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समादरणीय श्री ब्रह्मविद्यानंदजी महाराज

सादर प्रणाम

मेरा लेख जो ‘शंकराचार्य, साईबाबा और हिन्दू धर्म’ इस शीर्षक से र्मैने लिखा था, उस के संदर्भ में आपने अपनी प्रतिक्रिया जो प्रकाशनार्थ भेजी, उसकी एक प्रति आपने मुझे भेजी वह मैंने पढी। मैं इस अनुग्रह के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ। छत्तीसगढ के किस अखबार में मेरा लेख प्रकाशित हुआ यह मैं नहीं जानता। मैंने दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक के अतिरिक्त किसी भी अन्य समाचारपत्र को वह लेख नहीं भेजा था। ‘पाञ्चजन्य’ ने उसे प्रकाशित नहीं किया यह बात अलग है। संभवत:, छत्तीसगढ के उस अखबार ने मेरे ब्लॉग से वह लेख उद्धृत किया होगा। आप भी मेरे अन्य लेख उस ब्लॉग से पढ सकते हैं। ब्लॉग है mgvaidya.blogspot.com छत्तीसगढ के उस अखबार में शीर्षक में अपने स्वयं का ‘आस्था’ शब्द जोड दिया है। सम्पादक का वह अधिकार है। मेरी उस पर कोई आपत्ति नहीं।

अब बात आपके लेख की। आपने अपने लेख में झारखण्ड के एक आदिवासी का जो उदाहरण दिया वह यहाँ गैरलागू है। उस ‘आदिवासी’ व्यक्ति को ईसाई बनाया गया। यहाँ, साईबाबा जो जन्म से मुसलमान थे, उनको हिन्दू बनाया गया है। उनकी पूजा आरती करना, या हिन्दूओं की अन्य देवताओंके समान उनकी मूर्ति प्रतिष्ठित करना यह हिन्दूकरण है। उसका स्वागत करना चाहिये। अपने हिंदुस्थान के इतिहास में शक, हूण, कुशान, यवन (यानी ग्रीक) आक्रामक करके आये। उन्होंने यहाँ विजय पाकर यहीं रहना पसन्द किया। काल के ओघ में वे सारे हिन्दू समाज में विलीन हो गये। गुजरात के गिरनार पर्वत पर रुद्रदामन् राजा का जो शिलालेख मिला है, उस में रुद्रदामनने अपनी पूर्वपीठिका बतायी है। उनके पिता का नाम जयदामन् था और पितामह का नाम चेष्टन था। चेष्टन के पुत्रपौत्रों ने हिन्दू नाम स्वीकृत किये। इसी तरह से शक, हूण और कुशान भी विशाल हिन्दू धर्म में और समाज में विलीन हो गये। अत:,साईबाबा को हिन्दू बनाया गया है, इसका आनंद मानना चाहिये कि दु:ख? आप के महाराज जैसे पीठाधीशों और मठाधीशों ने इसी प्रकार अपने हिन्दू समाज से अलग हुये अपने बंधुओं को फिर से अपने समाज में लाने के लिये प्रयत्नशील होना आवश्यक है।

हमारी प्राचीन काल से चली आयी ‘धर्म’ की अवधारणा को सभी ने ध्यान में लेना चाहिये। उपासना यह धर्म का केवल एक अंग है, सम्पूर्ण धर्म नहीं। ‘धर्म’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘धृ’ धातु से है और ‘धृ’ का अर्थ जोडना, धारण करना है। महाभारत में लिखा है, धर्मो धारयति प्रजा:। धर्म वह है जो प्रजा का धारण यानी रक्षण, पोषण करता है। उसी में लिखा है कि धारणाद् धर्म इत्याहु: -अर्थ स्पष्ट है कि वह धारण करता है इस लिये उसे धर्म कहते हैं।

किस की धारणा करता है ‘धर्म’? सम्पूर्ण विश्‍व की, ब्रह्माण्ड की भी कह सकते हैं। विश्‍व में चार प्रमुख अस्तित्व हैं। एक है मानवव्यक्ति। दूसरा है मानवसमष्टि। मानवव्यक्ति समष्टि का अंश है । किन्तु समष्टि उसके बाहर भी है। किन्तु विश्‍व मानवसमष्टि के साथ समाप्त नहीं होता। क्यौं कि यहाँ पशु-पक्षी हैं,पहाड-नदीयाँ हैं- वृक्ष और वन भी हैं। यानी चराचर सृष्टि है। मानवसमष्टि इस सृष्टि का अंश है। और चौथा और सबसे महत्त्व का अस्तित्व है चैतन्य। जिसको मैं परमेष्ठी कहता हूँ। यह सब में है और सब के बाहर भी है। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठी इन चारों को जोडनेवाला जो सूत्र है इसका नाम ‘धर्म’ हैं। जो विधा, अपने को व्यापकता से जोडती है वह ‘धर्म’ बन जाती है। अपनी भाषा के कुछ शब्द लीजिये। जैसे धर्मशाला, धर्मार्थ अस्पताल, धर्मकांटा, राजधर्म, पुत्रधर्म आदि। ‘धर्मशाला’ में कौनसी उपासना होती है? फिर ‘धर्मशाला’ क्यौं? कारण हम अपने लिये कितना भी बडा और सुंदर मकान बनाइये वह‘धर्म’ नहीं। जब औरों के निवास की व्यवस्था करते हैं, तब ‘धर्मशाला’ खडी होती है। हम अपने लिये दवाईयों का कितना भी प्रबन्ध करें, वह ‘धर्म’ नहीं है। जब अन्यों के स्वास्थ्य की चिन्ता और व्यवस्था होती है, तब ‘धर्मार्थ अस्पताल’ बनता है। यह स्वयं को व्यापकता से जोडना है। ‘राजधर्म’ क्या राजा की उपासना है जो प्रजा की नहीं? जिन कर्तव्यों से राजा अपने को प्रजा से जोडता है वह राजधर्म है। और पुत्र जिन कर्तव्यों से स्वयं को माता-पिता से जोडता है वह पुत्रधर्म होता है। यही समष्टि धर्म है।

सृष्टि के साथ भी जोडने की व्यवस्था है। आवश्यकता है सम्मान से और आदर से जोडना चाहिये। अत: सृष्टि को हम मातृस्वरूप में देखते है। नदी लोकमाता बनती है। गंगामैय्या होती है। भूमि, भूमाता या मातृभूमि बतनी है। गौ-गोमाता बनती है। अचल हिमालय देवतात्मा कहलाया जाता है। पशुओं को पवित्रता अर्पण करने हेतु, उनको किसी ना किसी देवतास्वरूप से जोड दिया गया है। बैल को शंकरजी के साथ, गौ को भगवान् कृष्ण के साथ, हंस को सरस्वती के साथ, साँप को भी शंकर जी के साथ, छोटे चूहे को भी गणेशजी के साथ। इसी प्रकार वनस्पतियों को भी। तुलसी भगवान् विष्णु के लिये। बिल्व शंकर जी के लिये। दूर्वा गणेश जी के लिये। औंदुबर दत्तात्रेय के लिये और वटवृक्ष सावित्री के साथ।

अन्तिम सीढी जो है वह परमेष्ठी के साथ जोडने की। यह उपासना का दायरा है। आपने पूछा कि एकं सत् का क्या अर्थ है। वह है परमात्मा या परमेष्ठी। वही सत् यानी अक्षय है। किन्तु उस की उपासना की अनेक विधायें हो सकती हैं। विप्रा बहुधा वदन्ति का मतलब है बुद्धिमान लोक अनेक विधाओं से उसका वर्णन कर सकते हैं। यानी नाम अनेक हो सकते हैं। और अलग अलग नाम होने  के लिये रूप भी अनेक होना आवश्यक है। इस लिये हम अपने उपासना के लिये किसी रूप का या नाम का स्वीकार कर सकते हैं। कुछ थोडे ऐसे भी हो सकते हैं कि जो निराकार, निर्गुण की भी उपासना कर  सकते हैं। उपासना को ही परमार्थसाधना कहते हैं।

किन्तु विश्‍व जैसा पारमार्थिक है वैसाही वह भौतिक भी है। ‘धर्म’ दोनों की चिन्ता करता है और व्यवस्था निहित करता है। अत: ‘धर्म’ की वैशेषिकों ने जो परिभाषा की है वह भी ध्यान में लेनी चाहिये। वह यह यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म: यानी जिस से ‘अभ्युदय’ यानी ऐहिक उन्नति और‘नि:श्रेयस’ यानी पारमार्थिक कल्याण की सिद्धि होती है, वह ‘धर्म’ है। हिन्दू धर्म इस अर्थ में एकमात्र‘धर्म’ है। बाकी सब मजहब, सम्प्रदाय, पंथ एवं आस्थाएँ हैं। इस सबको हिन्दू धर्म में स्थान है। इस लिये डॉ. राधाकृष्णन् ने जो कहा कि ‘Hinduism is not a religion; it is a common-wealth of many religions’ वह एकदम सही है।

हिन्दू धर्म की इस विशाल व्यापकता के कारण ही वेदों की निन्दा करनेवाले गौतम बुद्ध को भी भगवान् का अवतार माना गया है। कवि जयदेव का यह वचन-

निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्

सदयहृदय दर्शितपशुघातम्

केशव धृतबुद्धशरीर । जय जगदीश हरे।

इसका चाहे उतना विस्तार किया जा सकता है। अत: यही विश्राम लेना चाहता हूँ।

हां, और एक बात रही। वह यह आपके गुरू स्वामी स्वरूपानंद महाराज की। आप ही अपने मन में सोचे कि अन्य पीठों के भी शंकराचार्य है। वे विवाद का विषय क्यौं नहीं बनते और स्वरूपानंद जी महाराज ही क्यौं? मैंने इस विषय का अधिक विस्तार करने की आवश्यकता नहीं। समझनेवाले समझ सकते हैं।

अस्तु। शेष शुभ।

स्नेहांकित

मा. गो. वैद्य

नागपुर, अक्तूबर 3, लखेश्वर चंद्रवंशी : देशवासियों को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भारत के सनातन मूल्यों को विश्व के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण बताया। संघ प्रमुख नागपुर में प्रतिवर्ष होनेवाले संघ के विजयादशमी पर्व समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने मंगलयान की सफलता के लिए वैज्ञानिकों और एशियाई खेलों में भारत को पदक दिलानेवाले खिलाडियों को शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि भारत ने सारी दुनिया के सामने मानवता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। कट्टरता हमारे व्यवहार में कभी नहीं रही है, और यही कारण है कि हमारे पूर्वजों से लेकर आज तक हमने कभी अपने विचारों को दूसरों पर नहीं थोपा। इसलिए विश्व में फैले कट्टरता और स्वार्थ से उपजे आतंकी प्रवृत्तियों का समूल नाश करने की शक्ति हमारे सनातन संस्कृति में है। इन मूल्यों की स्थापना में ही भारत का उत्थान और संसार का कल्याण निहित है।

संघ प्रमुख ने अपने भाषण में भारत के सकारात्मक विकास, सीमा सुरक्षा, सामाजिक एकता, सामाजिक विषमता, गोहत्या और पशु मांस की तस्करी, पर्यावरण, प्राकृतिक आपदा, पारिवारिक कर्तव्य तथा युवाओं के दायित्व से जुड़े मुद्दों पर विचार रखे। उन्होंने केंद्र सरकार के कार्यों की सराहना की, साथ की देशहित में आवश्यक सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। इस समय देश में आत्‍मविश्‍वास जगा है। देश में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। हम एक भारत का सपना देख रहे हैं।

संघ प्रमुख के भाषण का मुख्यांश :

वैश्विक कट्टरता के मूल प्रवृत्तियों का नाश

डॉ. भागवत ने कहा, कि समूची दुनिया विविध भाषा, पंथ और देशों में बंटी है। इस वजह से लोग खुद को औरों से अलग मानते हैं। अपने की मत को सर्वश्रेष्ठ मानकर अन्यों के प्रति कटुता का भाव रखने की प्रवृत्ति विश्व में दिखाई देती है। इन्हीं एकांतिक सामूहिक स्वार्थों के कारण शोषण, दमन, हिंसा व कट्टरता का जन्म होता है। ऐसे ही स्वार्थों के चलते मध्यपूर्व में पश्चिम देशों के जो क्रियाकलाप चले उसमें से कट्टरतावाद का नया अवतार आईआई (ISIS) के रूप में सारी दुनिया को आतंकित कर रहा है। विश्व के सभी देश तथा अनेक पंथ-संप्रदायों के समूह इस संकट के विरोध में एक सामूहिक शक्ति खड़ी करने की मन:स्थिति में है और वैसा करेंगे भी, परंतु बार-बार रूप बदलकर आने वाला यह आतंकवाद जिन एकांतिक प्रवृत्तियों व भोग-लालसी स्वार्थों की क्रिया-प्रतिक्रिया के चक्र में से जन्मा है उस चक्र की गति को मूल से खंडित कर समाप्त किए बिना विश्व में सदियों से चलती आई हुई आतंकवाद की संकट परंपरा जड़मूल से समाप्त नहीं होगी।

ऐसा करना चाहनेवालों को स्वयं के अंदर से स्वार्थ, भय, निपट भौतिक जड़वादिता को संपूर्ण समाप्त कर एक साथ सबके सुख का विचार करने वाली एकात्म व समग्र दृष्टि अपनानी पड़ेगी। जागतिकीकरण के नाम पर केवल अपने समूह के आर्थिक स्वार्थों को सरसाना चाहने वाले, परस्पर शांति प्रस्थापना की भाषा की आड़ में अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहने वाले अथवा नि:शस्त्रीकरण के नाम पर दूसरे देशों को स्वयं की अपेक्षा सदैव बलहीन बनाकर रखने की चेष्टा करने वाले, सुखी-सुंदर दुनिया के स्वप्न को न कभी साकार करना चाहेंगे और न करेंगे।

संघ प्रमुख ने कहा कि हमें कट्टरवाद के खिलाफ एकजुट होना होगा। उन्‍होंने कहा कि भारत विश्व का प्राचीन देश है, इसलिए हम विश्व के लिए बड़े भाई जैसे हैं। उन्‍होंने कहा कि अपने विचारों को दूसरे पर थोपना गलत है। सबका सम्‍मान करो, सबको स्‍वीकार करना चाहिए। सबको सुखी रखने की कोशिश होनी चाहिए। हमने किसी को नहीं बदला है। हमने किसी की संस्‍कृति को नहीं बदला है। तो फिर लोगों की कथनी और करनी में फर्क क्‍यों है। भारत के पास सबको जोड़ने का मंत्र है। समाज ने परिवर्तन सोच समझकर लाया है। हमारे सपनों के भारत के पास अच्‍छाई के सारे गुण हैं।

भारत का सन्देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम’

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि विश्व के गत हजार वर्षों के इतिहास में सत्य व अहिंसा के आधार पर इस दिशा में किए गए प्रामाणिक प्रयासों का उदाहरण केवल भारतवर्ष का है। अत्यंत प्राचीन काल से इस क्षण तक हिमालय और उसकी दोनों ओर की जुड़ी हुई पर्वत शृखंलाओं से सागर पर्यन्त विस्तार के अंदर जो सनातन अक्षुण्ण राष्ट्रीय विचार प्रवाह चल रहा है तथा जिसे आज हिन्दुत्व के नाम से जाना जाता है; उसकी यह विशेषता है कि भाषा, भू प्रदेश, पंथ-संप्रदाय, जाति-उपजाति, खान-पान,रीति-रिवाज आदि की सब स्वाभाविक विविधताओं को वह सम्मानपूर्वक स्वीकार करता है तथा साथ जोड़कर संपूर्ण विश्व के कल्याण में चलाता है। यहां जीवन के सत्य के बारे में अन्वेषण, अनुभव तथा निष्कर्ष की संपूर्ण स्वतंत्रता है। न किसी की भिन्न श्रद्धा को लेकर विवाद खड़े किए जाते हैं, न मूर्तिभंजक अभियान चलते हैं, न किसी पोथीबंद व्यवस्था के आधार पर श्रद्धा की व श्रद्धास्पदता की वैधता का निर्णय करने का प्रचलन इस परंपरा में है। बौद्धिक स्तर पर मतचर्चा का मुक्त शास्त्रार्थ चलते हुए भी व्यावहारिक स्तर पर श्रद्धा की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए समन्वय व सामंजस्य से एक समाज के नाते चलना यह हिन्दू संस्कृति का परिचायक लक्षण है।

प्राचीन काल से ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की आत्मीय दृष्टि को लेकर यहां से ऋषि,मुनि, भिक्खु, श्रमण, संत, विद्वान, शास्त्रज्ञ मैक्सिको से लेकर साइबेरिया तक फैले जगत के भूभाग में गए। बिना किसी साम्राज्य को विजित किए, बिना कहीं की किसी भिन्न जीवन पद्धति को, पूजा पद्धति को, राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक पहचान को नष्ट किए, प्रेम से उन्होंने वहां आत्मीयता के सूत्र को, सुमंगल और सृष्टि कल्याण की भावना को प्रतिष्ठित किया। वहां के जीवन को अधिक उन्नत, ज्ञानवान, संपन्न किया। आधुनिक काल में भी हमारे जगतवंद्य विभूतियों से लेकर तो सामान्य आप्रवासी भारतीयों का यही व्यवहार रहा है, यही कीर्ति है। दुनियाभर के चिन्तकों को, समाजों को इसलिए भारत के भविष्य में अपने लिए और जगत् के लिए एक सुखद आशा का दर्शन होता है।

‘‘मैंने सीने का लहु पिलाकर, पाले हैं दुनिया के क्षुधित लाल

भूभाग नहीं, शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।’’

यही अनुभव दुनिया को हमसे मिला है। इसलिए हमसे दुनिया की अपेक्षाएं भी हैं। एक राष्ट्र के नाते सृष्टि में भारत के सनातन अस्तित्व का यही प्रयोजन हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने भी बताया है।

एतद्देष प्रसूतस्य सकाषादग्रजन्मन:।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवा:।।

इसलिए आज विजयादशमी के इस पुण्य पर्व पर हमारे सामने विजय का यह नया क्षितिज स्पष्ट है। संपूर्ण विश्व को पथप्रदर्शक भारत का जीवन खड़ा करना। देश-काल-परिस्थिति-सुसंगत भारत का ऐसा नया निर्माण जो संपूर्ण विश्व के प्रति समग्र एकात्म-भेदरहित, स्वार्थ रहित, दृष्टि रखते हुए सर्वसमर्थ व सर्वांग सुंदर संपन्न बनकर खड़ा हो। सृष्टि की सारी विविधताओं को स्वीकार करते हुए समन्वय से चलाने में उदाहरणस्वरूप बने। संपन्नता जहां सुनीति सहित अवतरित हो, करूणा, सेवा व परोपकार निर्भयता सहित जहां अजेय सामर्थ्य का अंग बने, जिसका विकास पथ सर्वत्र मंगल सृष्टि करने वाला हो ऐसे भारत का निर्माण हमें करना है। जिस भारत के सुपुत्रों के नाते विश्वभर के देशों में जा कर बसे भारतीय मूल के लोग उन उन देशों की जनता के सम्मुख भद्रता,चारित्र्य तथा वैश्विकता का उदाहरण प्रस्थापित करते हो, जिस सामर्थ्यसंपन्न भारत के अस्तित्व मात्र से विश्व में सर्वत्र भारतभूमि, पूर्वज तथा संस्कृति से नाता रखने वाले लोग अपने आप को निर्भय व सुरक्षित मानकर जी सके ऐसे भारत का निर्माण हमें करना है।

पर्यावरण की रक्षा

सरसंघचालक ने कहा किसृष्टि में व्याप्त स्वाभाविक विविधता को प्रेम व सम्मान के साथ स्वीकार करना, प्रकृति के साथ व परस्पर व्यवहार में समन्वय, सहयोग तथा परस्पर सह संवेदना व संवाद के आधार पर चलना तथा विचारों, मतों व आचरण में एकांतिक कट्टरपन व हिंसा को छोड़कर अहिंसा व वैधानिक मध्यम मार्ग का पालन करना,इसी से संपूर्ण विश्व की मानवता को सुख-शांतिपूर्ण सुंदर जीवन का लाभ होगा; इस सत्य का बौद्धिक प्रबोधन तो विश्व के ज्ञात इतिहास के प्रारंभ काल से होता आ रहा है; पर्याप्त मात्रा में हुआ है। सब बुद्धि से इसको जानते हैं। परंतु नित्य भाषणों, प्रवचनों,उपदेशों में सुनाई देने वाले उदात्त, उन्नत व सुखहितकारक तत्वों के मंडन के पीछे सुसंगत आचरण नहीं है। परस्पर व्यवहार में व्यक्तियों से लेकर तो राष्ट्रों तक के आचरण में व नीतियों में दंभ, अहंकार, स्वार्थ, कट्टर संकुचितता आदि का ही वर्चस्व दिखाई देता है। इसी के चलते हम यह देख रहे हैं कि, आधुनिक मानवजाति जानकारी,शास्त्रज्ञान, तंत्रज्ञान व सुख-सुविधाओं में पहले से कहीं अधिक प्रगत होने के बाद भी,विश्व के जीवन में से दु:ख, कष्ट, शोक आदि का संपूर्ण निवारण करने के सब प्रकार के प्रयोग गत दो हजार वर्षों में कर लेने के बाद में भी वहीं समस्याएं बार-बार खड़ी हो रही है तथा मनुष्य की इस तथाकथित प्रगति ने कुछ नई दुर्ल्लंध्य समस्याएं और खड़ी कर दी हैं।

इसलिए हम देख रहे हैं कि पर्यावरण विषय की चर्चा जगत में सर्वत्र गत कई दशकों से चल रही है, फिर भी प्रत्येक बीतता दिन पर्यावरण के क्षरण को और एक कदम निकट लाता हुआ सिद्ध हो रहा है। विश्व में पर्यावरण क्षरण के कारण नित नई व विचित्र प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, फिर भी प्रचलित विकासपथ के पुनर्विचार में राष्ट्रों की व बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नीतियों में शब्दों के परिवर्तन व ऊपरी मलमपट्टियों के अतिरिक्त चिंतन में कोई मूलभूत परिवर्तन दिखाई देता नहीं। सारी करनी के पीछे वहीं पुरानी, एकांतिक जड़वादी, उपभोगाधारित व स्वार्थप्रेरित विचारधारा प्रच्छन्न या प्रकट रूप से काम करती हुई दिखती है।

वर्तमान वर्ष की विशेषता

संघ प्रमुख के वर्तमान वर्ष की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी हम सब विजयादशमी के पुण्यपर्व पर यहां एकत्रित हैं, परंतु इस वर्ष का वातावरण भिन्न है यह अनुभव हम सभी को होता है। भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा प्रथम प्रयास में ही मंगल की कक्षा में यान का सफल प्रवेश करा कर हमारे संबंध में विश्व में गौरव तथा भारतीयों के मन में आत्मविश्वास की वृद्धि में चार चाँद जोड़ दिए हैं। मंगल अभियान में जुड़े वैज्ञानिकों का तथा अन्य सभी कार्यकर्ताओं का हम हृदय से शत-शत अभिनंदन करते हैं। यह वर्ष राजा राजेंद्र चोल की दिग्विजयी जीवनगाथा का सहस्राब्दी वर्ष है। इस वर्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा एकात्म मानव दर्शन के अविर्भाव का 50 वां वर्ष भी है। भारतवर्ष का सामान्य समाज विश्व के तथाकथित प्रगत राष्ट्रों की, सुख-सुविधा संपन्न व शिक्षित जनता से बढ़-चढ़कर न कहें तो भी बराबरी में, अत्यंत परिपक्व बुद्धि से, देश के भविष्य निर्माण में अपने प्रजातांत्रिक कर्तव्यों का निर्वाह करता है,  इस साक्षात्कार के कारण विश्व के देशों में भारतीय प्रजा के संबंध में प्रकट अथवा अप्रकट गौरव की वृद्धि व हम सभी भारतीयों के मन में धैर्य, उत्साह और आत्मविश्वास की वृद्धि दिखाई दे रही है।

परंतु हम सभी को यह भी समझना, और समझकर चलना होगा कि जगत में सुख,शांति व सामंजस्य के आधार पर चलनेवाली नई व्यवस्था का स्वयं उदाहरण बनकर चलनेवाला विश्वगुरु भारतवर्ष बनाने के अभियान का यह मात्र एक छोटासा पदक्षेप है। अभी बहुत कुछ करना, गन्तव्य की दिशा में सतत व लंबा मार्गक्रमण शेष है। दुनिया व देश की परिस्थिति को गौर से देखेंगे तो यह बात किसी के भी ध्यान में आ सकती है।

मोदी सरकार के कार्यों की सराहना

डॉ.भागवत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा की तारीफ करते हुए कहा कि इस यात्रा से लोग खासे उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि अभी कुछ दिन पूर्व ही ऐसी ही कुछ आकांक्षाओं व अपेक्षाओं को मन में धारण करते हुए समाज ने देश के सत्ता तंत्र में एक बड़ा परिवर्तन लाया है। अभी इस परिवर्तन को 6 महिने भी पूरे नहीं हुए। परंतु ऐसे संकेत यदा-कदा प्राप्त होते रहते हैं, जिससे लगता है कि विश्व में भारत के उत्थान की तथा भारत की जनता के संपूर्ण सुरक्षित, सर्वांगीण उन्नत जीवन की आकांक्षा का प्रतिबिंब शासन-प्रशासन की नीतियों में खिलने लगेगा। इस अत्यंत अल्प कालखंड में भी केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक, सुरक्षा, वैश्विक संबंधों एवं अन्यान्य क्षेत्रों में देशहित में जो कतिपय नीतिगत पहल की गई है, उससे आशा तो जगी हैं। इसी दिशा में आने वाले दिनों में उचित पथ पर देश की नीति सुनिश्चित और सुव्यवस्थित होकर आगे बढ़े यह इस सरकार को करना होगा। आषा और विश्वास के साथ हमें अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

पिछले दिनों देश के विभिन्न भागों विशेषकर जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ से जन-धन की अपार क्षति हुई है। इस त्रासदी में काल कवलित हुए सभी लोगों की शांति व सद्गति के लिए प्रभुचरणों में प्रार्थना और उनके परिवारजनों के प्रति हार्दिक संवेदना है। जम्मू-कश्मीर में आई इस अकल्पनीय त्रासदी के निवारण के लिए केन्द्र सरकार ने जिस तत्परता एवं उदार मन से सब प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई है, वह प्रशंसनीय है। हमेशा की भांति, अन्यान्य सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं सेवाभारती के कार्यकर्ताओं ने भी तुरंत राहत कार्य प्रारंभ कर दिया और आगे भी आवश्यकता कार्य की योजना बनाई है। ऐसे संकट के समय सब प्रकार के भेदों से ऊपर उठकर सहायता के लिए तत्पर हो जाना ही भारतीय समाज की समान सामाजिक संवेदना एवं राष्ट्रीय एकता का परिचय देती है।

नीति निर्धारण के लिए हमारे मनीषियों के विचार महत्वपूर्ण  

संघ प्रमुख ने अपने भाषण में कहा कि देश की वर्तमान परिस्थिति व जमीन का वास्तव बहुत गंभीर व जटिल है। केवल सत्ता व राजनीति के भरोसे देश के भविष्य को छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। विश्व में प्रचलित सभी नीतिपथ खण्डित व अधूरी दृष्टि पर आधारित हैं। अपने देश के तंत्र व नीति पर भी स्वतंत्रता के बाद आज तक उसी का प्रभाव रहा है। एक राष्ट्र के नाते खड़े होने के लिए समाज में आवश्यक प्रामाणिकता का, समरस आत्मीयता का, उद्यमिता, ध्येयवादिता, संस्कार प्रवणता आदि सदगुणों का सदियों से क्षरण होता आ रहा, वह अभी भी रूका नहीं है। अपने संकुचित स्वार्थ के लिए इन कमियों को कुरेदकर, बढ़ाकर, भेद के झगड़ों की आग पर अपनी रोटियां सेंकने का खेल करने वाली देशी व विदेशी शक्तियां अभी भी विद्यमान है। अपना खेल खेलने का प्रयास कर रही है। इसलिए देश का तंत्र चलाने वाले सबको सजग व सक्षम रहना ही पड़ेगा। प्रचलित विकास पथ की अच्छी बातों को अपनाते हुए नए कालसुसंगत पथ का निर्माण करना पड़ेगा। एकात्म व समग्र दृष्टि के अभाव से प्रचलित विकास पथ में आई त्रुटिपूर्ण बातों का परित्याग करते हुए अपनी दृष्टि के आधार पर नए पर्याय खड़े करने पडेंगे।

उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानन्द, योगी अरविंद, स्वामी रामतीर्थ, रविंद्रनाथ ठाकूर, लोकमान्य तिलक से लेकर तो महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस,स्वातंत्र्यवीर सावरकर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, विनोबा भावे, संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी उपाख्य माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पं. दीनदयाल उपाध्याय आदि महापुरुषों ने स्वानुभव के आधार पर इस देश की शिक्षा, संस्कार, अर्थनीति, समाजनीति,सुरक्षानीति आदि के बारे में जो गहन, समग्र, मूलगामी व व्यावहारिक चिंतन किया है; उसके परिशीलन व प्रयोगों के अनुभव से निर्मित एक नया कालसुसंगत विकास पथ देश के तंत्र में स्थापित करना पड़ेगा। देश के अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम मनुष्य के जीवन की स्थिति ही इस देश के विकास की निर्णायक कसौटी होगी तथा आत्मनिर्भरता देश की सुरक्षा व समृद्धि का अनिवार्य घटक है यह ध्यान में रखकर चलना पड़ेगा। जीवन का भिन्न दृष्टि से विचार करने वाला तथा उस विचार के आधार पर विश्व का सिरमौर देश बनकर सदियों तक जगत का नेतृत्व करने वाला अपना देश रहा है, इस तथ्य को निरंतर स्मृति में रखकर चलना होगा। उस दृष्टि से भारत में ही समस्त विश्व के कल्याण का सामर्थ्य विद्यमान है। उसका युगानुकूल आविष्कार नीतियों में प्रकट करना पड़ेगा।

ऐसी नीतियां चलाकर देश के जिस स्वरूप के निर्माण की आंकांक्षा अपने संविधान ने दिग्दर्शित की है, उस ओर देश को बढ़ाने का काम होगा, इस आशा और विश्वास के साथ सत्ता अपना कार्य करे, इसके लिए उनको समय तो देना होगा। पर इसके साथ ही समाज के सहयोग के बिना मात्र सत्ता के प्रयासों से जीवन परिवर्तन नहीं होता, यह विश्व के सभी प्रगत देशों के विकास का इतिहास बताता है। इसलिए समाज का प्रबोधन करनेवाले तथा समाज की तरह-तरह की समस्याओं का निराकरण करने में लगे व्यक्तियों व संगठनों को अपना कर्तव्य समझकर सक्रिय व सजग रहने की आवश्यकता है। प्रजातंत्र में उनकी सक्रियता, सजगता तथा समाज की राष्ट्रहितपरक प्रबुद्धता के कारण ही नीतियों के सफल होने में शासन-प्रशासन को सहयोग मिलता है व सत्ता की राजनीति में देश के भटक जाने की संभावना से बचाव होता है।

ऐसे सब व्यक्ति, संस्था तथा संगठन, लोक प्रबोधन तथा लोक समस्या परिष्कार के काम में अपने संस्थागत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित बुद्धि से लगे रहें। शासन, प्रशासन के साथ संवाद का उनका क्रम बने और चलता रहे तथा नीतियों के सुपरिणाम आखरी व्यक्ति तक पहुंच रहे हैं अथवा नहीं, इसका सीधा प्रतिभाव शासन तक पहुंचते रहे इसकी आवश्यकता प्रजातांत्रिक देश में सदैव बनी रहती है।

इन समस्याओं पर विशेष कार्य करने की आवश्यकता

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि देश के दक्षिण भाग में स्थित केरल तथा तमिलनाडु राज्यों में जिहादी गतिविधियों में चिंताजनक वृद्धि दिखाई देती है। उन गतिविधियों के प्रतिरोध में ठोस व परिणामकारक उपाययोजना होती हुई ध्यान में नहीं आती है। दक्षिण सागर तट से वहां की रेत में पाए जाने वाले विरला खनिजों की (Rare Earth) तस्करी में कोई कमी नहीं आई  है। पश्चिम बंगाल में तथा असम में घुसपैठ तथा अन्य कारणों से निर्मित जनसंख्या की असंतुलित स्थिति तथा संप्रदाय विशेषों के कट्टरपन के आगे चुनावी मतों के लिए झुककर खुशामद की वहां के राज्यकर्ताओं की दब्बू नीति के कारण वहां पर हिन्दू समाज का जीवन, कानून व्यवस्था तथा देश की सुरक्षा भी खतरे में आ गए हैं।

संपूर्ण देश में ही देश की अंतर्गत सुरक्षा को चुनौति बननेवाला जिहादी और नक्सली उग्रवाद तथा उनका पोषण करनेवाली शक्तियों पर नियंत्रण लाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों के सहयोग से प्रभावी उपाय योजना प्रत्यक्ष होती हुई दिखना अभी बाकी है। परंतु इसमें समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। समाज में इन सब समस्याओं के प्रति अधिक सजगता की आवश्यकता है। सीमा पर दोतरफा चलनेवाली अनेक प्रकार के तस्करी में लिप्त होने वाले व्यक्ति तो समाज से ही मिलते हैं। बिना अनुमति सीमा के अंदर घुसकर संपूर्ण देश में फैल जानेवाले घुसपैठियों को रोजगार व आश्रय देनेवाले समाज के सामान्य लोग ही रहते हैं। समाज में शोषण के प्रभाव व विकास के अभाव के कारण नक्सली उग्रवाद को गोलाबारुद (Cannon fodder) उपलब्ध होता है।

शोषण समाप्ति व विकास लाभ के लिए जैसे प्रशासन की चुस्ती, पारदर्शिता, संवेदनशीलता तथा नियमबद्धता आवश्यक है वैसे ही और उतना ही, इन सब में समाज का सक्रिय सहयोग, अपनी स्वतंत्र गतिविधियों से शोषण समाप्ति के लिए प्रजातांत्रिक तरीके से संघर्षरत रहना तथा विकास को समाज के अभावग्रस्त व्यक्तियों तक पहुंचाने के लिए तरह-तरह की सेवा गतिविधि वहां प्रारंभ करना भी आवश्यक है।

समाज निभाए अपनी सक्रिय भूमिका

डॉ. भागवत ने कहा कि शासन की नीतियां देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाली ही हो परंतु साथ में समाज की उद्यमिता बढ़े, नित्य उपयोग की सामग्री सस्ती मिलती है इसलिए देवी-देवताओं की मूर्तियां भी विदेश में बनी हुई खरीदने की प्रवृत्ति हम समाज के सामान्य लोग त्यागें व जीवन में स्वदेशी का आचरण करें, यह भी अनिवार्य आवश्यकता हैं। देश की सुरक्षा को शासन की सजग व शक्तिशाली नीति तथा सेना की पूर्ण सिद्धता व पराक्रम के साथ-साथ ही समाज की जागरुकता, व्यक्तिगत चारित्र्य व देशभक्ति भी सुनिश्चित करती है। समाज में चलने वाला संवाद शासन और सेना का बल बढ़ाने वाला हो। सेना में सैनिकों तथा सैनिक अधिकारियों की पर्याप्त संख्या में आपूर्ति समाज के युवा वर्ग में से होती रहे तथा सामान्य लोगों की आँखें व कान समाज में चलने वाली गतिविधियों पर चौकस लगी रहें, इसकी आवश्यकता है।

परंतु क्या इस दृष्टि से हम अपने समाज की स्थिति को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं?हमारे घरों में पलने-बढ़नेवाले बालकों, किशोरों की तैयारी घर में मिलनेवाले वातावरण के संस्कारों से क्या इस प्रकार गढ़ी जाती है ? ऐसे संस्कारों के पोषण के लिए आवश्यक आचरण का उदाहरण क्या घर के अभिभावक उपस्थित करते हैं ? नई पीढ़ी में बढ़ने वाला नशीली द्रव्यों के उपयोग का प्रमाण, शिक्षा व परिवारों में आई हुई आत्मीयता, संवाद व संस्कारों की कमी की ओर भी निर्देश करते हैं। ‘‘मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ यह हमारी परम्परा का मुख्य संस्कार रहा है। उन संस्कारों का क्षरण देश में बढ़ते हुए अपराधों का, महिलाओं के साथ अत्याचार तथा युवा पीढ़ी में बढ़ते अनाचार व उच्छृंखलता का मूल है। उस पर नियंत्रण करने के लिए कानून की कड़ाई व व्यवस्थाओं की पुनर्रचना जितनी आवश्यकता है,उतनी ही आवश्यकता समाज के वातावरण में सुयोग्य आचरण के उदाहरण व सुसंस्कार प्रवणता की है।

संस्कारयुक्त हो वातावरण  

संघ प्रमुख ने कहा कि समाज में सुयोग्य वातावरण के परिवर्तन को लाने में शासन की भी भूमिका है, यह सब जानते हैं। शिक्षा सर्वसुलभ, संस्कार प्रदान करनेवाली व्यवस्थित हों, जीवनसंघर्ष में स्वाभिमान से खड़ा रहने का सामर्थ्य व साहस देने वाली हों, यह शिक्षा विभाग को देखना चाहिए। जनता को जानकारी देना व उनका प्रबोधन करना यह जिनका कर्तव्य है उन दृकश्राव्य तथा पाठ्य् माध्यमों (Visual and Print media) के द्वारा संस्कार बिगाड़नेवाले कार्यक्रम व विज्ञापन न परोसे जाए ऐसा नियंत्रण रखने का काम भी सरकार के सूचना व प्रसारण विभाग का है ही। परंतु समाज इन कार्यों के शासन के द्वारा होने की बाट जोहते रुका रहे, इसकी आवश्यकता नहीं। हमारा अपना परिवार भी समाज का एक छोटा रूप है। कुटुंब समाज की परिपूर्ण ईकाई के रूप में आज भी हमारी जीवनक व्यवस्था में चल रहा है। उसमें हम विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ा सकेंगे,परंतु जीवन में मनुष्यता का संस्कार भरने वाला, कर्तव्या-कर्तव्य का विवेक सिखाने वाला, साहस से जीवन का सामना करने की शक्ति व धैर्य देनेवाला प्रशिक्षण तो अपने घर के वातावरण में ही मिलता है। इस दृष्टि से अपने कुटुंब के बड़े व सन्मान्य व्यक्तियों का व्यवहार, कुलपरम्परा की इस दृष्टि से उपयुक्त रक्षणीय बातें तथा तदनुरूप व्यवहार व संवाद का चलन बनाना तो पूर्णतया अपने ही हाथ में है। प्रत्येक घर में यह होना आज आवश्यक हो गया है।

अभाव व भेदभाव की समाप्ति का लें संकल्प

संघ के सरसंघचालक ने कहा कि शासन की भूमिका के बिना भी हम जिन क्षेत्रों में अपना कर्तव्य करने में अग्रेसर हो सकते हैं वह है- अभाव व भेदभाव की समाप्ति।सौभाग्य से इन दोनों क्षेत्रों में चिंतन व कार्य पूर्व से चलता आ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण के प्रति जागृति व पर्यावरण परिष्कार, स्वावलंबन के लिए स्वयं सहायता समूह व उद्यमिता प्रशिक्षण, जलसंधारण, जैविक कृषि, गौसंवर्धन, ग्राम विकास ऐसे अनेक क्षेत्रों में अनेक लोग कार्य कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवक भी इन क्षेत्रों में कार्यरत है। परंतु समाज की विशालता के अनुपात में इन कार्यों के विस्तार की बहुत गुंजाईश है। अपनी रुचि, प्रकृति व समय आदि क्षमताओं के अनुसार हम किसी पहले से चले कार्य में जुड़ सकते हैं अथवा हम स्वतंत्र रूप से किसी कार्य को कर सकते हैं। कम से कम अपने अड़ोस-पड़ोस में अथवा हमारे अपने घर में आजीविका के लिए सेवा देनेवाले अपने समाज के अभावग्रस्त बंधु-भगिनियों के लिए किसी उपयोगी कार्य में हम अपने कुटुंब को साथ लेकर जुट सकते हैं।

समाज से भेद भावना दूर करने का कार्य बहुत अधिक प्रमाण में व बहुत अधिक गति से होने की आवश्यकता हैं। मन में से भेदभाव निकालने का काम तो शासन अथवा अन्य कोई व्यवस्थागत तंत्र कर भी नहीं सकता। इसे तो समाज के उद्यम के द्वारा ही संपन्न किया जा सकता है। अपने मन से, अपने घर से तथा अपने मित्र परिवार से प्रत्यक्ष कृति प्रारम्भ करके ही यह कार्य संभव होगा। इस हेतु मेरे अपने व्यक्तिगत व्यवहार में, मेरे अपने परिवार के वातावरण में, जो आदतें, रूढ़ि, कुरीतियां भेदभाव के व्यवहार का पोषण करनेवाली चली आ रही है उनका सम्पूर्ण त्याग करना होगा। जातिगत,प्रांतगत, भाषागत, अहंकारों तथा अभिनिवेशों के सूक्ष्मतम अवशेषों को भी निकाल बाहर करना होगा। ऐसे अहंकारों को लेकर भावना भड़कानेवाले वक्तव्य सुनने,बोलने तथा भड़काऊ वातावरण में बह जाकर किसी आतताई कार्य को करने से बचना होगा।

अपने विशाल हिंदू समाज का प्रत्येक व्यक्ति, भारतमाता का प्रत्येक सुपुत्र, मेरा अपना बंधु है, इस आत्मीय भावना की कसौटी पर अपनी प्रत्येक छोटी-बड़ी कृति को तराशना होगा। अपने समविचारी सहयोगियों को साथ लेकर हिंदुओं के धर्मस्थान, श्यमशान व जलाभरण के स्रोत सब हिंदुओं के लिए खुले हों, हिंदुओं के अनेकविध पंथ-संप्रदाय, भाषा, प्रांत, जातियों के गौरवास्पद महापुरुषों के नाम पर होने वाले कार्यक्रमों, उत्सवों में सब हिंदुओं की सहभागिता हों, यह पहल करनी पड़ेगी। इस कार्य का स्वयं से प्रारंभ हम आज ही कर सकते हैं। कालक्रम में संकुचित हुए अपने आत्मीयता के दायरे के लिए यह एक सीमोल्लंघन आज हम अनिवार्य रूप से कर लें।

हमारे पास दर्शनों की कमी कमी नहीं है। अपने शाश्वत मूल्यों के आधार पर व्यक्तिगत व सामूहिक जीवन का काल-सुसंगत विचार भी अनेक महापुरुषों ने रखा है। पं. दीनदयाल उपाध्याय के द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन के आविर्भाव का 50 वां वर्ष चल रहा है। सौभाग्य से प्रामाणिकता व नि:स्वार्थ बुद्धि से राष्ट्र कल्याण के लिए अपने आप्त पूर्वजों के द्वारा दिए गए उन स्वानुभूत उपदेशों को चरितार्थ करने का संकल्प भी देश का नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों में विद्यमान दिख रहा है। समाज में सजगता, एकात्मता,व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य, अनुशासन इत्यादि सद्गुणों के आधार पर धैर्यपूर्वक सामूहिक उद्यम खड़ा हो तो अपने सामने खड़ी सारी चुनौतियों व संकटों को पार कर स्वयं के उदाहरण से संतुलित, सुखी, सर्वांग सुंदर, वैश्विक जीवन का पथ प्रदर्शक राष्ट्र जीवन खड़ा करना शीघ्र संभव होगा।

धन्य हिन्दुस्थान

संघ प्रमुख ने कहा कि विजयादशमी विजयपर्व है। राष्ट्र के सामने प्रकट यह नए विजय का क्षितिज हमको ललकार रहा है। प्रतिपदा से लेकर नवमी तक जागृत रहकर सामूहिक शक्ति की उपासना चली तब दैवी संपत्तियुक्त देवगणों को विजयादशमी के विजय प्राप्ति का अवसर देखने को मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 से आजतक इसी दैवी सम्पदयुक्त, शक्तिसंपन्न, संगठित समाज की निर्मिति में लगा है। समाज में वातावरण निर्मिति से आचरण का परिवर्तन होता है, उसी के बल पर व्यवस्था परिवर्तन यशस्वी होता है। जितना बड़ा अपना समाज है, जितनी गंभीर व जटिल अंतर्गत व बाह्य समस्याओं का घेरा उस पर लगा है और जितने भव्य प्रयोजन की सिद्धी के लिए अपने इस राष्ट्र का अस्तित्व है, उसको देखते हुए अभी बहुत कार्य होना बाकी है। अपने राष्ट्रीय स्वत्व-हिन्दुत्व का गौरव मन में जगाकर उस गौरव के अनुरूप सद्गुणों को अपने स्वभाव का अंग बनाकर, देश के लिए संगठित होकर जीवन जीने वाले व प्रसंगोपात्त प्राणसर्वस्व अर्पण करने की तैयारी रखने वाले व्यक्तियों के निर्माण का यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने जीवन के प्रारंभ से करते आया है। सभी को अपने अंदर समा लेने वाला, सर्व समावेशक, सर्वव्यापक सत्य ही हिंदुत्व है। वहीं अपना स्वत्व है। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा गांव-गली-मोहल्ले में घर-घर तक पहुंचानी पड़ेगी।

उन्होंने कहा कि अपने इस सनातन राष्ट्र के उस स्वरूप के खड़े होने की प्रतीक्षा सारा विश्व कर रहा है, जिसके बारे में किसी कवि ने यह कहा है-

‘‘विश्व का हर देश जब भी, दिग्भ्रमित हो लड़खड़ाया,

सत्य की पहचान करने, इस धरा के पास आया।

भूमि यह हर दलित को पुचकारती, हर पतित को उद्धारती,

 धन्य देश महान, धन्य हिन्दुस्थान।’’

उस महान देश की नवनिर्मिति में सहयोग का आवाहन करता हुआ मैं अपना निवेदन समाप्त करता हूं।

इसके पूर्व कार्यक्रम के प्रारंभ में ध्वजारोहण के पश्चात मान्यवरों द्वारा शस्त्रपूजन किया गया तथा स्वयंसेवकों ने नियुद्ध,दंड-व्यायाम योग,आदि का प्रदर्शन किया। नागपुर महानगर संघचालक डॉ. दिलीप गुप्ता ने कार्यक्रम की प्रस्तावना तथा आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विदर्भ प्रान्त सहसंघचालक राम हरकरे तथा नागपुर महानगर सहसंघचालक लक्ष्मणराव पार्डीकर व्यासपीठ पर उपस्थित थे। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का, वरिष्ठ संघ प्रचारक रंगा हरिजी, वरिष्ठ पत्रकार मागो वैद्य, केन्द्रीय मंत्री नितीन गडकरी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष देवेन्द्र फडनविस के साथ ही नगर के गणमान्य नागरिक भारी संख्या में उपस्थित थे।

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने शनिवार, 11 अक्टूबर को यहां विराट पुरूष नाना जी देशमुख नामक ग्रंथावली का विमोचन किया. यह ग्रंथ दीनदयाल अनुसंधान संस्‍थान द्वारा छह अंकों में संकलित किया गया है, जो नानजी देशमुख की रचनाओं का संकलन है.

इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने नानाजी देशमुख की शक्ति, अभियान और राष्‍ट्र-निर्माण एवं सामाजिक कल्‍याण के प्रति उनकी वचनबद्धता की सराहना की. उन्‍होंने कहा कि उनके प्रयासों की बदौलत ही ”शिशु मंदिर”, जिसकी शुरुआत गोरखपुर में की गई थी, देशभर में शिक्षा का एक विख्‍यात संस्‍थान बना. उन्‍होंने राजनीतिक सहमति विकसित करने की नानाजी की क्षमता की भी सराहना की.

प्रधानमंत्री ने कहा कि श्री देशमुख ने 60 वर्ष की आयु में राजनीति से संन्‍यास लेते हुए अपना समूचा जीवन ग्रामीण विकास के प्रति समर्पित कर दिया था. श्री मोदी ने यह भी याद दिलाया कि देशमुख से प्रेरित होकर अनेक युवाओं ने सामाजिक उत्‍थान के प्रति अपने को समर्पित कर दिया था.

श्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि नानाजी ने अनेक प्रसिद्ध उद्योगपतियों को भी समाज के लिये काम करने के लिये प्रेरित किया था. उन्‍होंने कहा कि नानाजी का विचार था कि ”विज्ञान सार्वभौमिक हो सकता है लेकिन प्रौद्योगिकी अनिवार्य रूप से स्‍थानीय होनी चाहिये.

प्रधानमंत्री ने कहा कि ”विराट पुरूष नानाजी” नामक ग्रंथ भारत की भावी पीढि़यों को राष्‍ट्र निर्माण में योगदान के लिये प्रेरित करेगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक का शुभारम्भ लखनऊ में हुआ | जिसमे संघ व संघ के अनुषांगिक संगठनो के 390 पदाधिकारी भाग ले रहे है | इनमे संघ के सभी प्रान्तों के प्रान्त संघचालक, सहप्रान्त संघचालक व प्रान्त प्रचारक है |

 

इस अवसर पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए नवनिर्वाचित सरकार पर संघ के सह-सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबले जी ने कहा कि चुनाव के समय दिए वचन पूर्ण करने की वरीयता सरकार को तय करनी है | सामान्य जन का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के कार्य को वरीयता देना स्वाभाविक ही है |

 

सह-सरकार्यवाह जी ने संघ के विभिन्न प्राकृतिक आपदाओ में स्वयंसेवकों की भूमिका पर बोलते हुए कहा कि बचाव एवं राहत कार्य के समय जाती या मजहब न देखकर जो त्रस्त है, उनकी सहायता करने की संघ की परंपरा है | कश्मीर घाटी, जम्मू, मेघालय, विशाखपट्टनम सभी जगह स्वयंसेवक तत्परता से बचाव एवं राहत कार्य में जुट गए थे |

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