वेमुला की आत्महत्या पर राजनैतिक नौटंकी – दिलीप धारूरकर

भारतीय राजनीति में भाजपा विरोधकों के लिए अच्छा खासा अवरोध बन गया है। अब उसमें से बाहर निकलने के लिए चाहे जिस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे है । किसी भी कारण से कोई किसी का खूर करे अथवा किसी भी कारण से कोई आत्महत्या करे, कांग्रेस, वामपंथी और अन्य चाहे जिस तरह से उस प्रकरण का संबंध राजनीति से जोड़कर केंद्र सरकार के विरोध में शोर मचाने के प्रयास में है। इस प्रकरण में कोई भी सबूत इस सरकार के विरोध में कुछ भी साबित करनेवाला नहीं है, यह वे जानते है। लेकिन उन्हें हंगामा मचाने का एक ही मार्ग दिखता है – संसद में और संसद के बाहर केवल शोर मचाकर सरकार के सामने मुश्किल खड़ी करने का षडयंत्र उन्होंने रचा है। सरकार को मुश्किल में लाने से अधिक उन्हें सरकार की छवि बिगाडनी है। संचार माध्यमों में महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन वामपंथी और विश्व में विचारक  के तौर पर एक दूसरे को लेबल लगाकर बैठे हुए हिंदुत्वविरोधी इस शोर में आर्केस्ट्रा की तरह काम करनेवाले है। अतिकर्कश शोर मचाकर लोगों में इकतरफा भ्रांति फैलाकर भाजपा तथा हिंदुत्ववादी संगठनों को बदनाम करने का एक कलमी कार्यक्रम इन लोगों ने चलाया है। हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या का प्रकरण जिस तरह से मंडित किया जा रहा है, वह इस शोर की तकनीक का उत्तम उदाहरण है।

रोहित वेमुला प्रकरण में जो तथ्य सामने आ रहे है वे अचंबित करनेवाले है। मचाए जानेवाला शोर और वेमुला प्रकरण के तथ्यों में जमीन-आसमान का फर्क है। रोहित वेमुला की आत्महत्या की गंभीरता बढ़ाने के लिए उसकी आत्महत्या को ‘एक दलित छात्र की आत्महत्या’ शीर्षक देकर, इस प्रकरण मे आरंभ से ही मसाला भरा गया। दलित कहते ही पूरे देश में रोष की लहर फैलेगी। दलित संगठन, राजनैतिक ताकतें अपने आप मोदी सरकार के विरोध में चिल्लाते हुए उठेंगी, इस उम्मीद के साथ यह प्रकरण ‘दलित छात्र की आत्महत्या’ के तौर पर पेश किया गया। वास्तव में रोहित वेमुला के मां और बाप ‘वद्देरा’ नामक ओबीसी जाति से थे। उन्होंने बाद में ईसाई  धर्म स्वीकार किया था, इसलिए यह कहना, कि वे दलित थे, नीरा झूठ है। केवल प्रकरण की गंभीरता बढ़ाने के लिए किया गया यह झूठ का पुलिंदा है।

रोहित वेमुला ने आत्महत्या करते हुए जो सुसाईड नोट लिखी है उसमें स्पष्ट कहा है, कि इस आत्महत्या के लिए किसी को भी जिम्मेदार न मानें। फिर भी इस आत्महत्या के छह महिनों पहले से चल रहे छात्र संगठनों में संघर्ष से इस आत्महत्या का जोड़ते हुए भाजपा, अभाविप, नरेंद्र मोदी, बंडारू दत्तात्रेय, स्मृती इराणी के विरोध में भयानक शोर मचाया जा रहा है। इस नौटंकी का नेतृत्व इस देश के सबसे बालिश नेता राहुल गांधी ने स्वीकार किया है, यह तो और भी कमाल कहा जाएगा।

जिस वेमुला की आत्महत्या पर इतना शोर मचा है, वह कौन था और दो छात्र संगठनों में संघर्ष किस कारण से हुआ? रोहित वेमुला को विश्वविद्यालय के छात्रावास से एक महिने के लिए निलंबित करने की कारवाई किसने और क्यों की? इन प्रश्नों का उत्तर खोजें, तो किस नीच स्तर पर इस आत्महत्या पर राजनीति की जा रही है, यह समझा जा सकेगा।

रोहित वेमुला नामक छात्र आंबेडकर छात्र संगठन का कार्यकर्ता था। यह संगठन महाराष्ट्र के दलित छात्र संगठन की तरह बिल्कुल नहीं है। केवल सुविधा के लिए उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का नाम लिया है। वास्तव में हैदराबाद में यह छात्र संगठन एमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी की छत्रछाया में काम करता है। हैदराबाद विश्वविद्यालय ने केरल में प्रवेश के लिए एक केंद्र खोला है। वहां से कई ईसाई और मुस्लिम छात्रों ने बड़ी संख्या में इस विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया है। इनमें से कई लोग आंबेडकर छात्र संगठन का काम करते है। मुंबई बम विस्फोट के मुख्य अभियुक्त याकुब मेमन को फांसी देने का निर्णय देश के सभी न्यायालयों द्वारा दिए जाने के बाद, राष्ट्रपति द्वारा दया की अर्जी नकारने के बाद, फांसी देने से एक दिन पहले आधी रात उच्चतम न्यायालय के दरवाजे खोलकर, याकुब मेमन को बचाने की पूरी कोशिश मानवाधिकार के लिए लालायित लोगों ने की, जैसे कि वह कोई क्रांतिकारी या देशभक्त हो। उसका असर हैदराबाद के इस वेमुला और टोली पर भी पड़ा था। याकुब मेमन द्वारा किए हुए बम विस्फोटों के सिलसिले में बली गए सैंकड़ो निर्दोष लोगों की मौत को भुलाकर जो नौटंकी याकुब मेमन पर की गई, उसका एक प्रयोग हैदराबाद में इस वेमुला और दोस्तों ने किया। याकुब को फांसी देने के बाद, इस देश के लोकतंत्र द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनुचित लाभ उठाकर इन देशद्रोही प्रवृत्ति के लोगों ने प्रदर्शन किए थे। इस प्रदर्शन में उन्होंने हाथों में जो तख्तियां ली थी उन पर लिखा था – ‘‘तुम कितने याकुब मारोगे? हर घर से याकुब निकलेंगे’’, ‘‘याकुब तेरे खून से इन्कलाब आएगा’’। किसी भी देशभक्त व्यक्ति को सर से पांव तक गुस्सा दिलानेवाला यह माजरा था। ये प्रदर्शन ऐसा था जैसा पाकिस्तान के किसी छात्र संगठन द्वारा किया गया था। यह खुले तौर पर देशद्रोह था। घर घर में याकुब तैयार कर इन्हें कहां बम विस्फोट करने थे? किसे जान से मारना था? अर्थात् अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता इससे गुस्साना स्वाभाविक था। अपने विश्वविद्यालय में याकुब मेमन का, जो मानवताविरोधी तथा देशद्रोही था यह सिद्ध हो चुका था,  इस तरह खुले तौर पर समर्थन होना किसे भी गुस्सा दिला सकता था। जिस दिन याकुब को फांसी दी गई, उस दिन रोहित वेमुला ने ट्विटर पर पोस्ट किया था –  ‘‘ब्लैक डे फॉर इंडियन डेमॉक्रसी’’, ‘‘शेम ऑन ज्युडिशिअरी ऍण्ड गव्हर्नमेंट फॉर हँगिंग याकुब मेमन।’’ क्या वेमुला के इस मत से राहुल गांधी और छाती पीटनेवाले तमाम राजनेता सहमत है, यह एक बार पूछना चाहिए क्योंकि इसके बाद वेमुला की आत्महत्या तक घटनेवाली घटनाएं वेमुला के मत से और याकुब मेमन के फांसी के विरोध में किए हुए प्रदर्शन से ही जुड़ी है। घर घर में याकुब मेमन तैयार होंगे, इस घोषणा का निषेध करते हुए अभाविप के इस विश्वविद्यालय के अध्यक्ष सुशीलकुमार ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किए जिससे ये लोग काफी भड़क गए। पूरे तीस लोगों की गैंग सुशील के कमरे में उसे धमकियां देने के लिए पहुंची। यह कोई गुप्त घटनाक्रम नहीं है। एक हिंदी चैनल को स्वयं सुशीलकुमार ने साक्षात्कार देकर इन घटनाओंका वर्णन किया है। फेसबुक पर अपना मत हटाने और आंबेडकर छात्र संगठन से माफी का पत्र लिखने की मांग सुशीलकुमार से की गई। उसके द्वारा नकार दिए जाने पर उसे बाहर बुलाकर मारपीट करने की धमकी दी गई। उसने जैसे तैसे फोन पर यह जानकारी पुलिस और विश्वविद्यालय की सुरक्षा प्रणाली को दी। विश्वविद्यालय के सुरक्षा प्रणाली के लोगों ने आकर सुशील को अपने वैन में बिठाया। तथापि, इन 30 मुस्टंडों ने सुरक्षा प्रणाली की वैन से सुशील को बाहर खींचकर बेरहमी से पिटा। क्यों? याकुब मेमन के महिमामंडन का फेसबुक पर उसने विरोध किया इसलिए! सुशील को अस्पताल में दाखिल करना पड़ा। मामला पुलिस तक पहुंचा। सुशील भी ओबीसी प्रवर्ग का छात्र है। अब वेमुला दलित है इसलिए रास्ते पर उतर रहे है, ऐसा कहनेवालों से सुशील का सवाल है, कि मैं भी रोहित की तरह पिछड़ा हूं। मुझसे मारपीट की तब ये सब लोग कहां गए थे? कोई हिंदुत्ववादी हो तो उसे कोई भी मारपीट करें, कोई जानलेवा हमला करें, उसके लिए इनमें से किसी का कुछ नहीं कहना होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उस समय क्या पता कहां मुंह पर मल्टीकम्युनल प़ट्‌टी लगाकर बैठी होती है?

एमआईएम और ओवैसी ने मारपीट करनेवाले इस टोली पर कोई कारवाई न हो इसके लिए राजनैतिक दबाव लाना शुरू किया। इसलिए सुशील से हुई मारपीट को लेकर अभाविप द्वारा जांच की मांग करना स्वाभाविक था क्योंकि वह अभाविप का वह अध्यक्ष था। इस आवेदन की प्रतिलिपियां बंडारू दत्तात्रेय और स्मृती इरानी को दी गई, जैसे कि किसी भी आवेदन की प्रतिलिपियां मंत्रियों को दी जाती है। चूंकि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय था, इसलिए केंद्रीय मंत्रियों को ये प्रतिलिपियां दी गई। जब किसी का आवेदन आता है तब मंत्रालय में संबंधित विभाग के पास जांच के लिए वह अग्रेषित किया जाता है। वैसे ही यह आवेदन भी दोनों केंद्रीय मंत्रियों के द्वारा हैदराबाद विश्वविद्यालया को अग्रेषित किया गया। इस अग्रेषित किए हुए पत्र में इस प्रकरण की उचित जांच करने का ही निर्देश है। रोहित वेमुला का नाम अथवा किसी का भी नाम नहीं है। लेकिन अब विरोधक जो झूठा प्रचार कर रहे है, वह यह दर्शाते हुए कर रहे है, जैसे बंडारू दत्तात्रेय अथवा स्मृती इरानी ने इन छात्रों पर उनके दलित होने के कारण ही कारवाई करने के आदेश दिए हो। चूंकि यह मामला न्यायालय में पहुंचा था, इसलिए न्यायालय से भी इस बारे में विश्वविद्यालय ने कौन सी कारवाई की, इस बारे में जानकारी मंगाई जा रही थी। असली मारपीट अगस्त में हुई थी और सितंबर तक कोई कारवाई नहीं हुई थी। आखिर न्यायालय का दबाव और इस मामले में नियुक्त जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर सुशील से हुई मारपीट के मामले में पांच छात्रों को कुछ अवधि के लिए छात्रावास से निलंबित करने के आदेश दिए गए। या निर्णय का विरोध करते हुए रोहित वेमुला और अन्य चार छात्रों ने विश्वविद्यालय को चेतावनी दी, कि वे विश्वविद्यालय परिसर  में खुले अहाते में सोकर आंदोलन करेंगे। उन्होंने अपने अन्य मित्रों से इस आंदोलन को समर्थन देने का आह्वान किया था लेकिन रोहित वेमुला के साथ कोई नहीं खड़ा हुआ। पांच में से कुछ छात्र विश्वविद्यालय के स्टोअर में सो गए। हताश हुए वेमुला ने आखिर आत्महत्या की। लेकिन इस आत्महत्याका मंत्रियों के पत्र अथवा विश्वविद्यालय की कारवाई से कोई संबंध नहीं था। आत्महत्या के समय लिखी हुई चिठ्ठामें उसने साफ लिखा है, कि‘‘मेरी इस आत्महत्या के लिए किसी को भी जिम्मेदार न मानें।’’ फिर भी इस आत्महत्या को पूरा राजनैतिक रंग देते हुए राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अन्य झूठे विरोधक चिल्ल पों मचा रहेहै। पूरे देश में प्रदर्शन किए जा रहे है।

यह रोहित वेमुला विक्षिप्त था। ‘‘भगवा रंग दिखने पर मुझे उसे फाड़ने की इच्छा होती है,’’ यह कहते हुए उसने  अभाविप कापोस्टर फाड़ा था। ‘‘हिंदू, हिंदुत्व अथवा भगवा दिखने पर मैं उसे फाड़ूंगा, मेरे घर पर भगवा साडी दिखें तो उसे भी मैं फाड़ दूंगा,’’ यह वह आत्महत्या से पूर्व कुछ दिन एक विडीओ में कहता है। स्वामी विवेकानंद पर अत्यंत आपत्तिजनक भाषा में उसने ट्विटर पर अपमानित करनेवाला वक्तव्य किया था। ऐसे इस विक्षिप्त छात्र ने देशद्रोही, मानवताविरोधी, गुंड तथा आतंकवादी याकुब मेमन की तरफ से बयानबाज़ी की। उसका विरोध करने पर जानलेवा हमला किया। इस बारे में कारवाई होते ही आंदोलन का पैंतरा लिया। न्यायालय के मामले का निर्णय होने की प्रतीक्षा भी नहीं की और आंदोलन का कोई समर्थन नहीं करता,यह देखकर निराश होकर आत्महत्या की। इसका संबंध बिनावजह केंद्रीय मंत्री और सरकार से जोड़कर झूठा आंदोलन करना बचकानेपन का चरम है।

राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस टोली ने एक नया ‘हंगामा तकनीक’ का स्वीकार किया है – – किसी भी विषय के बहाने संसद और संसद के बाहर शोर करना। गुजरात के दंगों के बारे में इसी तरह झूठा प्रचार करते हुए इन लोगों ने कभी मोदी को अमेरिका का विसा मिलने से रोका, मोदी को राजनैतिक रुप से बदनाम करते हुए राजनीति से बाहर करने की चाल चली। भारतीय जनता ने बैलट बाक्स के जरिए यह चाल असफल की। कांग्रेस सरकार के समय में महाराष्ट्र में दाभोलकर का खून हुआ। उसके बाद गोविंद पानसरे का खून हुआ।इन दोनों घटनाओं के लिए यूं शोर मचाया गया मानो दोनों घटनाओं के लिए जणू मोदी सरकार ही जिम्मेदार हो। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के समय में कलबुर्गी का खून हुआ। फिर वही झूठ और शोर मचाया गया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार होते हुए दादरी प्रकरण हुआ।बिना किसी संबंध मोदी सरकार का विरोध में झूठा प्रचार करते हुए  ‘पुरस्कार वापसी’ जैसी चालें चली गई। बिहार चुनाव को सामने रखकर मोदी सरकार की बदनाम करने की चाल चली गई। गुजरात में दंगे हुए तब वह चाहे जो करें, वहां के सरकार को दोषी मानकर शोर मचानेवालों ने  महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तरप्रदेश मेंहुई हत्याओं का संबंध वहां की कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के राज्य सरकारों से न जोड़ते हुए केंद्र सरकार से क्यों जोड़ा? हैदराबाद मामले में भी वेमुला द्वारा देशद्रोही कारवाईयां करने पर उसका विरोध करते ही मारपीट की। विश्वविद्यालय द्वारा स्वतंत्र रुप से कारवाई करते ही उसने आत्महत्या की जिसका दोष केंद्र सरकार के मत्थे ड़ालकर झूठा प्रचार किया जा रहा है।

इस शोरतंत्र को लोगों को पहचानना चाहिए। घटनाक्रम ठीक से समझना चाहिए। सरकार को बिनावजह  बदनाम करने का इन राजनैतिक झूठों का उद्देश सफल होने नहीं देना चाहिए। यहा लोकतंत्र से मल न खानेवाला टोलीतंत्र का प्रकार है। देश में बहुमत से चुने हुए सरकार पर मात करने के लिए एक षडयंत्र खेला जा रहा है। इस षडयंत्र को समय पर ही पहचानना होगा।

– दिलीप धारूरकर

9422202024

dilip.dharurkar@gmail.com

विश्व संवाद केंद्र (पश्‍चिम महाराष्ट्र प्रांत)


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