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तानाजी मालुसरे शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और वीर निष्ठावान सरदार थे । उनके पुत्र के विवाह की तैयारी हो रही थी । चारों ओर उल्लास का वातावरण था। तभी शिवाजी महाराज का संदेश उन्हें मिला – माता जीजाबाई ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक कोढ़ाणा दुर्ग पर मुसलमानों के हरे झंडे को हटा कर भगवा ध्वज नहीं फहराया जाता तब तक वे अन्न – जल ग्रहण नहीं करेंगी । तुम्हें सेना लेकर इस दुर्ग पर आक्रमण करना है और अपने अधिकार में लेकर भगवा ध्वज फहराना है.

स्वामी का संदेश पाकर तानाजी ने सबको आदेश दिया – विवाह के बाजे बजाना बन्द करों , युद्ध के बाजे बजाओं । अनेक लोगों ने तानाजी से कहा – अरे , पुत्र का विवाह तो हो जाने दो , फिर शिवाजी के आदेश का पालन कर लेना । परन्तु , तानाजी ने ऊँची आवाज में कहा – नहीं , पहले कोण्डाणा दुर्ग का विवाह होगा , बाद में पुत्र का विवाह । यदि मैं जीवित रहा तो युद्ध से लौटकर विवाह का प्रबंध करूँगा । यदि मैं युद्ध में काम आया तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे । बस , युद्ध निश्चित हो गया । सेना लेकर तानाजी शिवाजी के पास पुणे चल दिये उनके साथ उनका भाई तथा अस्सी वर्षीय शेलार मामा भी गए । पुणे में शिवाजी ने तानाजी से परामर्श किया और अपनी सेना उनके साथ कर दी.

दुर्गम कोढ़ाणा दुर्ग पर तानाजी के नेतृत्व में हिन्दू वीरों ने रात में आक्रमण कर दिया । भीषण युद्ध हुआ । कोढ़ाणा का दुर्गपाल उदयभानु था। इसके साथ लड़ते हुए तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए। थोड़ी ही देर में शेलार मामा के हाथों उदयभानु भी मारा गया.

सूर्योदय होते – होते कोढ़ाणा दुर्ग पर भगवा ध्वज फहर गया । शिवाजी यह देखकर प्रसन्न हो उठे । परन्तु , जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके आदेश का पालन करने में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए है , तब उनके मुख से निकल पड़ा –  “गढ़ आला पण सिंह गेला “ गढ़ तो हाथ में आया , परन्तु मेरा सिंह ( तानाजी ) चला गया । उसी दिन से कोढ़ाणा दुर्ग का नाम सिंहगढ़ हो गया.

तानाजी जैसे स्वामी भक्त वीर तथा क्षत्रपति शिवाजी जैसे वीर स्वामी को कोटि – कोटि नमन.

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स्वतन्त्र भारत में जिन महापुरुषों ने हिन्दी और भारतीय भाषाओं के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री शिवराम शंकर (दादासाहब) आप्टे का नाम उल्लेखनीय है।

2 फरवरी, 1905 को बड़ोदरा में जन्मे दादासाहब ने वेदान्त और धर्म में विशेष योग्यता (ऑनर्स) के साथ स्नातक होकर कानून की शिक्षा ली और मुम्बई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। वे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, फाली नरीमन तथा मुहम्मद अली जिन्ना जैसे वरिष्ठ वकीलों के सहायक रहे।

कुछ समय वे एक अंग्रेजी पत्रिका में सम्पादक भी रहे। दो-ढाई साल वे वीर सावरकर जी के घर पर रहे। उन दिनों अंग्रेजी अखबार भारतीय पक्ष के समाचार प्रायः नहीं छापते थे। सावरकर जी ने उनसे भारतीय मन को समझने वाली समाचार संस्था बनाने को कहा। अतः यह काम सीखने के लिए उन्होंने दो साल तक रात की पारी में यू.पी.आई. नामक समाचार संस्था में काम किया।

दादासाहब बड़े शाही स्वभाव के व्यक्ति थे। सूट, बूट, टाई, हैट तथा सिगार उनके स्थायी साथी थे। न्यायालय के बाद वे शिवाजी पार्क में जाकर बैठते थे। वहाँ संघ की शाखा लगती थी। आबा जी थत्ते, बापूराव लेले, नारायणराव तर्टे आदि उस शाखा पर आते थे। उनके सम्पर्क में आकर दादासाहब 1944 में स्वयंसेवक बने और इसके बाद तो उनका जीवन ही बदल गया।

देश स्वतन्त्र होने के बाद अंग्रेजी समाचार पत्र अब सत्ताधारी कांग्रेस की चमचागिरी करने लगे। ऐसे में दादासाहब ने हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में समाचार संकलन व वितरण करने वाली ‘हिन्दुस्थान समाचार’ नामक संस्था का निर्माण किया। उन दिनों विश्व में केवल अंग्रेजी के दूरमुद्रक (टेलीप्रिंटर) ही प्रचलित थे। दादासाहब ने 1954 में हिन्दी का दूरमुद्रक विकसित किया। इससे हिन्दी पत्रकारिता जगत में क्रान्ति आ गयी।

हिन्दुस्थान समाचार के संस्थापक के रूप में दुनिया के अनेक देशों ने उन्हें आमन्त्रित किया। विश्व में भ्रमण के दौरान उन्होंने वहाँ के हिन्दुओं की दशा का अध्ययन किया। इसी आधार पर जब 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई, तो उन्हें उसका महासचिव बनाया गया। देश-विदेश में प्रवास कर इसके विस्तार के लिए दादासाहब ने अथक प्रवास किया। इस कारण शीघ्र ही विश्व हिन्दू परिषद का काम विश्व भर में फैल गया।

दादासाहब एक अच्छे लेखक, चित्रकार तथा छायाकार भी थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें लिखीं। इनमें से ‘शकारि विक्रमादित्य’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। ‘राष्ट्रगुरु रामदास’ नामक चित्रकथा के लिए उन्होंने चित्र भी बनाये। इसी से आगे चलकर महापुरुषों के जीवन चरित्र प्रकाशित करने वाली ‘अमर चित्रकथा’ की नींव पड़ी।

दादासाहब प्रतिदिन डायरी लिखते थे। 1942 से 1979 तक की उनकी डायरियाँ भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। कानून का जानकार होने के कारण 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तथा फिर विश्व हिन्दू परिषद का संविधान बनाने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभायी।

1974 के बाद कई वर्ष उन्होंने महामंडलेश्वर स्वामी गंगेश्वरानन्द उदासीन के साथ विश्व-भ्रमण कर वेदों की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास किया। जीवन के अन्तिम वर्षों में उन्होंने स्वयं को सब बाहरी कामों से अलग कर लिया। 10 अक्तूबर, 1985 को पुणे के कौशिक आश्रम में उनका देहावसान हुआ।

76 साल जीने वाले स्टीफन हॉकिंग जब 21 की उम्र में एकियोट्रॉपिक लेटर्ल स्केलोराइसिस (एएलसी) बीमारी से ग्रस्त हुए तो डॉक्टरों ने कहा कि वो दो साल से ज्यादा नहीं जी पाएंगे. इसके बाद भी उन्होंने 55 साल और जीकर दिखाया. इस दौरान वह पूरी दुनिया में घूमे. बोल नहीं पाने के बाद भी लेक्चर दिए. ऐसे शोध किए, जिसने अंतरिक्ष को लेकर लोगों की सोच बदल डाली. उन्होंने बेस्ट सेलर किताबें भी लिखीं. वह मानवीय दिमाग की मजबूती के प्रतीक भी थे. लोग हैरान होते थे कि एक अपंग शख्स इतनी ढेर सारी चीजें कैसे कर सकता है.

मशहूर ग्रीक फिलास्फर हेरो डोट्स का कहना है, “प्रतिकूलता हमारी मजबूतियों को सामने लाती है. जब आप अपनी सबसे बड़ी चुनौती के सामने सकारात्मक होते हैं और संरचनात्मक तरीके से रिस्पांस देते हैं तो एक खास किस्म की दृढ़ता, मजबूती, साहस, चरित्र, जो आपमें ही निहित होता है. भले ही आपको उसका अहसास नहीं हो, वह आपको निखारने लगता है. “

स्टीफन हॉकिंग के जीवन की वो बातें, जिससे हम सभी लोग सीख सकते हैं

1. अपंगता से उबरने के लिए तकनीक का सहारा लें

इंटेलिजेंस में वो क्षमता होती है कि वो किसी भी बदलाव के साथ तालमेल बिठा ले. उन्होंने हमें बताया कि तकनीक किस तरह हमारा जीवन बदल सकती है. वह एक विशेष मोटर से संचालित व्हील चेयर से मूव करते थे. व्हील चेयर से जुड़े स्पीच सिंथसाइजर से बोलते थे. व्हील चेयर से लगे कंप्यूटर मॉनिटर के जरिए बहुत कुछ समझाते थे. उन्होंने कंप्यूटर तकनीक और इंटरनेट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया.

2. अपंगता कभी राह में आड़े नहीं आती वो हमेशा कहते थे, “मेरी सलाह विकलांग लोगों से है कि हमेशा जो आप करना चाहते हैं, उसपर ध्यान लगाएं, आपकी अपंगता आपको कभी बेहतर करने से नहीं रोक सकती. कभी अपनी स्थिति पर अफसोस मत करिए. अपने जोश को कम मत होने दीजिए.”

3. हमेशा जिज्ञासु बनो
वह कहते थे- “हमेशा सितारों की ओर ऊपर देखो न कि अपने पैरों की ओर. ये सोचो कि ये दुनिया ऐसी क्यों है. ब्रह्मांड कैसे है. हमेशा जिज्ञासु बने रहो”. उनमें हमेशा एक बच्चे की तरह जिज्ञासा बनी रही. वह हमेशा सवाल पूछते थे – क्यों और कैसे.

4. हमेशा विनोदी स्वाभाव के बने रहो
स्टीफन हॉकिंग ने कहा-सक्रिय दिमाग हमेशा मेरे बने रहने की वजह रहा, इससे मैं हमेशा अपना सेंस ऑफ ह्यूमर बनाए रख सका. उन्हें जानने वाले कहते हैं कि वो हमेशा मजाकिया रहे.

5. हमेशा सिद्धांतों पर टिके रहो
“कोई फिजिक्स में प्राइज लेने के इरादे से रिसर्च नहीं करता. बल्कि इस आनंद के लिए करता है कि वो नई चीज की खोज कर रहा है, जिसके बारे में इससे पहले कोई नहीं जानता है” – स्टीफन हॉकिंग.
अपने पूरे जीवन के दौरान वह हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहा करते थे कि साइंस रिसर्च के लिए न केवल फंड कम हैं बल्कि साइंस रिसर्च और ब्रिटेन में पढ़ाई के लिए फंडिंग में कुप्रबंधन की स्थिति भी. जब उन्होंने नाइटहुड की उपाधि दी गई तो उन्होंने सिद्धांतों के आधार पर इसे ठुकरा दिया.

6. कभी हार मत मानो
ब्लैक होल पर नई थ्योरी देने से कुछ महीनों पहले उनके काम की बहुत आलोचना हो रही थी लेकिन वो डटे रहे. उन्होंने जब ब्लैक होल की रिसर्च को सामने रखा, तब भी उनकी हंसी उड़ाई गई और इसे माना नहीं गया लेकिन वो अपनी बात दृढ़ रहे. बाद में इसे सबने माना.

7. समय कीमती है, इसका उपयोग करो
वह समय को बर्बाद करने से घृणा करते थे. उन्होंने समय पर रिसर्च की थी. उन्होंने अपनी ये रिसर्च इस टिप्पणी के साथ खत्म की कि घड़ी को वापस पीछे घुमाना असंभव है. संदेश साफ था कि हम पैसा बना सकते हैं लेकिन गया हुआ समय कभी वापस नहीं लौटता, इसलिए हमें बुद्धिमानी से इसका उपयोग करना चाहिए.

8. अपनी जानकारी बांटो
वो जानकारियों के आदान प्रदान में विश्वास रखते थे. मसलन उन्होंने ये दिखाया कि फिजिक्स कोई गूढ़ विषय नहीं है बल्कि एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी उसे समझना आसान है. वह ज्ञान को बांटने में विश्वास रखते थे.

साभार – News18 

भारत के स्वाधीनता संग्राम में मेरठ की 10 मई, 1857 की घटना का बड़ा महत्व है। इस दिन गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से खोलने से मना करने वाले भारतीय सैनिकों को हथकड़ी-बेड़ियों में कसकर जेल में बंद कर दिया गया। जहां-जहां यह समाचार पहुंचा, वहां की देशभक्त जनता तथा भारतीय सैनिकों में आक्रोश फैल गया।

मेरठ पुलिस कोतवाली में उन दिनों धनसिंह गुर्जर कोतवाल थे। वे परम देशभक्त तथा गोभक्त थे। अपने संपर्क के गांवों में उन्होंने यह समाचार भेज दिया। उनकी योजनानुसार हजारों लोगों ने मेरठ आकर जेल पर धावा बोलकर उन सैनिकों को छुड़ा लिया। इसके बाद सबने दूसरी जेल पर हमला कर वहां के भी सब 804 बंदी छुड़ा लिये। इससे देशभक्तों का उत्साह बढ़ गया।

इसके बाद सबने अधिकारियों के घरों पर धावा बोलकर लगभग 25 अंग्रेजों को मार डाला। इनमें लेफ्टिनेंट रिचर्ड बेलेसली चेम्बर्स की पत्नी शारलैंट चेम्बर्स भी थी। रात तक पूरे मेरठ पर देशभक्तों का कब्जा हो गया। अगले दिन यह समाचार मेरठ के दूरस्थ गांवों तक पहुंच गया। हर स्थान पर देशभक्तों ने सड़कों पर आकर अंग्रेजों का विरोध किया; पर ग्राम धौलाना (जिला हापुड़, उ.प्र.) में यह चिंगारी ज्वाला बन गयी।

इस क्षेत्र में मेवाड़ से आकर बसे राजपूतों का बाहुल्य है। महाराणा प्रताप के वंशज होने के नाते वे सब विदेशी व विधर्मी अंग्रेजों के विरुद्ध थे। मेरठ का समाचार सुनते ही उनके धैर्य का बांध टूट गया। उन्होंने धौलाना के थाने में आग लगा दी। थानेदार मुबारक अली वहां से भाग गया। उसने रात जंगल में छिपकर बिताई तथा अगले दिन मेरठ जाकर अधिकारियों को सारा समाचार दिया।

मेरठ तब तक पुनः अंग्रेजों के कब्जे में आ चुका था। जिलाधिकारी ने सेना की एक बड़ी टुकड़ी यह कहकर धौलाना भेजी कि अधिकतम लोगों को फांसी देकर आतंक फैला दिया जाए, जिससे भविष्य में कोई राजद्रोह का साहस न करे। वह इन क्रांतिवीरों को मजा चखाना चाहता था।

थाने में आग लगाने वालों में अग्रणी रहे लोगों की सूची बनाई गई। यह सूची निम्न थी – सर्वश्री सुमेरसिंह, किड्ढासिंह, साहब सिंह, वजीर सिंह, दौलत सिंह, दुर्गासिंह, महाराज सिंह, दलेल सिंह, जीरा सिंह, चंदन सिंह, मक्खन सिंह, जिया सिंह, मसाइब सिंह तथा लाला झनकूमल सिंहल।

अंग्रेज अधिकारी ने देखा कि इनमें एक व्यक्ति वैश्य समाज का भी है। उसने श्री झनकूमल को कहा कि अंग्रेज तो व्यापारियों का बहुत सम्मान करते हैं, तुम इस चक्कर में कैसे आ गये ? इस पर श्री झनकूमल ने गर्वपूर्वक कहा कि यह देश मेरा है और मैं इसे विदेशी व विधर्मियों से मुक्त देखना चाहता हूं।

अंग्रेज अधिकारी ने बौखलाकर सभी क्रांतिवीरों को 29 दिसम्बर, 1857 को पीपल के पेड़ पर फांसी लगवा दी। इसके बाद गांव के 14 कुत्तों को मारकर हर शव के साथ एक कुत्ते को दफना दिया। यह इस बात का संकेत था कि भविष्य में राजद्रोह करने वाले की यही गति होगी।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऐसी धमकियों से बलिदान की यह अग्नि बुझने की बजाय और भड़क उठी और अंततः अंग्रेजों को अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा। 1857 की क्रांति के शताब्दी वर्ष में 11 मई, 1957 को धौलाना में शहीद स्मारक का उद्घाटन भगतसिंह के सहयोगी पत्रकार रणवीर सिंह द्वारा किया गया। प्रतिवर्ष 29 दिसम्बर को हजारों लोग वहां एकत्र होकर उन क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि देते हैं।

(संदर्भ : गोधन मासिक, मई 2007)

15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों ने भारत को स्वाधीन तो कर दिया; पर जाते हुए वे गृहयुद्ध एवं अव्यवस्था के बीज भी बो गये। उन्होंने भारत के 600 से भी अधिक रजवाड़ों को भारत में मिलने या न मिलने की स्वतन्त्रता दे दी। अधिकांश रजवाड़े तो भारत में स्वेच्छा से मिल गये; पर कुछ आँख दिखाने लगे। ऐसे में जिसने इनका दिमाग सीधाकर उन्हें भारत में मिलाया, उन्हें हम लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से जानते हैं।

वल्लभभाई का जन्म 31 अक्तूबर, 1875 को हुआ था। इनके पिता श्री झबेरभाई पटेल ग्राम करमसद (गुजरात) के निवासी थे। उन्होंने भी 1857 में रानी झाँसी के पक्ष में युद्ध किया था। इनकी माता लाड़ोबाई थीं।
बचपन से ही ये बहुत साहसी एवं जिद्दी थे। एक बार विद्यालय से आते समय ये पीछे छूट गये। कुछ साथियों ने जाकर देखा, तो ये धरती में गड़े एक नुकीले पत्थर को उखाड़ रहे थे। पूछने पर बोले – इसने मुझे चोट पहुँचायी है, अब मैं इसे उखाड़कर ही मानूँगा। और वे काम पूरा कर ही घर आये।

एक बार उनकी बगल में फोड़ा निकल आया। उन दिनों गाँवों में इसके लिए लोहे की सलाख को लालकर उससे फोड़े को दाग दिया जाता था। नाई ने सलाख को भट्ठी में रखकर गरम तो कर लिया; पर वल्लभभाई जैसे छोटे बालक को दागने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। इस पर वल्लभभाई ने सलाख अपने हाथ में लेकर उसे फोड़े में घुसेड़ दिया। खून और मवाद देखकर पास बैठे लोग चीख पड़े; पर वल्लभभाई ने मुँह से उफ तक नहीं निकाली।

साधारण परिवार होने के कारण वल्लभभाई की शिक्षा निजी प्रयास से कष्टों के बीच पूरी हुई। अपने जिले में वकालत के दौरान अपनी बुद्धिमत्ता, प्रत्युत्पन्नमति तथा परिश्रम के कारण वे बहुत प्रसिद्ध हो गये। इससे उन्हें धन भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुआ। इससे पहले उनके बड़े भाई विट्ठलभाई ने और फिर वल्लभभाई ने इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की।

1926 में वल्लभभाई की भेंट गांधी जी से हुई और फिर वे भी स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़े। उन्होंने बैरिस्टर वाली अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी और स्वदेशी रंग में रंग गये। बारडोली के किसान आन्दोलन का सफल नेतृत्व करने के कारण गांधी जी ने इन्हें ‘सरदार’ कहा। फिर तो यह उपाधि उनके साथ ही जुड़ गयी। सरदार पटेल स्पष्ट एवं निर्भीक वक्ता थे। यदि वे कभी गांधी जी से असहमत होते, तो उसे भी साफ कह देते थे। वे कई बार जेल गये। 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में उन्हें तीन वर्ष की सजा हुई।

स्वतन्त्रता के बाद उन्हें उपप्रधानमन्त्री तथा गृहमन्त्री बनाया गया। उन्होंने केन्द्रीय सरकारी पदों पर अभारतीयों की नियुक्ति रोक दी। रेडियो तथा सूचना विभाग का उन्होंने कायाकल्प कर डाला। गृहमन्त्री होने के नाते रजवाड़ों के भारत में विलय का विषय उनके पास था। सभी रियासतें स्वेच्छा से भारत में विलीन हो गयीं; पर जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ तथा हैदराबाद ने टेढ़ा रुख दिखाया। सरदार की प्रेरणा से जूनागढ़ में जन विद्रोह हुआ और वह भारत में मिल गयी। हैदराबाद पर पुलिस कार्यवाही कर उसे भारत में मिला लिया गया।

जम्मू कश्मीर का मामला प्रधानमन्त्री नेहरु जी ने अपने हाथ में रखा।  15 दिसम्बर, 1950 को भारत के इस महान सपूत का देहान्त हो गया।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति के निर्माण एवं विकास में जिनकी प्रमुख भूमिका रही है, उन श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस का जन्म 11 दिसम्बर, 1915 को नागपुर में हुआ था। वे बालासाहब के नाम से अधिक परिचित हैं। वे ही आगे चलकर संघ के तृतीय सरसंघचालक बने।

बालासाहब ने 1927 में शाखा जाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका सम्पर्क डा. हेडगेवार से बढ़ता गया। उन्हें मोहिते के बाड़े में लगने वाली सायं शाखा के ‘कुश पथक’ में शामिल किया गया। इसमें विशेष प्रतिभावान छात्रों को ही रखा जाता था। बालासाहब खेल में बहुत निपुण थे। कबड्डी में उन्हें विशेष मजा आता था; पर वे सदा प्रथम श्रेणी पाकर उत्तीर्ण भी होते थे।

बालासाहब देवरस बचपन से ही खुले विचारों के थे। वे कुरीतियों तथा कालबाह्य हो चुकी परम्पराओं के घोर विरोधी थे। उनके घर पर उनके सभी जातियों के मित्र आते थे। वे सब एक साथ खाते-पीते थे। प्रारम्भ में उनकी माताजी ने इस पर आपत्ति की; पर बालासाहब के आग्रह पर वे मान गयीं।

कानून की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने नागपुर के ‘अनाथ विद्यार्थी वसतिगृह’ में दो वर्ष अध्यापन किया। इन दिनों वे नागपुर के नगर कार्यवाह रहे। 1939 में वे प्रचारक बने, तो उन्हें कोलकाता भेजा गया; पर 1940 में डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद उन्हें वापस नागपुर बुला लिया गया। 1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो उसके विरुद्ध सत्याग्रह के संचालन तथा फिर समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क कर उनके माध्यम से प्रतिबन्ध निरस्त कराने में बालासाहब की प्रमुख भूमिका रही।

1940 के बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। इस दौरान उन्होंने नागपुर के काम को आदर्श रूप में खड़ा किया। देश भर के संघ शिक्षा वर्गों में नागपुर से शिक्षक जाते थे। नागपुर से निकले प्रचारकों ने देश के हर प्रान्त में जाकर संघ कार्य खड़ा किया।

1965 में वे सरकार्यवाह बने। शाखा पर होने वाले गणगीत, प्रश्नोत्तर आदि उन्होंने ही शुरू कराये। संघ के कार्यक्रमों में डा0 हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के चित्र लगते हैं। बालासाहब के सरसंघचालक बनने पर कुछ लोग उनका चित्र भी लगाने लगे; पर उन्होंने इसे रोक दिया। यह उनकी प्रसिद्धि से दूर रहने की वृत्ति का ज्वलन्त उदाहरण है।

1973 में श्री गुरुजी के देहान्त के बाद वे सरसंघचालक बने। 1975 में संघ पर लगे प्रतिबन्ध का सामना उन्होंने धैर्य से किया। वे आपातकाल के पूरे समय पुणे की जेल में रहे; पर सत्याग्रह और फिर चुनाव के माध्यम से देश को इन्दिरा गांधी की तानाशाही से मुक्त कराने की इस चुनौती में संघ सफल हुआ। मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक उन्होंने यह दायित्व निभाया।

इस दौरान उन्होंने संघ कार्य में अनेक नये आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सेवा बस्तियों में चलने वाले सेवा के कार्य हैं। इससे वहाँ चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गयी थी। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। मीनाक्षीपुरम् कांड के बाद एकात्मता यात्रा तथा फिर श्रीराम मंदिर आंदोलन के दौरान हिन्दू शक्ति का जो भव्य रूप प्रकट हुआ, उसमें इन सब संगठनों के काम और प्रभाव की व्यापक भूमिका है।

जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तो उन्होंने प्रमुख कार्यकर्ताओं से परामर्श कर यह दायित्व मा0 रज्जू भैया को सौंप दिया। 17 जून, 1996 को उन्होंने अन्तिम श्वास ली। उनकी इच्छानुसार उनका दाहसंस्कार रेशीमबाग की बजाय नागपुर में सामान्य नागरिकों के शमशान घाट में किया गया।

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वीर नारायण सिंह का जन्म सन् 1795 में सोनाखान के जमींदार रामसाय के हर हुआ था। वे बिंझवार आदिवासी समुदाय के थे, उनके पिता ने 1818-19 के दौरान अंग्रेजों तथा भोंसले राजाओं के विरुद्ध तलवार उठाई लेकिन कैप्टन मैक्सन ने विद्रोह को दबा दिया। इसके बाद भी बिंझवार आदिवासियों के सामर्थ्य और संगठित शक्ति के कारण जमींदार रामसाय का सोनाखान क्षेत्र में दबदबा बना रहा, जिसके चलते अंग्रेजों ने उनसे संधि कर ली थी। देशभक्ति और निडरता वीर नारायण सिंह को पिता से विरासत में मिली थी। पिता की मृत्यु के बाद 1830 में वे सोनाखान के जमींदार बने।

स्वभाव से परोपकारी, न्यायप्रिय तथा कर्मठ वीर नारायण जल्द ही लोगों के प्रिय जननायक बन गए। 1854 में अंग्रेजों ने नए ढंग से कर (Tax)  लागू किये, इसे जनविरोधी बताते हुए वीर नारायण सिंह ने इसका भरसक विरोध किया। इससे रायपुर के तात्कालीन डिप्टी कमिश्नर इलियट उनके घोर विरोधी हो गए ।

1856 में छत्तीसगढ़ में भयानक सूखा पड़ा था, अकाल और अंग्रेजों द्वारा लागू किए कानून के कारण प्रांत वासी भुखमरी का शिकार हो रहे थे। कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था। वीर नारायण ने उससे अनाज गरीबों में बांटने का आग्रह किया लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने माखन के गोदाम के ताले तुड़वा दिए और अनाज निकाल ग्रामीणों में बंटवा दिया। उनके इस कदम से नाराज ब्रिटिश शासन ने उन्हें 24 अक्टूबर 1856 में संबलपुर से गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया।

1857 में जब स्वतंत्रता की लड़ाई तेज हुई तो प्रांत के लोगों ने जेल में बंद वीर नारायण को ही अपना नेता मान लिया और समर में शामिल हो गए। उन्होंने अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ बगावत करने की ठान ली थी। नाना साहब द्वारा उसकी सूचना रोटी और कमल के माध्यम से देश भर की सैनिक छावनियों में भेजी जा रही थी। यह सूचना जब रायपुर पहुँची, तो सैनिकों ने कुछ देशभक्त जेलकर्मियों के सहयोग से कारागार से बाहर तक एक गुप्त सुरंग बनायी और नारायण सिंह को मुक्त करा लिया।

जेल से मुक्त होकर वीर नारायण सिंह ने 500 सैनिकों की एक सेना गठित की और 20 अगस्त, 1857 को सोनाखान में स्वतन्त्रता का बिगुल बजा दिया। इलियट ने स्मिथ नामक सेनापति के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना भेज दी। पर नारायण सिंह ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं। उन्होंने सोनाखान से अचानक बाहर निकल कर ऐसा धावा बोला कि अंग्रेजी सेना को भागते भी नहीं बना; पर दुर्भाग्यवश सोनाखान के आसपास के अनेक जमींदार अंग्रेजों से मिल गये। इस कारण नारायण सिंह को पीछे हटकर एक पहाड़ी की शरण में जाना पड़ा। अंग्रेजों ने सोनाखान में घुसकर पूरे नगर को आग लगा दी।

नारायण सिंह में जब तक शक्ति और सामर्थ्य रही, वे छापामार प्रणाली से अंग्रेजों को परेशान करते रहे। काफी समय तक यह गुरिल्ला युद्ध चलता रहा; पर आसपास के जमींदारों की गद्दारी से नारायण सिंह फिर पकड़े गये और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। कैसा आश्चर्य कि जनता ने जिसे राजा के रूप में अपने हृदय मन्दिर में बसाया, उस पर राजद्रोह का मुकदमा ? पर अंग्रेजी शासन में न्याय का नाटक ऐसे ही होता था।

मुकदमे में वीर नारायण सिंह को मृत्युदंड दिया गया। 10 दिसंबर 1857 को ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सरेआम तोप से उड़ा दिया, स्वातंत्र्य प्राप्ति के बाद वहाँ ‘जय स्तम्भ’ बनाया गया, जो आज भी छत्तीसगढ़ के उस वीर सपूत की याद दिलाता है।

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भारत के एक होमियोपैथ चिकित्सक, समाजसुधारक, तथा वैज्ञानिक चेतना के प्रसारक नेता थे।  महेंद्रलाल सरकार का जन्म 2 नवंबर 1833 को हुआ था. जहां भारत में आज भी अंग्रेजी दवाईयों का दबदबा है, वहां उन्होंने अंग्रेजी दवाइयों के सामने होम्योपैथी को बढ़ावा दिया. वह मानते थे कि जो असर होम्योपैथी दवाइयों में हैं, वो किसी अंग्रेजी दवा में नहीं है. आज भी ऐसी कई बीमारियां है जिनका इलाज होम्योपैी दवाइयों से किया जाता है.

उन्होंने साल 1876 में फादर यूजेन लफॉ के साथ मिलकर इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस की नींव रखी. यह देश का सबसे पुराना रिसर्च इंस्टीट्यूट है.  वे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रामकृष्ण परमहंस और त्रिपुरा के महाराजा जैसे दिग्गजों के डॉक्टर थे. उन्हें कई बार कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई विषयों पर लेक्चर देने का मौका मिला.

ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन की एक बैठक में होम्योपैथी को पश्चिमी इलाज से बेहतर बताया था. उन्होंने दवाओं से जुड़कर पारंपरिक यूरोपीय अध्ययन करने के बावजूद होम्योपैथी में ज्यादा यकीन दिखाया.

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15 अगस्त 1947 को जब भारत ब्रितानवी हुकूमत की दासता से आजाद हुआ था तब किसने कल्पना की होगी कि संसदीय लोकतंत्र अपनाकर देश दुनिया की सबसे बड़ी चुनाव प्रक्रिया वाला राष्ट्र बन जाएगा. वास्तव में आजादी के बाद भारत का पहला आम चुनाव इसी रोमांचक के सामूहिक मनोविज्ञान में संपन्न हुआ था. पहले आम चुनाव में लोकसभा की 497 तथा राज्य विधानसभाओं की 3,283 सीटों के लिए भारत के 17 करोड़ 32 लाख 12 हजार 343 मतदाताओं का पंजीयन हुआ था. इनमें से 10 करोड़ 59 लाख लोगों ने, जिनमें करीब 85 फीसद निरक्षर थे, अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करके पूरे विश्व को आश्चर्य में डाल दिया था.

25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक यानी करीब चार महीने चली उस चुनाव प्रक्रिया ने भारत को एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा किया. यह अंग्रेजों द्वारा लूटा-पीटा और अनपढ़ बनाया गया कंगाल देश जरूर था, लेकिन इसके बावजूद इसने स्वयं को विश्व के घोषित लोकतांत्रिक देशों की कतार में खड़ा कर दिया.

25 अक्टूबर, 1951 को जैसे ही पहला वोट हिमाचल प्रदेश की चिनी तहसील में पड़ा, नए युग की शुरुआत हो गई. आजादी के संघर्ष के कारण देश के आम जनमानस में तो कांग्रेस का ही नाम बैठा था. इसलिए कांग्रेस ने 364 सीटें जीत कर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीटें जीत कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी.

आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी को 12, आचार्य जेबी कृपलानी के नेतृत्व वाली किसान मजदूर प्रजा पार्टी को नौ, हिंदू महासभा को चार, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ को तीन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को तीन और शिड्यूल कास्ट फेडरेशन को दो सीटें मिलीं.

कांग्रेस ने कुल 4,76,65,951 यानी 44.99 वोट हासिल किए. उस वक्त एक निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक सीटें भी हुआ करती थीं, लिहाजा 489 स्थानों के लिए 401 निर्वाचन क्षेत्रों में ही चुनाव हुआ. 1960 से इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया. एक सीटों वाले 314 निर्वाचन क्षेत्र थे. 86 निर्वाचन क्षेत्रों में दो सीटें और एक क्षेत्र में तीन सीटें थीं. दो सदस्य आंग्ल-भारतीय समुदाय से नामांकित हुए थे.

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ध्येय मंदिर के पुजारी सोहन सिंह जी – जन्म दिवस 18 अक्तूबर

संघ कार्य के लिए जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ प्रचारक श्री सोहन सिंह जी का जन्म 18 अक्तूबर, 1923 (आश्विन शुक्ल 9, वि.सं. 1980) को ग्राम हर्चना (जिला बुलंदशहर, उ.प्र.) में चैधरी रामसिंह जी के घर में हुआ था। छह भाई-बहिनों में वे सबसे छोटे थे। 16 वर्ष की अवस्था में वे स्वयंसेवक बने। 1942 में बी.एस-सी. करते ही उनका चयन भारतीय वायुसेना में हो गया; पर उन्होंने नौकरी की बजाय प्रचारक कार्य को स्वीकार किया।

1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की विफलता से युवक बहुत उद्विग्न थे। उन दिनों सरसंघचालक श्री गुरुजी युवकों को देश के लिए समय देने का आग्रह कर रहे थे। उनकी प्रेरणा से दिल्ली के 80 युवक प्रचारक बने। उनमें सोहन सिंह जी भी थे। इससे पूर्व वे दिल्ली में सायं शाखाओं के मंडल कार्यवाह थे। 1943, 44 और 45 में उन्होंने तीनों संघ शिक्षा वर्ग पूरे किये।

प्रचारक बनने पर उन पर क्रमशः करनाल, रोहतक, झज्जर और अम्बाला में तहसील; करनाल जिला, हरियाणा संभाग और दिल्ली महानगर का काम रहा। 1973 में उन्हें जयपुर विभाग का काम देकर राजस्थान भेजा गया। आपातकाल में वे वहीं गिरफ्तार हुए। इसके बाद वे 10 वर्ष राजस्थान प्रांत प्रचारक; 1987 से 96 तक दिल्ली में सहक्षेत्र और फिर क्षेत्र प्रचारक; 2000 तक धर्म जागरण विभाग के राष्ट्रीय प्रमुख और फिर 2004 तक उत्तर क्षेत्र के प्रचारक प्रमुख रहे। इसके बाद अस्वस्थता के कारण उन्होंने सब दायित्वों से मुक्ति ले ली।

1948 के प्रतिबंध काल में भी वे जेल गये थे। उन्हें जिस कोठरी में रखा गया, सर्दी में उसमें पानी भर दिया गया। ऐसी यातनाओं के बाद भी वे अडिग रहे। 1965 के युद्ध के समय रात में दस बजे एक सैन्य अधिकारी ने संदेश भेजा कि अतिशीघ्र सौ यूनिट रक्त चाहिए। उन दिनों फोन नहीं थे; पर सोहन सिंह जी ने सुबह से पहले ही 500 लोग सैनिक अस्पताल में भेज दिये।

1973 से पूर्व, हरियाणा में संभाग प्रचारक रहते हुए वे अनिद्रा और स्मृतिलोप से पीडि़त हो गये। इस पर राजस्थान में प्रान्त प्रचारक ब्रह्मदेव जी उन्हें जयपुर ले गये। वहां के आयुर्वेदिक इलाज से वे ठीक तो हुए; पर कमजोरी बहुत अधिक थी। आपातकाल में जब वे जेल गये, तो कार्यकर्ताओं ने उनकी खूब मालिश की। इससे वे पूर्णतः स्वस्थ हुए। जेल में उनके कारण प्रशिक्षण वर्ग जैसा माहौल बना रहता था। इससे अन्य दलों के लोग भी बहुत प्रभावित हुए।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि हर आयु, वर्ग और स्तर के कार्यकर्ता उनसे खुलकर अपनी बात कह सकते थे। किसी भी विषय पर निर्णय करने से पूर्व वे धैर्य से सबकी बात सुनते थे। वे कार्यकर्ताओं को भाषण की बजाय अपने व्यवहार से समयपालन और जिम्मेदारी का अहसास कराते थे। राजस्थान के एक वर्ग में घड़े भरने की जिम्मेदारी जिस कार्यकर्ता पर थी, वह थकान के कारण ऐसे ही सो गया। सोहन सिंह जी ने रात में निरीक्षण के दौरान जब यह देखा, तो उसे जगाने की बजाय, खुद बाल्टी लेकर घड़े भर दिये। वे साहसी भी इतने थे कि लाठी लेकर 10-12 लोगों से अकेले ही भिड़ जाते थे।

सोहन सिंह जी का जीवन बहुत सादा था। राजस्थान और दिल्ली में भा.ज.पा. के राज में भी उन्होंने कभी किसी नेता या शासन का वाहन प्रयोग नहीं किया। वे रेलगाड़ी में प्रायः साधारण श्रेणी में ही चलते थे। वृद्धावस्था में भी जब तक संभव हुआ, वे कमरे की सफाई तथा कपड़े स्वयं धोते थे। कपड़े प्रेस कराने में भी उनकी रुचि नहीं थी। वे सामान बहुत कम रखते थे। यदि कोई उन्हें वस्त्रादि भेंट करता, तो वे उसे दूसरों को दे देते थे। दिल्ली में उन्होंने अपने कमरे में ए.सी. भी नहीं लगने दिया। बीमारी में भी अपने लिए कोई विशेष चीज बने, वे इसके लिए मना करते थे। चार जुलाई, 2015 की रात में दिल्ली कार्यालय पर ही उनका निधन हुआ। मृत्यु के बाद उनके नेत्रदान कर दिये गये।

(संदर्भ : पांचजन्य का ‘स्मृति शेष’ अंक, 18.7.2015)