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रांची, 10 जुलाई  : खिलाफत आंदोलन (1919-1924) भारतीय मुस्लिमों के बीच उत्पन्न हुए  एक तनाव का परिणाम था, जो प्रथम विश्व युद्ध के अंत में तुर्की ओटोमन साम्राज्य के विखंडन और तुर्की में खलीफा पद की समाप्ति की आशंका के परिणामस्वरूप प्रारम्भ हुआ था। खिलाफत आंदोलन की सर्वप्रमुख मांग खलीफा (शाब्दिकअर्थ:उत्तराधिकारी, पूरे विश्व के मुस्लिमों के मजहबी और लौकिक प्रमुख) की पुनर्स्थापना थी। इस वर्ष खिलाफत आंदोलन के सौ वर्ष होने जा रहे हैं और सौ वर्ष बाद भी यह आंदोलन अनेक प्रकार के विवादों  को प्रेरित करता है। खिलाफत आंदोलन कोई अलग थलग ऐतिहासिक घटना नहीं थी। इसे निश्चित रूप से मजहबी-किताबी स्वीकृति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी निहित थी। इसने हमारे स्वतंत्रता संग्राम को तो प्रभावित किया ही अंतत: विभाजन की प्रक्रिया को भी तीव्र किया। खिलाफत आंदोलन की प्रतिध्वनि आज तक निरंतर है।

खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन : अधिकांश भारतीयों के लिए खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के बीच के संबंध स्पष्ट नहीं हैं। पिछली कई पीढ़ियों से भारतीयों को यह बताया गया है कि असहयोग आंदोलन गांधी जी द्वारा 4 सितंबर1920 को शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य “स्व-शासन और पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था। 21 मार्च 1919 के रॉलेट एक्ट और 13 अप्रैल 1919 के जालियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ब्रिटिश सुधार प्रक्रिया से अलग हो गई। यह विकिपीडिया द्वारा प्रदान की गई जानकारी है, जो अधिकांश आधुनिक शिक्षितों के लिए ज्ञान का भंडार है!

राजनीतिक दलों से जुड़े विचारक जो स्वयं को इतिहासकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, भारतीय मानस को यही बताते रहे कि “गाँधी जी ने यह आशा की थी कि असहयोग आंदोलन को और खिलाफ़त की माँग को साथ-साथ साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख समुदाय- हिन्दू और मुसलमान एक साथ मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे। इनआंदोलनों ने निश्चय ही ऐसा लोकप्रिय उभार पैदा कर दिया था  जो औपनिवेशिक भारत में बिलकुल ही अभूतपूर्व था” (थीम्स इन इंडियन हिस्ट्री, भाग III, कक्षा 12 के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तक, एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित, पृ.350)।

यदि (अगर) कोई कांग्रेस के आधिकारिक इतिहास को पढ़ेगा, तो उसे तथ्यों से परे यह जानकारी मिलेगी कि असहयोग आंदोलन कांग्रेस का मौलिक विचार था, जिसका लक्ष्य स्वराज की प्राप्ति था जिसे स्वराज की प्राप्ति के लिए आरम्भ किया गया था (द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन नेशनल कांग्रेस, पट्टाभि सीतारमैय्या, सीडब्ल्यूसी, मद्रास, 1935, पृ. 334, 335)। यदि सत्य इतिहास की जननी है, तो इतिहासकार को यह जांचने की आवश्यकता है, कि क्या इतिहास से छेड़छाड़ की जा रही है।

खिलाफत आंदोलन का बारीकी से लेकिन निष्पक्ष विश्लेषण आवश्यक है। जब समाज में एक झूठ पर आधारित विमर्श स्थापित हो जाता है तो सत्य  भी  उसमें दब जाता है । प्राय: यह विमर्श दलीय राजनीति से प्रेरित होते हैं। खिलाफत आंदोलन इसका कोई अपवाद नहीं है।

राजनीतिक विमर्श : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर खिलाफत आंदोलन पर 25 अक्टूबर 2018 को एक लेख प्रकाशित किया गया। लेख में बताया गया,” खिलाफत आंदोलन भारत को ब्रिटिश राज से स्वयं को मुक्त कराने के लिए किये गए महत्वपूर्ण प्रयासों में से एक था… खिलाफत आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की देखरेख में हिंदुओं और मुस्लिमों का ब्रिटिश राज के विरुद्ध संयुक्त प्रयास था…यह सफलता तब और अधिक दृढ़ हुई जब महात्मा गांधी ने औपनेवेशिकों के विरुद्ध सामूहिक आक्रोश को मुखर करने के लिए संयुक्त प्रयासों के तहत खिलाफत आंदोलन के साथ असहयोग आंदोलन को एक साथ लाने का निर्णय किया… महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन को हिंदुओं और मुस्लिमों और उनके सबंधित उद्देश्यों को उनके शोषण और वर्चस्व की एक समान सत्ता के खिलाफ एक साथ लाने के एक शानदार अवसर के रूप में देखा…महात्मा गांधी ने स्वशासन के प्रस्ताव को, जिसे स्वराज के रूप में अधिक जाना जाता था, को ख़िलाफ़त से जुडी चिंताओं और मांगों के साथ जोड़ा और इन जुड़वां उद्देश्यों को पूरा करने के लिए असहयोग योजना को अपनाया…भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच एकता के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण दृष्टान्तो में से एक,खिलाफत आंदोलन द्वारा प्रदान किया गया था। यह मुख्यत: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं और खिलाफत आंदोलन के नेताओं के आपस में जुड़ने के कारण हुआ था…हिंदू-मुस्लिम सहमति का परिदृश्य महात्मा गांधी के विचार के अनुरूप था, कि ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता केवल तभी प्राप्त हो सकती थी, यदि हिंदू और मुस्लिम दोनों ने एक साथ काम किया और सामूहिक रूप से अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया ” (https://www.inc.in/en/in-focus/the-khilafat-movement-a-landmark-movement-in-indias-journey-to-freedom)|   

अकादमिक विमर्श : कुछ मिथ्या विमर्श इतिहासकारों द्वारा प्रचारित किए गए हैं, जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। स्कॉटिश इतिहासकार सर हैमिल्टन गिब (1895-1971) ने खिलाफत आंदोलन को बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद की एक प्रतिक्रिया बताया है। वह लिखते हैं, “दुनिया के सभी मुस्लिमों के बीच, भारत में ही  इस्लाम के अंतर्राष्ट्रीय पहलू पर जोर दिया गया, लेकिन इसमें उनका उद्देश्य हिंदू राष्ट्रवाद के सामने एक रक्षात्मक रवैया अपनाना था ” (विदर इस्लाम? ए सर्वे ऑफ़ मॉडर्न मूवमेंट इन द मॉस्लेम वर्ल्ड, 1932, रूटलेज, पृ.73)।

कभी-कभी, इतिहासकारों का विमर्श फूहड़ता के स्तर तक गिर जाता है। कनाडाई इस्लामी इतिहासकार विल्फ्रेड केंटवेल स्मिथ (1916-2000) उनकी पुस्तक ‘मॉर्डन इस्लाम इन इंडिया : ए सोशल एनालिसिस’ (मिनर्वा बुक शॉप, लाहौर) में लिखते हैं “ ख़िलाफ़त’शब्द का अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में एक अलग ही अर्थ है। लोगों ने सोचा कि यह ‘ख़िलाफ़’ शब्द उर्दू से आया है जिसका अर्थ ‘विरुद्ध’ या ‘विरोध’ है और इसलिए उन्होंने इसका मतलब सरकार के विरोध में लिया। वे हमेशा की तरह इस्लाम के प्रति तो जागरूक थे; लेकिन वे मुहम्मद और ओटोमन तुर्की साम्राज्य के बारे में शायद ही जानते थे ”(पृ. 234)। डी.जी.तेंदुलकर ने अपने ‘महात्मा: लाइफ ऑफ़ मोहनदास करमचंद गांधी’ (खंड 2, पृ. 47) में इस मूढ़ता को दोहराया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा प्रकाशित और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा विमोचित,‘सेंटेनरी हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन नेशनल कांग्रेस 1885-1985’ में भी (अकादमिक फाउंडेशन, दिल्ली, 1985, खंड 2, पृ. 66) यही बात दोहरायी गई। यह आश्चर्य की बात नहीं कि इस खंड और ग्रंथावली के संपादक क्रमशः रविंद्र कुमार और बीएन पांडे थे, जो दोनों ही नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के अग्रणी थे। अकादमिक कुतर्क का एक उदाहरण यह भी है कि, खिलाफत आंदोलन को अखिल-इस्लाम के बजाय अखिल-भारतीय इस्लाम के रूप में चित्रित किया गया है (खिलाफ़त मूवमेंट: रिलीजियस सिम्बोलिस्म एंड पोलिटिकल मोबिलाइजेशन, गेल मिनॉल्ट, कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982)। एक अन्य ‘प्रख्यात इतिहासकार’ प्रोफेसर भोजनंदन प्रसाद सिंह ‘बिहार में 1920-22 में खिलाफत और असहयोग आंदोलन के धर्म निरपेक्ष  पहलुओं की खोज’ पर जोर देते हैं (प्रोसीडिंग्स ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, खंड 63, 2002, पृ. 615-621)। उन्होंने आरोप लगाया कि “उसके धार्मिक पहलुओं पर जोर देने और उसके धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कम करके आंकने के उद्देश्य से जानबूझकर भ्रम फैलाया गया।आधिकारिक तौर पर, आंदोलन का नामोल्लेख तक भी सुविधापूर्वक हटा दिया गया है… वह यह बताने के लिए रफीक ज़कारिया का लेख उद्धृत करते हैं, कि उन्होंने  कैसे अपने लेख ‘द ट्रूथ अबाउट द खिलाफत मूवमेंट’ (द हिंदुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली, 24 अगस्त, 1997) में भ्रम फ़ैलाने के इन प्रयासों का विरोध किया। इस ‘प्रख्यात इतिहासकार’ का मानना है कि खिलाफत आंदोलन, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की गांधीवादी रणनीति का परिणाम था ।  इसमें कुछ अन्य बिंदु  हैं जैसे  “जहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के लोग भाइयों की तरह एक साथ रहते हो, ऐसे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत का उद्देश्य लेकर गांधी के असहयोग तथा खिलाफत आंदोलन धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में जाने गए”…और  “‘अहिंसा’ असहयोग और खिलाफत आंदोलन की एक अनिवार्य शर्त थी…”

इतिहास से मुकरना : खिलाफत आंदोलन को एक ऐसी आकस्मिक घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसकी कोई धार्मिक या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नहीं थी । अब खिलाफत आंदोलन के  हिंदुविरोधी स्वरूप को दूर करने की कोशिशें की जा रही है। उदाहरण के लिए, गार्गी चक्रवर्ती ‘मेनस्ट्रीम’ (खंड 53 क्रमांक 6, नई दिल्ली, 25 जनवरी, 2020) में लिखती हैं, “अखिल-इस्लामवाद की विचारधारा ने पश्चिमी साम्राज्यवाद के खिलाफ दुनिया भर के मुस्लिमों को एकजुट करने पर जोर दिया, पर भारत में यह तब तक एक शक्ति नहीं बन सकी जब तक कि 1911 में इटली और तुर्की के बीच युद्ध नहीं छिड़ गया। ब्रिटेन ने इटली के साथ एक गुप्त गठबंधन बनाया, इसके कारण अंग्रेजों से भारतीय मुस्लिमों का अलगाव हो गया। उन्हें लगा कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद उनकी इस्लामी संस्कृति को नष्ट करने पर तुला हुआ है। ‘इस्लाम खतरे में’ यह भय, ईसाइयत और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के खिलाफ कट्टर नफरत से भरा था, जो हिंदुओं के विरुद्ध  बिलकुल भी नहीं था।” चक्रवर्ती का लेख एक शोध पत्र था, जिसका शीर्षक था ग्लोबलाइजेशन एंड रिलिजियस डाइवर्सिटी:इश्यूज़,पर्सपेक्टिव्स एंड द रेलेवेन्स ऑफ़ गांधीयन फिलॉसफी। अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली और आरहूस यूनिवर्सिटी, डेनमार्क द्वारा 8-14 जनवरी 2020 को आयोजित एक इंटरनेशनल विंटर स्कूल में उसे प्रस्तुत किया गया। ध्यान दें कि अखिल-इस्लामवाद को अब पश्चिमी साम्राज्यवाद की प्रतिक्रिया के रूप में चित्रित करने पर जोर दिया जा रहा है।

यदि स्वघोषित धर्मनिरपेक्षतावादियों की यह हालत है, तो कट्टर इस्लामवादियों की हालत क्या होगी ? त्रिनिदाद और टोबैगो सरकार के विदेश मंत्रालय में कार्यरत अधिकारी शेख इमरान हुसैन ने 1985 में इस्लाम के मिशन के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए नौकरी छोड़ दी। वह खिलाफत आंदोलन के बारे में लिखते हैं, “ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने इस्लाम के विकल्प के रूप में यूरोपीय राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता को ‘तलवार की नोक पर’ लागू किया। हिंदू और मुस्लिम दोनों ने अंततः ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नए यूरोपीय धर्म को चुनौती दी और अपनी स्वदेशी राजनीतिक संस्कृति को बहाल करने और संरक्षित करने की मांग की… खिलाफत आंदोलन ने यूरोपीय राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था को खत्म करने की चुनौती दी जो औपनिवेशिक पश्चिम, गैर-श्वेत दुनिया पर लाद रहा था। इसलिए तुर्की खिलाफ़त को खत्म करने के लिए मुस्तफा कमाल के तुर्की के नए धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के साथ मिलकर,  ब्रिटिश शासन ने रणनीति तैयार की, जिससे खिलाफत आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम गठबंधन को नाकाम और नष्ट किया जा सके” (द रिटर्न ऑफ़ खिलाफ़त)। ध्यान दें कि कैसे खिलाफत आंदोलन को स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण और नस्लीय वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है!

अतीत से वर्तमान तक : इतिहासकारों के वेश में एक विशिष्ट विचार से जुडे विचारकों की एक प्रजाति है, जो खिलाफत आंदोलन का इस्तेमाल कर भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की आस लगाये बैठी है । ऐसे ही प्रयास के तहत प्रिंसटन विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाने वाले ज्ञानप्रकाश खिलाफत आंदोलन और नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध प्रदर्शन, के बीच समानताएं बताते हैं। वे लिखते हैं, ”भारत में आरएसएस से प्रेरित हमले का सामना करते हुए, मुस्लिम इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि वे मुस्लिम और भारतीय हैं, न कि मुस्लिम बनाम भारतीय। खिलाफत आंदोलन में मुस्लिम शिकायतों का उपयोग ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलन छेड़ने के महात्मा गांधी के प्रयत्नका स्मरण होता है, वह भी मुस्लिम और भारतीय का एक संयोजन था” (व्हाई द प्रोटेस्ट रिमाइंड अस ऑफ़ गान्धीज खिलाफत मूवमेंट, इकॉनोमिक टाइम्स, 12 जनवरी, 2020) ।  खिलाफत आंदोलन के संबंध में नया (वर्तमान) विमर्श निम्न बिंदुओं पर चलाया जा सकता है: “यह एक पीड़ित समुदाय द्वारा उनके औपनिवेशिक आकाओं के खिलाफ शुरू किया गया आंदोलन था, जो अपने गैर-मुस्लिम भाइयों को साथ लेकर महात्मा गांधी के व्यापक नेतृत्व में संचालित किया गया।” अब ‘औपनिवेशिक आकाओं’ को ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद’ से और ‘गैर-मुस्लिम भाइयों के स्थान पर’ ‘दमनकारी हिंदू ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शिकार दलितों’ से बदल दें तो आपके पास वर्तमान समय के लिए एक विषाक्त विमर्श  तैयार होजाता है । खिलाफत आंदोलन पर निर्मित इस नये विमर्श को तत्काल हटाने की आवश्यकता है। इस बात से इनकार नहीं कि आज भी खिलाफत आंदोलन की प्रासंगिकता है,क्योंकि 100 साल पहले इसे स्थापित करने वाली मानसिकता अभी भी मौजूद है। यह मानसिकता वर्तमान सभ्यता को पुन: सातवीं शताब्दी के वातावरण में ले जाने वाले मजहब द्वारा निर्देशित है । जो इतिहास को भुलाते हैं, उन्हें वही इतिहास दोहराना पड़ता है यह अवश्य सत्य है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जो इतिहास को झुठलाते हैं, उन्हें वह इतिहास दोहराने का अवसर तक नहीं मिलता। नीर-क्षीर विवेक करने का समय अब आ गया!  

                                                                                                                      क्रमश: …

देश मे आपातकाल लगाए जाने वाले काले 25 जून पर प्रतिवर्ष कुछ न कुछ लिखना मेरा प्रिय शगल रहा है। किंतु, आज जो मैं आपातकाल लिख रहा हूं, वह संभवतः इमर्जेंसी के सर्वाधिक कारुणिक कथाओं मे से एक कथा होगी।

जिस देश मे मतदान की आयु शर्त 18 वर्ष हो व चुनाव लड़ने की 21 वर्ष हो वहां 14 वर्ष के अबोध बालक को राजनैतिक अपराध में जेल में डाल देना कौतूहल के साथ साथ क्रोध व कड़वाहट उत्पन्न करता है। किंतु इस देश मे यह भी सत्य हुआ आपातकाल के दौर मे। वैसे जिन बंधुओं ने इमर्जेंसी की भयावहता बताने वाली, विनोद मेहता की पुस्तक “द संजय स्टोरी” पढ़ी होगी उन्हे आपातकाल की यह करुणापूर्ण कथा “द संतोष शर्मा स्टोरी” पढ़कर कोई आश्चर्य नहीं होगा।
इंदिरा गांधी द्वारा लिखा और उनके पुत्र संजय गांधी द्वारा क्रियान्वित किया गया आपातकाल का अध्याय स्वतंत्र भारत का सर्वाधिक भयावह, भ्रष्ट व भद्दा भाग है। 25 जून 1975 की रात्रि अचानक ही इंदिरा गांधी व उनके कानून मंत्री सिद्धार्थशंकर रे ने देश मे आपातकाल लागू करने का मसौदा बनाया, आधी रात्रि को देश के महामहिम राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद को सोते से उठाकर पढे-अनपढ़े ही हस्ताक्षर कराई गई और देश को आपातकाल के आततायी कालखंड मे धकेल दिया गया। इंदिरा जी तो नाममात्र की प्रधानमंत्री रह गई और देश की बागडोर संजय गांधी व उनकी रुखसाना सुलताना जैसी चांडाल चौकड़ी के हाथों मे आ गई।  आश्चर्य है कि आपातकाल के इस डरावने दौर मे इंदिरा जी के मंत्री देवकांत बरुआ जैसे चमचों ने ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ का बेसुरा राग भी अलापा था। 25 जून 1975 को लगाए गए इस आपातकाल के बहुत से स्याह और बदनाम पहलू हैं किंतु आज यहां एक बालक की गिरफ्तारी की चर्चा की जा रही है जिसे आपातकाल के दौरान बरती गई असंवेदनशीलता व निर्ममता की प्रतिनिधि घटना के रूप मे लिया जा सकता है।

         कहानी है एक भोपाल के एक 14 वर्षीय बालक संतोष शर्मा की जिन्हे इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के बाद गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। यूं तो इमरजेंसी के दौरान पूरे देश भर मे इंदिरा से तनिक सी भी असहमति रखने वालों का भयंकर दौर-ए-दौरा चला था किंतु इस अभियान मे एक चौदह वर्ष का अबोध बालक भी जेल पहुंच जाएगा ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा था।

      संतोष जी शर्मा बचपन से राष्ट्रवादी विचारधारा के धनी थे। पिता भारतीय मजदूर संघ के पदाधिकारी थे सो पारिवारिक वातावरण ही संघमय था। इस बाल स्वयंसेवक के साथ हुआ कुछ इस तरह कि आपातकाल लगने के बाद संतोष जी शर्मा जो उस समय नवमी कक्षा मे शिक्षारत थे ने अपने वरिष्ठ साथियों सुरेश शर्मा, अशोक गर्ग,शंभू सोनकिया, चन्द्र्भान जी, रमेश सिंह जी आदि के साथ भोपाल के चौक पर आपातकाल विरोधी प्रदर्शन किया। बस प्रदर्शन करने की देर थी कि कुछ ही समय मे पुलिस आई और सभी प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करके ले गई। दूसरे दिन सुबह सभी आंदोलनकारियों को पुलिस ने नाश्ते के समय पर 150-150 डंडे मारे, जब संतोष शर्मा का नंबर आया तो डंडे मारने वाला पुलिस कर्मचारी भी सामने छोटे से अबोध बालक को देखकर द्रवित हो गया और इस प्रकार संतोष को मात्र 15 डंडे मारकर छोड़ दिया गया। अब यह बात अलग थी कि उन 15 डंडों ने  संतोष कुमार शर्मा का चेहरा, चाल, ढाल सब कुछ बिगाड़ कर रख दिया था। खैर, संतोष शर्मा ने इस सबके बाद भी पुलिस के सामने क्षमा मांगने से इंकार कर दिया और परिणामस्वरूप वे अपने सभी साथियों के साथ भोपाल जेल भेज दिये गए। भोपाल जेल भेजें जाने के दौरान सभी को हथकड़ियां पहनाई गई, किंतु जब संतोष शर्मा के छोटे से शरीर की छोटी-छोटी कलाई मे हथकड़ी पहनाने की बात आई तो पता चला कि उसके नाप की तो हथकड़ी ही जेल प्रशसान के पास नहीं है। जो हथकड़ी संतोष शर्मा को पहनाई जाती उससे संतोष की कलाई तुरंत ही फिसलकर बाहर आ जाती। भोपाल जेल मे भी अमानवीय यातनाओं का लंबा दौर चला किंतु अपने वरिष्ठ साथियों के दृढ़ आचरण को देखकर यह अबोध बालक भी चट्टान जैसा दृढ़ रहा। अंततः बालक होने के आधार पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत कार्यवाह उत्तमचंद इसरानी ने न्यायालय मे संतोष की जमानत के कागज पेश करवाए और जमानत हो गई। लेकिन जेल से बाहर आने के बाद तो जैसे संघर्ष का दोहरा दौर प्रारंभ हो गया। पाठशाला से नाम काट दिया गया। अन्य विध्यालयों मे चक्कर मारे किंतु कोई प्रवेश देने को तैयार ण हुआ। सहपाठी, मित्र आदि सभी कन्नी काटने लगे व इंदिरा शासण के भय से इस अबोध बालक से दूरी बनाकर रखने लगे। अब पढ़ाई से तो कुछ समय के लिए संबंध टूट गया और मानस मे राष्ट्रवाद और आपातकाल का विरोध बसा ही था सो संतोष ने अपने लिए एक काम तलाश लिया और मीसा बंदियों और उनके संघर्षरत परिवारों के लिए काम करने लगे। मीसाबंदियों के परिवारों के लिए संगठन के अन्य लोगों के साथ चंदा एकत्रित करते, आटा इकट्ठा करते और उसे प्रत्येक परिवारों तक पहुंचाते। जेल मे मीसाबंदियों से मिलने हेतु उनके परिवारों की मदद भी करते। आपातकाल के ढ़ाई वर्ष समाप्त होने के बाद पढ़ाई पूरी की जाये ऐसा पुनः ध्यान मे आया तो 11 वीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा देनी पड़ी और अपना प्रिय विषय गणित छोड़कर आर्ट का विषय चुनने को मजबूर होना पड़ा। शिक्षा पूर्ण होने के बाद रोजी-रोजगार का समय आया तो आपातकाल का काला साया फिर संतोष शर्मा पर पड़ा और शासकीय नौकरी हेतु चयन होने के बाद भी आपातकाल मे जेलबंदी होने के कारण इनके चरित्र प्रमाणपत्र मे “शासकीय सेवा हेतु अयोग्य” का ठप्पा लगाया गया। फिर संघर्ष का दौर चला। फाइल इस कार्यालय से उस कार्यालय तक दो वर्षों तक चली और अंततः शासकीय नौकरी हेतु योग्य ठहराए जाने के साथ संतोष शर्मा का जीवन अंततः स्थायित्व की ओर अग्रसर हो पाया।     

Praveen Gugnani, guni.pra@gmail.com 9425002270  

1962  से 1967 वाला  हठधर्मी चीन भारत के प्रति 1998 मे सुधरा था और इसे सुधारा था पूर्व  प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जी ने, जो कि भारत चीन संबन्धो के सच्चे वास्तुकार कहे जाते हैं। वर्तमान मे भारत चीन सम्बंध मे जो भी सत्व है वह 1998 के परमाणु विस्फोट से लेकर 2003 तक के अटलबिहारी शासन की ही देन है।  यह बात भारत ही नहीं चीन भी स्वीकारता है। चीन यह भी स्वीकारता है कि यदि चीन के प्रति पंडित नेहरू की गलतियों को सुधारने  वाले अटल अभियान का सच्चा उत्तराधिकारी भारत को नरेंद्र मोदी के रूप मे मिल गया है। 2004 से लेकर 2014 तक का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कालखंड पुनः चीन के भारत पर हावी होने का दशक रहा। मनमोहन की कमजोर केंद्र सरकार ने चीन को अनावश्यक ही दसियों अवसरों पर भारत के प्रति आक्रामक होने का अवसर दिया। इस मध्य अनेकों गलतियां हुई जिनसे भारत चीन सम्बन्धों मे चीन के हावी होने का वातावरण बना।

      मई 2020 का अंतिम सप्ताह भारत-चीन-नेपाल-पाकिस्तान के चतुष्कोण मे सदैव स्मरणीय रहेगा।  मई प्रारंभ से ही लद्दाख सीमा पर चीन ने अपनी नीयत बिगाड़ ली थी।  चीन ने कोरोना वायरस को फैलाने के विश्व भर से अपने ऊपर लगते आरोपों के मध्य चीन ने भारत को घेरने की कूटनीति मे नेपाल व पाकिस्तान का सहारा लिया। भारत ने चीन नेपाल पाकिस्तान के इस संयुक्त हमले को अपनी राजनयिक कौशल से छिन्न भिन्न कर दिया है। लद्दाख मे भारत चीन सीमा विवाद मे ये अंततः ये तीनों ही देश अपने कदम वापिस लेते दिखाई दिये। चीन ने भारत स्थित अपने दूतावास से दार्शनिक प्रकार के शांति संदेश दिये। नेपाल ने नक्शा विवाद मामले में विधेयक वापस ले लिया और भारत नेपाल सीमा विवाद पर चुप्पी साध ली। भारत ने अपनी सेना को लद्दाख मोर्चे पर तैनात करना प्रारम्भ करके जो सख्त संदेश व दृढ़ मानस बताया उसे चीन ने तुरंत ही समझ लिया और कहा – चाइनीज ड्रैगन और भारतीय हाथी एक साथ नृत्य कर सकते हैं।  सर्वाधिक सुखकर विषय नेपाली संसद मे भारत को मिले समर्थन का दिखना रहा जिसमें अंततः संसद मे प्रस्तुत नक्शा नेपाल सरकार ने वापिस ले लिया। भारत नेपाल मे तब तनाव आ गया था जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे को धारचुला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल ने इस सड़क के उद्घाटन पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया था कि यह नेपाली सीमा से होकर जाती है। भारत ने नेपाल के दावे को खारिज करते हुए कहा था कि सड़क पूरी तरह से उसकी सीमा में है। नेपाल की इस भूमिका के पीछे चीन का हाथ माना जा रहा था क्योंकि ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी की नेपाल सरकार  को चीन का समर्थक माना जाता है। लद्दाख मे भारत चीन तनाव व भारत नेपाल के इस कटुक संवाद के मध्य चीन के पिछलग्गू पाकिस्तान ने भी चीन के संकेत पर अपने बेसुरा आलाप प्रारंभ किया था। पाकिस्तान ने भारत पर सीमावर्ती क्षेत्रों मे अवैध निर्माण का आरोप लगाया।  पाकिस्तान प्रमुख इमरान खान ने ट्वीट किया कि हिंदुत्ववादी  मोदी सरकार की अभिमानी विस्तारवादी नीतियां नाजी विचारधारा के समान है। पाक ने यह भी कहा कि  भारत अपने पड़ोसियों के लिए भी खतरा बन रहा है। भारत के खिलाफ नेपाल को समर्थन देने वाला पाकिस्तान लद्दाख में भी अपने आका चीन के पीछे खड़ा होकर गीदड़ भभकी कर रहा है।

पाकिस्तान ने कहा कि भारत लद्दाख में जो कर रहा है, उसे चीन बर्दाश्त नहीं कर सकता, और यह भी कहा कि चीन से वर्तमान संघर्ष के लिए भारत जिम्मेदार है, क्योंकि लद्दाख में उसकी ओर से शुरू किए गए अवैध निर्माण कार्य के बाद ही इस विवाद की जड़ हैं। वस्तुतः नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की बड़ी दीर्घ दृष्टि से सीमावर्ती क्षेत्रों मे चल रहे निर्माण कार्यों को चीन स्वाभाविक ही गंभीरता से ले रहा है व इस संघर्ष मे पाकिस्तान व नेपाल को मोहरा बना रहा  है। मोहरा बने पाकिस्तान ने भारत को पड़ोसियों के प्रति खतरा बताते हुये नेपाल को भारत से नाराज करने का अभियान चला रखा है। नागरिकता कानून व कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर भी पाकिस्तान बड़ी बयानबाजी करता रहा है व बांग्लादेश को भी भड़काते रहा है। मोदी सरकार ने सीमावर्ती भारतीय भूमि के प्रति जिस प्रकार का गंभीर, आक्रामक व हठी आचरण अपना रखा है चीन को उसकी आशा तो थी किंतु उसे मोदी सरकार से इस कोरोना कालखंड मे इतनी बलशाली प्रतिक्रिया की आशा संभवतः कम ही थी। चीन का अपने कदम वापिस लेना प्रदर्शित करता है कि वह यह समझ चुका है कि यह नरेंद्र मोदी का भारत है। भारत अपनी सीमाओं के प्रति अपनी चैतन्य व जागृत है व समय आने पर आक्रामक भी हो सकता है यह संदेश चीन को मिल गया है जो स्वाभाविक ही उसे रास नहीं आया है। 

       वस्तुतः नेपाल ने उत्तराखंड में धारचूला से चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख तक रोड लिंक बनाये जाने के विरोध में नेपाल स्थित  भारतीय राजदूत को समन जारी किया था और भारतीय राजूदत को राजनयिक पत्र सौंपा। नेपाल  सरकार का कहना है कि उत्तराखंड में जो सड़क बनायी गयी है, वह उसके क्षेत्र  में है। दूसरी तरफ भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में हाल ही जिस रोड का उद्घाटन किया गया है वह पूरी तरह से भारत की सीमा में है। इस मार्ग पर आवागमन आसान हो जाने से तीर्थयात्रियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों और व्यापारियों को बहुत सहूलियत मिलेगी। दूसरी तरफ भारत ने पाकिस्तान द्वारा एक बांध निर्माण के लिए चीन के साथ समझौता किये जाने पर विरोध प्रदर्शित किया है। नेपाल द्वारा सीमाओं पर हाल ही मे तैनात की गई सेना व नेपाली रक्षामंत्री रक्षा मंत्री का राइजिंग नेपाल को दिया साक्षात्कार भी भारत के लिए असहजता बनाने वाला विषय रहा है।  हाल ही के भारत नेपाल विवाद के मूल मे वह नक्शा है जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लाम्पियाधुरा को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। इस विषय मे भारत का मानना है कि कालापानी उसका हिस्सा है। उत्तराखंड स्थित इस घाटी में ब्रिटिश काल से ही भारतीय चौकी रही है और इस पर भारत का नियंत्रण रहा है। अंततः सुखद यही रहा कि इस समूचे विषय मे नेपाल ने विवादित व भारत विरोधी अपना नया  नक्शा वापिस ले लिया है, चीन ने भारतीय हाथी संग अपने ड्रेगन के संयुक्त नृत्य का सुखद व्यक्तव्य जारी कर दिया है और पाकिस्तान की स्थिति बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना की हो गई है।

Praaveen Gugnani, guni.pra@gmail.com 9425002270

महात्मा गांधी एक व्यक्ति अथवा नेता नहीं थे. भारतीय अंतर्मन के एक सशक्त हस्ताक्षर थे महात्मा जी.‘रामराज्य’, ‘वैष्णव-जन’ एवं हिन्द स्वराज जैसे आदर्श उनकी जीवन यात्रा के घोषणा पत्र थे. स्वदेश, स्वदेशी, स्वधर्म, स्वसंस्कृति, स्वभाषा और स्वराज इत्यादि विचार तत्वों को गांधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन की कार्य संस्कृति और उद्देश्य घोषित किया था.

महात्मा गांधी जी इन्हीं आदर्शों के आधार पर भारतीयों को सत्याग्रहों / आंदोलनों में भाग लेने की प्रेरणा देते रहे. गांधी जी तो जीवन के अंत तक प्रयास करते रहे कि ‘रामराज्य’ और ‘हिन्द स्वराज’ जैसी भारतीय परंपराओं और भारत की संस्कृति के आधार पर भारत के संविधान, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक रचना और एकात्म सामाजिक व्यवस्था इत्यादि का ताना-बाना बुना जाए.

महात्मा गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ पत्रिका में अपने एक लेख में लिखा था – -“अंग्रेज रहें, उनकी सभ्यता चली जाए, वह तो मुझे मंजूर है, परंतु अंग्रेज चले जाएं और उनकी सभ्यता यहां राज करती रहे, यह मुझे मंजूर नहीं. इसे मैं स्वराज नहीं कहूंगा.”

देश के दुर्भाग्य से विभाजन के पश्चात खंडित भारत की सरकार के सभी प्रकार के रीति-रिवाजों में कुछ भी भारतीय नहीं था और ना ही राष्ट्रीय स्वाभिमान के इस अति महत्वपूर्ण विचार पर किसी को सोचने की फुर्सत ही थी. सत्ता की भूख के उतावलेपन में जिस तरह भारत का विभाजन स्वीकार किया गया, ठीक उसी तरह हमारे कांग्रेसी सत्ताधारी महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, और पुरुषोत्तमदास टंडन इत्यादि जैसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानियों की विचारधारा से दूर हट गए.

इन सत्ताधारियों ने अंग्रेजों द्वारा थोपी गई राजनीति एवं संवैधानिक व्यवस्था की लकीर के फकीर बनना ही उचित समझा. ब्रिटिश सत्ता के कालखंड में स्वतंत्रता संग्राम के सर्वोच्च सेनापति महात्मा गांधी के उन सिद्धांतों और वैचारिक मूल्यों को भुला दिया गया, जिन्हें आदर्श मान कर स्वतंत्रता की जंग लड़ी गई थी.

महात्मा गांधी पश्चिम के अंधे अनुकरण के घोर विरोधी थे. उनके विचारानुसार विशाल यंत्रों पर आधारित औद्योगिक क्रांति, पश्चिम में प्रचलित चुनाव प्रणाली, पश्चिम की सभ्यता पर आधारित शिक्षा व्यवस्था तथा आर्थिक रचना भारत जैसे धर्मप्रधान एवं 75प्रतिशत से ज्यादा गांवों में रहने वाले भारतीयों के लिए सर्वाधिक नुकसानदायक साबित होगी.

गांधी जी ने नेहरू के नाम लिखे एक पत्र में कहा था – “आधुनिक विज्ञान का प्रशंसक होते हुए भी मैं यह अनुभव करता हूं कि हमारे देश के प्राचीन जीवन मूल्यों को ही आधुनिक विज्ञान के आलोक में संवार कर अपनाना चाहिए” . गांधी जी के अनुसार अंग्रेज शासकों ने भारत को पाश्चात्य शिक्षा, प्रशासन, संविधान और आर्थिक मक्कड़जाल में फंसा दिया था. स्वराज प्राप्ति के पश्चात यदि देश को इस विदेशी मक्कड़जाल से ना निकाला गया, तो स्वाधीनता का कोई अर्थ नहीं बचता.

दुर्भाग्य से पंडित नेहरु को गांधी जी के ध्येय-वाक्य स्वधर्म, स्वभाषा, अपरिग्रह, हिन्द स्वराज, रामराज्य इत्यादि विचार पसंद नहीं थे. अपने को ‘एक्सीडेंटल हिन्दू’ कहने वाले और अंग्रेजी सभ्यता में संस्कारित नेहरू जी को ‘गांधी-दर्शन’ से कुछ भी लेना-देना नहीं था. गांधी जी गांव को एक इकाई मानकर आर्थिक विकास की रचना चाहते थे, जबकि भारतीय ग्रामीण व्यवस्था से पूर्णतया अनभिज्ञ नेहरू जी शहरों के विकास को महत्व देकर अपनी आर्थिक योजनाओं में जुट गए. इस प्रकार नेहरू जी ने देश के 75 प्रतिशत भारतीयों के पेट पर लात मार दी.

महात्मा गांधी जी ने स्वतंत्रता संग्राम को दो सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में देखा था. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में लिखा था – “कुछ लोग मेरे हिन्दुस्तान को इंग्लिशस्तान बनाना चाहते हैं, परंतु वे जान लें कि ऐसी हालत में तब वह हिन्दुस्तान नहीं रहेगा, यह मेरी कल्पना का स्वराज्य नहीं होगा”.

परंतु, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी परतंत्रता को जारी रखा गया. गांधी जी के ‘भारतीय-दर्शन’ को तिलांजलि दे दी गई. भारत की सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक धरोहर को तोड़ डालने के भयानक दुष्परिणाम हमारे सामने हैं. अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के समय जो भारत एकजुट था, वह अब भाषा, क्षेत्र, जाति और मजहब के आधार पर विभाजित हो गया.15 अगस्त 1947 को हुए भौगोलिक विभाजन के बाद यह अपनी तरह का एक ऐसा विभाजन था, जिसने एकत्व को विघटन में बदल दिया. वोट बैंक की राजनीति का उदय हो गया. भ्रष्टाचार, अलगाववाद तथा आतंकवाद का बोलबाला हो गया.

नाथूराम गोडसे ने भारत माता के एक महान सपूत महात्मा गांधी की हत्या करके जघन्य राष्ट्रीय अपराध किया. गांधी जी के जाने के साथ ही उनका भारतीय वैचारिक आधार भी चला गया. महात्मा गांधी जी कुछ वर्ष और जीवित रहते तो पंडित जवाहरलाल नेहरू को देश का प्रधानमंत्री बनवाने की अपनी भूल को सुधार लेते. राम-राज्य के अपने उद्देश्य को फलीभूत होता हुआ देख लेते. परंतु ऐसा नहीं हो सका.

देशवासियों के सौभाग्य से आज परिवर्तन की लहर चली है. गांधी जी के दर्शन के अनुसार राजनीति, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में कार्य संपन्न होने शुरू हुए हैं. अखंड-भारत, स्वदेशी, सामाजिक सामंजस्य और रामराज्य का गांधी जी का संकल्प साकार होता हुआ दिखने लगा है.

यह भी कितने आश्चर्य की बात है कि जिन राष्ट्र समर्पित देशभक्त लोगों पर महात्मा जी की हत्या का झूठा, बेबुनियाद और अनर्गल आरोप लगाने का षड्यंत्र रचा गया था, वही लोग ‘गांधी-दर्शन’ पर चलते हुए गांधी जी को सच्ची श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

नरेंद्र सहगल

पूर्व संघ प्रचारकलेखक एवं स्तम्भकार

यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर अंतिम निर्णायक प्रहार किया था. 21 अक्तूबर, 1943 को नेता जी द्वारा सिंगापुर में गठित आजाद हिन्द सरकार को जापान और जर्मनी सहित नौ देशों ने मान्यता दे दी थी. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर इस सरकार ने 30 दिसंबर को भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा फहरा कर आजाद भारत की घोषणा कर दी थी. अंडमान और निकोबार के नाम बदल कर ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ कर दिए गए.

अत: यह कहने में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नेताजी द्वारा गठित सरकार स्वतंत्र भारत की पहली सरकार थी. नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे. 30 दिसंबर, 1943 ही वास्तव में भारत का स्वतंत्रता दिवस है. इसी दिन नेताजी ने अखण्ड भारत की सर्वांग एवं पूर्ण स्वतंत्रता का बिगुल बजाया था. दुर्भाग्य से कांग्रेस द्वारा देश का विभाजन स्वीकार कर लिया गया और 15 अगस्त को खण्डित भारत का स्वतंत्रता दिवस स्वीकृत हो गया.

उपरोक्त तथ्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में झांक कर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि स्वतंत्रता संग्राम के इस महत्वपूर्ण एवं निर्णायक अध्याय को जानबूझ कर इतिहास के कूड़ेदान में डाल देने का राष्ट्रीय अपराध किया गया. आजाद हिन्द सरकार के 75 वर्ष पूर्ण हुए हैं, इस अवसर पर देश के नागरिकों, युवा पीढ़ी को ऐतिहासिक तथ्य से अवगत करवाकर गलती को सुधारने का सुनहरा अवसर हमारे पास है.

यही ऐतिहासिक अन्याय वीर सावरकर, सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रासबिहारी बोस, डॉक्टर हेडगेवार जैसे सैकड़ों देशभक्त क्रांतिकारियों एवं आजाद हिन्द फौज के 30 हजार बलिदानी सैनिकों के साथ किया गया है. आर्य समाज, हिन्दू महासभा इत्यादि के योगदान को भी नकार दिया गया.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस के प्रखर राष्ट्रीय नेता थे. वे किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण के घोर विरोधी थे. नेताजी के अनुसार केवल अहिंसक सत्याग्रहों से ही देश आजाद नहीं हो सकता. नेताजी के इसी एक निर्विवाद सिद्धांत के कारण गांधीवादी नेताओं ने उन्हें 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया. नेताजी ने 03 मई 1939 को अपने सहयोगियों की सहायता से एक स्वतंत्र संगठन फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की. उन्होंने समस्त राष्ट्रीय शक्तियों को एकत्रित करने का अभियान छेड़ दिया.

सितंबर 1939 में पोलैण्ड पर जर्मनी के हमले के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया. ब्रिटेन और फ्रांस भी युद्ध में कूद पड़े. नेताजी ने इस अवसर का लाभ उठाकर अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास प्रारंभ कर दिए. उन्होंने अनेक क्रांतिकारी नेताओं वीर सावरकर, डॉक्टर हेडगेवार एवं डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे स्वातंत्र्य योद्धाओं के साथ मिलकर निर्णायक प्रहार का ऐतिहासिक फैसला किया.

इसी उद्देश्य से नेताजी गुप्त रूप से विदेश चले गए. वहां उन्होंने हजारों क्रांतिकारी देशभक्त भारतीय युवाओं की योजनाबद्ध ढंग से इस फौज में भर्ती की. इधर, वीर सावरकर ने भारतीय सेना में विद्रोह करवाने की मुहिम छेड़ दी. आजाद हिन्द फौज अपने उद्देश्य के अनुसार सफलता की ओर बढ़ने लगी.

नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने जिस स्वाधीनता संग्राम का श्रीगणेश किया, उसने तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश का बिगुल ही बजा दिया. इस फौज के सेनापति सुभाष चन्द्र बोस ने जैसे ही दिल्ली चलो का उद्घोष किया, भारतीय सेना में विद्रोह की आग लग गई. डॉक्टर हेडगेवार, सावरकर और सुभाष चन्द्र के बीच पूर्व में बनी एक गुप्त योजना के अनुसार भारतीय सेना में भर्ती हुए युद्ध सैनिकों ने अंग्रेज सरकार को उखाड़ डालने के लिए कमर कस ली. यह जवान सैनिक प्रशिक्षण लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ेंगे, इसी उद्देश्य से भर्ती हुए थे.

राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध गुप्तचर विभाग की रपटों में कहा गया है कि “20 सितंबर 1943 को नागपुर में हुई संघ की एक गुप्त बैठक में जापान की सहायता से आजाद हिन्द फौज के भारत की ओर कूच के समय संघ की सम्भावित योजना के बारे में विचार हुआ था.” एक दिन अवश्य ही इस दबी हुई सच्चाई पर से पर्दा उठेगा कि वीर सावरकर एक महान उद्देश्य के लिए तथाकथित माफीनामा लिख कर जेल से बाहर आए थे. यह अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने जैसा कदम था. अभिनव भारत का गठन, सेना में विद्रोह, और आजाद हिंद फौज की स्थापना इस रणनीति का हिस्सा थे.

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरंत पश्चात ब्रिटिश शासक इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अब भारत में उनका रहना और शासन करना संभव नहीं होगा. दुनिया के अधिकांश देशों पर अपना अधिपत्य जमाए रखने की उनकी शक्ति और संसाधन पूर्णतया समाप्त हो चुके हैं. वास्तव में यही वजह थी अंग्रेजों के भारत छोड़ने की.

लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ के नवंबर 2009 के अंक में के.सी. सुदर्शन जी का एक लेख ‘पाकिस्तान के निर्माण की व्यथा’ छपा था. जिसमें लिखा था – “जिस ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के काल में भारत को स्वतंत्रता मिली, वे 1965 में एक निजी दौरे पर कोलकत्ता आए थे और उस समय के कार्यकारी राज्यपाल और कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी सी.डी. चक्रवर्ती के साथ राजभवन में ठहरे थे.

बातचीत के दौरान चक्रवर्ती ने सहजभाव से पूछा कि 1942 का आंदोलन तो असफल हो चुका था और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी आप विजयी रहे, फिर आपने भारत क्यों छोड़ा? तब एटली ने कहा था कि हमने 1942 के कारण भारत नहीं छोड़ा, हमने भारत छोड़ा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के कारण. नेताजी अपनी फौज के साथ बढ़ते-बढ़ते इंफाल तक आ चुके थे और उसके तुरंत बाद नौसेना एवं वायु सेना में विद्रोह हो गया था.” जाहिर है कि अंग्रेज शासकों का दम निकल चुका था. अगर उस समय कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर, डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और संघ के बड़े अधिकारियों के साथ संयुक्त संग्राम छेड़ा होता तो देश स्वतंत्र भी होता और भारत का दुःखद विभाजन भी नहीं होता.

नरेंद्र सहगल

पूर्व प्रचारक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभ लेखक

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सारे जहां में जिसका है नाम, सर ज़मीनों हिंदोस्तान, रोशन है जिससे ये आसमान, ऐसे थे बिस्मिल अशफ़ा के राम॥ शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन पर अंकित लेखक (अमित त्यागी) की ये पंक्तियाँ शाहजहाँपुर आने वाले सैलानियों का स्वागत एवं एवं काकोरी कांड के नायकों को श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं। वास्तव में काकोरी कांड सिर्फ खज़ाना लूटने की घटना मात्र नहीं थी। वह बड़ा जिगर रखने वाले क्रांतिकारियों द्वारा अँग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती थी। भारत के स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड का एतेहासिक महत्व है। असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद देश में हताशा का माहौल था। युवा चाहते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध कुछ सक्रियता दिखाई जाये। ऐसे समय में राम प्रसाद बिस्मिल ने एक क्रांतिकारी संगठन का गठन किया जिसका नाम हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संगठन रखा। गया। चन्द्रशेखर आज़ाद, अशफाक़ उल्लाह खान, राजेंद्र लाहीड़ी, रोशन सिंह, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्र नाथ सनयाल जैसे क्रांतिकारी इसके साथ जुड़े। गांधी जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस उस समय तक पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग के विचार से दूर थी। इन क्रांतिकारियों ने अपने संगठन के संविधान  में  ‘स्वतंत्र भारत में प्रजातन्त्र की अवधारणा’ का स्पष्ट विचार प्रस्तुत करके अंग्रेजों को खुली चुनौती दे दी।

अपने क्रांतिकारी कार्यों को अंजाम देने के लिए इनको धन की आवश्यकता हुयी। इस धन को एकत्रित करने के लिये भी इन्होने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। इन क्रांतिकारियों ने सत्ता को खुली चुनौती देते हुये ट्रेन में जा रहे सरकारी ख़ज़ाने को लूटने की योजना बनाई। योजनाबद्ध तरीके से 19 अगस्त 1925 को काकोरी और आलमनगर(लखनऊ) के मध्य ट्रेन को रोका गया और 10 मिनट मे ही पूरा खज़ाना लूट लिया गया। ट्रेन मे 14 व्यक्ति ऐसे थे जिनके पास हथियार मौजूद थे किन्तु न ही सवारियों और न ही हथियारबंद लोगों ने कोई प्रतिरोध किया। लूटे गए धन से दल के लोगों ने संगठन का पुराना कर्ज़ निपटा दिया। हथियारों की खरीद के लिए 1000 रुपये भेज दिये गए। बम आदि बनाने का प्रबंध कर लिया गया। इस कांड ने सरकार की नाक मे दम कर दिया। इनके हौसले की पराकाष्ठा फांसी के बाद के संस्मरण में देखने को मिलती है। रोशन सिंह को जैसे ही ज्ञात हुआ कि बिस्मिल के साथ उन्हे भी फाँसी हुई है वो खुशी से उछल पड़े और चिल्लाये । “ओ जज के बच्चे, देख बिस्मिल के साथ मुझे भी फाँसी हुई है। और फिर बिस्मिल से बोले कि पंडित जी अकेले ही जाना चाहते हो, ये ठाकुर पीछा छोडने वाला नहीं है। हर जगह तुम्हारे साथ रहेगा।” ऐसे अनेक संस्मरण हैं जिससे ज्ञात होता है कि देशप्रेम इन क्रांतिकारियों में कितना कूट कूट कर भरा था।

इसके साथ ही स्वाधीनता संग्राम के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों की जीवन गाथा का अध्ययन करने से ऐसे ऐसे रोचक परिदृश्य उभरते हैं जो भारत की गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण देते हैं। क्रांतिकारियों द्वारा सिर्फ अपना जीवन मातृभूमि के लिए अर्पण करना महत्वपूर्ण नहीं है। उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है उनकी सोच एवं आचरण, जिसके द्वारा उन्होने वह मापदंड स्थापित किये जिसको सुनकर किसी भी भारतवासी को अपनी जन्मभूमि पर गर्व हो सकता है।

काकोरी कांड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्लाह खान एवं ठाकुर रोशन सिंह उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले के निवासी थे। बिस्मिल सबमे वरिष्ठ थे। राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा में उनके विचारों को पढ़कर उनके एवं क्रांतिकारियों साथियों के वृहद ज्ञान का आभास होता है। “जैसे तुर्की और रूस की क्रान्ति में जिस तरह असंख्य वीरों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी है, इसी प्रकार का संघर्ष भारत में भी चल रहा है और उनके बाद भी चलता रहेगा। क्रांति के लिए मजबूत संगठन की आवश्यकता होती है। संगठित होने के लिए शिक्षित होना एवं अधिकारों का ज्ञान आवश्यक है।” राम प्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी थे। उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले का आर्य समाज मंदिर उनकी बौद्धिक कर्मभूमि था। दूसरी तरफ अशफाक़ उल्लाह खान इस्लाम को दिल से मानने वाले पक्के मुसलमान थे। अशफाक़ उल्ला, बिस्मिल के साथ आर्य समाज मंदिर जाते थे और बिस्मिल को पूरे जीवन उन्होने ‘राम भैया’ ही कहा।  बिस्मिल भी अशफाक़ को अपना छोटा भाई मानते थे। शहीदों की नगरी के नाम से मशहूर आपकी जन्मभूमि शाहजहाँपुर के वातावरण और आबोहवा में आपकी दोस्ती आज भी ज़िंदा है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है कि शाहजहाँपुर में कभी हिन्दू-मुस्लिम के बीच दंगा नहीं हुआ। जब भी कभी कोई असामाजिक तत्व उत्तेजना का माहौल पैदा करता है तो यहाँ की आवाम अशफाक़-बिस्मिल के हवाले से हिन्दू-मुस्लिम टकराव को रोक लेती है। अमन पसंद माहौल बन जाता है।

काकोरी कांड सिर्फ एक ट्रेन डकैती नहीं थी। वह भारत निर्माण का ध्येय रखने वाले उस समय के भारतीय नौजवानो की सशस्त्र क्रान्ति थी। भारत को अंग्रेजों से नहीं अंग्रेज़ियत से मुक्ति दिलाना क्रांतिकारियों का उद्देश्य था। वह सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल नहीं था बल्कि अँग्रेजी सभ्यता द्वता पुष्पित-पल्लवित की जा रही व्यवस्था के खिलाफ एक आवाज़ थी। आज सत्ता को हस्तांतरित हुये सात दशक से ज़्यादा हो चुके हैं। क्या अभी तक हम महानायकों के सपनों का भारत निर्माण कर पाये हैं यह प्रश्न हमें सरकार से नहीं स्वयं से पूछना है ? क्योंकि जो काम पहले गोरे अंग्रेज़ करते थे वह काम आज काले अंग्रेज़ कर रहे हैं ?

  • अमित त्यागी (शाहजहाँपुर निवासी लेखक विधि विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं। )

 

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तो अंततः देश विभाजन के तुरंत बाद किया जाने वाला बहू प्रतीक्षित व प्राकृतिक न्याय वाला कार्य अब पूर्ण हुआ और संसद ने नागरिकता संशोधन बिल पारित कर दिया।  चाणक्य ने कहा था कि ऋण, शत्रु और रोग को समय रहते ही समाप्त कर देना चाहिए। जब तक शरीर स्वस्थ और आपके नियंत्रण में है, उस समय आत्म साक्षात्कार के लिए उपाय अवश्य ही कर लेना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के पश्चात कोई कुछ भी नहीं कर सकता। चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु और विश्व के  नीतिशास्त्र व अर्थशास्त्र के प्रणेता कौटिल्य को यदि आज के संदर्भों मे पढ़ें तो राज्य का रोग तुष्टिकरण की राजनीति ही होता है। यदि राजनीति सही चली होती या रोगपूर्ण न होती तो धर्म के आधार पर भारत का विभाजन न हुआ होता और आज नरेंद्र मोदी सरकार को नागरिकता संशोधन बिल लाने की आवश्यकता न पड़ती। देश विभाजन के समय से लेकर आज तक हिंदुओ के साथ हो रहे सामाजिक, राजनैतिक अत्याचारों को रेखांकित करते हुये अमित शाह ने इस विधेयक के पारित होने के दौरान लोकसभा मे कहा  कि

1947 में पाकिस्तान में 23 फीसदी हिंदू थे लेकिन वहीं साल 2011 में ये आंकड़ा 1.4 प्रतिशत रह गया है. पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को देखते हुए भारत मूकदर्शक नहीं बना रह सकता। जहां इन पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान मे हिंदू अल्पसंख्यकों की संख्या चिंतनीय स्तर पर कम हुई है वहीं, भारत मे  मुस्लिम आबादी के प्रतिशत में असामान्य बढ़ोतरी हुई है।

     बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदाय हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिक्ख लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है इस बहू प्रतीक्षित अधिनियम मे जिससे इन तीनों घोषित रूप से इस्लामिक देशों मे अत्याचार सह रहे हिंदुओं के भारत आने व यहां की वैध नागरिकता प्राप्त करने का स्व्पन साकार हो सकेगा।

     तथाकथित तौर पर कई राष्ट्रवादी  नेताओं के मत की अनदेखी करके नेहरू ने लियाकत अली खान के साथ जो समझौता किया था वह प्रारंभ से ही दरक गया था। इस समझौते के अनुसार कभी भी हिंदुओं को पाकिस्तान मे किसी भी प्रकार की सुरक्षा या सरंक्षण नहीं मिला और सबसे बड़ी बात विगत सत्तर वर्षों मे भारतीय सरकारों ने कभी भी  इन देशों मे छूट गए हिंदुओं  की चिंता नहीं की। यहां छूट गए हिंदू अत्याचार सहते सहते या तो धर्मांतरण को मजबूर हुये या भगोड़े बनकर दूसरे देशों मे अवैध नागरिक कहलाने लगे। वस्तुतः देश का विभाजन ही गलत वातावरण मे किया गया था। जब गांधी जी की देश मे अतीव विश्वसनीयता थी तब उस कालखंड मे गांधीजी कई कई बार बोलते थे कि  “देश विभाजन मेरी लाश पर होगा”। उसी समय जिन्ना मुस्लिम समुदाय को विश्वास दिलाते थे कि मुस्लिमों का पाकिस्तान बनकर रहेगा। देश भर के हिंदुओं मे गांधीजी की विश्वसनीयता के कारण व उनकी राजनैतिक शक्तियों के कारण हिंदू समाज आश्वस्त था कि विभाजन नहीं होगा अतः वर्तमान पाकिस्तान मे बसा हिंदू समाज लापरवाह था। उसने अपनी सम्पत्तियों, व्यसाय, रिश्तेदारों के प्रति इस आश्वस्ति के कारण कोई व्यवस्था नहीं बनाई जबकि वर्तमान भारत मे बसे मुस्लिम समुदाय ने अपनी संपत्ति, व्यवसाय व रिश्तेदारियों को व्यवस्थित व सावधानीपूर्वक स्थानांतरित करने की पूरी योजना बना रखी थी। इस प्रकार विभाजन मे सबसे बड़ी हानि हिंदुओं की हुई। यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान पाकिस्तान मे उस समय की अधिकांश संपत्तियां, व्यवसाय व संसाधनों पर हिंदूओं का ही स्वामित्व होता था वहीं मुस्लिमों की स्थिति निर्धनता की थी, अतः इस दृष्टि से भी विभाजन हिंदुओं हेतु अतीव पीड़ादायक व हानिकारक रहा, वहीं मुस्लिमों को कई बनी बनाई संपत्तियां, व्यवसाय आदि बने बनाए रूप मे कब्जा करने को मिल गए थे। सर्वविदित व अकाट्य तथ्य है कि स्व्तंत्रता के बाद जो हिंदू पाकिस्तान या बांग्लादेश मे बच गए थे वे प्रताड़ित होते रहे व उनके संसाधन छीने गए जबकि भारत मे अल्पसंख्यक समुदाय की स्थिति व संख्या सुदृढ़ होती गई। वस्तुतः cab विभाजन के अधूरे कार्य को पूर्ण करने का ही बड़े विलंब से लाया गया विधिक मार्ग है जिससे तब के दीन हीन हिंदुओं व अन्य समुदायों को पाकिस्तान, बांग्लादेश,  अगानिस्तान के नारकीय जीवन से बाहर निकलने का सम्मानपूर्ण मार्ग निकल सकेगा। विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था व तब बड़ी संख्या मे इस आधार पर ही जनसंख्या की अदला बदली भी हुई थी किंतु बड़ी संख्या मे मुस्लिम भारत मे छूट गए थे  जो  सम्मानपूर्वक नागरिक जीवन जीते रहे व असामान्य जनसंख्या वृद्धि करते रहे जबकि पाकिस्तान मे छूटे हुये 23% हिंदू पाशविक अत्याचारों व बलपूर्वक धर्मांतरण का शिकार हुये व आज 1.4% की दयनीय दशा मे आ गए हैं। आज मोदी सरकार cab के माध्यम से जो कर रही है वह कार्य स्वतंत्रता के तुरंत बाद नेहरू सरकार को करना चाहिए था। नेहरू सरकार ने इसके विपरीत कार्य किया उसने पाकिस्तान मे छूटे हुये हिंदुओं को अनाथ समझकर अनदेखा किया और भारत मे छूट गए मुस्लिमों को तुष्टिकरण की राजनीति के माध्यम से अपना वोट बैंक बनाया व उन्हे अपने सर माथे बैठाते रहे।

        हो यह रहा था कि पाकिस्तान मे मुस्लिमों के अत्याचारों से तंग होकर जो हिंदू बंधु भारत को अपनी भूमि समझकर यहां आकर रह रहे थे उन्हें अवैध माना जा रहा था व उन्हें नागरिक नहीं माना जा रहा था। हिंदू अपनी ही जन्मभूमि मे पराया व अपमानित जीवन जीने को अभिशप्त था। इस अधिनियम के माध्यम से यह स्थिति समाप्त होगी। अब इस प्रकार के उपेक्षित हिंदू बंधुओं  को भारत मे सम्मान पूर्ण जीवन मिलेगा। नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार  पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान मे अत्याचारों से तंग होकर बिना किसी दस्तावेज़ के भारत मे प्रवेश कर चुके हिंदू अवैध अप्रवासी माने जाते थे। अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है या फिर विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1920 के तहत वापस उनके देश भेजा जा सकता है। मोदी सरकार ने इस संवेदनशील विषय मे अपने पहले कार्यकाल मे कार्य प्रारंभ कर दिया था और 2015 और 2016 में उपरोक्त 1946 और 1920 के कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई को छूट दे दी थी। इसका मतलब यह हुआ कि इन धर्मों से संबंध रखने वाले लोग अगर भारत में वैध दस्तावेजों के बगैर भी रहते हैं तो उनको न तो जेल में डाला जा सकता है और न उनको निर्वासित किया जा सकता है। यह छूट उपरोक्त धार्मिक समूह के उन लोगों को प्राप्त है जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत पहुंचे हैं। इन्हीं धार्मिक समूहों से संबंध रखने वाले लोगों को भारत की नागरिकता का पात्र बनाने के लिए नागरिकता कानून-1955 में संशोधन के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 संसद में पेश किया गया था किंतु तब यह लोकसभा मे पारित होकर राज्यसभा मे विफल हो गया था व हिंदू चिंता का एक प्रमुख विषय कुत्सित व तुष्टिकरण राजनीति की भेंट चढ़ गया था।

कभी हुआ करता था कि मजदूर संगठन की बात घोर पूंजीपति विरोध से ही प्रारंभ हुआ करती थी। रोजगार देने वाले व रोजगार प्राप्त करने वाले मे सौहाद्र, समन्वय व संतोष की न तो कामना की जाये और न ही आशा की जाये, यही कार्ल मार्क्स के मजदूरों को दिये गए संदेश का अर्थ था। कम्युनिस्टों के नारे थे ‘‘चाहे जो मजबूरी होमाँग हमारी पूरी होदुनिया के मजदूरो एक होकमाने वाला खायेगा’’। यहीं से पश्चिमी दृष्टि के मजदूर संगठनों व भारतीय दृष्टि के मजदूर संगठनों मे विभेद की लाइन प्रारंभ होती है। मालिक, मजदूर  व राष्ट्र, तीनों दृष्टि की कृतित्व शैली यदि किसी मजदूर नेता मे दिखी तो वे दत्तोपंत जी ठेंगड़ी थे। ठेंगड़ी जी के आंदोलन ने नारा दिया – ‘‘देश के हित में करेंगे कामकाम के लेंगे पूरे दाममजदूरो दुनिया को एक करोकमाने वाला खिलायेगा’’। 2002 में राजग शासन द्वारा दिये जा रहे पद्मभूषण’ अलंकरण को उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि जब तक संघ के संस्थापक पूज्य डा. हेडगेवार और श्री गुरुजी को भारत रत्न’ नहीं मिलतातब तक वे कोई अलंकरण स्वीकार नहीं करेंगे। कार्ल मार्क्स व दत्तोपंत जी मे यही मूल अंतर था। मार्क्स की मजदूर नीति शासकीय व आर्थिक स्वीकार्यता की धूरी पर घूमती थी जबकि ठेंगड़ी जी की नीति नैतिक व सामाजिक स्वीकार्यता के आधार पर कार्यरत रहती थी। कार्ल मार्क्स पर उन्ही के देश जर्मनी के ब्यौर्न और सीमोन अक्स्तीनात बंधुओं ने एक पुस्तक अभी अभी प्रकाशित की है। इस पुस्तक का  नाम है, मार्क्स और एंगेल्स अंतरंग” (मार्क्स उन्ट एंजेल्स इन्टीम)। सीमोन अक्स्तिनास्त को एक दिन अचानक मार्क्स के कुछ तथ्य व उद्धरण मिले जो सामाजिक आधार पर अत्यंत ही निकृष्ट थे। इसके बाद अक्स्तिनास्त बंधु कार्ल मार्क्स पर शोध करने लगे। उन्होने मार्क्स के कई सारे कार्यों, संदर्भों, उद्धरणों व भाषणों को इस पुस्तक मे प्रकाशित किया है जिनसे इस कम्युनिस्ट नेता की छवि ही बदल जाती है व यह धारणा सुदृढ़ होती है कि कम्युनिस्टों की कार्यशैली सदा ही बाहर कुछ और व भीतर कुछ और रहती है। “दास केपिटल” की डेढ़ सौवें वर्ष पर इस पुस्तक का प्रकाशन व इसे हाथों हाथ लिया जाना मार्क्स के वैचारिक ह्रास का बड़ा परिचायक है। मार्क्स व एंजिल्स के वैचारिक ढलोसले को उघाड़ती यह पुस्तक सम्पूर्ण मार्क्सवादी विचार पर एक बड़ा प्रश्न उठाती है। मार्क्स के सौ वर्ष बाद जन्मे दत्तोपंत जी ठेंगड़ी अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से सम्पूर्ण मार्क्सवाद को खारिज करते हैं यह कोई कथित रूप से  कथित ठेंगड़ीवाद का परिणाम नहीं अपितु भारतीय दर्शन व विचार का परिणाम है। यही मूल अंतर है मार्क्सवाद  मे व ठेंगड़ी जी के भारतवाद मे। यही कारण है कि भारत वर्ष में ही नहीं बल्कि विश्व भर के मजदूर-किसान और श्रमिक वर्ग में दत्तोपंत जी ठेंगड़ी जी का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।  स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब हमारा देश अपनें पैरों पर खड़ा होनें और आर्थिक आत्म निर्भरता के लिए ओद्योगीकरण की राह पर चलनें को उद्दृत हुआ तब पचास व साठ के दशक में स्वतंत्र भारत में मजदूर संगठन और मजदूर राजनीति नाम के नयें ध्रुवों का उदय हुआ था. मजदूर संगठन और मजदूर राजनीति के बारीक किन्तु बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील भेद भारतीय शैली से पहलेपहल दत्तोपंत जी ठेंगडी ने ही समझा और आत्मसात किया था. मजदूरों से बात करते-उनकी समस्याओं को सुनते और संगठन गढ़ते-करते समय जैसे वे आत्म विभोर ही नहीं होतें थे वरन सामनें वाले व्यक्ति या समूह की आत्मा में बस जाते थे और उसके मुख से वही निकलवा लेते थे जो वे चाहते थे और जिस रूप में वे चाहते थे। मात्र 15 वर्ष की किशोरावस्था में ही वे आर्वी नगरपालिका हाईस्कूल के अध्यक्ष निर्वाचित हो गए थे, तब अपनी संवेदन शीलता का परिचय देते हुए इन्होनें निर्धन विद्यार्थियों के लिए स्कालरशिप की योजना बनाई थी।

दत्तोपंत जी कानून की शिक्षा प्राप्त कर वकील बनें किन्तु वकालत उन्हें रास न आई और वे आरएसएस के प्रचारक रूप में कार्य करने लगे।प्रचारक के तपस्वी कार्य पर निकलनें की प्रेरणा के मूल में श्री गोलवलकरजी का सान्निध्य और उनकें साथ किये प्रवास ही रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूल विचारों से सदा प्रेरित और उद्वेलित दत्तोपंत जी सन 1942 से सन 1945 तक केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक के दायित्व को निर्वहन कर 1945 से सन 1948 तक बंगाल में प्रांत प्रचारक के दायित्व को संभालें रहे और तब 1949 में गुरूजी ने ठेंगड़ीजी को मजदूर क्षेत्र का संगठन और नेतृत्व करने का आदेश दिया।  इसके बाद तो जैसे दत्तोपंत जी का जीवन किसान व मजदूर क्षेत्र की ही पूंजी बन गया।  अक्तूबर 1950 में दत्तोपंत जी को इंटक का राष्ट्रीय परिषद सदस्य बनाया गया और फिर इन्हें मध्यभारत के इंटक के संगठन मंत्री का दायित्व सौंपा गया।  इसके बाद 1952 से 1955 के मध्य कम्युनिस्ट प्रभावित आल इंडिया बैंक एम्प्लाईज एसो. के प्रांतीय संगठन मंत्री रहे और पोस्टलजीवन-बीमारेल्वेकपडा उद्धोगकोयला उद्धोग से संबंधित मजदूर संगठनों के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सृजनात्मक कार्यो के लिए एक विस्तृत पृष्ठभूमि तैयार करते हुए उन्होंने भारतीय किसान संघसामाजिक समरसता मंचसर्व पंथ समादर मंचस्वदेशी जागरण मंच आदि कई राष्ट्रवादी और महात्वाकांक्षी संगठनों की स्थापना कीऔर उनके अनुभवी व संवेदनशील नेतृत्व में इन सभी संगठनों का तीव्र विकास होता रहा।  ठेंगड़ी जी ने ही बाद में संस्कार भारतीअखिल भारतीय अधिवक्ता परिषदभारतीय विचार केंद्रअखिल भारतीय ग्राहक पंचायत आदि संगठनों की स्थापना में सूत्रधार की भूमिका का निर्वहन किया था। अपनें पचास वर्षीय कार्य जीवन में ठेंगड़ी जी से इस देश का शायद ही कोई मजदूर क्षेत्र और संगठन रहा होगा जिसमें इनका दखल न रहा हो। देश के सभी मजदूर संगठन और इनसें जुड़े लोगों को दत्तोपंत जी में अपना स्वाभाविक नेतृत्व और विश्वस्त मुखिया का आभास और विश्वास मिलता था। दलित संघरेल्वे कर्मचारी संघउसी प्रकार कृषिशैक्षणिकसाहित्यिक आदि विविध क्षेत्रों के संगठनों को उनके सक्रिय और वैचारिक मार्गदर्शन का लाभ मिला। प्रचंड वाणीतीव्र प्रत्युत्पन्न्मतितेज किन्तु संवेदनशील मष्तिष्क के धनी दत्तोपंत जी ने अपनें जीवन में मजदूरों-किसानों के संगठन और उनके हितों को अपना ध्येय मान सादा जीवन जिया व मृत्यु पर्यंत सक्रिय रहे। तीव्र मेघा किन्तु संज्ञेय बुद्धि के धनी ठेंगड़ी जी ने अपने जीवन काल में 26 हिंदी, 12 अंग्रेजी और 2 मराठी पुस्तकें  लिखी। इनमें से राष्ट्र” और ध्येय पथ पर किसान” नामक किताबें मजदूर वर्ग और कार्यकर्ताओं में प्रकाश स्तम्भ के रूप में पढ़ी जाती हैं।

 ठेंगड़ी जी  संघ के विराट संसार में जैसे एक घुमते-विचरते धूमकेतु थे, संघ के अनेक आनुषांगिक संगठनों को उनका स्पर्श और स्नेह मिला। हिंदुस्तान समाचार के आप संगठन मंत्री रहे और 1955 से 1959 तक मध्यप्रदेश तथा दक्षिण में भारतीय जनसंघ की स्थापना और जगह-जगह पर जनसंघ के विस्तार का कार्य भी किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य रहे और भारतीय बौद्ध महासभामध्य प्रदेश शेडयूल कास्ट फेडरेशन के कार्यों में सतत निर्णायक दृष्टि रखते रहे। ठेंगड़ी जी ने ही 1955 मे पर्यावरण मंच व सर्व धर्म समादर मंच की स्थापना की। इन सभी कार्यों को करते हुए दत्तोपंत जी ने 23 जुलाई 1955 को भारतीय मजदूर संघ का स्थापना यज्ञ पूर्ण किया। आज भारतीय मजदूर संघ एक करोड़ सदस्यों तक पहुंचता हुआ एक विराट संगठन है। 1967 में उन्होने भारतीय श्रम अन्वेषण केन्द्र की स्थापना कराई और 1990 में स्वदेशी जागरण मंच स्थापित किया। भारतीय संसद में 12 वर्षों तक राज्यसभा के सदस्य रहते हुए भारतीय मजदूर संघ का ध्वज उठाये दत्तोपंत जी ने अनेकों देशों की यात्राएं की थी। पुरे विश्व में मजदूर संगठनों के कार्यक्रमों में इन्हें बुलाया जाता रहा। विश्व के सभी छोटे बड़े देशों सहित चीन और अमेरिका के मजदूर संगठनों के कार्यों और पद्धतियों में ठेंगड़ी जी ने अपनी छाप छोड़ी थी। चीन प्रवास मे ठेंगड़ी जी के मजदूरों को दिये गए उद्बोधन का चीनी रेडियो से प्रसारण चीन जैसे बंद खिड़की वाले देश मे होना कौतूहल व आश्चर्य का विषय बना था।

नारद जयंती (20 मई) पर विशेष

ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयन्ती होती है, जो इस बार 20 मई को है. पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवादी लोग इस दिन को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते हैं. नारद सृष्टि के पहले संवाददाता माने जाते हैं. हिन्दी फिल्मों और सेकुलर विमर्शकारों द्वारा उन्हें नकारात्मक चरित्र और लोगों के बीच में मनमुटाव और लड़ाई करने वाले के रूप में चित्रित किया जाता है. इसलिए कई बार ऐसे ही लोग नारद जयन्ती के आयोजनों पर अपनी भौहें तानते हैं. जबकि वास्तविक तथ्य यह है कि नारद एक दार्शनिक, कानून जानने वाले और एक कुशल सम्प्रेषक हैं. इसीलिए शायद सत्य और धर्म की विजय के प्रतीक नारद को भारत के पहले हिन्दी समाचार पत्र ‘_उदन्तमार्तण्ड’ ने अपने मुखपृष्ठ पर छापा और इसका लोकार्पण नारद जयन्ती के दिन ही किया. नारद आज भी प्रासांगिक हैं, न केवल अपने सार्थक सम्प्रेषण के लिए, बल्कि कुशल शासन और आम व्यक्ति के साथ बंधुत्व भाव के लिए. सीधा अर्थ यह है कि एक व्यक्ति, जो ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंच जाए, वही नारद है. नारद की उपस्थिति दो इतिहास ग्रंथों के निर्माण में प्रत्यक्षत: दिखाई पड़ती है. रामायण तभी लिखी गई, जब नारद राम कथा लिखने के लिए एक परिपूर्ण व्यक्ति की खोज में निकले थे और वाल्मीकि को तमसा नदी के किनारे उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम का चरित्र चित्रित कर रामायण लिखने की प्रेरणा दी. नारद ने वाल्मीकि को कथा पर ध्यान केन्द्रित कर एकाग्र होने का वातावरण उपलब्ध कराया.

महाभारत में भी धर्म का सारा मर्म कहीं न कहीं नारद की पद्धति को उद्घाटित करता है. नारद महाराज युधिष्ठिर की राजसभा में उपस्थित हुए थे और उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर को पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पूर्ण ज्ञान प्रदान किया था. भारतीय परम्परागत साहित्य में भी कहीं न कहीं किसी अध्याय में नारद द्वारा प्रतिपादित स्वधर्म, तंत्र, विधान, राजस्व प्राप्ति, शिक्षा, उद्योग इत्यादि पर उनके दर्शन का प्रभाव पाते हैं. नारद विशेष रूप से सुराज पर भी युधिष्ठिर से मंत्रणा करते हुए भी दिखाई पड़ते हैं. वे धर्मराज से पूछते हैं कि क्या तुम धर्म के साथ अर्थ-चिन्तन पर भी विचार करते हो? सामाजिक विकास और कृषि की स्थिति क्या है? क्या तुम्हारे साम्राज्य में सभी किसान समृद्ध और सन्तुष्ट हैं? क्या तुमने अभावग्रस्त किसानों के लिए ऋण सुविधा उपलब्ध कराई है? नारद प्रशासनिक ढांचे पर भी ध्यान आकर्षित करते हैं. वे मंत्रियों और अधिकारियों के चयन की प्रकृति, उनके चरित्र और सामाजिक प्रतिबद्धता के आवश्यक मानकों पर भी चर्चा करते हैं. नारद नागरिकों के रहन-सहन के जीवन स्तर, उनकी भावनाओं और पारिवारिक दायित्वों के विषय को भी उठाते हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि नारद हमेशा धर्म के प्रचार और नागरिकों के कल्याण के लिए तत्पर दिखाई देते हैं. महाभारत के आदि पर्व में नारद के पूर्ण चरित्र को वेदव्यास ने इस श्लोक में व्यक्त किया है –

अर्थनिर्वाचने नित्यं, संशयचिदा समस्या:.

प्रकृत्याधर्मा कुशलो, नानाधर्मा विशारदा:.

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नारद एक महान विचारक और ‘नारद स्मृति’, ‘नारद भक्ति स्तोत्र’ आदि की रचना करने वाले ग्रंथकार हैं. नारद तीनों लोकों में भ्रमण करने वाले, संवाद करने वाले और सारे विवादों को मिटाने वाले संन्यासी हैं. हम सबको नारद के इस विराट स्वरूप को ही स्वीकार करना चाहिए.

जे. नन्द कुमार

(लेखक प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक एवं केरल से प्रकाशित मलयाली पत्रिका केसरी के पूर्व संपादक हैं।)

असली भारत गांवों में बसता है। यदि किसी आदर्श गाँव को देखना चाहते हैं तो मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के बघुवार गांव चलिए। साफ सुथरी सड़कें, भूमिगत नालियां, हर घर में शौचालय, खेलने के लिए इनडोर स्टेडियम, खाना बनाने के लिए बायोगैस संयत्र। वर्षों से गांव का कोई विवाद थाने तक नहीं पहुंचा। स्कूल व सामुदायिक भवन के लिए जब सरकार का दिया पैसा कम पड़ा तो बघुवार वासियों ने धन भी दिया व श्रमदान भी किया। यह सब 50 वर्षों से चल रही संघ की शाखा व स्वयंसेवकों द्वारा किए जा रहे ग्राम विकास के प्रयासों का नतीजा है।

लगभग 25 वर्ष तक गांव के निर्विरोध सरपंच रहे ठाकुर सुरेंद्र सिंह, ठाकुर संग्राम सिंह एवं हरिशंकर लाल जैसे स्वयंसेवकों ने तत्कालीन सरकार्यवाह भाऊराव देवरस की प्रेरणा से अपने गांव को आदर्श गांव बनाने का निश्चय किया। 50 वर्षों से नियमित चल रही प्रभात फेरी हो या हर घर की दीवार पर लिखे सुविचार या फिर बारिश के पानी को संग्रहित करने की आदत, बघुवार को अन्य गांवों से अलग बनाती है।

1950 से बघुवार की ग्राम विकास समिति समग्र ग्राम विकास के मॉडल पर काम कर रही है। गांव तक पहुंचने वाली 3 किलोमीटर लंबी सड़क यहां के नवयुवकों ने मिलकर बनायी है।

कृषि विशेषज्ञ व संघ के तृतीय वर्ष शिक्षित स्वयंसेवक बघुवारवासी एम.पी. नरोलिया जी बताते हैं कि गांव के लोग कभी भी विकास के लिए सिर्फ सरकार पर निर्भर नहीं रहे। सरकार से मिली राशि में गांव वालों ने डेढ़ लाख रु. मिलाकर पक्का स्कूल भवन बनाया, भ्रमरी नदी पर बने स्टॉपडेम में ढाई लाख रु. देकर खेती के लिए पानी के संकट को भी हल किया। नियमित साफ सफाई, घरों के आगे बने सोखते गड्ढे, भूमिगत नालियों का निर्माण, गांव में वृक्षारोपण, वर्षा जल की हरेक बूंद को सहेजकर सिंचाई में उपयोग करना यह सब गांववालों की आदत में शामिल हो चुका है।

शतप्रतिशत साक्षरता, घरों की दीवारों पर लिखे प्रेरक, ज्ञानवर्धक और संस्कारक्षम वाक्य मन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। 40 प्रतिशत घरों का भोजन गोबर गैस से बनता है। शिशु मंदिर के प्राचार्य रहे नारायण प्रसाद नरोलिया जैसे कुछ लोग समय समय पर विद्यालय जाकर पढ़ाते भी हैं। इसी सरकारी विद्यालय से पढ़कर नरोलिया कृषि संचालक बने तो अवधेश शर्मा लेफ्टीनेंट बने। कुछ डॉक्टर बने व तीन पीएचडी भी कर चुके हैं।

नरसिंहपुर के कलैक्टर रहे मनीष सिंह का मानना था कि आईएएस की तैयारी कर रहे छात्रों को परीक्षा देने से पहले इस गांव को आकर देखना चाहिए, उनकी इस टिप्पणी के बाद विद्यार्थियों के कई बैच गांव देखने आ चुके हैं।