम्-जगत् हिताय’ अर्थात् आत्ममोक्ष के प्रयास के साथ समाज सेवा। इसी ध्येय को लेकर 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई।

जाति, पंथ, मत की दीवारों को तोड़कर रामकृष्ण मिशन ने सर्वप्रथम सामाजिक समरसता का उद्घोष किया। मुस्लिम हो, ईसाई हो या हिन्दू- रामकृष्ण मठ में सभी को दीक्षा दी। लेकिन सभी के लिए एक अनिवार्यता थी 9 साल तक हिन्दू धर्म के अनुसार यज्ञोपवीत धारण, चोटी-रखना और साथ ही समाज के हर वर्ग को देखना। रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों के लिए मंदिर में प्रार्थना और अस्पताल में रोगियों की सेवा में कोई अंतर नहीं। रामकृष्ण मिशन ने ज्ञान को कर्म के साथ जोड़ा।

सामाजिक समरसता का उद्घोष तो स्वयं स्वामी रामकृष्ण ने ही किया था। उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों का अध्ययन किया, कुरान के अनुसार कई दिन तक नमाज भी पढ़ी, ईसा का विचार भी ग्रहण किया। और फिर निष्कर्ष रूप में सनातन धर्म के मूल “एकम्सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति’ का साक्षात् लोगों को कराया। उनके अनुयायियों में ईसाई भी थे और मुसलमान भी। सभी ने सनातन हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों पर चलते हुए ज्ञान के साथ कर्म को भी अपनाया। समाज सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में रामकृष्ण मिशन ने हाथ बढ़ाया।

#RamkrishanaMission

भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों की मार सर्वप्रथम सिन्ध और पंजाब को ही झेलनी पड़ी। 1802 में रणजीत सिंह विधिवत महाराजा बन गये। 40 साल के शासन में उन्हें लगातार अफगानों और पठानों से जूझना पड़ा। इसमें मुख्य भूमिका उनके सेनापति हरिसिंह नलवा की रही। 1802 में उन्होंने कसूर के पठान शासक निजामुद्दीन तथा 1803 में झंग के पठानों को हराया। 1807 में मुल्तान के शासक मुजफ्फर खान को हराकर उससे वार्षिक कर लेना शुरू किया।

इस युद्ध के बाद वीरवर हरिसिंह नलवा का नाम पेशावर से काबुल तक मुसलमानों के लिए आतंक का पर्याय बन गया। वहाँ की माताएँ अपने बच्चों को यह कहती थीं कि यदि तू नहीं सोएगा, तो नलवा आ जाएगा।

मुल्तान और अटक जीतकर रणजीत सिंह ने पेशावर और कश्मीर पर ध्यान दिया। काबुल के वजीर शेर मोहम्मद खान का बेटा अता मोहम्मद कश्मीर में शासन कर रहा था। 1819 में उसे जीतकर पहले दीवान मोतीराम को और फिर 1820 में हरिसिंह नलवा को वहाँ का सूबेदार बनाया गया। इससे कश्मीर पूरी तरह काबू में आ गया। 1822 में हरिसिंह को अफगानों के गढ़ हजारा का शासक बनाया गया।

पठान और अफगानी सेना में प्रशिक्षित सैनिकों के साथ जेहाद के नाम पर एकत्र ‘मुल्की सेना’ भी रहती थी। 1823 में अटक के पार नोशहरा में दोनों सेनाओं में भारी युद्ध हुआ। 10,000 अफगान सैनिक मारे गये, इधर भी भारी क्षति हुई। अकाली फूलासिंह और हजारों सिख बलिदान हुए; पर जीत हरिसिंह नलवा की हुई। उन्होंने अफगानों का गोला बारूद और तोपें छीन लीं। इससे उनकी धाक काबुल और कन्धार तक जम गयी। उन्होंने वहाँ का सूबेदार बुधसिंह सन्धावालिया को बना दिया।

पर पठान और अफगानों ने संघर्ष जारी रखा। 1826 से 1831 के बीच सिख राज्य के विरुद्ध जेहाद छेड़ने का कार्य मुख्यतः रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले सैयद अहमद खान ने किया। पठान उसे ‘सैयद बादशाह’ कहते थे। 1827 में 50,000 जेहादी तथा पेशावर के बरकजाई कबीले के 20,000 सैनिकों के साथ उसने हमला किया।

पेशावर से 32 कि.मी दूर पीरपाई में सिखों और जेहादियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। बुधसिंह के पास 10,000 सैनिक और 12 तोपें थीं। कुछ ही घण्टों में 6,000 मुजाहिदीन मारे गये, अतः उनके पाँव उखड़ गये। सैयद अहमद भागकर स्वात की पहाडि़यों में छिप गया।

पर यह संघर्ष रुका नहीं। 8 मई, 1831 को बालाकोट के युद्ध में मुस्लिम सेना बुरी तरह पराजित हुई। सैयद बादशाह भी मारा गया। सिख सेना का नेतृत्व रणजीत सिंह का बेटा शेरसिंह कर रहा था। नलवा इस समय सम्पूर्ण पेशावर क्षेत्र के शासक थे।

1837 में काबुल का अमीर मोहम्मद खान एक बड़ी फौज और 40 तोपें लेकर नलवा के किले जमरूद पर चढ़ आया। महीनों तक संघर्ष चलता रहा। हरिसिंह नलवा उन दिनों बुरी तरह बीमार थे, फिर भी 30 अप्रैल, 1837 को वे युद्ध के मैदान में आ गये। उनका नाम सुनते ही अफगानी सेना भागने लगी। उसी समय एक चट्टान के पीछे छिपे कुछ अफगानी सैनिकों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। वे घोड़े से गिर पड़े।

इस प्रकार भारत की विजय पताका काबुल, कन्धार और पेशावर तक फहराने वाले वीर ने युद्धभूमि में ही वीरगति प्राप्त की।

Source : http://www.sikhiwiki.org

#HariSinghNalwa   #vskgujarat.com

आज घर-घर में देवी-देवताओं की तस्वीरें आम हैं. लेकिन अब से करीब सवा सौ साल पहले ये देवी-देवता ऐसे सुलभ न थे. उनकी जगह केवल मंदिरों में थी. वहां सबको जाने की इजाजत भी नहीं थी. जात-पांत का भी भेद होता था. घर में भी यदि वे होते तो मूर्तियों के रूप में. तस्वीरों, कैलेंडरों और पुस्तकों में जो देवी-देवता आज दिखते हैं वे असल में राजा​ रवि वर्मा की कल्पनाशीलता की देन हैं.

आज तो चित्रकला की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है पर कुछ समय पूर्व तक ऐसा नहीं होता था। तब एक-एक चित्र को बनाने और उसमें सजीवता लाने के लिए कई दिन और महीने लग जाते थे। चित्र के रंगों में भेद न हो जाये, यह बड़े अनुभव और साधना का काम था। ऐसे युग में भारतीय चित्रकला को पूरे विश्व में प्रसिद्ध करने वाले थे राजा रवि वर्मा।

राजा रवि वर्मा का जन्म केरल के किलिमनूर में 29 अप्रैल, 1848 को हुआ था। इनके घर में प्रारम्भ से ही चित्रकारी का वातावरण था। इसका प्रभाव बालक रवि पर भी पड़ा। वे भी पेन्सिल और कूची लेकर तरह-तरह के चित्र बनाया करते थे।

इनके चाचा राजा राज वर्मा ने इनकी रुचि देखकर इन्हें विधिवत चित्रकला की शिक्षा दी। इसके बाद तो रवि वर्मा ने मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने आगे चलकर चित्रकला की अपनी स्वतन्त्र शैली भी विकसित की। उनकी चित्रकारी सबका मन मोह लेती थी।

एक बार प्रसिद्ध अंग्रेज चित्रकार थियोडोर जौन्सन त्रावणकोर आये। वे रवि वर्मा की चित्रकारी देखकर दंग रह गये। रवि वर्मा ने अपने चित्रों में पात्रों के चेहरे पर रंगों के जो प्रयोग किये थे, उससे थियोडोर जौन्सन बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने रवि वर्मा को कैनवास पर तैल चित्र बनाने का प्रशिक्षण दिया और इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे रवि वर्मा इस प्रकार के तैल चित्र बनाने में भी निष्णात हो गये।

रवि वर्मा अपने चित्रों में हिन्दू पौराणिक कथाओं से पात्रों का चयन करते थे। 1873 में उन्होंने मद्रास में आयोजित एक प्रतियोगिता में भाग लिया। इसमें उनके द्वारा निर्मित नायर महिला के चित्र को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिर उन्होंने अपने चित्रों की प्रदर्शिनी पुणे में लगाई। इससे उनकी प्रसिद्धि देश भर में फैल गयी। उन दिनों कैमरे का चलन नहीं था। अतः उन्हें दूर-दूर से चित्र बनाने के निमन्त्रण मिलने लगे।

अनेक राजा-महाराजाओं और धनिकों ने उनसे अपने परिजनों के व्यक्तिगत और सामूहिक चित्र बनवाये। 1888 में बड़ौदा नरेश श्री गायकवाड़ ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। वे दो वर्ष तक वहाँ रहे और महल की कला दीर्घा के लिए अनेक चित्र बनाये। उनके चित्रों की इतनी माँग थी कि बड़ौदा नरेश ने उन्हें मुम्बई में तैल चित्रों की छपाई के लिए प्रेस स्थापित करने की सलाह दी, जिससे उनके चित्र सामान्य लोगों को भी उपलब्ध हो सकें।

राजा रवि वर्मा ने चित्रकला में एक नया युग प्रारम्भ किया। उन्होंने अपने कौशल से विश्व भर में भरपूर ख्याति और सम्मान अर्जित किया। उनके चित्र भारत के अनेक महत्वपूर्ण घरानों, राज परिवारों और कला दीर्घाओं में आज भी सुरक्षित हैं। इनमें तिरुअनन्तपुरम् की श्रीचित्र कला दीर्घा प्रमुख है। अब तो उनके चित्रों का मूल्य लाखों-करोड़ों रु. में आँका जाता है।

अपने अन्तिम दिनों में राजा रवि वर्मा अपने जन्मस्थान किलिमनूर ही आ गये और यही कला साधना करते रहे। 2 अक्तूबर, 1906 को त्रिवेन्द्रम के पास अत्तिगल में उनकी कलम और कूची के रंग सदा के लिए मौन हो गये।

#RajaRaviVerma #vskgujarat.com