मौलाना अबुलकलाम मुहीउद्दीन अहमद (जन्म- 11 नवम्बर, 1888; मृत्यु- 22 फ़रवरी, 1958) एक मुस्लिम विद्वान् थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वह वरिष्ठ राजनीतिक नेता थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया और सांप्रदायिकता पर आधारित देश के विभाजन का विरोध किया। स्वतंत्र भारत में वह भारत सरकार के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्हें ‘मौलाना आज़ाद’ के नाम से जाना जाता है। ‘आज़ाद’ उनका उपनाम है।
बंगाल के क्रांतिकारी श्यामसुन्दर चक्रवर्ती से उन्होंने क्रांन्ति के लिए प्रशिक्षण प्राप्त किया था और उसकी ही सहायता से सन् 1905 में महान् क्रांतिकारी अरविन्द घोष से उनकी मुलाकात हुई थी। मुसलमानों के कुछ गुप्त मंडलों की भी उन्होंने स्थापना की थी। मौलाना को लगा कि कुछ ऐसे कारण है जिनको लेकर सन् 1857 की आज़ादी की लड़ाई के बाद मुसलमान बहुत सी बातों में अपने दूसरे देशवासियों से पीछे रह गए हैं। बहुत से मुसलमान ऐसा सोच रहे थे कि भारत में हमेशा अंग्रेज़ों का ही राज बना रहेगा और इसलिए उनको अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन अपने लेखों द्वारा मौलाना ने उन्हें समझाया कि विदेशी सरकार की ग़ुलामी से छुटकारा पाना सिर्फ़ राष्ट्रीय ध्येय ही नहीं है बल्कि यह उनका धार्मिक कर्तव्य भी है।
एक बार उन्होंने घोषणा की- “मुसलमानों के लिए बिच्छू और साँप से सुलह कर लेना, पहाड़, ग़ुफा और बिलों के भीतर घूमना और वहाँ जंगली जानवरों के साथ चैन से रहना आसान है, लेकिन उनके लिए अंग्रेज़ों के साथ संधि के लिए हाथ बढ़ाना मुमकिन नहीं है।”
अपने इस संदेश को फैलाने के लिए सन् 1912 में उन्होंने अपना प्रसिद्ध साप्ताहिक अखबार ‘अल-हिलाल’ आरम्भ किया।जब कांग्रेसी नेताओं ने 1947 के विभाजन को स्वीकार कर लिया था किंतु मौलाना इसका विरोध करते रहे। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर उनका विश्वास था।
वे कहते है – अगर एक देवदूत स्वर्ग से उतरकर क़ुतुब मीनार की ऊंचाई से यह घोषणा करता है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता को नकार दें तो 24 घंटे के भीतर स्वराज तुम्हारा हो जाएगा, तो मैं इस स्वराज को लेने से इंकार करूंगा, लेकिन अपने रुख़ से एक इंच भी नहीं हटूंगा, क्योंकि स्वराज से इंकार सिर्फ़ भारत को प्रभावित करेगा लेकिन हमारी एकता की समाप्ति से हमारे समूचे मानव जगत् को हानि होगी।
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