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पंडित रामप्रसाद का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता श्री मुरलीधर शाहजहाँपुर नगरपालिका में कर्मचारी थे; पर आगे चलकर उन्होंने नौकरी छोड़कर निजी व्यापार शुरू कर दिया। रामप्रसाद जी बचपन से महर्षि दयानन्द तथा आर्य समाज से बहुत प्रभावित थे। शिक्षा के साथ साथ वे यज्ञ, सन्ध्या वन्दन, प्रार्थना आदि भी नियमित रूप से करते थे।

स्वामी दयानन्द द्वारा विरचित ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पढ़कर उनके मन में देश और धर्म के लिए कुछ करने की प्रेरणा जगी। इसी बीच शाहजहाँपुर आर्य समाज में स्वास्थ्य लाभ करने के लिए स्वामी सोमदेव नामक एक संन्यासी आये। युवक रामप्रसाद ने बड़ी लगन से उनकी सेवा की। उनके साथ वार्तालाप में रामप्रसाद को अनेक विषयों में वैचारिक स्पष्टता प्राप्त हुई। रामप्रसाद जी ‘बिस्मिल’ उपनाम से हिन्दी तथा उर्दू में कविता भी लिखतेे थे।

1916 में भाई परमानन्द को ‘लाहौर षड्यन्त्र केस’ में फाँसी की सजा घोषित हुई। बाद में उसे आजीवन कारावास में बदलकर उन्हें कालेपानी (अन्दमान) भेज दिया गया। इस घटना को सुनकर रामप्रसाद बिस्मिल ने प्रतिज्ञा कर ली कि वे ब्रिटिश शासन से इस अन्याय का बदला अवश्य लेंगे। इसके बाद वे अपने जैसे विचार वाले लोगों की तलाश में जुट गये।

लखनऊ में उनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हुआ। मैनपुरी को केन्द्र बनाकर उन्होंने प्रख्यात क्रान्तिकारी गेंदालाल दीक्षित के साथ गतिविधियाँ शुरू कीं। जब पुलिस ने पकड़ धकड़ शुरू की, तो वे फरार हो गये। कुछ समय बाद शासन ने वारंट वापस ले लिया। अतः ये घर आकर रेशम का व्यापार करने लगे; पर इनका मन तो कहीं और लगा था। उनकी दिलेरी,सूझबूझ देखकर क्रान्तिकारी दल ने उन्हें अपने कार्यदल का प्रमुख बना दिया।

क्रान्तिकारी दल को शस्त्रास्त्र मँगाने तथा अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए पैसे की बहुत आवश्यकता पड़ती थी। अतः बिस्मिल जी ने ब्रिटिश खजाना लूटने का सुझाव रखा। यह बहुत खतरनाक काम था; पर जो डर जाये, वह क्रान्तिकारी ही कैसा ? पूरी योजना बना ली गयी और इसके लिए नौ अगस्त, 1925 की तिथि निश्चित हुई।

निर्धारित तिथि पर दस विश्वस्त साथियों के साथ पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ से खजाना लेकर जाने वाली रेल को काकोरी स्टेशन से पूर्व दशहरी गाँव के पास चेन खींचकर रोक लिया। गाड़ी रुकते ही सभी साथी अपने-अपने काम में लग गये। रेल के चालक तथा गार्ड को पिस्तौल दिखाकर चुप करा दिया गया। सभी यात्रियों को भी गोली चलाकर अन्दर ही रहने को बाध्य किया गया। कुछ साथियों ने खजाने वाले बक्से को घन और हथौड़ों से तोड़ दिया और उसमें रखा सरकारी खजाना लेकर सब फरार हो गये।

परन्तु आगे चलकर चन्द्रशेखर आजाद को छोड़कर इस कांड के सभी क्रान्तिकारी पकड़े गये। इनमें से रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खाँ तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी की सजा सुनायी गयी। रामप्रसाद जी को गोरखपुर जेल में बन्द कर दिया गया। वे वहाँ फाँसी वाले दिन तक मस्त रहे। अपना नित्य का व्यायाम, पूजा, सन्ध्या वन्दन उन्होंने कभी नहीं छोड़ा।

19 दिसम्बर, 1927 को बिस्मिल को गोरखपुर, अशफाक उल्ला को फैजाबाद तथा रोशन सिंह को प्रयाग में फाँसी दे दी गयी।

हिन्दी साहित्य के गौरवशाली नक्षत्र आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपने अनूठे लेखन शिल्प के कारण हिन्दी का प्रथम लोकमान्य आचार्य माना जाता है। इनका जन्म ग्राम दौलतपुर (रायबरेली, उ.प्र.) में 15 मई, 1864 को पंडित रामसहाय दुबे के घर में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई, जबकि बाद में वे रायबरेली, रंजीतपुरवा (उन्नाव) और फतेहपुर में भी पढ़े।

शिक्षा प्राप्ति के समय ही इनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचय सबको होने लगा था। इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। शिक्षा प्राप्ति के बाद इन्होंने कुछ समय अजमेर, मुम्बई और झाँसी में रेल विभाग में तार बाबू के नाते काम किया।

इस राजकीय सेवा में रहते हुए उन्होंने मराठी, गुजराती, बंगला और अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाया। झाँसी में किन्हीं नीतिगत विरोध के कारण इन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद इंडियन प्रेस, प्रयाग के स्वामी बाबू चिन्तामणि घोष के प्रस्ताव पर इन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादन का दायित्व सँभाला। थोड़े ही समय में सरस्वती पत्रिका लोकप्रियता के उत्कर्ष पर पहुँच गयी। इसका अधिकांश श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद जी को ही जाता है। आचार्य जी ने 1903 से 1920 तक इस पत्रिका का सम्पादन किया।

हिन्दी भाषा के लेखन में उन दिनों उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों की घुसपैठ होने लगी थी। आचार्य जी इससे बहुत व्यथित थे। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से हिन्दी के शुद्धिकरण का अभियान चलाया। इससे हिन्दी के सर्वमान्य मानक निश्चित हुए और हिन्दी में गद्य और पद्य का विपुल भंडार निर्माण हुआ। इसी से वह काल हिन्दी भाषा का ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है।

सरस्वती के माध्यम से आचार्य जी ने हिन्दी की हर विधा में रचनाकारों की नयी पीढ़ी भी तैयार की। इनमें मैथिलीशरण गुप्त, वृन्दावन लाल वर्मा, रामचरित उपाध्याय, गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ लोचन प्रसाद पाण्डेय, नाथूराम शंकर शर्मा, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’, हरिभाऊ उपाध्याय, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, देवीदत्त शुक्ल आदि प्रमुख हैं।

उन्होंने स्वयं भी अनेक कालजयी पुस्तकें लिखीं। इनमें हिन्दी भाषा का व्याकरण, भाषा की अनस्थिरता, सम्पत्ति शास्त्र, अयोध्या विलाप आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उनकी फुटकर रचनाओं की संख्या तो अगणित है। आचार्य जी ने यद्यपि साहित्य रचना तो अधिकांश हिन्दी में ही की; पर उन्हें जिन अन्य भाषाओं की जानकारी थी, उसके श्रेष्ठ साहित्य को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाया।

आचार्य जी को अपने गाँव से बहुत प्रेम था। साहित्य के शिखर पर पहुँचकर भी उन्होंने किसी बड़े शहर या राजधानी की बजाय अपने गाँव में ही रहना पसन्द किया। वे यहाँ भी इतने लोकप्रिय हो गये कि लोगों ने उन्हें दौलतपुर पंचायत का सरपंच बना दिया। जब लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते, तो वे कहते थे कि भारत माता ग्रामवासिनी है। यहाँ मैं अपनी जन्मभूमि का कर्ज चुकाने आया हूँ। उन्हें लेखन और गाँव की समस्याओं को सुलझाने में समान आनन्द आता था।

खड़ी बोली को हिन्दी की सर्वमान्य भाषा के रूप में स्थापित और प्रचारित-प्रसारित कराने वाले युग निर्माता आचार्य जी 21 दिसम्बर, 1938 को रायबरेली में चिरनिद्रा में सो गये। उनके लिए किसी ने ठीक कहा है कि वे सचमुच हिन्दी के ‘महावीर’ ही थे।

* कुछ इतिहासकर उनकी जन्म तारीख 9 मई मानते है.

#MahavirPrasadDwivedi

महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है। उनका जन्म  9 मई, 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में हुआ था। उनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह था और माता महारानी जयवंता बाई थीं। अपने परिवार की वह सबसे बड़ी संतान थे।  महाराणा प्रताप 1 मार्च, 1573 को  सिंहासन पर बैठे।

महाराणा प्रताप के समय दिल्ली पर मुगल शासक अकबर का राज था। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुगल बादशाह की गुलामी पसंद नहीं थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि मानसिंह के भड़काने से अकबर ने खुद मानसिंह और सलीम (जहांगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।अकबर ने मेवाड़ को पूरी तरह से जीतने के लिए 18 जून, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह और आसफ खां के नेतृत्व में मुगल सेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के बीच गोगुडा के नजदीक अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के बीच युद्ध हुआ। इस लड़ाई को हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है। ‘हल्दीघाटी का युद्ध’ भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाइयां लड़ते रहे।

भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। कुछ लोकगीतों के अलावा हिन्दी कवि श्यामनारायण पांडेय की वीर रस कविता ‘चेतक की वीरता’ में उसकी बहादुरी की खूब तारीफ की गई है। हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी।

गुरु अर्जन देव  सिक्खों के पाँचवें गुरु थे। ये 1 सितम्बर, 1581 ई. में गद्दी पर बैठे। गुरु अर्जन देव का कई दृष्टियों से सिक्ख गुरुओं में विशिष्ट स्थान है। ‘गुरु ग्रंथ साहब’ आज जिस रूप में उपलब्ध है, उसका संपादन इन्होंने ही किया था। गुरु अर्जन देव सिक्खों के परम पूज्य चौथे गुरु रामदास के पुत्र थे। गुरु नानक से लेकर गुरु रामदास तक के चार गुरुओं की वाणी के साथ-साथ उस समय के अन्य संतमहात्माओं की वाणी को भी इन्होंने ‘गुरु ग्रंथ साहब’ में स्थान दिया। ग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604में किया। ग्रंथ साहिब की संपादन कला अद्वितीय है, जिसमें गुरु जी की विद्वत्ता झलकती है। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रंथ साहिब में 36महान वाणीकारोंकी वाणियां बिना किसी भेदभाव के संकलित हुई।

अकबर के देहांत के बाद जहांगीर दिल्ली का शासक बना। वह कट्टर-पंथी था। अपने धर्म के अलावा, उसे और कोई धर्म पसंद नहीं था। गुरु जी के धार्मिक और सामाजिक कार्य भी उसे सुखद नहीं लगते थे। कुछ इतिहासकारों का यह भी मत है कि शहजादा खुसरोको शरण देने के कारण जहांगीर गुरु जी से नाराज था। 15मई, 1606ई. को बादशाह ने गुरु जी को परिवार सहित पकडने का हुक्म जारी किया।

तुज्ाके-जहांगीरी के अनुसार उनका परिवार मुरतजाखान के हवाले कर घरबार लूट लिया गया। श्री गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा’ के तहत लोहे की गर्म तवी पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। यासा के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया जहां गुरुजी का पावन शरीर रावी में आलोप हो गया। गुरु अर्जुनदेव जी ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया।

‘साइकिल वाले पत्रकार’ श्री नारायण बालकृष्ण (बापूराव) लेले का जन्म 29 फरवरी, 1920 को जलगांव (महाराष्ट्र) में हुआ था। बचपन में वे स्वयंसेवक बने और 1940 में डा0 हेडगेवार के देहांत के बाद प्रचारक बन गये। इसी वर्ष उन्होंने मुंबई से बी.कॉम. की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी। उन्होंने सांगली, सोलापुर और फिर गुजरात के अमदाबाद, बड़ोदरा आदि में शाखा कार्य किया। लेखन में रुचि होने के कारण इस दौरान भी वे अनेक पत्रों में लिखते थे।

1948 में गांधी जी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लग गया। ऐसे में बापूराव ने अनेक गुप्त पत्रक निकालकर उनके वितरण का सुचारू तन्त्र बनाया। प्रतिबन्ध के बाद संघ योजना से अनेक पत्र-पत्रिकाएं तथा ‘हिन्दुस्थान समाचार’ नामक समाचार संस्था प्रारम्भ की गयी। इसका केन्द्र मुंबई बनाकर दादा साहब आप्टे तथा बापूराव लेले को यह काम दिया गया।

थोड़े ही समय में इसने पत्र जगत में प्रतिष्ठा बना ली। बापूराव की पत्रकारिता वृत्ति सदा जाग्रत रहती थी। एक बार नागपुर जाते समय मार्ग में रेल दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। चोट के बाद भी बापूराव ने पूरा विवरण लिखकर मुंबई के दैनिक ‘प्रभात’ को भेज दिया।

1953 में बापूराव दिल्ली बुला लिये गये। वे दिन भर साइकिल पर घूमकर समाचार जुटाते और देश भर में भेजते थे। शासकीय कार्यालयों, संसद और मंत्रियों के घर तक उनकी निर्बाध पहुंच थी। वे संघ के बड़े अधिकारियों की भेंट प्रधानमंत्री तक से करवा देते थे। संघ और शासन के बीच वे सेतु बनकर काम करते थे। वे पांच वर्ष तक ‘भारतीय प्रेस परिषद’ के सदस्य भी रहे।

काम की विशेष प्रवृत्ति के कारण वे अलग कमरा लेकर रहते थे। 1962 में नागपुर और पुणे से प्रकाशित होने वाले ‘तरुण भारत’ के दिल्ली संवाददाता का काम भी उन पर आ गया। एक मित्र ने उन्हें एक पुराना स्कूटर दे दिया। इससे उनकी गति बढ़ गयी।

वे 1963 में राष्ट्रपति डा0 राधाकृष्णन के साथ ब्रिटेन और 1966 में शास्त्री जी के साथ ताशकंद गये। 1975 के आपातकाल में पत्रकार होने के नाते उन पर पुलिस ने हाथ नहीं डाला। इसका लाभ उठाकर उनके आवास पर संघ के भूमिगत अधिकारी ठहरने लगे।

आपातकाल में शासन ने सब समाचार संस्थाओं को मिलाकर ‘समाचार’ नामक एक संस्था बना दी। 1977 में यद्यपि इन्हें फिर स्वतन्त्र कर दिया; पर तब तक हिन्दुस्थान समाचार को भारी आर्थिक हानि हो चुकी थी।

1980 में इंदिरा गांधी ने फिर सत्ता में आने पर योजनाबद्ध रूप से हिन्दुस्थान समाचार के आर्थिक òोत बंद कर दिये। 1982 में इस पर प्रशासक नियुक्त कर दिया और अंततः 1986 में यह संस्था ठप्प हो गयी; पर बापूराव हिन्दी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी के कई पत्रों में नियमित रूप से लिखते रहे।

बापूराव पत्रकार होते हुए भी मूलतः प्रचारक ही थे। उनकी षष्ठिपूर्ति पर सांगली के एक कार्यक्रम में उन्हें 61,000 रु0 भेंट किये गये। बापूराव ने बिना देखे वह थैली ‘तरुण भारत’ के लिए दे दी। धीरे-धीरे उनका शरीर थकने लगा। अतः उनके भतीजे उन्हें जलगांव ले गये।

1996 में दिल्ली में उनकी 75वीं वर्षगांठ मनाई गयी। अक्तूबर, 2001 में प्रधानमंत्री अटल जी ने अपने निवास पर उन्हें सम्मानित किया। इस अवसर पर संघ, भाजपा तथा हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े उनके सब पुराने मित्र उपस्थित थे। प्रसन्नता और उल्लास के वातावरण में सब उनके गिरते हुए स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे।

जलगांव लौटकर भी उन्हें चैन नहीं था। वे दिल्ली जाकर फिर काम प्रारम्भ करना चाहते थे; पर शरीर निढाल हो चुका था। 11 अगस्त, 2002 को मन के उत्साह एवं उमंग के बावजूद इस ऋषि पत्रकार ने संसार से विदा ले ली।

(संदर्भ – बापूराव लेले : व्यक्ति और कार्य, वसंत आप्टे)

श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर  “श्री गुरूजी”  का जन्म माघ कृष्ण एकादशी (विजया एकादशी) विक्रम संवत् 1962 तथा दिनांक  19 फरवरी 1906 को प्रातः के साढ़े चार बजे नागपुर के ही श्री रायकर के घर में हुआ। उनका नाम माधव रखा गया। परन्तु  परिवार के सारे लोग उन्हें मधु नाम से ही सम्बोधित करते थे। बचपन में उनका यही नाम प्रचलित था। ताई-भाऊजी की कुल 9 संतानें हुई थीं। उनमें से केवल मधु ही बचा रहा और अपने माता-पिता की आशा का केन्द्र बना।

डाक्टर जी के बाद श्री गुरुजी संघ के द्वितिय सरसंघचालक बने और उन्होंने यह दायित्व 1973 की 5 जून तक अर्थात लगभग 33 वर्षों तक संभाला। ये 33 वर्ष संघ और राष्ट्र के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण रहे। 1942 का भारत छोडो आंदोलन, 1947 में देश का विभाजन तथा खण्डित भारत को मिली राजनीतिक स्वाधीनता, विभाजन के पूर्व और विभाजन के बाद हुआ भीषण रक्तपात, हिन्दू विस्थापितों का विशाल संख्या में हिन्दुस्थान आगमन, कश्मीर पर पाकिस्तान का आक्रमण.

1948 की 30 जनवरी को गांधीजी की हत्या, उसके बाद संघ-विरोधी विष-वमन, हिंसाचार की आंधी और संघ पर प्रतिबन्ध का लगाया जाना, भारत के संविधान का निर्माण और भारत के प्रशासन का स्वरूप व नितियों का निर्धारण, भाषावार प्रांत रचना, 1962 में भारत पर चीन का आक्रमण, पंडित नेहरू का निधन, 1965 में भारत-पाक युद्ध, 1971 में भारत व पाकिस्तान के बिच दूसरा युद्ध और बंगलादेश का जन्म, हिंदुओं के अहिंदूकरण की गतिविधियाँ और राष्ट्रीय जीवन में वैचारिक मंथन आदि अनेकविध घटनाओं से व्याप्त यह कालखण्ड रहा।

इस कालखण्ड में परम पूजनीय श्री गुरुजी ने संघ का पोषण और संवर्धन किया। भारत भर अखंड भ्रमण कर सर्वत्र कार्य को गतिमान किया और स्थान-स्थान पर व्यक्ति- व्यक्ति को जोड़कर सम्पूर्ण भारत में संघकार्य का जाल बिछाया। विपुल पठन-अध्ययन, गहन चिंतन, आध्यात्मिक साधना व गुरुकृपा, मातृभूमि के प्रति निस्वार्थ समर्पणशीलता, समाज के प्रति असीम आत्मीयता, व्यक्तियों को जोडने की अनुपम कुशलता आदि गुणों के कारण उन्होंने सर्वत्र संगठन को तो मजबूत बनाया ही, साथ ही हर क्षेत्र में देश का परिरक्व वैचारिक मार्गदर्शन भी किया।

संघ के विशुद्ध और प्रेरक विचारों से राष्ट्रजीवन के अंगोपांगों को अभिभूत किये बिना सशक्त, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और सुनिश्चित जीवन कार्य पूरा करने के लिए सक्षम भारत का खड़ा होना असंभव है, इस जिद और लगन से उन्होंने अनेक कार्यक्षेत्रों को प्रेरित किया। विश्व हिंदू परिषद्, विवेकानंद शिला स्मारक, अखिल भारतीय विद्दार्थी परिषद्, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, शिशु मंदिरों आदि विविध सेवा संस्थाओं के पीछे श्री गुरुजी की ही प्रेरणा रही है। राजनीतिक क्षेत्र में भी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उन्होंने पं. दिनदयाल उपाध्याय जैसा अनमोल हीरा सौंपा।

5 जून, 1973 को इन राष्ट्रऋषी का निधन हुआ.

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तानाजी मालुसरे शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और वीर निष्ठावान सरदार थे । उनके पुत्र के विवाह की तैयारी हो रही थी । चारों ओर उल्लास का वातावरण था। तभी शिवाजी महाराज का संदेश उन्हें मिला – माता जीजाबाई ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक कोढ़ाणा दुर्ग पर मुसलमानों के हरे झंडे को हटा कर भगवा ध्वज नहीं फहराया जाता तब तक वे अन्न – जल ग्रहण नहीं करेंगी । तुम्हें सेना लेकर इस दुर्ग पर आक्रमण करना है और अपने अधिकार में लेकर भगवा ध्वज फहराना है.

स्वामी का संदेश पाकर तानाजी ने सबको आदेश दिया – विवाह के बाजे बजाना बन्द करों , युद्ध के बाजे बजाओं । अनेक लोगों ने तानाजी से कहा – अरे , पुत्र का विवाह तो हो जाने दो , फिर शिवाजी के आदेश का पालन कर लेना । परन्तु , तानाजी ने ऊँची आवाज में कहा – नहीं , पहले कोण्डाणा दुर्ग का विवाह होगा , बाद में पुत्र का विवाह । यदि मैं जीवित रहा तो युद्ध से लौटकर विवाह का प्रबंध करूँगा । यदि मैं युद्ध में काम आया तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे । बस , युद्ध निश्चित हो गया । सेना लेकर तानाजी शिवाजी के पास पुणे चल दिये उनके साथ उनका भाई तथा अस्सी वर्षीय शेलार मामा भी गए । पुणे में शिवाजी ने तानाजी से परामर्श किया और अपनी सेना उनके साथ कर दी.

दुर्गम कोढ़ाणा दुर्ग पर तानाजी के नेतृत्व में हिन्दू वीरों ने रात में आक्रमण कर दिया । भीषण युद्ध हुआ । कोढ़ाणा का दुर्गपाल उदयभानु था। इसके साथ लड़ते हुए तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए। थोड़ी ही देर में शेलार मामा के हाथों उदयभानु भी मारा गया.

सूर्योदय होते – होते कोढ़ाणा दुर्ग पर भगवा ध्वज फहर गया । शिवाजी यह देखकर प्रसन्न हो उठे । परन्तु , जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके आदेश का पालन करने में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए है , तब उनके मुख से निकल पड़ा –  “गढ़ आला पण सिंह गेला “ गढ़ तो हाथ में आया , परन्तु मेरा सिंह ( तानाजी ) चला गया । उसी दिन से कोढ़ाणा दुर्ग का नाम सिंहगढ़ हो गया.

तानाजी जैसे स्वामी भक्त वीर तथा क्षत्रपति शिवाजी जैसे वीर स्वामी को कोटि – कोटि नमन.

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स्वतन्त्र भारत में जिन महापुरुषों ने हिन्दी और भारतीय भाषाओं के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री शिवराम शंकर (दादासाहब) आप्टे का नाम उल्लेखनीय है।

2 फरवरी, 1905 को बड़ोदरा में जन्मे दादासाहब ने वेदान्त और धर्म में विशेष योग्यता (ऑनर्स) के साथ स्नातक होकर कानून की शिक्षा ली और मुम्बई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। वे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, फाली नरीमन तथा मुहम्मद अली जिन्ना जैसे वरिष्ठ वकीलों के सहायक रहे।

कुछ समय वे एक अंग्रेजी पत्रिका में सम्पादक भी रहे। दो-ढाई साल वे वीर सावरकर जी के घर पर रहे। उन दिनों अंग्रेजी अखबार भारतीय पक्ष के समाचार प्रायः नहीं छापते थे। सावरकर जी ने उनसे भारतीय मन को समझने वाली समाचार संस्था बनाने को कहा। अतः यह काम सीखने के लिए उन्होंने दो साल तक रात की पारी में यू.पी.आई. नामक समाचार संस्था में काम किया।

दादासाहब बड़े शाही स्वभाव के व्यक्ति थे। सूट, बूट, टाई, हैट तथा सिगार उनके स्थायी साथी थे। न्यायालय के बाद वे शिवाजी पार्क में जाकर बैठते थे। वहाँ संघ की शाखा लगती थी। आबा जी थत्ते, बापूराव लेले, नारायणराव तर्टे आदि उस शाखा पर आते थे। उनके सम्पर्क में आकर दादासाहब 1944 में स्वयंसेवक बने और इसके बाद तो उनका जीवन ही बदल गया।

देश स्वतन्त्र होने के बाद अंग्रेजी समाचार पत्र अब सत्ताधारी कांग्रेस की चमचागिरी करने लगे। ऐसे में दादासाहब ने हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में समाचार संकलन व वितरण करने वाली ‘हिन्दुस्थान समाचार’ नामक संस्था का निर्माण किया। उन दिनों विश्व में केवल अंग्रेजी के दूरमुद्रक (टेलीप्रिंटर) ही प्रचलित थे। दादासाहब ने 1954 में हिन्दी का दूरमुद्रक विकसित किया। इससे हिन्दी पत्रकारिता जगत में क्रान्ति आ गयी।

हिन्दुस्थान समाचार के संस्थापक के रूप में दुनिया के अनेक देशों ने उन्हें आमन्त्रित किया। विश्व में भ्रमण के दौरान उन्होंने वहाँ के हिन्दुओं की दशा का अध्ययन किया। इसी आधार पर जब 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई, तो उन्हें उसका महासचिव बनाया गया। देश-विदेश में प्रवास कर इसके विस्तार के लिए दादासाहब ने अथक प्रवास किया। इस कारण शीघ्र ही विश्व हिन्दू परिषद का काम विश्व भर में फैल गया।

दादासाहब एक अच्छे लेखक, चित्रकार तथा छायाकार भी थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें लिखीं। इनमें से ‘शकारि विक्रमादित्य’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। ‘राष्ट्रगुरु रामदास’ नामक चित्रकथा के लिए उन्होंने चित्र भी बनाये। इसी से आगे चलकर महापुरुषों के जीवन चरित्र प्रकाशित करने वाली ‘अमर चित्रकथा’ की नींव पड़ी।

दादासाहब प्रतिदिन डायरी लिखते थे। 1942 से 1979 तक की उनकी डायरियाँ भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। कानून का जानकार होने के कारण 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तथा फिर विश्व हिन्दू परिषद का संविधान बनाने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभायी।

1974 के बाद कई वर्ष उन्होंने महामंडलेश्वर स्वामी गंगेश्वरानन्द उदासीन के साथ विश्व-भ्रमण कर वेदों की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास किया। जीवन के अन्तिम वर्षों में उन्होंने स्वयं को सब बाहरी कामों से अलग कर लिया। 10 अक्तूबर, 1985 को पुणे के कौशिक आश्रम में उनका देहावसान हुआ।

76 साल जीने वाले स्टीफन हॉकिंग जब 21 की उम्र में एकियोट्रॉपिक लेटर्ल स्केलोराइसिस (एएलसी) बीमारी से ग्रस्त हुए तो डॉक्टरों ने कहा कि वो दो साल से ज्यादा नहीं जी पाएंगे. इसके बाद भी उन्होंने 55 साल और जीकर दिखाया. इस दौरान वह पूरी दुनिया में घूमे. बोल नहीं पाने के बाद भी लेक्चर दिए. ऐसे शोध किए, जिसने अंतरिक्ष को लेकर लोगों की सोच बदल डाली. उन्होंने बेस्ट सेलर किताबें भी लिखीं. वह मानवीय दिमाग की मजबूती के प्रतीक भी थे. लोग हैरान होते थे कि एक अपंग शख्स इतनी ढेर सारी चीजें कैसे कर सकता है.

मशहूर ग्रीक फिलास्फर हेरो डोट्स का कहना है, “प्रतिकूलता हमारी मजबूतियों को सामने लाती है. जब आप अपनी सबसे बड़ी चुनौती के सामने सकारात्मक होते हैं और संरचनात्मक तरीके से रिस्पांस देते हैं तो एक खास किस्म की दृढ़ता, मजबूती, साहस, चरित्र, जो आपमें ही निहित होता है. भले ही आपको उसका अहसास नहीं हो, वह आपको निखारने लगता है. “

स्टीफन हॉकिंग के जीवन की वो बातें, जिससे हम सभी लोग सीख सकते हैं

1. अपंगता से उबरने के लिए तकनीक का सहारा लें

इंटेलिजेंस में वो क्षमता होती है कि वो किसी भी बदलाव के साथ तालमेल बिठा ले. उन्होंने हमें बताया कि तकनीक किस तरह हमारा जीवन बदल सकती है. वह एक विशेष मोटर से संचालित व्हील चेयर से मूव करते थे. व्हील चेयर से जुड़े स्पीच सिंथसाइजर से बोलते थे. व्हील चेयर से लगे कंप्यूटर मॉनिटर के जरिए बहुत कुछ समझाते थे. उन्होंने कंप्यूटर तकनीक और इंटरनेट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया.

2. अपंगता कभी राह में आड़े नहीं आती वो हमेशा कहते थे, “मेरी सलाह विकलांग लोगों से है कि हमेशा जो आप करना चाहते हैं, उसपर ध्यान लगाएं, आपकी अपंगता आपको कभी बेहतर करने से नहीं रोक सकती. कभी अपनी स्थिति पर अफसोस मत करिए. अपने जोश को कम मत होने दीजिए.”

3. हमेशा जिज्ञासु बनो
वह कहते थे- “हमेशा सितारों की ओर ऊपर देखो न कि अपने पैरों की ओर. ये सोचो कि ये दुनिया ऐसी क्यों है. ब्रह्मांड कैसे है. हमेशा जिज्ञासु बने रहो”. उनमें हमेशा एक बच्चे की तरह जिज्ञासा बनी रही. वह हमेशा सवाल पूछते थे – क्यों और कैसे.

4. हमेशा विनोदी स्वाभाव के बने रहो
स्टीफन हॉकिंग ने कहा-सक्रिय दिमाग हमेशा मेरे बने रहने की वजह रहा, इससे मैं हमेशा अपना सेंस ऑफ ह्यूमर बनाए रख सका. उन्हें जानने वाले कहते हैं कि वो हमेशा मजाकिया रहे.

5. हमेशा सिद्धांतों पर टिके रहो
“कोई फिजिक्स में प्राइज लेने के इरादे से रिसर्च नहीं करता. बल्कि इस आनंद के लिए करता है कि वो नई चीज की खोज कर रहा है, जिसके बारे में इससे पहले कोई नहीं जानता है” – स्टीफन हॉकिंग.
अपने पूरे जीवन के दौरान वह हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहा करते थे कि साइंस रिसर्च के लिए न केवल फंड कम हैं बल्कि साइंस रिसर्च और ब्रिटेन में पढ़ाई के लिए फंडिंग में कुप्रबंधन की स्थिति भी. जब उन्होंने नाइटहुड की उपाधि दी गई तो उन्होंने सिद्धांतों के आधार पर इसे ठुकरा दिया.

6. कभी हार मत मानो
ब्लैक होल पर नई थ्योरी देने से कुछ महीनों पहले उनके काम की बहुत आलोचना हो रही थी लेकिन वो डटे रहे. उन्होंने जब ब्लैक होल की रिसर्च को सामने रखा, तब भी उनकी हंसी उड़ाई गई और इसे माना नहीं गया लेकिन वो अपनी बात दृढ़ रहे. बाद में इसे सबने माना.

7. समय कीमती है, इसका उपयोग करो
वह समय को बर्बाद करने से घृणा करते थे. उन्होंने समय पर रिसर्च की थी. उन्होंने अपनी ये रिसर्च इस टिप्पणी के साथ खत्म की कि घड़ी को वापस पीछे घुमाना असंभव है. संदेश साफ था कि हम पैसा बना सकते हैं लेकिन गया हुआ समय कभी वापस नहीं लौटता, इसलिए हमें बुद्धिमानी से इसका उपयोग करना चाहिए.

8. अपनी जानकारी बांटो
वो जानकारियों के आदान प्रदान में विश्वास रखते थे. मसलन उन्होंने ये दिखाया कि फिजिक्स कोई गूढ़ विषय नहीं है बल्कि एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी उसे समझना आसान है. वह ज्ञान को बांटने में विश्वास रखते थे.

साभार – News18 

भारत के स्वाधीनता संग्राम में मेरठ की 10 मई, 1857 की घटना का बड़ा महत्व है। इस दिन गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से खोलने से मना करने वाले भारतीय सैनिकों को हथकड़ी-बेड़ियों में कसकर जेल में बंद कर दिया गया। जहां-जहां यह समाचार पहुंचा, वहां की देशभक्त जनता तथा भारतीय सैनिकों में आक्रोश फैल गया।

मेरठ पुलिस कोतवाली में उन दिनों धनसिंह गुर्जर कोतवाल थे। वे परम देशभक्त तथा गोभक्त थे। अपने संपर्क के गांवों में उन्होंने यह समाचार भेज दिया। उनकी योजनानुसार हजारों लोगों ने मेरठ आकर जेल पर धावा बोलकर उन सैनिकों को छुड़ा लिया। इसके बाद सबने दूसरी जेल पर हमला कर वहां के भी सब 804 बंदी छुड़ा लिये। इससे देशभक्तों का उत्साह बढ़ गया।

इसके बाद सबने अधिकारियों के घरों पर धावा बोलकर लगभग 25 अंग्रेजों को मार डाला। इनमें लेफ्टिनेंट रिचर्ड बेलेसली चेम्बर्स की पत्नी शारलैंट चेम्बर्स भी थी। रात तक पूरे मेरठ पर देशभक्तों का कब्जा हो गया। अगले दिन यह समाचार मेरठ के दूरस्थ गांवों तक पहुंच गया। हर स्थान पर देशभक्तों ने सड़कों पर आकर अंग्रेजों का विरोध किया; पर ग्राम धौलाना (जिला हापुड़, उ.प्र.) में यह चिंगारी ज्वाला बन गयी।

इस क्षेत्र में मेवाड़ से आकर बसे राजपूतों का बाहुल्य है। महाराणा प्रताप के वंशज होने के नाते वे सब विदेशी व विधर्मी अंग्रेजों के विरुद्ध थे। मेरठ का समाचार सुनते ही उनके धैर्य का बांध टूट गया। उन्होंने धौलाना के थाने में आग लगा दी। थानेदार मुबारक अली वहां से भाग गया। उसने रात जंगल में छिपकर बिताई तथा अगले दिन मेरठ जाकर अधिकारियों को सारा समाचार दिया।

मेरठ तब तक पुनः अंग्रेजों के कब्जे में आ चुका था। जिलाधिकारी ने सेना की एक बड़ी टुकड़ी यह कहकर धौलाना भेजी कि अधिकतम लोगों को फांसी देकर आतंक फैला दिया जाए, जिससे भविष्य में कोई राजद्रोह का साहस न करे। वह इन क्रांतिवीरों को मजा चखाना चाहता था।

थाने में आग लगाने वालों में अग्रणी रहे लोगों की सूची बनाई गई। यह सूची निम्न थी – सर्वश्री सुमेरसिंह, किड्ढासिंह, साहब सिंह, वजीर सिंह, दौलत सिंह, दुर्गासिंह, महाराज सिंह, दलेल सिंह, जीरा सिंह, चंदन सिंह, मक्खन सिंह, जिया सिंह, मसाइब सिंह तथा लाला झनकूमल सिंहल।

अंग्रेज अधिकारी ने देखा कि इनमें एक व्यक्ति वैश्य समाज का भी है। उसने श्री झनकूमल को कहा कि अंग्रेज तो व्यापारियों का बहुत सम्मान करते हैं, तुम इस चक्कर में कैसे आ गये ? इस पर श्री झनकूमल ने गर्वपूर्वक कहा कि यह देश मेरा है और मैं इसे विदेशी व विधर्मियों से मुक्त देखना चाहता हूं।

अंग्रेज अधिकारी ने बौखलाकर सभी क्रांतिवीरों को 29 दिसम्बर, 1857 को पीपल के पेड़ पर फांसी लगवा दी। इसके बाद गांव के 14 कुत्तों को मारकर हर शव के साथ एक कुत्ते को दफना दिया। यह इस बात का संकेत था कि भविष्य में राजद्रोह करने वाले की यही गति होगी।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऐसी धमकियों से बलिदान की यह अग्नि बुझने की बजाय और भड़क उठी और अंततः अंग्रेजों को अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा। 1857 की क्रांति के शताब्दी वर्ष में 11 मई, 1957 को धौलाना में शहीद स्मारक का उद्घाटन भगतसिंह के सहयोगी पत्रकार रणवीर सिंह द्वारा किया गया। प्रतिवर्ष 29 दिसम्बर को हजारों लोग वहां एकत्र होकर उन क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि देते हैं।

(संदर्भ : गोधन मासिक, मई 2007)