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07-04-2024 Vadodara

સજ્જન શક્તિ સંગઠિત થઈ કાર્યમાં ગતિશીલ બની સમાજ પરીવર્તનના કામે લાગે.

રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘના પ.પૂ. સરસંઘચાલક મા.મોહનજી ભાગવતની ઉપસ્થિતિમાં દિનાંક 6 – 7 એપ્રિલ 2024ના પ્રવાસમાં “શ્રી રેવા સેવા સમન્વય સમિતિ – ભરુચ” અને “ડૉ. હેડગેવાર જન્મશતાબ્દી સેવા સમિતિ, વડોદરા” દ્વારા પ્રબુદ્ધ નાગરિક ગોષ્ઠી યોજાઇ હતી. આ પ્રસંગે મા.મોહનજી ભાગવતે આહવાહન કર્યું કે સામાજિક સમરસતા કુટુંબ પ્રબોધનથી સંસ્કાર સિંચન, પર્યાવરણ સંરક્ષણ, સ્વદેશી ભાવ જાગરણ અને નાગરિક કર્તવ્ય બોધના આધાર પર સમાજમાં રહેલી સજ્જન શક્તિ સંગઠિત થઈ કાર્યમાં ગતિશીલ બની સમાજ પરીવર્તનના કામે લાગે. સમાજમાં રહેલા જાતિ-પાતિના ભેદ દૂર કરવા આચરણ દ્વારા વિશેષ પ્રયાસો થાય, સજ્જન શક્તિનું નેટવર્ક ઊભું થાય એવા વિશેષ પ્રયોગો કરવા જોઈએ.

               આ પ્રસંગે સમાજમાં સેવા, સ્વાસ્થ્ય, પર્યાવરણ, કળા, સાહિત્ય, લેખન ઉદ્યોગ અને સમાજ પરિવર્તનના ક્ષેત્રમાં કાર્યરત પ્રબુદ્ધ નાગરિકોની ઉપસ્થિતિ રહી અને પ્રતિભાગીઓએ પોતાના દ્વારા ચાલતા પ્રકલ્પો વિષે વિચાર-મંતવ્યો રજૂ કર્યા. ‘

                રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘના અખિલ ભારતીય કાર્યકારિણી મંડળના સદસ્ય મા. ભૈયાજી જોષીએ વિષય પ્રસ્તાવનામાં જણાવ્યું કે દુનિયાની સૌથી પ્રાચીન સંસ્કૃતિ  અને પરંપરાના આપણે વાહક હોઈ, સમયાંતરે સમાજજીવનમાં આવતા દોષોના કારણે ઉદ્ભવતી સમસ્યાઓનું સમાધાન પણ સમાજની સજ્જન શક્તિ જેવી કે અધ્યાત્મિક, શિક્ષા, કળા, ઉદ્યોગ શક્તિના આધાર પર જ નિરાકરણ લાવવાની આપણી પરંપરા રહી છે. સમાજના દરેક વ્યક્તિનું જીવન સંસ્કારિત બને અને એના થકી સમગ્ર સમાજ સંસ્કારિત બનશે.

                મા. મોહનજી ભાગવતે ગરુડેશ્વર ખાતે દત્ત મંદિરમાં પૂજા અર્ચના અને નર્મદા નદીમાં સ્નાન કર્યું હતું. આ પ્રસંગે રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘના પદાધિકારીઓ અને ગણમાન્ય મહાનુભાવો ઉપસ્થિત રહ્યા હતા.

भारतीय स्वतन्त्रता के लिए हुए संघर्ष के गौरवशाली इतिहास में अमृतसर के जलियाँवाला बाग का अप्रतिम स्थान है। इस आधुनिक तीर्थ पर हर देशवासी का मस्तक उन वीरों की याद में स्वयं ही झुक जाता है, जिन्होंने अपने रक्त से भारत की स्वतन्त्रता के पेड़ को सींचा।

13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी का पर्व था। यों तो इसे पूरे देश में ही मनाया जाता है; पर खालसा पन्थ की स्थापना का दिन होने के कारण पंजाब में इसका उत्साह देखते ही बनता है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं, लोग पवित्र नदियों में स्नान कर पूजा करते हैं; पर 1919 में इस पर्व पर वातावरण दूसरा ही था। इससे पूर्व अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के दमन के लिए ‘रौलट एक्ट’ का उपहार दिया था। इसी के विरोध में एक विशाल सभा अमृतसर के जलियाँवाला बाग में आयोजित की गयी थी।

यह बाग तीन ओर से दीवार से घिरा था और केवल एक ओर से ही आने-जाने का बहुत छोटा सा मार्ग था। सभा की सूचना मिलते ही जनरल डायर अपने 90 सशस्त्र सैनिकों के साथ वहाँ आया और उसने उस एकमात्र मार्ग को घेर लिया। इसके बाद उसने बिना चेतावनी दिये निहत्थे स्त्री, पुरुष, बच्चों और वृद्धों पर गोली चला दी। यह गोलीवर्षा 10 मिनट तक होती रही।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इसमें 379 लोग मरे तथा 1,208 घायल हुए; पर सही संख्या 1,200 और 3,600 है। सैकड़ों लोग भगदड़ में दब कर कुचले गये और बड़ी संख्या में लोग बाग में स्थित कुएँ में गिर कर मारे गये।

इस नरसंहार के विरोध में पूरे देश का वातावरण गरम हो गया। इसके विरोध में पूरे देश में धरने और प्रदर्शन हुए। सरकारी जाँच समिति ‘हंटर कमेटी’ के सामने इस कांड के खलनायक जनरल डायर ने स्वयं स्वीकार किया कि ऐसी दुर्घटना इतिहास में दुर्लभ है। जब उससे पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया ? तो उसने कहा कि उसे शक्ति प्रदर्शन का यह समय उचित लगा।

उसने यह भी कहा कि यदि उसके पास गोलियाँ समाप्त न हो गयी होतीं, तो वह कुछ देर और गोली चलाता। वह चाहता था कि इतनी मजबूती से गोली चलाए, जिससे भारतीयों को फिर शासन का विरोध करने की हिम्मत न हो। उसने इसके लिए डिप्टी कमिश्नर की आज्ञा भी नहीं ली।

जब उससे पूछा गया कि उसने गोलीवर्षा के बाद घायलों को अस्पताल क्यों नहीं पहुँचाया, तो उसने लापरवाही से कहा कि यह उसका काम नहीं था। विश्वकवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इस नरसंहार के विरोध में अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त ‘सर’ की उपाधि लौटा दी।

भारी विरोध से घबराकर शासन ने 23 मार्च, 1920 को जनरल डायर को बर्खास्त कर इंग्लैंड भेज दिया, जहां अनेक शारीरिक व मानसिक व्याधियों से पीडि़त होकर 23 जुलाई, 1927 को उसने आत्महत्या कर ली।

इस कांड के समय पंजाब में माइकेल ओडवायर गवर्नर था। जनरल डायर के सिर पर उसका वरदहस्त रहता था। 28 मई, 1919 को गवर्नर पद से मुक्त होकर वह भी इंग्लैंड चला गया। वहाँ उसके प्रशंसकों ने उसे सम्मानित कर एक अच्छी धनराशि भेंट की। उसने भारत के विरोध में एक पुस्तक भी लिखी।

पर भारत माँ वीर प्रसूता है। क्रान्तिवीर ऊधमसिंह ने लन्दन के कैक्सटन हाॅल में 13 मार्च, 1940 को माइकेल ओडवायर के सीने में गोलियां उतार कर इस राष्ट्रीय अपमान का बदला लिया। इस बाग में दीवारों पर लगे गोलियों के निशान आज भी उस क्रूर जनरल डायर की याद दिलाते हैं, जबकि वहाँ स्थित अमर शहीद ज्योति हमें देश के लिए मर मिटने को प्रेरित करती है।

#Jallianwala Bagh  #vskgujarat.com

राणा सांगा का पूरा नाम महाराणा संग्रामसिंह था.  उनका जन्म  12 अप्रैल, 1484  को मालवा, राजस्थान मे हुआ था. राणा सांगा सिसोदिया (सूर्यवंशी राजपूत) राजवंशी थे. राणा सांगा ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एकजुट किया। राणा सांगा अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिद्ध हुये। एक विश्वासघाती के कारण वह बाबर से युद्ध हारे लेकिन उन्होंने अपने शौर्य से दूसरों को प्रेरित किया। राणा रायमल के बाद सन 1509 में राणा सांगा मेवाड़ के उत्तराधिकारी बने। इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की। उस समय के वह सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे। इनके शासनकाल मे मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की ‍रक्षा तथा उन्नति की। (शासनकाल 1509 से 1528 ई.)  राणा सांगा अदम्य साहसी थे। एक भुजा, एक आँख खोने व अनगिनत ज़ख्मों के बावजूद उन्होंने अपना महान पराक्रम नहीं खोया, सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युद्ध मे हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया.

बाबर ने पानीपत के युद्ध को तो जीत लिया परन्तु हिन्दू समाज ने उसे केवल एक विदेशी, आक्रमणकारी तथा लुटेरे से अधिक स्वीकार न किया। बाबर के आगरा पहुंचने पर उसके अधिकारियों तथा सेना को तीन दिन तक भोजन नहीं मिला। घोड़ों को चारा भी उपलब्ध नहीं हुआ। अबुल फजल ने स्वीकार किया है कि हिन्दुस्थानी बाबर से घृणा करते थे। इस विदेशी लुटेरे बाबर का अपने जीवन का महानतम संघर्ष खानवा के मैदान में मेवाड़ के शक्तिशाली शासक राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) से हुआ। राणा सांगा महाराणा कुंभा के पौत्र तथा महाराणा रायमल के पुत्र थे। वे अपने समय के महानतम विजेता तथा “हिन्दूपति” के नाम से विख्यात थे। वे भारत में हिन्दू-साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने मालवा तथा गुजरात पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। बाबर के साथ इस संघर्ष के बारे में इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है, “अब बाबर को ऐसे उच्च कोटि के कुछ योद्धाओं का सामना करना पड़ा जिनसे इससे पहले कभी टक्कर न हुई थी।”

इस भीषण युद्ध के प्रारंम्भ में ही बाबर की करारी हार हुई तथा उसकी विशाल सेना भाग खड़ी हुई। वास्तव में इस युद्ध में ऐसा कोई राजपूत कुल नहीं था जिसके श्रेष्ठ नायक का रक्त न बहा हो। परन्तु बाबर भागती हुई अपनी सेना को पुन: एकत्रित करने में सफल हुआ। उसने अपने सैनिकों में मजहबी उन्माद तथा भविष्य के सुन्दर सपने देकर जोश भरा तथा लड़ने के लिए तैयार किया, जिसमें उसे सफलता मिली। चन्देरी दुर्ग के रक्षक, राणा सांगा द्वारा नियुक्त मेदिनी राय ने 4,000 राजपूत सैनिकों के साथ संघर्ष किया। संख्या अत्यधिक कम होने पर भी केसरिया वस्त्र धारण कर सैनिकों ने अंतिम सांस तक संघर्ष किया।

#RanaSanga #vskgujarat.com

महात्मा ज्योतिबा फुले इनका जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में हुआ था | उनका असली  नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था | वह 19वी सदी  की एक बड़े समाज सुधारक, सक्रिय प्रतिभागी तथा विचारक थे |  ज्‍योतिबा फुले भारतीय समाज में प्रचलित जाति आधारित विभाजन और भेदभाव के खिलाफ थे।

उन्‍होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया। उन्होंने इसके साथ ही किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1854 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।

२४ सितंबर १८७३ को दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे।

उनके आयुष्य में महत्वपूर्ण बदलाव तब आया जब उनके मुस्लिम तथा इसाईं पडोसीयो ने उनकी अपार बुद्धिमत्ता  को पहचानते हुए ज्योतिराव के पिता को ज्योतिराव को वहां के स्थानिक ‘ स्कोटीश मिशुनस हाई स्कूल ‘ में भर्ती करने के लिए राजी किया | थोमस पैन के ‘राइटस ऑफ़ माँन ‘ इस पुस्तक से प्रभावित होते हुए फुलेजी  ने सामाजिक न्याय के लिए और भारतीय जातीवाद के खिलाफ अपना एक दृढ़ दृष्टिकोण बना लिया |

महात्मा फुले ने अपने जीवन में हमेशा बड़ी ही प्रबलता तथा तीव्रता से विधवा विवाह की वकालत की | उन्होंने उच्च जाती की विधवाओ के लिए १८५४ में एक घर भी बनवाया था |  दुसरो के सामने आदर्श रखने के लिए उन्होंने अपने खुद के घर के दरवाजे सभी जाती तथा वर्गों के लोगो के लिए हमेशा खुले रखे , इतना ही नहीं उन्होंने अपने कुए का पानी बिना किसी पक्षपात के सभी के लिए उपलब्ध किया |

#JyotibaPhule #vskgujarat

भारत में एक समय वह भी था, जब लोग कर्मकाण्ड को ही हिन्दू धर्म का पर्याय मानने लगे थे। वे धर्म के सही अर्थ से दूर हट गये थे। इसका लाभ उठाकर मिशनरी संस्थाएँ हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सक्रिय हो गयीं। भारत पर अनाधिकृत कब्जा किये अंग्रेज उन्हें पूरा सहयोग दे रहे थे।

यह देखकर स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल, 1875 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, नव संवत्सर) के  शुभ अवसर पर मुम्बई में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। आर्य समाज ने धर्मान्तरण की गति को रोककर परावर्तन की लहर चलायी। इसके साथ उसने आजादी के लिए जो काम किया, वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा है।

स्वामी दयानन्द का जन्म 12 फरवरी, 1824 को ग्राम टंकारा, काठियावाड़ (गुजरात) में हुआ था। उनके पिता श्री अम्बाशंकर की भगवान भोलेनाथ में बहुत आस्था थी। माता अमृताबाई भी धर्मप्रेमी विदुषी महिला थीं।

दयानन्द जी का बचपन का नाम मूलशंकर था। 14 वर्ष की अवस्था में घटित एक घटना ने उनका जीवन बदल दिया। महाशिवरात्रि के पर्व पर सभी परिवारजन व्रत, उपवास, पूजा और रात्रि जागरण में लगे थे; पर रात के अन्तिम पहर में सब उनींदे हो गये। इसी समय मूलशंकर ने देखा कि एक चूहा भगवान शंकर की पिण्डी पर खेलते हुए प्रसाद खा रहा है।

मूलशंकर के मन पर इस घटना से बड़ी चोट लगी। उसे लगा कि यह कैसा भगवान है, जो अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता ? उन्होंने अपने पिता तथा अन्य परिचितों से इस बारे में पूछा; पर कोई उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने संकल्प किया कि वे असली शिव की खोज कर उसी की पूजा करेंगे। वे घर छोड़कर इस खोज में लग गये।

नर्मदा के तट पर स्वामी पूर्णानन्द से संन्यास की दीक्षा लेकर वे दयानन्द सरस्वती बन गये। कई स्थानों पर भटकने के बाद मथुरा में उनकी भेंट प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द जी से हुई। उन्होंने दयानन्द जी के सब प्रश्नों के समाधानकारक उत्तर दिये। इस प्रकार लम्बी खोज के बाद उन्हें सच्चे गुरु की प्राप्ति हुई।

स्वामी विरजानन्द के पास रहकर उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन और फिर उनका भाष्य किया। गुरुजी ने गुरुदक्षिणा के रूप में उनसे यह वचन लिया कि वे वेदों का ज्ञान देश भर में फैलायेंगे। दयानन्द जी पूरी शक्ति से इसमें लग गये। प्रारम्भ में वे गुजराती और संस्कृत में प्रवचन देते थे; पर फिर उन्हें लगा कि भारत भर में अपनी बात फैलाने के लिए हिन्दी अपनानी होगी। उन्होंने अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ भी हिन्दी में ही लिखा।

‘आर्य समाज’ के माध्यम से उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त पाखण्ड और अन्धविश्वासों का विरोध किया। इस बारे में जागरूकता लाने के लिए उन्होंने देश भर का भ्रमण किया। अनेक विद्वानों से उनका शास्त्रार्थ हुआ; पर उनके तर्कों के आगे कोई टिक नहीं पाता था। इससे ‘आर्य समाज’ विख्यात हो गया। स्वामी जी ने बालिका हत्या, बाल विवाह, छुआछूत जैसी कुरीतियों का प्रबल विरोध किया। वे नारी शिक्षा और विधवा विवाह के भी समर्थक थे।

धीरे-धीरे आर्य समाज का विस्तार भारत के साथ ही अन्य अनेक देशों में भी हो गया। शिक्षा के क्षेत्र में आर्य समाज द्वारा संचालित डी.ए.वी. विद्यालयों का बड़ा योगदान है। देश एवं हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए जीवन समर्पित करने वाले स्वामी जी को जोधपुर में एक वेश्या के कहने पर जगन्नाथ नामक रसोइये ने दूध में विष दे दिया। इससे 30 अक्तूबर, 1883 (दीपावली) को उनका देहान्त हो गया।

#AryaSaman

पंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के ग्राम पन्दहा में नौ अप्रैल, 1893 को हुआ था। बचपन में इनका नाम केदार पांडेय था। माता कुलवन्ती देवी तथा पिता श्री गोवर्धन पांडेय की असमय मृत्यु के कारण इनका पालन ननिहाल में हुआ।

15 वर्ष की अवस्था में आजमगढ़ से उर्दू में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर वे काशी आ गये। वहाँ उन्होंने संस्कृत और दर्शनशास्त्र का तथा फिर अयोध्या में वेदान्त का गहन अध्ययन किया। उन्होंने आगरा में अरबी तथा लाहौर में फारसी की पढ़ाई भी की।

राहुल जी घुमक्कड़ स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया। उन पर आर्य समाज, मार्क्सवाद  और बौद्ध मत का बहुत प्रभाव पड़ा। 1917 में वह रूस गये। वहाँ उन्होंने रूसी क्रान्ति का गहन अध्ययन कर उस पर एक पुस्तक लिखी। बौद्ध मत का अध्ययन करने के लिए उन्होंने चीन, जापान, श्रीलंका और तिब्बत आदि का कष्टपूर्ण पर विस्तृत प्रवास किया।

वहाँ जो भी प्राचीन पुस्तकें एवं पांडुलिपियाँ उन्हें मिलीं, उसे 22 खच्चरों पर लादकर अपने साथ लाये। इसमें से अधिकांश का उन्होंने हिन्दी में अनुवाद किया। इस प्रकार भारत से बाहर बिखरे बौद्ध साहित्य से उन्होंने विश्व का परिचय कराया। बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर उन्होंने उसे अपना लिया। इसके बाद उनका नाम राहुल सांकृत्यायन हो गया।

1927-28 तक श्रीलंका में उन्होंने संस्कृत शिक्षण का कार्य किया। अच्छे लेखक और विचारक होने के बाद भी वे कभी प्रत्यक्ष कार्य से अलग नहीं हुए। भारत आकर वे किसान आन्दोलन में कूद पड़े।

उनका मत था कि अंग्रेजों की शह पर पल रहे सामंतवाद और पूँजीवाद के गठजोड़ को तोड़े बिना किसानों की दशा नहीं सुधरेगी। 1921 में वे गांधी जी के साथ जुड़ गये। 1931 में एक बौद्ध मिशन के साथ वे यूरोप की यात्रा पर गये। 1937 में रूस ने उन्हें प्राचीन साहित्य के अध्ययन के लिए बुलाया। भारत आकर 1942 में वे ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के अन्तर्गत जेल गये।

राहुल जी हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, कन्नड़, पाली, अंग्रेजी, जापानी, रूसी, तिब्बती और फ्रान्सीसी भाषाओं के अच्छे जानकार थे। इसके अतिरिक्त भी 20-25 भाषाएँ वे जानते थे; पर हिन्दी के प्रति उनके मन में सर्वाधिक आदर था। हिन्दी के प्रति अपनी निष्ठा के कारण उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। 1947 में मुम्बई में आयोजित ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के वे निर्विरोध सभापति चुने गये थे।

उन्होंने कहानी, उपन्यास, यात्रा वर्णन, जीवनी, संस्मरण, विज्ञान, इतिहास, राजनीति, दर्शन जैसे विषयों पर विभिन्न भाषाओं में 130 ग्रन्थ लिखे। ‘वोल्गा से गंगा तक’ उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति है, जिसे वैश्विक ख्याति मिली। उनकी पुस्तकों के अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं।

राहुल जी को ‘महापंडित’ की उपाधि पाठकों ने ही दी। कई देशों ने उन्हें अपने यहाँ बुलाकर अनेक सम्मानों  एवं पुरस्कारों से अलंकृत किया। भारत में उन्हें ‘पद्मभूषण’ और ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

राहुल जी का हृदय बहुत बड़ा था। वे व्यक्ति में दोष की बजाय गुण देखने पर बल देते थे। उनका मत था कि कोई भी व्यक्ति दूध का धुला नहीं होता। यदि किसी में पाँच प्रतिशत भी अच्छाई है, तो उसे महत्व देना चाहिए। घुमक्कड़ पन्थ के अनुयायी राहुल जी 1959 में दर्शनशास्त्र के महाचार्य के नाते फिर श्रीलंका गये; पर 1961 में उनकी स्मृति खो गयी। इसी दशा में 14 अप्रैल, 1963 को उनका देहान्त हो गया।

अंग्रेजी शासन के विरुद्ध चले लम्बे संग्राम का बिगुल बजाने वाले पहले क्रान्तिवीर मंगल पांडे का जन्म 30 जनवरी, 1831 को ग्राम नगवा (बलिया, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। कुछ लोग इनका जन्म ग्राम सहरपुर (जिला साकेत, उ0प्र0) तथा जन्मतिथि 19 जुलाई, 1827 भी मानते हैं। युवावस्था में ही वे सेना में भर्ती हो गये थे।

उन दिनों सैनिक छावनियों में गुलामी के विरुद्ध आग सुलग रही थी। अंग्रेज जानते थे कि हिन्दू गाय को पवित्र मानते हैं, जबकि मुसलमान सूअर से घृणा करते हैं। फिर भी वे सैनिकों को जो कारतूस देते थे, उनमें गाय और सूअर की चर्बी मिली होती थी। इन्हें सैनिक अपने मुँह से खोलते थे। ऐसा बहुत समय से चल रहा था; पर सैनिकों को इनका सच मालूम नहीं था।

मंगल पांडे उस समय बैरकपुर में 34 वीं हिन्दुस्तानी बटालियन में तैनात थे। वहाँ पानी पिलाने वाले एक हिन्दू ने इसकी जानकारी सैनिकों को दी। इससे सैनिकों में आक्रोश फैल गया। मंगल पांडे से रहा नहीं गया। 29 मार्च, 1857 को उन्होंने विद्रोह कर दिया।

एक भारतीय हवलदार मेजर ने जाकर सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन को यह सब बताया। इस पर मेजर घोड़े पर बैठकर छावनी की ओर चल दिया। वहां मंगल पांडे सैनिकों से कह रहे थे कि अंग्रेज हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं। हमें उसकी नौकरी छोड़ देनी चाहिए। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जो भी अंग्रेज मेरे सामने आयेगा, मैं उसे मार दूँगा।

सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ने सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने को कहा; पर तब तक मंगल पांडे की गोली ने उसका सीना छलनी कर दिया। उसकी लाश घोड़े से नीचे आ गिरी। गोली की आवाज सुनकर एक अंग्रेज लेफ्टिनेण्ट वहाँ आ पहुँचा। मंगल पांडे ने उस पर भी गोली चलाई; पर वह बचकर घोड़े से कूद गया। इस पर मंगल पांडे उस पर झपट पड़े और तलवार से उसका काम तमाम कर दिया। लेफ्टिनेण्ट की सहायता के लिए एक अन्य सार्जेण्ट मेजर आया; पर वह भी मंगल पांडे के हाथों मारा गया।

तब तक चारों ओर शोर मच गया। 34 वीं पल्टन के कर्नल हीलट ने भारतीय सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया; पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेज सैनिकों को बुलाया गया। अब मंगल पांडे चारों ओर से घिर गये। वे समझ गये कि अब बचना असम्भव है। अतः उन्होंने अपनी बन्दूक से स्वयं को ही गोली मार ली; पर उससे वे मरे नहीं, अपितु घायल होकर गिर पड़े। इस पर अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया।

अब मंगल पांडे पर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं अंग्रेजों को अपने देश का भाग्यविधाता नहीं मानता। देश को आजाद कराना यदि अपराध है, तो मैं हर दण्ड भुगतने को तैयार हूँ।’’

न्यायाधीश ने उन्हें फाँसी की सजा दी और इसके लिए 18 अप्रैल का दिन निर्धारित किया; पर अंग्रेजों ने देश भर में विद्रोह फैलने के डर से घायल अवस्था में ही 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी। बैरकपुर छावनी में कोई उन्हंे फाँसी देने को तैयार नहीं हुआ। अतः कोलकाता से चार जल्लाद जबरन बुलाने पड़े।

मंगल पांडे ने क्रान्ति की जो मशाल जलाई, उसने आगे चलकर 1857 के व्यापक स्वाधीनता संग्राम का रूप लिया। यद्यपि भारत 1947 में स्वतन्त्र हुआ; पर उस प्रथम क्रान्तिकारी मंगल पांडे के बलिदान को सदा श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

#MangalPanday

1857 के स्वाधीनता संग्राम में जो महिलाएं पुरुषों से भी अधिक सक्रिय रहीं, उनमें बेगम हजरत महल का नाम उल्लेखनीय है। मुगलों के कमजोर होने पर कई छोटी रियासतें स्वतन्त्र हो गयीं। अवध भी उनमें से एक थी। श्रीराम के भाई लक्ष्मण के नाम पर बसा लखनऊ नगर अवध की राजधानी था।

हजरत महल वस्तुतः फैजाबाद की एक नर्तकी थी, जिसे विलासी नवाब अपनी बेगमों की सेवा के लिए लाया था; पर फिर वह उसके प्रति भी अनुरक्त हो गया। हजरत महल ने अपनी योग्यता से धीरे-धीरे सब बेगमों में अग्रणी स्थान प्राप्त कर लिया। वह राजकाज के बारे में नवाब को सदा ठीक सलाह देती थी। पुत्रजन्म के बाद नवाब ने उसे ‘महल’ का सम्मान दिया।

वाजिदअली शाह संगीत, काव्य, नृत्य और शतरंज का प्रेमी था। 1847 में गद्दी पाकर उसने अपने पूर्वजों द्वारा की गयी सन्धि के अनुसार रियासत का कामकाज अंग्रेजों को दे दिया। अंग्रेजों ने रियासत को पूरी तरह हड़पने के लिए कायर और विलासी नवाब से 1854 में एक नयी सन्धि करनी चाही। हजरत महल के सुझाव पर नवाब ने इसे अस्वीकार कर दिया।

इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने नवाब को बन्दी बनाकर कोलकाता भेज दिया। इससे क्रुद्ध होकर हजरत महल ने अपने 12 वर्षीय पुत्र बिरजिस कद्र को नवाब घोषित कर दिया तथा रियासत के सभी नागरिकों को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध खुला युद्ध छेड़ दिया।

अंग्रेजों ने नवाब की सेना को भंग कर दिया था। वे सब सैनिक भी बेगम से आ मिले। बेगम स्वयं हाथी पर बैठकर युद्धक्षेत्र में जाती थी। अंततः पांच जुलाई, 1857 को अंग्रेजों के चंगुल से लखनऊ को मुक्त करा लिया गया। अब वाजिद अली शाह भी लखनऊ आ गये।

इसके बाद बेगम ने राजा बालकृष्ण राव को अपना महामंत्री घोषित कर शासन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। उन्होंने दिल्ली में बहादुरशाह जफर को यह सब सूचना देते हुए स्वाधीनता संग्राम में पूर्ण सहयोग का वचन दिया। उन्होंने खजाने का मुंह खोलकर सैनिकों को वेतन दिया तथा महिलाओं की ‘मुक्ति सेना’ का गठन कर उसके नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था की।

एक कुशल प्रशासक होने के नाते उनकी ख्याति सब ओर फैल गयी। अवध के आसपास के हिन्दू राजा और मुसलमान नवाब उनके साथ संगठित होने लगे। वे सब मिलकर पूरे क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के लिए प्रयास करने लगेे; पर दूसरी ओर नवाब की अन्य बेगमें तथा अंग्रेजों के पिट्ठू कर्मचारी मन ही मन जल रहे थे। वे भारतीय पक्ष की योजनाएं अंग्रेजों तक पहुंचाने लगे।

इससे बेगम तथा उसकी सेनाएं पराजित होने लगीं। प्रधानमंत्री बालकृष्ण राव मारे गये तथा सेनापति अहमदशाह बुरी तरह घायल हो गये। इधर दिल्ली और कानपुर के मोर्चे पर भी अंग्रेजों को सफलता मिली। इससे सैनिक हताश हो गये और अंततः बेगम को लखनऊ छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद कई राजाओं तथा नवाबों ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। वे उनसे निश्चित भत्ते पाकर सुख-सुविधा का जीवन जीने लगे; पर बेगम को यह स्वीकार नहीं था। वे अपने पुत्र के साथ नेपाल चली गयीं। वहां पर ही अनाम जीवन जीते हुए सात अप्रैल, 1879 को उनका देहांत हुआ। लखनऊ का मुख्य बाजार हजरत गंज तथा हजरत महल पार्क उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाये है।

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शिवाजी महाराज के किलों में पुणे का लाल महल बहुत महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने बचपन का बहुत सा समय वहाँ बिताया था; पर इस समय उस पर औरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ का कब्जा था। उसके एक लाख सैनिक महल में अन्दर और बाहर तैनात थे; पर शिवाजी ने भी संकटों से हार मानना नहीं सीखा था। उन्होंने स्वयं ही इस अपमान का बदला लेनेे का निश्चय किया।

6 अप्रैल, 1663 (चैत्र शुक्ल 8) की मध्यरात्रि का मुहूर्त इसके लिए निश्चित किया गया। यह दिन औरंगजेब के शासन की वर्षगाँठ थी। उन दिनों मुसलमानों के रोजे चल रहे थे। दिन में तो बेचारे कुछ खा नहीं सकते थे; पर रात में खाने-पीने और फिर सुस्ताने के अतिरिक्त कुछ काम न था। इसी समय शिवाजी ने मैदान मारने का निश्चय किया। हर बार की तरह इस बार भी अभियान के लिए सर्वश्रेष्ठ साथियों का चयन किया गया।

तीन टोलियों में सब वीर चले। द्वार पर पहरेदारों ने रोका; पर बताया कि गश्त से लौटते हुए देर हो गयी है। शाइस्ता खाँ की सेना में मराठे हिन्दू भी बहुत थे। अतः पहरेदारों को शक नहीं हुआ। द्वार खोलकर उन्हें अन्दर जाने दिया गया। सब महल के पीछे पहुँच गये। माली के हाथ में कुछ अशर्फियाँ रखकर उसे चुप कर दिया गया। शिवाजी तो महल के चप्पे-चप्पे से परिचित थे ही। अब वे रसोइघर तक पहुँच गये।

रसोई में सुबह के खाने की तैयारी हो रही थी। हिन्दू सैनिकों ने चुपचाप सब रसोइयों को यमलोक पहुँचा दिया। थोड़ी सी आवाज हुई; पर फिर शान्त। दीवार के उस पार जनानखाना था। वहाँ शाइस्ता खाँ अपनी बेगमों और रखैलों के बीच बेसुध सो रहा था। शिवाजी के साथियों ने वह दीवार गिरानी शुरू की। दो-चार ईंटों के गिरते ही हड़कम्प मच गया। एक नौकर ने भागकर खाँ साहब को दुश्मनों के आने की खबर की।

यह सुनते ही शाइस्ता खाँ के फरिश्ते कूच कर गये; पर तब तक तो दीवार तोड़कर पूरा दल जनानखाने में आ घुसा। औरतें चीखने-चिल्लाने लगीं। सब ओर हाय-तौबा मच गयी। एक मराठा सैनिक ने नगाड़ा बजा दिया। इससे महल में खलबली मच गयी। चारों ओर ‘शिवाजी आया, शिवाजी आया’ का शोर मच गया। लोग आधे-अधूरे नींद से उठकर आपस में ही मारकाट करने लगे। हर किसी को लगता था कि शिवाजी उसे ही मारने आया है।

पर शिवाजी को तो शाइस्ता खाँ से बदला लेना था। उन्होंने तलवार के वार से पर्दा फाड़ दिया। सामने ही खान अपनी बीवियों के बीच घिरा बैठा काँप रहा था। एक बीवी ने समझदारी दिखाते हुए दीपक बुझा दिया। खान को मौत सामने दिखायी दी। उसने आव देखा न ताव, बीवियों को छोड़ वह खिड़की से नीचे कूद पड़ा; पर तब तक शिवाजी की तलवार चल चुकी थी। उसकी तीन उँगलियाँ कट गयीं। अंधेरे के कारण शिवाजी समझे कि खान मारा गया। अतः उन्होंने सबको लौटने का संकेत कर दिया।

इसी बीच एक मराठे ने मुख्य द्वार खोल दिया। शिवाजी और उनके साथी भी मारो-काटो का शोर मचाते हुए लौट गये। अब खान की वहाँ एक दिन भी रुकने की हिम्मत नहीं हुई। वह गिरे हुए मनोबल के साथ औरंगजेब के पास गया। औरंगजेब ने उसे सजा देकर बंगाल भेज दिया।

अगले दिन श्रीरामनवमी थी। माता जीजाबाई को जब शिवाजी ने इस सफल अभियान की सूचना दी, तो उन्होंने हर्ष से पुत्र का माथा चूम लिया।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्या भारती तथा फिर विश्व हिन्दू परिषद के काम में सक्रिय रहने वाले श्री हरमोहन लाल जी का हीरे, जवाहरात और रत्नों का पुश्तैनी कारोबार था। भारत में आगरा, जयपुर, मुंबई आदि के साथ ही अमरीका और अफ्रीका में भी उनकी दुकानें थीं। पत्थरों को परखते हुए वे लोगों को परखना भी जान गये और अनेक मानव रत्नों को संगठन में जोड़ा।

श्री हरमोहन लाल जी के पूर्वज वर्तमान पाकिस्तान में मुल्तान नगर के निवासी थे। इनमें से एक श्री गुरदयाल सिंह शिमला में बस गये। इसके बाद उनके कुछ वंशज जयपुर आ गये। वहां ‘राजामल्ल का तालाब’ उनके पुरखों द्वारा निर्मित है। इस परिवार के एक बालक गणेशीलाल को आगरा में गोद लिया गया। 1917 में जन्मे हरमोहन लाल जी गणेशीलाल जी के ही पौत्र थे।

हरमोहन लाल जी के प्रपितामह ने आगरा में ‘गणेशीलाल एंड सन्स’ के नाम से 1845 में हीरे-जवाहरात की दुकान खोली। हरमोहन लाल जी के पिता श्री ब्रजमोहन लाल जी की इस क्षेत्र में बड़ी प्रतिष्ठा थी। देश के बड़े-बड़े राजे, रजवाड़े, साहूकार और जमींदार आदि उनके ग्राहक थे। वे उन्हें अपने महल और हवेलियों में बुलाकर अपने पुराने गहनों और हीरों आदि का मूल्यांकन कराते थे। आगे चलकर हरमोहन लाल जी भी इसमें निष्णात हो गये।

अत्यधिक सम्पन्न और प्रतिष्ठित परिवार के होने के कारण हरमोहन लाल जी आगरा के अनेक क्लबों और संस्थाओं के सदस्य थे; पर 1945 में आगरा में संघ के प्रचारक श्री न.न.जुगादे के सम्पर्क में आकर वे स्वयंसेवक बने और फिर धीरे-धीरे संघ के प्रति उनका प्रेम और अनुराग बढ़ता चला गया। वे कई वर्ष आगरा के नगर संघचालक रहे। जब वे अपने कारोबार के लिए जयपुर रहने लगे, तो उन्हें वहां भी नगर संघचालक बनाया गया। शिक्षाप्रेमी होने के कारण जयपुर में उन्होंने ‘आदर्श विद्या मंदिर’ की स्थापना की।

विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के बाद वे उ.प्र. में इसके काम में सक्रिय हो गये। आपातकाल के बाद वे वानप्रस्थी बनकर पूरा समय परिषद के लिए ही लगाने लगे। 1981 में उन्हें वि.हि.प. में महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी। उनके कार्यकाल में ही ‘संस्कृति रक्षा निधि’ एवं ‘एकात्मता यज्ञ यात्रा’ जैसे कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जो वि.हि.प. के कार्य विस्तार में मील के पत्थर हैं।

शाही जीवन के आदी हरमोहन लाल जी ने परिषद में सक्रिय होने पर सादा जीवन अपना लिया। एक बार वे महाराष्ट्र में संभाजीनगर (औरंगाबाद) के प्रवास पर गये। कार्यकर्ताओं ने उनके निवास की व्यवस्था एक सेठ के घर पर की थी; पर वे वहां न जाकर विभाग संगठन मंत्री के घर पर ही रुके। संगठन मंत्री के छोटे से घर में ओढ़ने-बिछाने का भी समुचित प्रबंध नहीं था; पर हरमोहन लाल जी बड़े आनंद से वहां रहे और धरती पर ही सोये। उनके आने की खबर पाकर शहर के कई बड़े जौहरी उनसे मिलने आये। वे यह सब देखकर हैरान रह गये। यद्यपि तब तक हरमोहन लाल जी वहां से जा चुके थे।

एबट मांउट (जिला चंपावत, उत्तराखंड) में हरमोहन लाल जी की पुश्तैनी जागीर थी। वहां उन्होंने एक सरस्वती शिशु मंदिर और धर्मार्थ चिकित्सालय खोला। उनकी पत्नी श्रीमती हीरोरानी भी इसमें बहुत रुचि लेती थीं। मथुरा के अद्वैत आश्रम के कामों के भी वही सूत्रधार थे।

मृदुभाषी एवं विनोदप्रिय स्वभाव के धनी हरमोहन लाल जी का अपने व्यापार के कारण विश्व भर में संपर्क था। इनका उपयोग उन्होंने वि.हि.प. के कार्य विस्तार के लिए किया। न्यूयार्क और कोपेनहेगन के ‘विश्व हिन्दू सम्मेलन’ इसका प्रमाण हैं। वे बैंकाक में होने वाले तीसरे सम्मेलन की तैयारी में लगे थे; पर इसी बीच पांच अपै्रल, 1986 को उनका आकस्मिक निधन हो गया।

(संदर्भ : श्रद्धांजलि स्मारिका, वि.हि.प.)

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