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संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, इतिहास के प्राध्यापक तथा राजनीति, समाजशास्त्र, साहित्य आदि विषयों के गहन अध्येता श्रीपति सुब्रमण्यम शास्त्री का जन्म 19 जून, 1935 को कर्नाटक राज्य के चित्रदुर्ग जिले के हरिहर ग्राम में हुआ था। बालपन में ही वे स्वयंसेवक बने तथा अपने संकल्प के अनुसार अविवाहित रहकर अंतिम सांस तक संघ कार्य करते रहे।

1956 में वे मैसूर नगर कार्यवाह बने। उस दौरान उन्होंने मैसूर वि.वि. से इतिहास में स्वर्ण पदक लेकर एम.ए किया और ‘संवैधानिक इतिहास’ विषय पर पी-एच.डी करने पुणे आ गये। इसी बीच उन्होंने संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण भी पूर्ण किया।

1961 में वे पुणे के वाडिया महाविद्यालय में अध्यापक तथा फिर पुणे वि.वि. में इतिहास के विभागाध्यक्ष बने। यहां उन्हें सायं शाखाओं का काम दिया गया। वे अपनी साइकिल पर दिन-रात घूमने लगे। छात्रावासों तथा वहां के जलपान गृहों को उन्होंने अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया। वे प्राध्यापक होते हुए भी छात्रों में मित्र की तरह घुलमिल जाते थे।

शास्त्री जी के भाषण बहुत तर्कपूर्ण होते थे। सैकड़ों संदर्भ व तथ्य उन्हें याद थे। पुणे एक समय समाजवादियों का गढ़ था। उनका ‘साधना’ नामक पत्र प्रायः संघ पर झूठे आरोप लगाता था। शास्त्री जी हर बार उसका तर्कपूर्ण उत्तर देते थे। इससे उनका मनोबल टूट गया और उन्होंने यह मिथ्याचार बंद कर दिया। दूसरी ओर शास्त्री जी की बैठकें बड़ी रोचक और हास्यपूर्ण होती थीं। बैठक के बाद भी कार्यकर्ता घंटों उनके साथ बैठकर गप्प लड़ाते थेे। वे संघ के काम में बौद्धिकता से अधिक महत्व श्रद्धा और विनम्रता को देते थे।

महाराष्ट्र में काफी समय तक संघ को ब्राह्मणों का संगठन माना जाता था। हिन्दू समाज का निर्धन व निर्बल वर्ग इस कारण संघ से दूर ही रहता था। अतः तात्या बापट व दामु अण्णा दाते के साथ ‘पतित पावन’ संस्था बनाकर वे इन वर्गाें में पहुंचे। संघ में व्यस्त रहते हुए भी वे विद्यालय में पूरी तैयारी से पढ़ाते थे। इसलिए उन्हें ‘अर्जेंट प्रोफेसर’ कहा जाता था। उनकी रोचक शैली के कारण कक्षा में अन्य विद्यालयों के छात्र भी आकर बैठ जाते थे।

उनके प्रयास से कुछ ही वर्ष में पुणे में नये, जुझारू तथा युवा कार्यकर्ताओं की टोली खड़ी हो गयी। शास्त्री जी ने उनके हाथ में संघ का पूरा काम सौंप दिया। तब तक उन पर भी प्रांत, क्षेत्र तथा फिर अखिल भारतीय सहबौद्धिक प्रमुख, सह संपर्क प्रमुख आदि दायित्व आ गये। इस नाते उनका प्रवास देश और विदेशों में भी होने लगा। वे कन्नड़, तमिल, हिन्दी और अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता थे। पुणे आकर उन्होंने मराठी भी सीख ली। कुछ समय बाद उन्हें मराठी में बोलते सुनकर किसी को नहीं लगता था कि वे मूलतः महाराष्ट्र के नहीं हैं।

उनकी विद्वत्ता की धाक संघ के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी थी। इसलिए सब तरह के लोग उनसे परामर्श के लिए आते थे। 1983 में पुणे में एक ईसाई संस्था ‘सेमिनरी’ ने उन्हें ‘ईसाइयों का भारत में स्थान’ विषय पर व्याख्यान के लिए बुलाया। उनका वह स्पष्ट भाषण बहुचर्चित और प्रकाशित भी हुआ।

शास्त्री जी ने महाराष्ट्र की ‘जन कल्याण समिति’ को भी व्यवस्थित किया। लातूर के भूकंप के बाद इसके सेवा और पुनर्वास कार्य की दुनिया भर में प्रशंसा हुई। डा. हेडगेवार जन्मशती पर महाराष्ट्र में प्रवास कर उन्होंने धन संग्रह कराया। श्री गुरुजी की जन्मशती पर उन्होंने अनेक व्याख्यानमालाओं का आयोजन किया। इस भागदौड़ से वे अनेक रोगों से घिर गये, जिसमंे मधुमेह प्रमुख था। इस पर भी वे लगातार काम में लगे रहे।

कार्यकर्ताओं के दुख-सुख को निजी दुख-सुख मानने वाले, सदा दूसरों को आगे रखने वाले आत्मविलोपी व्यक्तित्व के धनी श्रीपति शास्त्री का 27 फरवरी, 2010 को हृदयाघात से पुणे में ही देहांत हुआ।

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भारत में अंग्रेजी सत्ता के आने के साथ ही गाँव-गाँव में उनके विरुद्ध विद्रोह होने लगा; पर व्यक्तिगत या बहुत छोटे स्तर पर होने के कारण इन संघर्षों को सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों के विरुद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 में हुआ। इसमें जिन वीरों ने अपने साहस से अंग्रेजी सेनानायकों के दाँत खट्टे किये, उनमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम प्रमुख है।

19 नवम्बर, 1835 को वाराणसी में जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनु था। प्यार से लोग उसे मणिकर्णिका तथा छबीली भी कहते थे। इनके पिता श्री मोरोपन्त ताँबे तथा माँ श्रीमती भागीरथी बाई थीं। गुड़ियों से खेलने की अवस्था से ही उसे घुड़सवारी,  तीरन्दाजी, तलवार चलाना, युद्ध करना जैसे पुरुषोचित कामों में बहुत आनन्द आता था। नाना साहब पेशवा उसके बचपन के साथियों में थे।

उन दिनों बाल विवाह का प्रचलन था। अतः सात वर्ष की अवस्था में ही मनु का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधरराव से हो गया। विवाह के बाद वह लक्ष्मीबाई कहलायीं। उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। जब वह 18 वर्ष की ही थीं, तब राजा का देहान्त हो गया। दुःख की बात यह भी थी कि वे तब तक निःसन्तान थे। युवावस्था के सुख देखने से पूर्व ही रानी विधवा हो गयीं।

उन दिनों अंग्रेज शासक ऐसी बिना वारिस की जागीरों तथा राज्यों को अपने कब्जे में कर लेते थे। इसी भय से राजा ने मृत्यु से पूर्व ब्रिटिश शासन तथा अपने राज्य के प्रमुख लोगों के सम्मुख दामोदर राव को दत्तक पुत्र स्वीकार कर लिया था; पर उनके परलोक सिधारते ही अंग्रेजों की लार टपकने लगी। उन्होंने दामोदर राव को मान्यता देने से मनाकर झाँसी राज्य को ब्रिटिश शासन में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सुनते ही लक्ष्मीबाई सिंहनी के समान गरज उठी – मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।

अंग्रेजों ने रानी के ही एक सरदार सदाशिव को आगे कर विद्रोह करा दिया। उसने झाँसी से 50 कि.मी दूर स्थित करोरा किले पर अधिकार कर लिया; पर रानी ने उसे परास्त कर दिया। इसी बीच ओरछा का दीवान नत्थे खाँ झाँसी पर चढ़ आया। उसके पास साठ हजार सेना थी; पर रानी ने अपने शौर्य व पराक्रम से उसे भी दिन में तारे दिखा दिये।

इधर देश में जगह-जगह सेना में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह शुरू हो गये। झाँसी में स्थित सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों ने भी चुन-चुनकर अंग्रेज अधिकारियों को मारना शुरू कर दिया। रानी ने अब राज्य की बागडोर पूरी तरह अपने हाथ में ले ली; पर अंग्रेज उधर नयी गोटियाँ बैठा रहे थे।

जनरल ह्यू रोज ने एक बड़ी सेना लेकर झाँसी पर हमला कर दिया। रानी दामोदर राव को पीठ पर बाँधकर 22 मार्च, 1858 को युद्धक्षेत्र में उतर गयी। आठ दिन तक युद्ध चलता रहा; पर अंग्रेज आगे नहीं बढ़ सके। नौवें दिन अपने बीस हजार सैनिकों के साथ तात्या टोपे रानी की सहायता को आ गये; पर अंग्रेजों ने भी नयी कुमुक मँगा ली। रानी पीछे हटकर कालपी जा पहुँची।

कालपी से वह ग्वालियर आयीं। वहाँ 18 जून, 1858 को ब्रिगेडियर स्मिथ के साथ हुए युद्ध में उन्होंने वीरगति पायी। रानी के विश्वासपात्र बाबा गंगादास ने उनका शव अपनी झोंपड़ी में रखकर आग लगा दी। रानी केवल 22 वर्ष और सात महीने ही जीवित रहीं। पर ‘‘खूब लड़ी मरदानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी…..’’ गाकर उन्हें सदा याद किया जाता है।

कुछ इतिहासकार रानी लक्ष्मीबाई का  बलिदान दिवस  17 जून मानते है। 

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रानी लक्ष्मीबाई का एकमात्र चित्र जिसे एक अंग्रेज फोटोग्राफर जॉन स्टोन एण्ड हॉटमैन ने सन् 1850 में खींचा था।
प. पू. बाला साहब देवरस (तृतीय सर संघचालक, रा. स्व. संघ) – पूण्य तिथि 17 जून 1996
 
रा. स्व. संघ के तृतीय सर संघचालक प. पू. बाला साहब देवरस जी (श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का जन्म 11 दिसंबर 1915 को नागपुर में हुआ था। उनके पिता सरकारी कर्मचारी थे और नागपुर इतवारी मे आपका निवास था। यहीं देवरस परिवार के बच्चे व्यायामशाला जाते थे 1925 मे संघ की शाखा प्रारम्भ हुई और कुछ ही दिनों बाद बालसाहेब ने शाखा जाना प्रारम्भ कर दिया।
 
स्थायी रूप से उनका परिवार मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के आमगांव के निकटवर्ती ग्राम कारंजा का था। उनकी संपूर्ण शिक्षा नागपुर में ही हुई। न्यू इंगलिश स्कूल मे उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई
 
संस्कृत और दर्शनशास्त्र विषय लेकर मौरिस कालेज से बालसाहेब ने 1935 मे बी.ए. किया। दो वर्ष बाद उन्होंने विधि (ला) की परीक्षा उत्तीर्ण की। विधि स्नातक बनने के बाद बालसाहेब ने दो वर्ष तक ‘अनाथ विद्यार्थी बस्ती गृह’ मे अध्यापन कार्य किया। इसके बाद उन्हें नागपुर मे नगर कार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। 1965 में उन्हें सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया जो 6 जून 1973 तक उनके पास रहा।
 
श्रीगुरू जी के स्वर्गवास के बाद 6 जून 1973 को सरसंघचालक के दायित्व को ग्रहण किया। उनके कार्यकाल में संघ कार्य को नई दिशा मिली। उन्होंने सेवाकार्य पर बल दिया परिणाम स्वरुप उत्तर पूर्वांचल सहित देश के वनवासी क्षेत्रों के हजारों की संख्या में सेवाकार्य आरंभ  हुए।
 
सन् 1975 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। हजारों संघ के स्वयंसेवको को मीसा तथा डी आई आर जैसे काले कानून के अंतर्गत जेलों में डाल दिया गया और यातनाऐं दी गई। प. पू. बाला साहब की प्रेरणा एवं सफल मार्गदर्शन में विशाल सत्याग्रह हुआ और 1977 में आपातकाल समाप्त होकर संघ से प्रतिबंध हटा।
 
स्वास्थ्य कारणों से जीवन काल में ही सन् 1994 में ही सरसंघचालक का दायित्व उन्होंने प्रो. प्रो॰ राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जु भैया को सौप दिया। 17 जून 1996 को उनका स्वर्गवास हो गया।
 
उनके छोटे भाई भाऊराव देवरस ने भी संघ परिवार एवं भारतीय राजनीति में महती भूमिका निभाई।
 
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भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में यद्यपि क्रान्तिकारियों की चर्चा कम ही हुई है; पर सच यह है कि उनका योगदान अहिंसक आन्दोलन से बहुत अधिक था। बंगाल क्रान्तिकारियों का गढ़ था। इसी से घबराकर अंग्रेजों ने राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली में स्थापित की थी। इन्हीं क्रान्तिकारियों में एक थे नलिनीकान्त बागची, जो सदा अपनी जान हथेली पर लिये रहते थे।

एक बार बागची अपने साथियों के साथ गुवाहाटी के एक मकान में रह रहे थे। सब लोग सारी रात बारी-बारी जागते थे; क्योंकि पुलिस उनके पीछे पड़ी थी। एक बार रात में पुलिस ने मकान को घेर लिया। जो क्रान्तिकारी जाग रहा था, उसने सबको जगाकर सावधान कर दिया। सबने निश्चय किया कि पुलिस के मोर्चा सँभालने से पहले ही उन पर हमला कर दिया जाये।

निश्चय करते ही सब गोलीवर्षा करते हुए पुलिस पर टूट पड़े। इससे पुलिस वाले हक्के बक्के रह गये। वे अपनी जान बचाने के लिए छिपने लगे। इसका लाभ उठाकर क्रान्तिकारी वहाँ से भाग गये और जंगल में जा पहुँचे। वहाँ भूखे प्यासे कई दिन तक वे छिपे रहे; पर पुलिस उनके पीछा करती रही। जैसे तैसे तीन दिन बाद उन्होंने भोजन का प्रबन्ध किया। वे भोजन करने बैठे ही थे कि पहले से बहुत अधिक संख्या में पुलिस बल ने उन्हें घेर लिया।

वे समझ गये कि भोजन आज भी उनके भाग्य में नहीं है। अतः सब भोजन को छोड़कर फिर भागे; पर पुलिस इस बार अधिक तैयारी से थी। अतः मुठभेड़ चालू हो गयी। तीन क्रान्तिकारी वहीं मारे गये। तीन बच कर भाग निकले। उनमें नलिनीकान्त बागची भी थे। भूख के मारे उनकी हालत खराब थी। फिर भी वे तीन दिन तक जंगल में ही भागते रहे। इस दौरान एक जंगली कीड़ा उनके शरीर से चिपक गया। उसका जहर भी उनके शरीर में फैलने लगा। फिर भी वे किसी तरह हावड़ा पहुँच गये।

हावड़ा स्टेशन के बाहर एक पेड़ के नीचे वे बेहोश होकर गिर पड़े। सौभाग्यवश नलिनीकान्त का एक पुराना मित्र उधर से निकल रहा था। वह उन्हें उठाकर अपने घर ले गया। कुछ दिन में नलिनी ठीक हो गये। ठीक होने पर नलिनी मित्र से विदा लेकर कुछ समय अपना हुलिया बदलकर बिहार में छिपे रहे; पर चुप बैठना उनके स्वभाव में नहीं थी। अतः वे अपने साथी तारिणी प्रसन्न मजूमदार के पास ढाका आ गये।

लेकिन पुलिस तो उनके पीछे पड़ी ही थी। 15 जून को पुलिस ने उस मकान को भी घेर लिया, जहाँ से वे अपनी गतिविधियाँ चला रहे थे। उस समय तीन क्रान्तिकारी वहाँ थे। दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गयी। पास के मकान से दो पुलिस वालों ने इधर घुसने का प्रयास किया; पर क्रान्तिवीरों की गोली से दोनों घायल हो गये। क्रान्तिकारियों के पास सामग्री बहुत कम थी, अतः तीनों दरवाजा खोलकर गोली चलाते हुए बाहर भागे। नलिनी की गोली से पुलिस अधिकारी का टोप उड़ गया; पर उनकी संख्या बहुत अधिक थी। अन्ततः नलिनी गोली से घायल होकर गिर पड़े।

पुलिस वाले उन्हें बग्घी में डालकर अस्पताल ले गये, जहाँ अगले दिन 16 जून, 1918 को नलिनीकान्त बागची ने भारत माँ को स्वतन्त्र कराने की अधूरी कामना मन में लिये ही शरीर त्याग दिया।

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जनवरी 1946 को दस सदस्यीय ब्रिटिश सांसदों का प्रतिनिधि मंडल भारत आया और प्रमुख नेताओं से मिला। जनवरी 25 को वह महात्मा गांधी से मिला और फरवरी 10 को इंग्लैण्ड लौट गया। 17 फरवरी महात्मा गांधी मुम्बई लौटे। उन दिनों भारत में ब्रिटिश विरोधी भावनाएँ अपनी चरम पर थीं। साथ ही भारतीय नौ सेना व वायु सेना में प्रश्न खड़ा हुआ कि-‘‘ब्रिटिश सेनाएँ तो अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए लड़ रहीं है, हम किसके लिए लड़ रहे हैं ? और परिणामस्वरूप भारतीय नौ-सेना दल में मुंबई में और भारतीय वायुसेना दल में दिल्ली में 17-18 फरवरी को विद्रोह की आग भड़क उठी। अँग्र्रेजों ने शाही भारतीय सेना को उन पर गोली चलाने के लिए कहा तो अपने नौ सैनिक भाईयों पर गोली चलाने से उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। अँग्रेजों का भारतीय सेना पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। उन्होंने सोचा कि जिस सेना के बलबूते पर आज तक हम इस देश पर राज्य करते आए हैं वही जब हमारे विरुद्ध हो गई तो हमारे दिन कितने बचे हैं ?

14-15 जून 1947 को अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की बैठक में जहाँ गोविन्दवल्लभ पंत ने कहा कि-‘3 जून योजना और आत्महत्या’ में से उन्होंने 3 जून को चुना है। मौलाना आजाद ने कहा कि मैंने भी अनुभव किया कि-‘‘तत्काल समझौते की आवश्यकता है किन्तु आशा करता हूँ कि विभाजन अधिक देर नहीं टिकेगा।’’ किन्तु श्री चोइथराम गिडवानी ने आलोचना करते हुए कहा कि प्रस्ताव तो लीग की हिंसावृत्ति के आगे आत्मसमर्पण है। श्री जगत्नारायण ने स्मरण कराया कि मई 1942 में अखिल भारतीय काँग्रेस समिति ने डंके की चोट पर कहा था कि विभाजन की हर योजना का विरोध करेगी- अब वह पीछे नहीं हट सकती। समाजवादी काँग्रेसी विभाजन का बराबर कड़ा विरोध करते रहे थे। डाक्टर राममनोहर लोहिया ने विभाजन की योजना से असहमत होते हुए भी इसीलिए तटस्थता की भूमिका स्वीकार की क्योंकि विभाजन-योजना तथ्य रूप धारण कर चुकी थी। अनोखा तर्क था।

वरिष्ठ काँग्रेसियों में केवल बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन ही ऐसे थे जिन्होंने अंत तक प्रस्ताव का ढृढ़ता से विरोध किया। उन्होंने कहा कि नेहरू सरकार मुस्लिम लीग के आतंककारी हथकंडों से हतोत्साह हो गयी है, विभाजन की स्वीकृति देना विश्वासघात और आत्मसमर्पण करना होगा। अपने भाषण के अंत में उन्होंने आवेगपूर्ण भाव से आग्रह किया-‘‘भले ही हमें कुछ और समय तक ब्रिटिश राज्य के अधीन कष्ट उठाने पड़ें पर हमें अखण्ड भारत के चिरपोषित लक्ष्य की बलि नहीं देना चाहिए। आइए, हम युद्ध के लिए कटिबद्ध हों, यदि आवश्यकता पड़े तो अँग्रेजों और लीग दोनों से लोहा लें और देश को खण्डित होने से बचाएँ।’’ समिति के सदस्यों ने तालियों की प्रचण्ड गड़गड़ाहट से टंडन जी के भाषण का समर्थन किया। काँग्रेसी सदस्यों की डूबती हुई आस्था को आधार मिल गया और प्रस्ताव का भविष्य अधर में लटक गया।

इस निर्णायक घड़ी में गांधी जी का तर्क यह था कि-‘‘योजना की स्वीकृति में काँग्रेस कार्यकारिणी ही एक मात्र पक्ष नहीं है, दो अन्य पक्ष ब्रिटिश सरकार और मुस्लिम लीग भी संबंधित हैं। ऐसी स्थिति में काँग्रेस समिति अपनी कार्यकारिणी के निर्णय को ठुकरा दे तो संसार क्या सोचेगा ?….. वर्तमान घड़ी में देश में शान्ति-स्थापना का भारी महत्व है। काँग्रेस सदा ही पाकिस्तान का विरोध करती रही है ….पर कभी-कभी हमें बड़े ही अरुचिकर निर्णय करने पड़ते हैं। …. यदि मेरे पास समय होता तो क्या मैं इसका विरोध नहीं करता ? किन्तु मैं काँग्रेस के वर्तमान नेतृत्व को चुनौती नहीं दे सकता और लोगों की उनके प्रति आस्था को नष्ट नहीं कर सकता। ऐसा तभी मैं करुँगा जब मैं उनसे कह सकूंगा, ‘लीजिए, यह रहा वैकल्पिक नेतृत्व’। ऐसे विकल्प के निर्माण के लिए मेरे पास समय नहीं रह गया है। …. आज मुझ में वैसी शक्ति नहीं रह गई है। अन्यथा मैं अकेला ही विद्रोह की घोषणा कर देता।’’

गांधी जी की उपर्युक्त टिप्पणी के प्रसंग में यह जान लेना उपयुक्त रहेगा कि पंडित नेहरू ने लियोनार्ड मोसले से क्या कहा था ? विभाजन की स्वीकृति के कारणों पर प्रकाश डालने के बाद नेहरू ने कहा था कि-‘‘गांधी जी हमसे कहते कि विभाजन स्वीकार न किया जाए तो हम लड़ाई चालू रखते, प्रतीक्षा करते।’’ गांधी के हस्तक्षेप के कारण प्रस्ताव के पक्ष में 157 मत पड़े, विपक्ष में 29 और तटस्थ रहे 32। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के सर्वाधिक मूल और महत्वपूर्ण प्रश्न पर काँग्रेस की सर्वोच्च संस्था ने आत्मसमर्पण कर दिया और विभाजन के दुःखान्त नाटक के अंतिम दृष्य का पटाक्षेप हुआ।

आतंकवाद, अशांति, अनुशासनहीनता और अव्यवस्था से विश्व को बचाने का एकमात्र उपाय अंिहंसा ही है। देश के दूरस्थ गांवों में लाखों कि.मी पदयात्रा कर यह संदेश फैलाने वाले जैन सन्त आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म14 जून, 1920 (आषाढ़ कृष्ण 13) को राजस्थान के झुंझनू जिले के ग्राम तमकोड़ में हुआ था।

बचपन में इनका नाम नथमल था। पिता श्री तोलाराम चोरड़िया का देहांत जल्दी हो जाने से इनका पालन माता श्रीमती बालू ने किया। धार्मिक स्वभाव की माताजी का नथमल पर बहुत प्रभाव पड़ा। अतः माता और पुत्र दोनों ने एक साथ 1929 में संत श्रीमद् कालूगणी से दीक्षा ले ली।

श्रीमद् कालूगणी की आज्ञा से इन्होंने आचार्य तुलसी को गुरु बनाकर उनके सान्निध्य में दर्शन, व्याकरण,ज्योतिष, आयुर्वेद,  मनोविज्ञान, न्याय शास्त्र, जैन, बौद्ध और वैदिक साहित्य का अध्ययन किया। संस्कृत, प्राकृत तथा हिन्दी पर उनका अच्छा अधिकार था। वे संस्कृत में आशु कविता भी करते थे। जैन मत के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ‘आचरांग सूत्र’ पर उन्होंने संस्कृत में भाष्य लिखा। उनकी प्रवचन शैली भी रोचक थी। इससे उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी।

उनके विचार और व्यवहार को देखकर आचार्य तुलसी ने 1965 में उन्हें अपने धर्मसंघ का निकाय सचिव बनाया। इस प्रशासनिक दायित्व का समुचित निर्वाह करने पर उन्हें 1969 में युवाचार्य एवं 1978 में महाप्रज्ञ घोषित किया गया। 1998 में आचार्य तुलसी ने अपना पद विसर्जित कर इन्हें जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया।

आचार्य महाप्रज्ञ ने अपने गुरु आचार्य तुलसी द्वारा 1949 में प्रारम्भ किये गये ‘अणुव्रत आंदोलन’ के विकास में भरपूर योगदान दिया। 1947के बाद जहां एक ओर भारत में भौतिक समृद्धि बढ़ी, वहीं अशांति, हिंसा,दंगे आदि भी बढ़ने लगे। वैश्वीकरण भी अनेक नई समस्याएं लेकर आया। आचार्य जी ने अनुभव किया कि इन समस्याओं का समाधान अहिंसा ही है। अतः उन्होंने 2001 से 2009 तक ‘अहिंसा यात्रा’ का आयोजन किया। इस दौरान लगभग एक लाख कि.मी की पदयात्रा कर वे दस हजार ग्रामों में गये। लाखों लोगों ने उनसे प्रभावित होकर मांस, मदिरा आदि को सदा के लिए त्याग दिया।

भौतिकवादी युग में मानसिक तनाव, व्यस्तता व अवसाद आदि के कारण लोगों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन को चौपट होते देख आचार्य जी ने साधना की सरल पद्धति ‘प्रेक्षाध्यान’ को प्रचलित किया। इसमें कठोर कर्मकांड, उपवास या शरीर को अत्यधिक कष्ट देने की आवश्यकता नहीं होती। किसी भी अवस्था तथा मत, पंथ या सम्प्रदाय को मानने वाला इसे कर सकता है। अतः लाखों लोगों ने इस विधि से लाभ उठाया।

आचार्य जी प्राचीन और आधुनिक विचारों के समन्वय के पक्षधर थे। वे कहते थे कि जो धर्म सुख और शांति न दे सके, जिससे जीवन में परिवर्तन न हो, उसे ढोने की बजाय गंगा में फेंक देना चाहिए। जहां समाज होगा, वहां समस्या भी होगी; और जहां समस्या होगी, वहां समाधान भी होगा। यदि समस्या को अपने साथ ही दूसरे पक्ष की दृष्टि से भी समझने का प्रयास करें, तो समाधान शीघ्र निकलेगा। इसे वे ‘अनेकांत दृष्टि’ का सूत्र कहते थे।

आचार्य जी ने प्रवचन के साथ ही प्रचुर साहित्य का भी निर्माण किया। विभिन्न विषयों पर उनके लगभग 150 ग्रन्थ उपलब्ध हैं। उन्होंने विश्व के अनेक देशों में यात्रा कर अहिंसा, प्रेक्षाध्यान और अनेकांत दृष्टि के सूत्रों का प्रचार किया। उन्हें अनेक उपाधियों से भी विभूषित किया गया। नौ मई, 2010 को जिला चुरू (राजस्थान) के सरदारशहर में हृदयाघात से उनका निधन हुआ।

भारत माँ को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए देश का कोई कोना ऐसा नहीं था, जहाँ छोटे से लेकर बड़े तक, निर्धन से लेकर धनवान तक, व्यापारी से लेकर कर्मचारी और कवि, कलाकार,  साहित्यकार तक सक्रिय न हुए हों। यह बात और है किसी को इस संग्राम में सफलता मिली, तो किसी को निर्वासन और वीरगति।

चहलारी, बहराइच (उत्तर प्रदेश) के 18 वर्षीय जमींदार बलभद्र सिंह ऐसे ही वीर थे। उनके पास 33 गाँवों की जमींदारी थी। उनकी गाथाएँ आज भी लोकगीतों में जीवित हैं। 1857 में जब भारतीय वीरों ने मेरठ में युद्ध प्रारम्भ किया, तो अंग्रेजों ने सब ओर भारी दमन किया। अवध के नवाब वाजिद अली शाह की गिरफ्तारी के बाद उनकी बेगम हजरत महल ने लखनऊ छोड़कर राजा हरदत्त सिंह (बौड़ी) के गढ़ को केन्द्र बनाया। उन्होंने वहाँ अपने विश्वासपात्र राजाओं, जमींदारों तथा स्वाधीनता सेनानियांे की बैठक बुलाकर सबको इस महासंग्राम में कूदने का आह्नान किया।

अपने छोटे भाई छत्रपाल सिंह के विवाह के कारण बलभद्र सिंह इस बैठक में आ नहीं पाये। बेगम ने उन्हें बुलाने के लिए एक विशेष सन्देश वाहक भेजा। इस पर बलभद्र सिंह  बारात को बीच में ही छोड़कर बौड़ी आ गये। बेगम ने उन्हें सारी योजना बतायी, जिसके अनुसार सब राजा अपनी सेना लेकर महादेवा (बाराबंकी) में एकत्र होने थे। बलभद्र सिंह ने इससे पूरी सहमति व्यक्त की और अपने गाँव लौटकर सेनाओं को एकत्र कर लिया।

जब बलभद्र सिंह सेना के साथ प्रस्थान करने लगे, तो वे अपनी गर्भवती पत्नी के पास गये। वीर पत्नी ने उनके माथे पर रोली-अक्षत का टीका लगाया और अपने हाथ से कमर में तलवार बाँधी। इसी प्रकार राजमाता ने भी बेटे को आशीर्वाद देकर अन्तिम साँस तक अपने वंश और देश की मर्यादा की रक्षा करने को कहा। बलभद्र सिंह पूरे उत्साह से महादेवा जा पहुँचे।

महादेवा में बलभद्र सिंह के साथ ही अवध क्षेत्र के सभी देशभक्त राजा एवं जमींदार अपनी सेना के साथ आ चुके थे। वहाँ राम चबूतरे पर एक सम्मेलन हुआ, जिसमें सबको अलग-अलग मोर्चे सौंपे गये। बलभद्र सिंह को नवाबगंज के मोर्चे का नायक बनाकर बेगम ने शाही चिन्हों के साथ ‘राजा’ की उपाधि और 100 गाँवों की जागीर प्रदान की।

बलभद्र सिंह ने 16,000 सैनिकों के साथ मई 1958 के अन्त में ओबरी (नवाबगंज) में मोर्चा लगाया। वे यहाँ से आगे बढ़ते हुए लखनऊ को अंग्रेजों से मुक्त कराना चाहते थे। उधर अंग्रेजों को भी सब समाचार मिल रहे थे। अतः ब्रिगेडियर होप ग्राण्ट के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी गयी, जिसके पास तोपखाने से लेकर अन्य सभी आधुनिक शस्त्र थे।

13 जून को दोनों सेनाओं में भयानक युद्ध हुआ। बलभद्र सिंह ने अपनी सेना को चार भागों में बाँट कर युद्ध किया। एक बार तो अंग्रेजों के पाँव उखड़ गये; पर तभी दो नयी अंग्रेज टुकड़ियाँ आ गयीं, जिससे पासा पलट गया। कई जमींदार और राजा डर कर भाग खड़े हुए; पर बलभद्र सिंह चहलारी वहीं डटे रहे। अंग्रेजों ने तोपों से गोलों की झड़ी लगा दी, जिससे अपने हजारों साथियों के साथ राजा बलभद्र सिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए।

इस युद्ध में राजा बलभद्र सिंह चहलारी के साहस की अंग्रेज सेनानायकों ने भी बहुत प्रशंसा की है; पर इसमें पराजय से भारत की स्वतन्त्रता का स्वप्न अधूरा रह गया।

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ગુજરાત પ્રાંતના પૂર્વ પ્રાંત સંઘચાલક ડો.અમૃતભાઈ કડીવાલા આપણને છોડીને ચાલ્યા ગયા .૮૩ વર્ષની ઉંમરમાં સંપૂર્ણ રાષ્ટ્રવાદી જીવન જીવનાર ગુજરાતના પાયાના પથ્થર કહી શકાય એવા સંઘના શરૂઆતના સ્વંયસેવકો માંહેના એક એટલે ડો. અમૃતભાઈ કડીવાલા.પારિવારિક જીવનમાં ,વ્યવસાયિક જીવનમાં ,રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘના કાર્યમાં અને અન્ય સામાજીક સંસ્થાઓમાં એક આદર્શ સ્વયંસેવક નો વ્યવહાર કેવો હોય એનું એક ઉત્તમ ઉદાહરણ મૂકતા ગયા.

સંઘની શાખામાં મુખ્યશિક્ષક-કાર્યવાહથી માંડીને અનેકવિધ જવાબદારીઓ સંભાળતા સંભાળતા પ્રાંતના શારીરિક પ્રમુખ ,પ્રાંતના કાર્યવાહ અને પ્રાંતના સંઘચાલક તરીકે વર્ષો સુધી ગુજરાતમાં માર્ગદર્શન આપ્યું .આજની કેડર ઉભી કરવા માટેનો એક મોટો સિંહ ભાગ તેમનો છે.

મારે એમબીબીએસના અભ્યાસ માટે કર્ણાવતી બી.જે.મેડિકલ કોલેજમાં જવાનું થયુ.અસારવા સિવિલ હોસ્પિટલ કેમ્પસમાં મેડિકલ કોલેજની સવારની પ્રભાત શાખા ના મુખ્ય શિક્ષક અને બાદમાં કાર્યવાહ તરીકેની મારી જવાબદારી હતી ત્યારે અમૃતભાઈ કડીવાલા પ્રાંતના શારીરિક પ્રમુખ હતા. અમારી પ્રભાત શાખામાં મળવાનું થતુ.એક શારીરિક પ્રમુખ પ્રભાત શાખા માં આવી શીખવતા એટલું જ નહી પરંતુ ગપસપ કરવા મેડિકલના વિદ્યાર્થીઓ સાથે હોસ્ટેલની કેન્ટીનમાં નાસ્તો કરવા રોકાતા.

ગુજરાત પ્રાંતના પ્રાંત સંઘચાલક તરીકે કામ કરતા રાજકોટના ડોક્ટર પી.વી.દોશી (પપ્પાજી ) ઉંમરના કારણે નાદુરસ્ત તબિયતના લીધે પ્રાંત સંઘચાલક તરીકેની જવાબદારી માન.અમૃતભાઈ ને ભાગે આવી ,જે તેમણે ૨૦૧૨ સુધી સુપેરે નિભાવી.

કર્ણાવતીમાં મારો અભ્યાસ પૂર્ણ થયા બાદ મોરબીમાં આવવાનું થયું .ત્યાર પછી સંઘની વિવિધ જવાબદારી જેવી કે બૌધ્ધિક પ્રમુખ ,નગર સંઘચાલક ,જિલ્લા સંચાલક અને સહ પ્રાંત કાર્યવાહ તરીકે માન્ય અમૃતભાઈ સાથે અનેક વાર મળવાનું થતુ. માનનીય અમૃતભાઈ એટલે શારીરિકનાં જીવ. ઘણા વર્ષો સુધી સંઘ શિક્ષા વર્ગમાં આ લાભ સૌને મળેલ.પ્રાંત કાર્યવાહ તરીકે પણ ગુજરાત પ્રાંતના સંઘકાર્યને દ્ઢ અને સમૃદ્ધ બનાવવામાં તેમનો અનન્ય ફાળો રહેલો છે.પ્રાંત સંઘચાલક બન્યા પછી થોડા સમયને બાદ કરતા એમણે એકલા હાથે સંઘચાલક તરીકે સંપૂર્ણ પ્રાંતનુ માર્ગદર્શન અને પ્રવાસ કરવાનું રહ્યું.અવારનવાર સંઘચાલકોની બેઠકમાં સંઘચાલકો ના ગટ સમક્ષ તેઓ પોતાની નાની-નાની વાતોથી સંઘચાલકોને સંઘમાં પાલક અને માલિક તરીકે શું કામ કરવું તેનો વિચાર સહજ વાત વાતમાં કહી દેતા.

સંઘ શિક્ષા વર્ગમાં જ્યારે એમનો પ્રવાસ હોય ત્યારે તેમની સાથે અનૌપચારિક વાર્તાલાપમાં પણ ઘણું પ્રશિક્ષણ મળતુ.સંઘની બેઠકમાં , બેઠક વચ્ચેના સમયગાળામાં પણ નાના-નાના ઉદાહરણો અને પોતાના સ્વયં નિરીક્ષણ વડે શીખવવાની તેમની એક આગવી પદ્ધતિ હતી.આમ પણ સંઘના દરેક કામમાં ચોકસાઈનું ખૂબ મહત્વ હોય છે,પરંતુ અમૃતભાઇ ચોકસાઈ માં પણ ખૂબ જ ચોકસાઇ રાખવાવાળા.રેલ્વે ની ટિકિટ બુક બીજાએ કરાવી હોય તો સ્વયં પોતે નિરીક્ષણ કરીને તારીખ સમય તપાસે. કાર્યક્રમોની પત્રીકા મા પણ એકદમ ઝીણી વાતો નું ધ્યાન રખાવતા.આયોજન કરવામાં એક એન્જિનિયર કેવી રીતે પોતાના કામો ની નાની-નાની પાયાની વાતોનુ ધ્યાન રાખે એવું એમનું સમગ્ર કાર્યમાં દેખાઈ આવે

સ્વ.અમૃતભાઈ વ્યવસાયે એન્જિનિયર હતા. પરંતુ ભાષાવિજ્ઞાનના સારા અભ્યાસુ .ગુજરાતીના અનેક પુસ્તકો ખાસ કરીને સંઘના જે પુસ્તકોનો ગુજરાતીમાં અનુવાદ થયો તેનિ જોડણી સુધારો કરવાનો અને સંઘ ની કોઈ પત્રિકાઓની અંદર નાની-મોટી જોડણી, વ્યાકરણનાં સુધારવામાં ખૂબ મદદરૂપ થતા .મારા નામ અને અટક માં પણ ભાષા વિજ્ઞાન પ્રમાણે આમ હોવું જોઈએ તેવું મને એમણે બતાવેલું.

નાની નાની વાતોમાં ચીવટ રાખવાનો તેમનો સ્વભાવ હતો.એક વખત બેંગ્લોરમાં અખીલ ભારતીય બેઠક વખતે પરત આવ્યા પછી એમને ખ્યાલ આવ્યો કે એમનુ એક વસ્ત્ર ભૂલથી બેઠક સ્થાને રહી ગયું છે.સામાન્ય રીતે કોઈ વસ્તુ રહી જાય તો ત્યાં પ્રબંધકોને આ વસ્તુ કોની રહી ગઇ તે ચિંતા ન થાય એટલા માટે એમણે એક પોસ્ટકાર્ડ પ્રબંધક વ્યવસ્થા ને લંખેલ. મારુ વસ્ત્ર રહી ગયું છે પરંતુ કોઈ ચિંતા કરતા નહીં .મોકલવાની ઉતાવળ પણ કરતા નહીં.

સંઘમાં જેમ અનુશાસન છે તેમ સમાજના જુદા જુદા સ્થાનમાં પણ અનુશાસન હોવુ જોઈએ એવો તેમનો આગ્રહ .એક વખત બેઠકમાં જતી વખતે રેલવેના ડબ્બામાં રીઝર્વેશન વગરનાં મુસાફરો અંદર આવીને માથાકૂટ કરતા તેઓ એકદમ ગુસ્સે થઈને તેમને યોગ્ય પાઠ ભણાવ્યો હતો.

નિયમિત શાખામાં જવાનો આગ્રહ કાયમ માટે રહયો.જ્યાં સુધી શરીરે સાથ આપ્યો ત્યાં સુધી નિયમ પાળ્યો .બેઠકમાં પણ જ્યાં અપેક્ષિત ત્યાં ઉપસ્થિત પોતે જ્યારે વાહન ચલાવી શકતા નહોતા ત્યારે અન્ય સ્વંયસેવકને સંપર્ક કરીને પણ નિયત સ્થાને સમયસર પહોંચવા માટેનો આગ્રહ રાખતા.

શરીરના સ્વાસ્થ્ય માટે ડૉકટરોની સલાહ લેવી અને તે અનુસાર કરવું. ડોકટર જે સલાહ આપે તેને અનુસરવાનો આગ્રહ રાખતા. હૃદયના બાયપાસ ઓપરેશન માટે એલોપથી પસંદ કરે તો ડાયાબીટીસ અને બીજી નાની-મોટી તકલીફો માટે પ્રાકૃતિક સારવાર અને આયુર્વેદનો ઉપયોગ કરતા. holistic approach એમના જીવન દરમિયાન રહ્યો.

અમૃતભાઈ આટલી બધી જવાબદારીઓ નિભાવવા છતાં પરિવારના દરેક સભ્યો નું શિક્ષણ ,પ્રશિક્ષણ પ્લેસમેન્ટ થાય એ માટે હંમેશા યોગ્ય કરતા રહ્યા અને ક્યારેય સંબંધોનો ઉપયોગ ન કર્યો . દૂર ના પ્રવાસમા પણ પોતાની પત્નીની તબિયત ના સમાચાર યોગ્ય સમયે ફોન દ્વારા પૂછી લેતા .એટલું જ નહીં પરંતુ નાની ઉંમરમાં પોતાના પુત્રને ગુમાવ્યા પછી પણ તેમના પરિવાર ની ખૂબ કાળજી રાખતા. પોતે પૌત્ર ને ગણિત શિખવાડતા અને પોતે પૌત્ર અને પૌત્રી પાસેથી નવી ટેકનોલોજી , મોબાઇલ , ફેસબુક વિગેરે શીખીને સક્રિય પણ રહેતા. પોતાના પરિવારના એક દૂરના બહેન કે તેમને કોઈ સાચવવા વાળા નહોતા ,એમને મૃત્યુ સુધી અમૃતભાઈ ના ઘરમાં સાથે રહ્યા.

સંઘની અખિલ ભારતીય બેઠકમાં અમૃતભાઈ અમદાવાદથી ખાસ જમ્યા પછીના મુખવાસની અલગ અલગ વેરાઇટી સાથે લાવે. બેઠકમાં બધા ભોજન પછી અમૃતભાઈ પાસે મુખવાસ માટે હાથ લાંબો કરે.

સંઘના બૌધ્ધિક કાર્યક્રમમાં લેવાના વિષયોને ક્રમશઃ મુદ્દાસર લખીને તૈયાર કરે તથા વિષયનું પુનરાવર્તન ન થાય અને ઉદાહરણો સાથે બધા નો રસ જળવાઈ રહે તેવો તેમનો પ્રયત્ન રહેતો.એક વખત પ્રવાસ નિશ્ચિત થાય તો કોઈપણ સ્વરૂપમાં અડચણ આવે છતાં પણ પ્રવાસ પૂર્ણ કરવાનો આગ્રહ રાખતા.પોતાની નિયમિત નોકરીમાંથી નિવૃત્ત થયા બાદ માનદ સેવા આપવા જતા અને એન્જીનીયરીગ ના વિદ્યાર્થીઓને ભણાવવા જતા. તેઓ નિયમિત પણે મંગળવારે ગાંધીનગર અને કર્ણાવતીના સરકારી પ્રશાસનિક અને વિશેષ અધિકારીઓને મળવા સંપર્ક માટે જતા.

૨૦૦૯ની સાલમાં મારી સહ પ્રાંત કાર્યવાહ માંથી સહ પ્રાંત સંઘચાલક તરીકે નિયુક્તિ થતા મારી પાસે એમણે આનંદ વ્યક્ત કર્યો હતો કે મને સાથીદાર મળી ગયા. અમારા બંનેમા ઉંમર અને સંઘ કાર્યના અનુભવનો મોટો તફાવત હોવા છતા ક્યારેય લાગવા ન દેતા. તેમનો પ્રવાસ તો વધારે રહે એટલું જ નહીં જ્યારે જ્યારે મળવાનું થાય ત્યારે પોતે પ્રાંતના પોતાના પ્રવાસોની વિગતો મારી સાથે વિગતવાર શેર કરતા .

માનનીય અમૃતભાઈ સાથે અખિલ ભારતીય બેઠકોમાં 2001થી 2012 સુધી જવાનું થયું .ઘણી બેઠકોમાં પરિવાર સાથે પણ જોડાયા હતા અને બાકીના બધાના પરિવાર સાથે જોડાયા હોય તો તેમને એક વડીલનો સરસ સુંદર મજાનો અનુભવ થતો.

સંઘ કાર્યમાં પ્રવાસનું જેટલું મહત્વ છે એટલું અનુવર્તનનુ પણ છે .તેમણે ઘણા વર્ષો સુધી એક ટેવ રાખી હતી કે ક્યાંય પણ પ્રવાસ કર્યા પછી પરત ફરે તો તુરંત એક પત્ર જ્યાં પ્રવાસ કર્યો હોય ત્યાં ના કાર્યકર્તા ને લખતા અને પરિવારના દરેક સભ્યોને યાદ કરતા ભાવનગરના સંચાલક ડો ચેતનભાઇ ની નાની દીકરી હેતવી એમને દાદા કહીને ખૂબ યાદ કરતી.

મને અમૃતભાઈ પાસેથી બેઠકોની સમાપન વખતે ઘણી વખત સાંભળવા મળ્યું ,તેમાં ઇઝરાયેલ ની ક્ષમતા તેના પ્રજાજનોની એક દ્રઢ નિર્ધાર અને જીદ ને વારંવાર યાદ કરાવતા.

માનનીય અમૃતભાઈ ના ભાગે સંઘ સિવાય સેવાભારતી અને અન્ય ઘણા બીજા ટ્રસ્ટોનું કામ પણ રહેતું. દરેક બેઠકની મીનીટ્સ બરાબર લખાય તે જેતા . સમવિચારી સંગઠનોના સંપર્ક સૂત્ર તરીકે પણ કામ માટે બધા જ ક્ષેત્ર ના કાર્યકર્તા ને સાચવવાની કળા તેમની પાસે સ્વભાવીક હતી.

કર્ણાવતીમાં તેમના ઘરની નજીકના વિસ્તારમાં મારા પુત્રએ એક મકાન લીધુ ત્યારે એમણે મળવાની ઇચ્છા દર્શાવી એટલું જ નહીં યોગ્ય સમયે મળીને માર્ગદર્શન પણ આપ્યું.

સંઘની પોતાની જવાબદારીમાંથી મુક્ત થયેલા . પરંતુ ઘણા અનુભવી કાર્યકર્તાઓને મળવાનો ક્રમ રહ્યો એટલું જ નહીં વિવિધ ક્ષેત્રમાં કામ કરતા અને પોતપોતાના ક્ષેત્રમાં કંઈક મૂંઝવણ અનુભવતા લોકો ને પણ મળીને તેમની મુંઝવણ દૂર કરવાનો પ્રયત્ન કરતા .કેટલાક જુના કાર્યકર્તા કોઈ કારણસર સંઘ વિચારને વિરુદ્ધની સ્થિતિમાં આવી જાય અને જુદી દિશામાં ચાલે તો તેમને સમજાવવા માટે પણ અમૃતભાઈ હર હંમેશ તૈયાર રહેતા.

અમારા પરિવારના બધા શુભ પ્રસંગોમાં તેઓ લાંબુ અંતર કાપીને પણ પોતાના સ્વાસ્થ્ય ઠીક ન હોય ત્યારે પણ હાજર રહેતા અને અમારા આનંદમાં અનેરો વધારો કરતા.

મને ગર્વ છે કે તેમના પછી મને મળેલ જવાબદારીમાં તેમનું ખૂબ માર્ગદર્શન રહ્યું. 2012માં મારી પ્રાંત સંઘચાલક તરીકે નિયુક્તિ થયા પછી મારે શું કરવું તે સમજવા હું એમના ઘરે મળવા ગયો ત્યારે થોડાક શબ્દોમાં કહ્યું કે આજુબાજુના લોકોને જોતા રહેવા ,મળતું રહેવું અને બધું અનુભવે શીખવા મળતું હોય છે .બોલવું ઓછું , કામ વધારે કરવું અને જરૂર લાગે યોગ્ય સાચા સ્પષ્ટ શબ્દોમાં સત્ય વાતની સાથે રહેવું જે વાતનો અમલ તેમણે જીવનભર કર્યો.

કોરોના ના સમયગાળામાં મળવાનો ક્રમ અને પ્રવાસ ઓછા થયા પરંતુ થોડો સમય પહેલા વિશ્વ હિન્દુ પરિષદ દ્વારા એક ઓનલાઇન પોર્ટલ ઉદ્ઘાટન વખતે તેમને નિરાંતે મળવાનું થયું .સાથે રહ્યા ,ભોજન કર્યુ એટલું જ નહીં કનુભાઈ મિસ્ત્રી નું અવસાન થતા તેમના પરિવારને મળવા માટે અમે સાથે ગયા હતા .કદાચ સૌથી વધારે સમય તેમની સાથે રહેવાનો મારો એ છેલ્લો પ્રસંગ હશે.

કોરોનાની બીમારી દરમિયાન પ્રથમ વખત હોસ્પિટલમાં દાખલ થયા ત્યારે એમની સાથે વાત કરવાનું થયુ હતું અને બીજી વખત કોમ્પ્લિકેશન ના કારણે એપોલો હોસ્પિટલમાં દાખલ થયા હતા . દાખલ થયા પછી એમણે બીજા દિવસે પણ મારી સાથે વાત કરીને પોતાના શરીરની ચર્ચા કરી હતી.
પરંતુ આ મહામારીમાં ભારતમાતાના અનેક પનોતા પુત્રોને ભગવાને પોતાની પાસે બોલાવી લીધાં એમાં એમનો પણ સમાવેશ થઈ ગયો.અમૃતભાઇ દેહ છોડીને ગયા છે પરંતુ તેમના વિચારો ,કામ કરવાની પ્રેરણા તેમજ આપેલા રાષ્ટ્રીયતા અને પ્રમાણિકતા ના પાઠો બધા જ સ્વયંસેવકોને એમની ગેરહાજરીમાં પણ માર્ગદર્શન કરતા રહેશે .એક સ્વયંસેવક કાર્યકર્તા કે અધિકારીનુ પોતાનું સ્વયંનું જીવન ,પારિવારિક જીવન વ્યવસાયિક જીવન અને સંઘના કાર્યકર્તા તરીકે જવાબદારી માં હોય અને ન હોય ત્યારે કેવું હોય એનું એક આદર્શ ઉદાહરણ મૂકતા ગયા.

ધીરે-ધીરે ગુજરાતની જૂની પેઢીના તારલાઓ જતાજાય છે .પરંતુ તેમના માર્ગદર્શનમાં તૈયાર થયેલા નવા તારલાઓ એમની જગ્યા તો ન લઈ શકે પરંતુ તેમની પાસેથી શીખેલા જ્ઞાનનો પ્રકાશ લઈને દિપત તો બની જ શકે. રાષ્ટ્ર અને સમાજના કાર્યમાં હંમેશા અગ્રેસર રહેતા તેઓ એક મૌન તપસ્વી હતા .ભાગીરથી ના પ્રવાહ જેવા હતા .કે જે પ્રવાહ અને તેને પોષણ આપ્યું છે પરંતુ ભાગીરથી તો સતત વહેતો પ્રવાહ છે. જ્યારે જ્યારે ગુજરાતના કાર્યકર્તાઓને યાદ કરવામાં આવશે ત્યારે એ બધામાં અમૃતભાઈનું નામ બધાને માટે મુખ્ય હશે.

વ્યવસાયિક ક્ષેત્રમાં પોતે એન્જિનિયર પરંતુ soil testing મા પીએચડી કરેલું.નદીઓના પટમાં કુવાઓ ગાળીને તેમાં પાણી કેવી રીતે વધારી શકાય એ માટેનો સંશોધનનો વિષય હતો.જ્યાં જ્યાં તેમણે સોઇલ ટેસ્ટિંગ નું કામ કર્યું એ કામ કરનારી સંસ્થા અને તેના ગ્રાહકો હર હંમેશ સંતોષાયા હતા .આ એક શિક્ષક પોતાના વ્યવસાયિક ક્ષેત્રમા . વાત આવે કે પરિવાર સંઘમાં જવો જોઈએ અને સંઘ પરિવારમાં આવવો જોઈએ .આ માટે પોતાના પરિવારને આ દિશામાં લઇ જવા માટે અને પરિવારના દરેક સભ્યોને સંઘના કોઈને કોઈ કાર્ય સાથે જોડવા માટેનો એમાં સહભાગી થવાનો તેમનો સુંદર પ્રયત્ન રહ્યો.

2001ના ગુજરાતમાં કચ્છના ભૂકંપ વખતે થયેલા પુનઃનિર્માણ ના કાર્યોમાં સેવા ભારતીના એક પદાધિકારી તરીકે તો ખરુ , સાથે સાથે એક સારા એન્જિનિયર તરીકે પણ ખૂબ જ સાતત્યપૂર્વક નવનિર્માણના કાર્યમાં પોતાનુ માર્ગદર્શન પુરુ પાડ્યું હતું . હજુ પણ બધા જ કાર્યકર્તાઓ વારંવાર યાદ કરે છે.

પરિવારમાંથી જ્યારે કોઈ વ્યક્તિ નું સ્વર્ગાગમન થાય ત્યારે બાકીના બધા લોકોને પોતાની એક વડીલની છાયા ઓછી થઈ ગઈ લાગે જ. આજે ઘણા સ્વંયસેવકો પણ મનથી અનાથ થયાનુ અનુભવશે. સંઘના સ્વયંસેવકોને આમાં મદદરુપ થશે. આવા દિવંગત કાર્યકર્તાઓના કાર્યના દિપકો રાષ્ટ્ર કાર્યને પ્રકાશ દેતા રહેશે.

અમૃતભાઇના ના આત્માને પ્રભુ ચરણમાં સ્થાન તો આપે પરંતુ ફરીથી આવા રાષ્ટ્રીય કાર્યમા જોડાવા માટે તેમનો પુર્નજન્મ પણ ભારત માતાના ચરણોમાં થાય એ જ ભગવાનનાં શ્રી ચરણોમાં પ્રાર્થનાં.
ડો. જયંતિ ભાઈ ભાડેશીયા

भारत माँ को दासता की शृंखला से मुक्त कराने के लिए 1857 में हुए महासमर के सैकड़ों ऐसे ज्ञात और अज्ञात योद्धा हैं, जिन्होंने अपने शौर्य,पराक्रम और उत्कट देशभक्ति से ने केवल उस संघर्ष को ऊर्जा दी, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी वे प्रेरणास्पद बन गये। बाबा साहब नरगुन्दकर ऐसे ही एक योद्धा थे।

इस महासंग्राम के नायक श्रीमन्त नाना साहब पेशवा ने 1855 से ही देश भर के राजे, रजवाड़ों, जमीदारों आदि से पत्र व्यवहार शुरू कर दिया था। इन पत्रों में अंग्रेजों के कारण हो रही देश की दुर्दशा और उन्हें निकालने के लिए किये जाने वाले भावी संघर्ष में सहयोग का आह्नान किया जाता था। प्रायः बड़ी रियासतों ने अंग्रेजों से मित्रता बनाये रखने में ही अपना हित समझा; पर छोटी रियासतों ने उनके पत्र का अच्छा प्रतिसाद दिया।

10 मई को मेरठ में क्रान्ति की ज्वाला प्रकट होने पर सम्पूर्ण उत्तर भारत में स्वातन्त्र्य चेतना जाग्रत हुई। दिल्ली,  कानपुर, अवध आदि से ब्रिटिश शासन समाप्त कर दिया गया। इसके बाद नानासाहब ने दक्षिणी राज्यों से सम्पर्क प्रारम्भ किया। कुछ ही समय में वहाँ भी चेतना के बीज प्रस्फुटित होने लगे।

कर्नाटक के धारवाड़ क्षेत्र में नरगुन्द नामक एक रियासत थी। उसके लोकप्रिय शासक भास्कर राव नरगुन्दकर जनता में बाबा साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। वीर होने के साथ-साथ वे स्वाभिमानी और प्रकाण्ड विद्वान भी थे। उन्होंने अपने महल में अनेक भाषाओं की 4,000 दुर्लभ पुस्तकों का एक विशाल पुस्तकालय बना रखा था। अंग्रेजी शासन को वे बहुत घृणा की दृष्टि से देखते थे। उत्तर भारत में क्रान्ति का समाचार और नाना साहब का सन्देश पाकर उन्होंने भी अपने राज्य में स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी को जैसे ही यह सूचना मिली, उन्होंने मुम्बई के पोलिटिकल एजेण्ट जेम्स मेंशन के नेतृत्व में एक सेना बाबा साहब को सबक सिखाने के लिए भेज दी। इस सेना ने नरगुन्द के पास पड़ाव डाल दिया। सेनापति मेंशन भावी योजना बनाने लगा। बाबा साहब के पास सेना कम थी, अतः उन्होंने शिवाजी की गुरिल्ला प्रणाली का प्रयोग करते हुए रात के अंधेरे में इस सेना पर हमला बोल दिया। अंग्रेज सेना में अफरा-तफरी मच गयी। जेम्स मेंशन जान बचाकर भागा; पर बाबा साहब ने उसका पीछा किया और पकड़कर मौत के घाट उतार दिया।

इसके बाद अंग्रेजों ने सेनापति माल्कम को और भी बड़ी सेना लेकर भेजा। इस सेना ने नरगुन्द को चारों ओर से घेर लिया। बाबा साहब ने इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। ‘पहले मारे सो मीर’ के सिद्धान्त का पालन करते हुए उन्होंने किले से नीचे उतरकर माल्कम की सेना पर हमला कर अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया; पर उसी समय ब्रिटिश सेना की एक नयी टुकड़ी माल्कम की सहायता को आ गयी।

अब नरगुन्द का घेरा और कस गया। बाबा साहब की सेना की अपेक्षा ब्रिटिश सेना पाँच गुनी थी। एक दिन मौका पाकर बाबा साहब कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ किले से निकल गये। माल्कम ने किले पर अधिकार कर लिया। अब उसने अपनी पूरी शक्ति बाबा साहब को ढूँढने में लगा दी। दुर्भाग्यवश एक विश्वासघाती के कारण बाबा साहब पकड़े गये। 12 जून, 1858 को बाबा साहब ने मातृभूमि की जय बोलकर फाँसी का फन्दा चूम लिया।

मेजर धनसिंह थापा उन वीर गोरखा नायको में से है , जिन्होंने अपने जीवन को अनुशासन और शौय से भारतवर्ष को अतुलनीय योगदान दिया। 10 जून 1928 को शिमला में पी एस थापा  के घर जन्मे धन सिंह ने अगस्त 1949 में भारतीय सेना के 8th गोरखा राईफल्स में कमीशन अधिकारी के रूप में अपनी सेवा प्रारम्भ की । धन सिंह थापा ने सन 1962 के भारत-चीन से युद्ध के दौरान कश्मीर सूबे के लद्दाख भूभाग में चीनी आक्रमणकारी सेना का सामना बहादुरी से किया । लद्दाख के उत्तरी सीमा पर पांगोंग झील के पास सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चुशूल हवाई पट्टे को चीनी सेना से बचाने के लिए सिरिजाप घाटी में 1/8 गोरखा राईफल्स की कमान सँभालते हुए चीनी कब्ज़े को पीछे खदेड़ने का काम शुरू किया

12 अक्तूबर 1962 को सिरिजाप वन नामक सैन्य चौकी में प्लाटून सी में मेजर धन सिंह थापा ने दुश्मनों से ज़ोरदार युद्ध लड़ा . 20 अक्तूबर 1962 को अलसुबह 6 बजे को एक बार फिर पूरी ताक़त से चीनी सैनिको ने भारी हथियारों जैसे मोर्टार , तोप से सिरिजाप वन चौकी पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया । दोनों और से गोलाबारी ढाई घंटे से अधिक चलती रही , भारतीय सेना का संचार तंत्र इस हमले में बुरी तरह नष्ट हो गया , इस हमले में भारतीय सैन्य चौकी पूरी तरह से तबाह हो गई और अनेको जवान शहीद हो गए . साथ ही मारे गए भारतीय सैनिको ने चीनी सेना को भी भारी नुकसान पहुँचाया , यहाँ तक की चीन की तीसरी पंक्ति के टैंको ने भी इस हमले में बड़ी भूमिका निभाई । आखिरकार बड़े  संघर्ष के बाद इस चौकी पर पूरी तरह से चीनी नियंत्रण हो गया, धन सिंह थापा को भी पकड़ने के लिए सैनिको को कड़ी मसक्कत करनी पडी क्यूंकि मेजर अंत में चीनी सैनिको ने उन्हें बंदी बना लिया . गोरखा परंपरा का निर्वहन करते हुए धन सिंह थापा ने चीनी युद्धबंदी शिविर से चीनी चौकसी को धता हुए, वहां से भागने में सफल हुए ।

कई दिनों पहाडियों में भटकते रहने के बाद थापा भारतीय सीमा क्षेत्र में प्रविष्ट हुए और भारतीय सैनिक चौकी तक पहुंचे , घायल अवाष्ठ में होने के बावजूद बुलंद हौंसले ने अन्य भारतीय जवानो में भी नव उत्साह का संचार कर दिया । इस घटना ने ना केवल चीनी पक्ष का मनोबल गिराया वरन भारतीय सैनिको की निर्भीकता से दुनियाभर को सन्देश दिया । अपने दुश्मनों से वीरता से लड़ने के कारण भारतीय सरकार ने सेना का सर्वोच्च सम्मान “परमवीर चक्र “ देकर धन सिंह थापा को सम्मानित किया . इस घटना के बाद भी धन सिंह थापा ने भारतीय सेना को अपनी सेवाए दी और सेना से लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर हुए । 6 सितम्बर 2005 को इस वीर गोरखा सपूत ने दुनिया को अलविदा कह दिया.