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जम्मू-कश्मीर में बाढ़ का पानी उतर गया है। जिंदगी दोबारा अपनी रफ़्तार पकडऩे के लिए जूझ रही है। तूफान की धुंध खत्म हो गई है। तूफान के दौरान क्या घटा, क्या उजड़ा, कौन बचा सब साफ दिखने लगा है। इन साफ तस्वीरों में कुछ बातें चौंकाने वाली है। सबसे पहली तो यही कि तूफान, आंधी और पानी की प्रलयकारी बौछारों के बीच पीडि़तों की मदद के लिए केवल दो ही हाथ सामने आए एक सेना का और दूसरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का, और हैरत में डालनेवाली दूसरी बात यह है कि घाटी में कुछ लोगों ने मदद के लिए सामने आए स्वयंसेवकों और सैनिकों पर पत्थर बरसाए। लेकिन पत्थर खाकर भी मददगार पीछे नहीं हटे बल्कि डटे रहे। इसका कारण यह था कि पत्थर बरसाने वाले लोग गिरोह-बंद तो थे लेकिन उनकी संख्या कम थी जबकि मदद के आकांक्षी हजारों लोग हसरत की नजरों से अपने मददगारों को देख रहे थे और दुआ दे रहे थे।

पीड़ितों की मदद करना भारतीय सेना के जवानों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की अपनी शैली है। वे स्थान, समूह, वर्ग, वर्ण, धर्म, जाति अथवा आपदा के स्वरूप पर भेद नहीं करते। खबर मिलते ही पहुंचते हैं। भूकंप, रेल दुघर्टनाओं तथा बाढ़ की विभीषिका में ऐसे उदाहरण भी हैं जब स्वयंसेवक पहले पहुंचे और सरकार बाद में। अपने उसी संगठन के तहत स्वयंसेवक कश्मीर घाटी में पीड़ितों की सहायता के लिए पहुंचे। हालांकि संघ पर यह आरोप हमेशा लगता है कि वह केवल हिन्दुत्व के लिए काम करता है। हिन्दू का अर्थ किसी के लिए कुछ भी हो लेकिन संघ की नजर में हिन्दुस्तान में रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति ‘हिन्दू’ है, भले ही उसका पंथ और सम्प्रदाय कुछ भी हो। इसी भाव के साथ स्वयंसेवक घाटी में पहुंचे थे जबकि वहां 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। घाटी में एक समूह ऐसा है जो सदैव भारत विरोधी वातावरण बनाता है। भारत और भारत से जुड़े तमाम संदर्भों का विरोध करता है। वह नहीं चाहता कि भारतीय सेना या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्र को समर्पित संगठन की साख घाटी में प्रतिष्ठित हो। पत्थर मारने के पीछे असली मंशा यही थी। अब पत्थरों की बौछार के बीच सैनिक और स्वयंसेवकों की सेवा कैमरे में कैद है। इसका विवरण सेना के पास भी है और संघ के पास भी, जो पिछले दिनों लखनऊ में संपन्न संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक में सामने आया।

संघ की इन तमाम सेवाओं को नजर अंदाज करते हुए उत्तरप्रदेश समाजवादी पार्टी के चर्चित नेता आजम खान ने राज्य और केन्द्र सरकार को चिट्ठी लिखी। उनका आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ साम्प्रदायिक राजनीति करता है। उन्हें संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा हिन्दू शब्द का प्रयोग करने पर ऐतराज है। उनका यह भी तर्क हैं कि केन्द्र में भाजपा सरकार आने के बाद संघ के ‘अच्छे दिन’ आ रहे हैं। लगभग ऐसी ही मिलती-जुलती प्रतिक्रिया कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी व्यक्त की। इन दोनों प्रतिक्रिया करनेवालों को ‘इंडियन’ शब्द से एतराज नहीं है जो अंग्र्रेजों का दिया हुआ है और उस शब्द के मूल में भी ‘हिंदू’ शब्द है लेकिन संघ प्रमुख द्वारा ‘हिन्दू’ शब्द के उपयोग पर आपत्ति होती है। प्रजातंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजी राय रखने और व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन सरेआम साम्प्रदायिक राजनीति करनेवाले हैदराबाद के औवेसी के भाषण पर कोई टिप्पणी न हो, या दिल्ली के इमाम बुखारी के कथनों पर कोई प्रतिक्रिया न हो तब इनकी प्रतिक्रियाओं पर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। खासकर तब जब संघ के सेवा कार्यों में भेदभाव नहीं दिखता। संघ के स्वयंसेवक सेवा के लिए यदि उत्तराखंड जाते हैं तो कश्मीर की घाटी में भी जाते हैं। बाढ़ में, रेल-बस दुर्घटनाओं अथवा भूंकप से प्रभावित क्षेत्रों में भी वे बिना जाति-धर्म पूछ सेवा करते हैं किन्तु आजम खान इस सेवाकार्य पर कोई टिप्पणी नहीं करते।

कश्मीर की आपदा में एक खास बात और देखी गई। मौलाना इमाम बुखारी, आजम खान और हैदराबाद के औवेसी, जिनकी जुबान पर केवल मुसलमानों की बात होती है, इनमें से कोई व्यक्ति या इनका प्रतिनिधि अथवा इनके द्वारा संरक्षित संस्थाओं में कोई भी कश्मीर घाटी में राहत या सेवा के लिए नहीं पहुंचा। वहां अगर सबसे पहले कोई पहुंचा तो संघ के स्वयंसेवक और सुरक्षा बलों के जवान, जिन्हें कुछ लोगों ने अपशब्द कहकर या पत्थर मारकर  भगाने की कोशिश की बावजूद इसके वे डटे रहे। अपने दायित्व को पूरा करके ही वहां से रवाना हुए। संघ के इन्हीं सेवाकार्यों का नतीजा है कि उसका काम निरंतर विस्तार पा रहा है। संघ की स्थापना से आज तक यह अकेला संगठन है जिसे निरंतर विस्तार मिल रहा है। जो विपरीत परिस्थिति में भी अपनी जगह कायम रहा।

संघ द्वारा की जानेवाली यह जमीनी सेवा और विचलित हुए बिना राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का भाव ही है जिससे हजार विरोधों के बावजूद संघ के काम बढ़ रहे हैं। कार्यकारी मंडल के सामने संघ ने कार्य-विस्तार का जो विवरण प्रस्तुत किया, उसके अनुसार देश में43,500 शाखाएं नियमित लग रही हैं। जबकि 11,854 साप्ताहिक शाखाएं इससे अलग हैं। वे लोग साप्ताहिक शाखा में जाते हैं जो किन्हीं कारणों से नियमित शाखाओं में नहीं जा पाते, जबकि इस वर्ष 59 हजार स्थानों पर गुरुपूजा हुई। भारत के अलावा36 अन्य देशों में संघ का प्रत्यक्ष कार्य चल रहा है। इनमें अमेरिका में 140, इंग्लैंड में80 और श्रीलंका में 70 स्थानों पर संघकार्य हो रहे हैं।

राजनीतिक या अन्य कारणों से मीडिया में कुछ लोग कुछ भी प्रचारित करें लेकिन संघ के प्रति लोगों का विशेषकर नौजवानों का रुझान किस प्रकार बढ़ रहा है। इसका उदाहरण उस वेबसाइट से मिलता है जिसपर 67 हजार लोगों ने संघ से जुडऩे के लिए पंजीयन कराया। प्रत्यक्ष शाखाओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक ज्वाइन आर.एस.एस. नाम से एक वेबसाइट बनाई है। इस वेबसाइट को प्रतिदिन हजारों लोग देखते हैं और संघ से जुडऩे की इच्छा दिखाते हैं। पिछले दिनों हम ‘आन-लाइन’ स्वयंसेवकों का एक समागम कर्नाटक में आयोजित किया गया जिसमें चार हजार लोगों ने हिस्सा लिया। इस समागम में 650 महिलाएं थीं जिन्होंने ‘समर्थ भारत’ का संकल्प लिया।

इस समागम में आए 35 लोगों ने सेवा के लिए पूर्णकालिक बनने की इच्छा व्यक्त की। इनमें सेवा की प्रेरणा का भाव संघ के सेवाकार्यों को देखकर ही जगा। वेबसाइट के माध्यम से शिविर में आए कार्यकर्ताओं को 47 प्रकार के सेवाकार्यों का परिचय दिया गया। इन कार्यकर्ताओं को यह संकल्प भी दिलाया गया है कि बिना किसी भेदभाव, बिना परवाह किए सेवा के संकल्प को पूरा करते हैं। इसका उदाहरण कश्मीर में आए प्राकृतिक आपदा के समय देखने को मिला। स्वयंसेवक पत्थर खाकर भी सेवा के कामों में जुटे रहे।

विजिगीषा का अर्थ है, विजयकी इच्छा, विजय की आकांक्षा यह विजिगीषा मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में अत्यंत आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में बताते हैं कि विश्‍व में दो प्रकार के लोग होते हैं। एक दैवीगुण संपदावाले और दुसरे आसुरी गुण संपदावाले। भगवान के शब्द हैं, ‘द्वौ भूतसर्गो लोकेस्मिन्, दैव आसुर एव च’ (अध्याय 16, श्‍लोक 6)। इन दैवी संपदावाले लोगों और आसुरी संपदावाले लोगों में संघर्ष अनिवार्य है। हम संघर्ष टालने का कितना भी प्रयत्न करें, वह आसुरी संपदावालों के हठधर्मिता के कारण असफल हो जाता है। फिर संघर्ष अपरिहार्य होता है। इस संघर्ष में विजय प्राप्त करना नितराम आवश्यक हो जाता है। यह विजय की आकांक्षा ही विजिगीषा है।
रामायण का उदाहरण
रामायण का उदाहरण लीजिये। रावण सीता का अपहरण करता है। अंगद ने मनाया, विभीषण ने मनाया, फिर भी रावण मानता नहीं। मातृवत् परदारेषु यह अपनी संस्कृति का एक आदर्श है। परस्त्री को माता के समान देखो, यह इसका अर्थ है। रावण नहीं मानता। युद्ध अटल हो जाता है। फिर युद्ध से डरना नहीं चाहिये।  प्रभु रामचंद्र को युद्ध करना ही पडता है। और वे इसमें विजय पाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में भी ऐसाही प्रसंग आता है। कौरव और पाण्डवों में युद्ध होता है। द्यूत में कौरवों की ओर से कुटिलमति शकुनी है। और पाण्डवोंकी ओर से युधिष्ठिर हैं। द्यूत में युधिष्ठिर हार जाते हैं। द्यूत की शर्त के कारण युधिष्ठिर को अपने भाईयों के साथ बारह वर्ष वनवास में, और एक वर्ष अज्ञातवास में रहना पडता है। अज्ञातवास में यदि उन को किसीने पहचाना तो उनको फिरसे 12 वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पडेगा। यदि इस शर्त का परिपालन हुआ, तो कौरव प्रमुख दुर्योधन पाण्डवों का संपूर्ण राज्य उन्हें लौटाएगा। पाण्डव शर्त पूर्ण कर आते हैं। किन्तु दुर्योधन उनका राज्य लौटाने से मुकर जाता है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं मध्यस्थ बनकर आते हैं। और कहते हैं कि पूरा राज्य रहने दो, केवल पाँच गाँव दीजिये। दुर्योधन का उत्तर रहता है, पाँच गाँवों की क्या बात करते हो, सुई के नोंक पर रह सकेगी इतनी भी जमीन नहीं मिलेगी।
अब युद्ध अटल हो जाता है। और युद्ध में विजय प्राप्त करना अनिवार्य रहता है। कुरुक्षेत्र के रण में 18 दिनों तक पाण्डवों और कौरवों के बीच घनघोर युद्ध होता है। इतना घनघोर की 18 अक्षौहिणी की विशाल सेना में से केवल दस लोग जीवित बचते हैं। पाण्डवों में सात और कौरवों में तीन. बस्स!
कौरवों के पक्ष में बडे बडे रणधुरंधर हैं। भीष्माचार्य हैं, द्रोणाचार्य हैं, महारथी कर्ण हैं। विजय प्राप्त करने का मतलब होता है,इनको परास्त करना। मतलब होता है इनको मारना। फिर भगवान कृष्ण अपना कौशल दिखाते हैं। वे शत्रुओं की कमजोरी का ध्यान रखते हैं। युद्ध में इसकी बहुत आवश्यकता होती है। विजय पानी है तो दुष्मनों की दुर्बलता जाननी ही पड़ती है। इसलिए भगवान कृष्ण ने भीष्माचार्य के सामने शिखण्डी को खडा किया। भीष्माचार्य की प्रतिज्ञा थी कि जो नर भी नहीं, नारी भी नहीं,नपुंसक है, उसपर शस्त्र नहीं चलाएंगे। और अर्जुन ने शिखण्डी के पीछे खडे होकर भीष्माचार्य के ऊपर शरवृष्टि की। भीष्माचार्य रथ में गिर गये। कोई कहेगा कि यह पापमार्ग है। नहीं। हमनें नित्य संदर्भ ध्यान में लेना चाहिए। भीष्माचार्य की विजय होती तो राज्य भीष्माचार्य का नहीं होता। वह दुर्योधन का ही होता। उस दुर्योधन का कि जिसको कपट द्यूत से परहेज नहीं थी। अपनी भाभी को भर सभा में विवस्त्र करने की शरम नहीं थी। मतलब हैं, भीष्माचार्य जैसे ज्ञानी, सत्यप्रतिज्ञ पुरुष व्यक्ति का राज्य नहीं होता। वह दुष्ट दुर्योधन का होता। और भीष्म पितामह उसकी ओर से रणमैदान में खड़े थे। उन को मारना सत्पक्ष की विजय के लिए अवश्यंभावी था।
अश्‍वत्थामा मृत:
भीष्माचार्य के पश्‍चात द्रोणाचार्य कौरव-सेना के सेनापति बने। वे पाण्डवों के भी गुरु थे। किन्तु दुर्योधन के पक्ष में थे। द्रोणाचार्य भी अत्यंत पराक्रमी थे। किन्तु उन की एक दुर्बलता थी। अपने पुत्र अश्‍वत्थामा पर उनका असीम प्रेम था। उनको परास्त करने के लिए अश्‍वत्थामा को मारना आवश्यक था। भीम ने अपना ही एक बडा हाथी, जिसका नाम अश्‍वत्थामा था, उसको मार डाला और द्रोणाचार्य सुन सके इतनी जोर से चिल्लाया कि अश्‍वत्थामा हत:। द्रोणाचार्य ने उसकी बात को नहीं स्वीकारा और अभूतपूर्व पराक्रम प्रकट कर पाण्डवों की सेना की जबरदस्त हानि की। तब ़श्रीकृष्ण की सलाह से कि इस समय सत्यात् ज्याय: अनृतं वच: यानी इस समय सत्य से असत्य बोलना श्रेयस्कर हैं, युधिष्ठिर ने अश्‍वत्थामा मृत: यह कहा। आगे नरो वा कुंजरो वायानी आदमी या हाथी नहीं जानता यह भी कहा। किन्तु रणवाद्यों की गंभीर आवाज में द्रोणाचार्य उसे नहीं सुन सके। उन्होंने शस्त्र नीचे डाल दिए। और धृष्टद्युम्न ने उनका शिरश्र्छेद किया।
क्व ते धर्मस्तदा गत:
कर्ण के बारे में भी यही बात है। द्रोणाचार्य के पश्‍चात कर्ण कौरव सेना का सेनापति बना। अर्जुन के साथ युद्ध करते समय उसके रथ का एक पहिया जमीन में धस गया। तब, रथ से नीचे उतरकर कर्ण अर्जुन से कहता है, ‘हे अर्जुन मैं नि:शस्त्र हूँ। और नि:शस्त्रों पर वार करना यह अधर्म है। तू धर्मयुद्ध के नियमों का जानकार है। अत: जरा रुक, मैं रथ का पहिया उपर उठाकर, तुझसे लडूंगा। मैं ना तुझसे डरता हूँ, ना कृष्ण से। तब सचमुच अर्जुन थम जाता है, तब श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘इस पर बाण चलाओ। दुष्ट लोग जब संकट में पडते हैं, तब उनको धर्म का स्मरण होता है। और कर्ण से सवाल करते हैं कि जब द्रौपदी को भर सभा में विवस्त्र करने का आप लोगों ने प्रयास किया तब तुम्हारा धर्म कहाँ गया था। क्व ते धर्मस्तदा गत:। धर्मयुद्ध का नियम है कि एक व्यक्ति पर अनेकोंने शस्त्राघात नहीं करना चाहिए। तुम अनेकों ने अभिमन्यु को घेर कर उसकी हत्या की। तब क्व ते धर्मस्तदा गत: क्व ते धर्मस्तदा गत:’, इस वचन से अन्त होनेवाले, भगवान श्रीकृष्ण के नौ प्रश्‍न महाभारत के कर्णपर्व में है। तात्पर्य यह है कि विजय पाने हेतु,शत्रु की दुर्बलताओंका भी ध्यान रखना चाहिए। हम भारतीय यह बात भूल गए। अत: पराक्रमी होते हुए भी हमें हार खानी पडी। इसके दो उदाहरण मैं यहां प्रस्तुत करता हूँ।
पृथ्वीराज और घोरी
पहला उदाहरण पृथ्वीराज चौहाण का है। महम्मद घोरी ने पृथ्वीराज चौहाण के राज्यपर आक्रमण किया। लडाई में घोरी की हार हुई। घोरी पकडा गया। किन्तु घोरी ने गयावया करते ही पृथ्वीराज ने उसे छोड दिया। क्यों? उसने गलती से नहीं, सोच समझ के आक्रमण किया था। उसका दण्ड उसको मिलना आवश्यक था। एैसे ही राजा को युक्तदण्ड कहते हैं। घोरी मुक्त होने का बाद स्वस्थ नहीं बैठा। उसने फिर से आक्रमण किया। अब बारी पृथ्वीराज के हार की थी। घोरी ने उसे छोडा नहीं। वह अपने राज में पृथ्वीराज को ले गया। मुसलमानों की रीत का अवलंबन कर उसको पहले अन्धा किया। और बाद में उसकी कत्ल की। विजय की परिपाटी पृथ्वीराज भूल गए। भारत में पश्‍चिम से आनेवाली मुसलमानी सत्ता का प्रारंभ हुआ।
अल्लाउद्दीन खिलजी
दुसरा उदाहरण अल्लाउद्दीन खिलजी का। उसने चित्तौेड पर आक्रमण किया। क्योंकि चित्तौड नरेश की लावण्यवती पत्नी पद्मिनी उसे चाहिये थी। परस्त्री की चाह रखना अपने संस्कृति में महान पाप बताया हैं। किन्तु अल्लाउद्दीन भारत की संस्कृति को माननेवाला नहीं था। उसने पद्मिनी की बेशर्मी से मांग की। जब चित्तोड काबीज करना सम्भव नहीं हुआ, तो उसने शान्ति का नाटक रचा। कहा कि, ‘पद्मिनी नहीं चाहिए, उस लावण्यवती को केवल देखना चाहता हूँ। फिर भी राजपूत नहीं माने।  तो अल्लाउद्दीन ने कहा कि केवल आइने में उसे देखूंगा और चला जाऊँगा। राजपूत, अल्लाउद्दीन चित्तौड क्यों आया था, यही भूल गए। आयने में प्रतिबिम्ब दिखाने से लडाई टल सकती है, ऐसा सोचकर उसके लिए कबूल हो गये। अल्लाउद्दीन आया और आयने में पद्मिनी का सौंदर्य देखकर खुश हुआ। इस सब बातचीत में विश्‍वास निर्माण हुआ। और पद्मिनी के पतिदेव, मेहमान का आदर करने के लिए अल्लाउद्दीन को उसकी छावनी में छोडने के लिए उसके साथ गये। अल्लाउद्दीन ने वहीं उसे कैद किया और कहा कि पद्मिनी मिलेगी तभी छुटकारा होगा। राजपूत तो इसे माननेवाले नहीं थे। फिर लडाई हुई। बातचीत के दौरान, अल्लाउद्दीन के दूतों का किलेपर कई बार आवागमन हुआ। किले के दुर्बल स्थानों को उन्होंने देख लिया। वे किलेपर चढ गए। अपनी सतीत्व की रक्षा के लिए दो हजार राजपूत रमणीयोंने जौहर कर अपने देह अग्नि को समर्पित किए। पद्मिनी अल्लाउद्दीन को नहीं मिलीं। किन्तु चित्तौड उसके कब्जे में आ गया। विजिगीषा होती, तो अल्लाउद्दीन जब स्वयं पद्मिनी के रूप को आयने में देखने आया, तब जिंदा नहीं लौटता।
छत्रपति शिवाजी
यह विजिगीषा छत्रपति शिवाजी महाराज में थी। विजापुर के बादशहा का सेनापती अफजल खाँ, दरबार में शिवाजी को जिन्दा या मरा पेश करता हूँँ, इस प्रतिज्ञा के साथ बडी भारी सेना लेकर निकला। शिवाजी के पास सेना छोटी थी। मैदान में अफजलखान कामुकाबला नहीं किया जा सकता था। अफजलखान की नीति थी, शिवाजी को कैसे भी करके मैदान में लाना। शिवाजी की नीति थी, कि अफजलखान को संकरी घाटी में लाना। शिवाजी को क्रोध के वश में लाने के लिए, अफजलखान ने समूचे महाराष्ट्र का अत्यंत पवित्र स्थल पंढरपुर का मंदिर भ्रष्ट किया। फिर भी शिवाजी शान्त ही रहे। फिर शिवाजी की कुलदेवता तुलजा भवानी के मन्दिर को उसने भ्रष्ट किया। फिर भी शिवाजी शान्त। शिवाजी ने भयभीत होने का बहाना धारण किया। मित्रता का हाथ बढाया। और अफजलखान को प्रतापगड की घनी झाडी में आने को प्रोत्साहित किया। दोनों की व्यक्तिगत भेेंट तय हुई। आलिंगन होते ही शिवाजी ने अपने बाघनख उसके पेट में घुसा दिए। कुछ लोग कहते हैं कि पहला वार अफजलखान ने किया और बाद में आत्मरक्षा के लिए शिवाजी ने बाघनख चलाए। यह सहीं नहीं है। मिर्झा राजा जयसिंह को लिखे पत्र में शिवाजी ने स्वयं लिखा है कि अफजलखान के प्रसंग में मैं पहला वार नहीं करता तो यह खत मैं कैसे लिख पाता। इस संपूर्ण प्रकरण में शिवाजी महाराज एक क्षण भी नहीं भूले कि अफजलखान उन्हें जिंदा या मरा, आदिलशाह के दरबार में हाजिर करने का बीडा उठा कर निकल पडा था। अल्लाउद्दीन के प्रसंगपर यदि चित्तौडगढ पर शिवाजी होते तो अल्लाउद्दीन जिंदा नहीं लौट पाता।
विजिगीषा की महत्ता
मनुष्य जीवन में, जब आसुरी गुणोंवालों से मुकाबला होता है, तब विजय ही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। आसुरी शक्ति को परास्त करना यहीं एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। अन्यथा आसुरी शक्तिवालों से दुनिया की रक्षा असंभव है। आखिर कीर्ति विजयी पुरुष की ही होती है।  महाकवि कालिदास अपने रघुवंश महाकाव्य की प्रस्तावना में लिखते हैं कि मैं, किन गुणोंसे युक्त रघुवंश के राजाओं का वर्णन करने जा रहा हूँ। उनके अनेक गुणों में से ‘‘यथाकालप्रबोधिनाम्’’ (उचित समय पर जागनेवाले), ‘यथापराधदण्डानाम्’ (अपराध के अनुरूप दण्ड देनेवाले) और सबसे महत्त्वपूर्ण है यशसे विजिगीषूणाम्’ (कीर्ति के लिए विजय की आकांशा रखनेवाले) इन गुणों का भी वर्णन करता है। विजिगीषा की ऐसी महत्ता है। राजपूत अत्यंत पराक्रमशाली थे, किन्तु विजयशाली नहीं बन पाए।
मा. गो. वैद्य
2.10.14.

दस्तारबंदी के कार्यक्रम में मोदी को न बुलाने के इमाम बुखारी के फैसले को विकृत सेक्युलरवाद की देन बता रहे हैं – बलबीर पुंज

 

देश की सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद किस धरती पर आबाद है? यदि वह मस्जिद भारत में आबाद है तो वहां के इमाम की राष्ट्रभक्ति किस देश के साथ जुड़ी होनी चाहिए? दिल्ली स्थित ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने अपने बेटे के दस्तारबंदी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित न कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को न्यौता भेजा है। अपने बेटे को नायब इमाम बनाने के मौके पर सैयद बुखारी का आचरण उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इमाम का काम मजहबी मामलों तक सीमित होना चाहिए, किंतु विकृत सेक्युलरवाद ने एक इमाम के अंदर खुद को निजाम समझने का अहंकार पैदा कर दिया है। बुखारी का आचरण उसी सेकुलर मानवर्धन का दुष्परिणाम है।

मुगल शासक शाहजहां ने आगरा में ताजमहल बनवाने के बाद दिल्ली में जामा मस्जिद का निर्माण कराया था। इस मस्जिद की देखरेख और मजहबी कार्यो को संपन्न कराने के लिए शाहजहां ने 1656 ई. में उजबेकिस्तान केबुखारा से सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी को बुलाकर उन्हें जामा मस्जिद का पहला इमाम बनाया था। तब से जामा मस्जिद की इमामत इसी परिवार के पास है। आजकल के जमाने में जब राजे-रजवाड़े नहीं रहे, जामा मस्जिद मुगलिया राजशाही को ढो रहा है। विडंबना यह है कि विकृत सेक्युलरवाद के कारण जामा मस्जिद मजहबी कामों की जगह राजनीति में अनावश्यक दखलंदाजी भी करता आया है। ऐसे समय में जब पाकिस्तान बिना किसी उकसावे के संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रहा हो, सीमा पर गोलीबारी कर निरपराध नागरिकों की हत्या कर रहा हो और आतंकवाद को पोषित कर भारत को निरंतर खंडित करने की साजिश में जुटा हो, उस शत्रु देश के प्रधानमंत्री को आमंत्रित करना क्या राष्ट्रद्रोह नहीं है? भारतीय प्रधानमंत्री को आमंत्रित नहीं करने के अपने निर्णय की सफाई देते हुए बुखारी ने कहा है, ‘‘पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमंत्री से ज्यादा पसंद है। भारत के मुसलमान नरेंद्र मोदी को अपना नेता नहीं मानते। वह भले ही प्रधानमंत्री चुने गए हों, किंतु भारत के मुसलमानों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।’’ वास्तव में बुखारी को पूरे भारतीय मुस्लिम समुदाय का रहनुमा होने का दंभ हो रहा है तो इसके लिए विकृत सेक्युलरवाद दोषी है, जो हर चुनाव में मुस्लिमों का साथ पाने के लिए बुखारी के आगे सजदा करता आया है। वर्तमान इमाम के पिता अब्दुल्ला बुखारी के जमाने से प्रारंभ हुई यह विकृति मौजूदा इमाम के काल में अपने निकृष्टतम स्तर पर है।

1980 के चुनाव में अब्दुल्ला बुखारी ने इंदिरा गांधी के पक्ष में फतवा जारी किया था। आपातकाल की ज्यादतियों के कारण जनता ने 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी को सत्ता से उखाड़ फेंका था। स्वाभाविक रूप से जब 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी हुई तो जामा मस्जिद का सियासत में हस्तक्षेप और वहां के इमाम के अंदर राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ीं। आलम यह था कि एक ओर जब 15 अगस्त को इंदिरा गांधी लाल किले से देश को संबोधित करती थीं तो दूसरी ओर अब्दुल्ला बुखारी जामा मस्जिद से तकरीर करते थे। सेक्युलरवाद के एक और नामवर झंडाबरदार वीपी सिंह के कार्यकाल में अब्दुल्ला बुखारी की तूती बोलती थी। उनके दबाव में ही जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन को वीपी सिंह ने वापस बुला लिया था। अब्दुल्ला बुखारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाने के लिए सैयद बुखारी ने 1980 में आदम सेना का गठन किया था, किंतु उन्हें जल्दी ही यथार्थ से दो-चार होना पड़ा और अपनी राजनीतिक दुकान बंद करनी पड़ी। वह महत्वाकांक्षा अभी मरी नहीं है तो इसका कारण सेक्युलर जमात द्वारा किया जाने वाला मानवर्धन है। सैयद बुखारी अपने हितों के आधार पर सियासती खेमा बदलने में माहिर हैं। उनकी फितरत को जानते हुए भी हर चुनाव में खुद को सेक्युलर कहने वाले दलों में उनका साथ पाने की होड़ लगती है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बुखारी की देहरी पर याचक बनी थीं। बुखारी के फतवे के बावजूद मुस्लिम समाज ने नरेंद्र मोदी पर एतबार किया। भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत में मुसलमानों का भी बड़ा योगदान है। पिछले तीन बार से दिल्ली के मटियामहल से विधायक चुने जा रहे शोएब इकबाल के साथ बुखारी का छत्तीस का आंकड़ा है। किंतु हर चुनाव में इकबाल बड़े अंतर से जीत दर्ज करते आ रहे हैं। जब जामा मस्जिद के बगलगीर मुसलमान बुखारी पर विश्वास नहीं करते तो शेष मुस्लिम समाज उन्हें अपना रहनुमा कैसे मान सकता है?

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बुखारी को समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव सिर आंखों पर बिठाए घूमते रहे, किंतु बुखारी अपने दामाद को बेहटा से जिता नहीं पाए, जहां 80 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। बाद में बुखारी ने अपने दामाद को मंत्री बनाने और भाई को राज्यसभा में भेजने के लिए सपा से ब्लैकमेलिंग की। विफल रहने पर इटावा में रैली कर मायावती के गुण गाने लगे। सैयद बुखारी की यही फितरत रही है। 2012 में जिस सपा को इन्होंने समर्थन दिया था उसे वह 2007 और 2009 के चुनाव में मुसलमानों का शत्रु बताया करते थे। आज बुखारी की नजर में प्रधानमंत्री के लिए सबसे मुफीद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं, जिनके संरक्षण में पश्चिम बंगाल जिहादियों के गढ़ के रूप में उभरा है। वहां वोट बैंक के लालच में बांग्लादेशी घुसपैठियों को अभयदान प्राप्त है, जो जिहादी संगठनों की कठपुतली बन इस देश को रक्तरंजित करने की साजिश में जुटे हैं। जामा मस्जिद देश की अमानत है। इस पर वक्फ बोर्ड का हक है। इसे पारिवारिक मिल्कियत समझ दस्तारबंदी को पारिवारिक आयोजन बनाने का हक बुखारी को किसने दिया?

इस देश के सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को कसूरवार नहीं माना है। गुजरात के मुसलमानों के बाद शेष भारत के मुसलमानों ने भी मोदी को स्वीकारा है। गुजरात दंगों का प्रलाप करने की जगह बुखारी को ईरान के पूर्व राष्ट्रपति खातमी से मिली नसीहत सदा याद रखनी चाहिए, जो उन्होंने 2003 के भारत दौरे के दौरान बुखारी को दी थी। खातमी के भारत आगमन पर उलमा और बुद्धिजीवियों की बैठक आयोजित की गई थी, जिसका बुखारी ने यह कहकर बहिष्कार किया था कि खातमी ने अपने दौरे में भारतीय मुसलमानों की दुर्दशा पर कुछ नहीं कहा। इस पर खातमी ने कड़े शब्दों में ऐसी मानसिकता की निंदा करते हुए कहा था, ‘‘भारतीय मुसलमानों को अपने विवाद आपसी विचार-विमर्श से दूर करने चाहिए।’’ स्वाभाविक है कि ऐसे माहौल को विकसित करने के लिए बुखारी जैसे लोगों को हाशिये पर डालने की आवश्यकता है। बुखारी के पाकिस्तान प्रेम पर मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिक्रिया एक शुभ संकेत है।

(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)

समादरणीय श्री ब्रह्मविद्यानंदजी महाराज

सादर प्रणाम

मेरा लेख जो ‘शंकराचार्य, साईबाबा और हिन्दू धर्म’ इस शीर्षक से र्मैने लिखा था, उस के संदर्भ में आपने अपनी प्रतिक्रिया जो प्रकाशनार्थ भेजी, उसकी एक प्रति आपने मुझे भेजी वह मैंने पढी। मैं इस अनुग्रह के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ। छत्तीसगढ के किस अखबार में मेरा लेख प्रकाशित हुआ यह मैं नहीं जानता। मैंने दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक के अतिरिक्त किसी भी अन्य समाचारपत्र को वह लेख नहीं भेजा था। ‘पाञ्चजन्य’ ने उसे प्रकाशित नहीं किया यह बात अलग है। संभवत:, छत्तीसगढ के उस अखबार ने मेरे ब्लॉग से वह लेख उद्धृत किया होगा। आप भी मेरे अन्य लेख उस ब्लॉग से पढ सकते हैं। ब्लॉग है mgvaidya.blogspot.com छत्तीसगढ के उस अखबार में शीर्षक में अपने स्वयं का ‘आस्था’ शब्द जोड दिया है। सम्पादक का वह अधिकार है। मेरी उस पर कोई आपत्ति नहीं।

अब बात आपके लेख की। आपने अपने लेख में झारखण्ड के एक आदिवासी का जो उदाहरण दिया वह यहाँ गैरलागू है। उस ‘आदिवासी’ व्यक्ति को ईसाई बनाया गया। यहाँ, साईबाबा जो जन्म से मुसलमान थे, उनको हिन्दू बनाया गया है। उनकी पूजा आरती करना, या हिन्दूओं की अन्य देवताओंके समान उनकी मूर्ति प्रतिष्ठित करना यह हिन्दूकरण है। उसका स्वागत करना चाहिये। अपने हिंदुस्थान के इतिहास में शक, हूण, कुशान, यवन (यानी ग्रीक) आक्रामक करके आये। उन्होंने यहाँ विजय पाकर यहीं रहना पसन्द किया। काल के ओघ में वे सारे हिन्दू समाज में विलीन हो गये। गुजरात के गिरनार पर्वत पर रुद्रदामन् राजा का जो शिलालेख मिला है, उस में रुद्रदामनने अपनी पूर्वपीठिका बतायी है। उनके पिता का नाम जयदामन् था और पितामह का नाम चेष्टन था। चेष्टन के पुत्रपौत्रों ने हिन्दू नाम स्वीकृत किये। इसी तरह से शक, हूण और कुशान भी विशाल हिन्दू धर्म में और समाज में विलीन हो गये। अत:,साईबाबा को हिन्दू बनाया गया है, इसका आनंद मानना चाहिये कि दु:ख? आप के महाराज जैसे पीठाधीशों और मठाधीशों ने इसी प्रकार अपने हिन्दू समाज से अलग हुये अपने बंधुओं को फिर से अपने समाज में लाने के लिये प्रयत्नशील होना आवश्यक है।

हमारी प्राचीन काल से चली आयी ‘धर्म’ की अवधारणा को सभी ने ध्यान में लेना चाहिये। उपासना यह धर्म का केवल एक अंग है, सम्पूर्ण धर्म नहीं। ‘धर्म’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘धृ’ धातु से है और ‘धृ’ का अर्थ जोडना, धारण करना है। महाभारत में लिखा है, धर्मो धारयति प्रजा:। धर्म वह है जो प्रजा का धारण यानी रक्षण, पोषण करता है। उसी में लिखा है कि धारणाद् धर्म इत्याहु: -अर्थ स्पष्ट है कि वह धारण करता है इस लिये उसे धर्म कहते हैं।

किस की धारणा करता है ‘धर्म’? सम्पूर्ण विश्‍व की, ब्रह्माण्ड की भी कह सकते हैं। विश्‍व में चार प्रमुख अस्तित्व हैं। एक है मानवव्यक्ति। दूसरा है मानवसमष्टि। मानवव्यक्ति समष्टि का अंश है । किन्तु समष्टि उसके बाहर भी है। किन्तु विश्‍व मानवसमष्टि के साथ समाप्त नहीं होता। क्यौं कि यहाँ पशु-पक्षी हैं,पहाड-नदीयाँ हैं- वृक्ष और वन भी हैं। यानी चराचर सृष्टि है। मानवसमष्टि इस सृष्टि का अंश है। और चौथा और सबसे महत्त्व का अस्तित्व है चैतन्य। जिसको मैं परमेष्ठी कहता हूँ। यह सब में है और सब के बाहर भी है। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठी इन चारों को जोडनेवाला जो सूत्र है इसका नाम ‘धर्म’ हैं। जो विधा, अपने को व्यापकता से जोडती है वह ‘धर्म’ बन जाती है। अपनी भाषा के कुछ शब्द लीजिये। जैसे धर्मशाला, धर्मार्थ अस्पताल, धर्मकांटा, राजधर्म, पुत्रधर्म आदि। ‘धर्मशाला’ में कौनसी उपासना होती है? फिर ‘धर्मशाला’ क्यौं? कारण हम अपने लिये कितना भी बडा और सुंदर मकान बनाइये वह‘धर्म’ नहीं। जब औरों के निवास की व्यवस्था करते हैं, तब ‘धर्मशाला’ खडी होती है। हम अपने लिये दवाईयों का कितना भी प्रबन्ध करें, वह ‘धर्म’ नहीं है। जब अन्यों के स्वास्थ्य की चिन्ता और व्यवस्था होती है, तब ‘धर्मार्थ अस्पताल’ बनता है। यह स्वयं को व्यापकता से जोडना है। ‘राजधर्म’ क्या राजा की उपासना है जो प्रजा की नहीं? जिन कर्तव्यों से राजा अपने को प्रजा से जोडता है वह राजधर्म है। और पुत्र जिन कर्तव्यों से स्वयं को माता-पिता से जोडता है वह पुत्रधर्म होता है। यही समष्टि धर्म है।

सृष्टि के साथ भी जोडने की व्यवस्था है। आवश्यकता है सम्मान से और आदर से जोडना चाहिये। अत: सृष्टि को हम मातृस्वरूप में देखते है। नदी लोकमाता बनती है। गंगामैय्या होती है। भूमि, भूमाता या मातृभूमि बतनी है। गौ-गोमाता बनती है। अचल हिमालय देवतात्मा कहलाया जाता है। पशुओं को पवित्रता अर्पण करने हेतु, उनको किसी ना किसी देवतास्वरूप से जोड दिया गया है। बैल को शंकरजी के साथ, गौ को भगवान् कृष्ण के साथ, हंस को सरस्वती के साथ, साँप को भी शंकर जी के साथ, छोटे चूहे को भी गणेशजी के साथ। इसी प्रकार वनस्पतियों को भी। तुलसी भगवान् विष्णु के लिये। बिल्व शंकर जी के लिये। दूर्वा गणेश जी के लिये। औंदुबर दत्तात्रेय के लिये और वटवृक्ष सावित्री के साथ।

अन्तिम सीढी जो है वह परमेष्ठी के साथ जोडने की। यह उपासना का दायरा है। आपने पूछा कि एकं सत् का क्या अर्थ है। वह है परमात्मा या परमेष्ठी। वही सत् यानी अक्षय है। किन्तु उस की उपासना की अनेक विधायें हो सकती हैं। विप्रा बहुधा वदन्ति का मतलब है बुद्धिमान लोक अनेक विधाओं से उसका वर्णन कर सकते हैं। यानी नाम अनेक हो सकते हैं। और अलग अलग नाम होने  के लिये रूप भी अनेक होना आवश्यक है। इस लिये हम अपने उपासना के लिये किसी रूप का या नाम का स्वीकार कर सकते हैं। कुछ थोडे ऐसे भी हो सकते हैं कि जो निराकार, निर्गुण की भी उपासना कर  सकते हैं। उपासना को ही परमार्थसाधना कहते हैं।

किन्तु विश्‍व जैसा पारमार्थिक है वैसाही वह भौतिक भी है। ‘धर्म’ दोनों की चिन्ता करता है और व्यवस्था निहित करता है। अत: ‘धर्म’ की वैशेषिकों ने जो परिभाषा की है वह भी ध्यान में लेनी चाहिये। वह यह यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म: यानी जिस से ‘अभ्युदय’ यानी ऐहिक उन्नति और‘नि:श्रेयस’ यानी पारमार्थिक कल्याण की सिद्धि होती है, वह ‘धर्म’ है। हिन्दू धर्म इस अर्थ में एकमात्र‘धर्म’ है। बाकी सब मजहब, सम्प्रदाय, पंथ एवं आस्थाएँ हैं। इस सबको हिन्दू धर्म में स्थान है। इस लिये डॉ. राधाकृष्णन् ने जो कहा कि ‘Hinduism is not a religion; it is a common-wealth of many religions’ वह एकदम सही है।

हिन्दू धर्म की इस विशाल व्यापकता के कारण ही वेदों की निन्दा करनेवाले गौतम बुद्ध को भी भगवान् का अवतार माना गया है। कवि जयदेव का यह वचन-

निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्

सदयहृदय दर्शितपशुघातम्

केशव धृतबुद्धशरीर । जय जगदीश हरे।

इसका चाहे उतना विस्तार किया जा सकता है। अत: यही विश्राम लेना चाहता हूँ।

हां, और एक बात रही। वह यह आपके गुरू स्वामी स्वरूपानंद महाराज की। आप ही अपने मन में सोचे कि अन्य पीठों के भी शंकराचार्य है। वे विवाद का विषय क्यौं नहीं बनते और स्वरूपानंद जी महाराज ही क्यौं? मैंने इस विषय का अधिक विस्तार करने की आवश्यकता नहीं। समझनेवाले समझ सकते हैं।

अस्तु। शेष शुभ।

स्नेहांकित

मा. गो. वैद्य