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श्री देवीदास आर्य का जन्म तीन जून, 1922 को ग्राम केहर (जिला सक्खर, सिन्ध) में श्री विद्याराम एवं श्रीमती पद्मादेवी हजारानी के घर में हुआ था। 1939 में मुस्लिम दंगों के कारण पढ़ाई अधूरी छोड़कर उन्हें गांव त्यागना पड़ा। निजाम हैदराबाद द्वारा हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध हुए आंदोलन में वे 149 दिन जेल में रहेे। इसके बाद मैट्रिक कर उन्होंने आठ साल तक पढ़ाया। 1942 के आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे।

1945 में सक्खर में आर्य वीर दल में शामिल होने से उनका नाम देवीदास आर्य प्रसिद्ध हो गया। आर्य समाज और संघ के माध्यम से उन्होंने हजारों नवयुवकों को संगठित किया। इससे वे मुस्लिम गुंडों के आंख की किरकिरी बन गये। 1947 में भारत आते समय भी वे पीछे पड़े रहे। उनके एक मित्र नारायण दास ने अपना टिकट देकर जिदपूर्वक उन्हें कराची में जलयान में बैठा दिया। रात में गुंडों ने हमला कर आर्य जी के भ्रम में नारायण दास को ही मार डाला। अपने शेष जीवन को प्रभु का प्रसाद समझ उन्होंने समाज सेवा को ही जीवन का व्रत बना लिया।

उ0प्र0 के कानपुर नगर में आकर उन्होंने शासन से संघर्ष कर विस्थापितों को दुकानें तथा आर्थिक सहायता दिलवायी। 1950 में डी.ए.वी स्कूल की स्थापना कर वे उसके प्राचार्य तथा फिर प्रबन्धक बने। पत्रकारिता में रुचि होने के कारण उन्होंने ‘दीपक’ समाचार पत्र भी निकाला। गोविन्दपुरी रेलवे स्टेशन, आर्य समाज, श्मशान घाट तथा कई संस्थाओं की स्थापना उनके प्रयास से हुई।

आर्य जी जनसंघ की ओर से नगर महापालिका का चुनाव लड़े और उ0प्र0 में सर्वाधिक वोट पाने वाले सभासद बने। भ्रष्टाचार के 50 से अधिक मामले उजागर करने पर नगर महापालिका ने उनका सम्मान किया। 1975 के आपातकाल में उन्हें ‘मीसा’ में ठूंस दिया गया। जेल में गलत इलाज से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया। शासन उन्हें इस शर्त पर छोड़ने को तैयार था कि वे कानपुर में नहीं रहेंगे; पर आर्य जी ने इसे ठुकरा दिया। अपने जीवन में 14 बार उन्होंने जेल यात्रा की; पर शासन से कोई पेंशन आदि नहीं ली।

आर्य जी की सर्वाधिक ख्याति नारी उद्धार हेतु की गयी उनकी सेवाओं के कारण हुई।

विभाजन के समय मुस्लिम गुंडों ने जिन कन्याओं से दुर्व्यवहार किया था, युवक उनसे विवाह करने में संकोच करते थे। देवीदास जी ने ऐसी सैकड़ों कन्याओं का विवाह कराया। कानपुर एक बड़ा औद्योगिक नगर होने के साथ ही वेश्यावृत्ति का भी गढ़ है। आर्य जी ने पुलिस के सहयोग से 3,500 से भी अधिक नारियों को असामाजिक तत्वों और वेश्यालयों से मुक्त कराया। वे इनके विवाह की भी व्यवस्था करते थे।600 विवाह तो उन्होंने स्वयं धर्मपिता बन कर कराये। उन पर कई बार प्राणघातक हमले हुए; पर वे डरे नहीं।

आर्य जी ने 2,000 से अधिक वृद्धों, विधवाओं तथा निराश्रित लोगों को शासन से पेंशन दिलाई। उन्होंने 4,000 से अधिक विधर्मियों को हिन्दू बनाया। इनमें कई पादरी, मौलवी तथा इमाम भी थे। घर से भागी, भगाई या ठुकराई गयी मुस्लिम कन्याओं के विवाह वे प्रयासपूर्वक हिन्दू युवकों से करा देते थे।

700 अन्तरजातीय विवाह कराने वाले आर्य जी ने 300 दम्पतियों के मनभेद मिटाकर उनके गृहस्थ जीवन को नष्ट होने से बचाया। उनकी सेवाओं को देखकर 1983 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह तथा देश की अनेक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। 1988 में उनके नागरिक अभिनंदन में भी श्री जैलसिंह उपस्थित हुए।

25 अक्तूबर, 2001 को इस महान समाज सुधारक का देहांत हुआ। उनके सम्मान में कानपुर के सभी बाजार तथा विद्यालय बन्द रहे। उनकी शवयात्रा में हजारों नर-नारी शामिल हुए। इनमें सैकड़ों वे महिलाएं भी थीं,जिनके जीवन में आशा का दीप देवीदास आर्य जी ने ही जलाया था।

स्वामी विवेकानन्द के विश्वप्रसिद्ध भाषण लिखने का श्रेय जोशिया जॉन गुडविन को है। स्वामी जी उसे प्रेम से ‘मेरा निष्ठावान गुडविन’ (My faithful Goodwin) कहते थे। उसका जन्म 20 सितम्बर, 1870 को इंग्लैंड के बैथेस्टोन में हुआ था। उसके पिता श्री जोशिया गुडविन भी एक आशुलिपिक (stenographer) एवं सम्पादक थे। गुडविन ने भी कुछ समय पत्रकारिता की; पर सफलता न मिलने पर वह ऑस्ट्रेलिया होते हुए अमरीका आ गया।

स्वामी जी के 1895 में न्यूयार्क प्रवास के दौरान एक ऐसे आशुलिपिक की आवश्यकता थी, जो उनके भाषण ठीक और तेजी से लिख सके। इसमें कई लोग लगाये गये; पर कसौटी पर केवल गुडविन ही खरा उतरा, जो 99 प्रतिशत शुद्धता के साथ 200 शब्द प्रति मिनट लिखता था। वह इससे पहले कई वरिष्ठ और प्रसिद्ध लोगों के साथ काम कर चुका था। अतः उसे उचित पारिश्रमिक पर नियुक्त कर लिया गया; पर स्वामी जी के भाषण सुनते-सुनते गुडविन का मन बदल गया। उसने पारिश्रमिक लेने से स्पष्ट मना कर दिया और अपनी सेवाएँ निःशुल्क देेने लगा। उसने अपने एक मित्र को लिखा, ‘‘मुझे अब पैसा मिले या नहीं, पर मैं उनके प्रेमजाल में फँस चुका हूँ। मैं पूरी दुनिया घूमा हूँ। अनेक महान लोगों से मिला हूँ; पर स्वामी विवेकानन्द जैसा महापुरुष मुझे कहीं नहीं मिला।’’

एक निष्ठावान शिष्य की तरह गुडविन स्वामी जी की निजी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखते थे। वे उनके भाषणों को आशुलिपि में लिखकर शेष समय में उन्हें टाइप करते थे। इसके बाद उन्हें देश-विदेश के समाचार पत्रों में भी भेजते थे। स्वामी जी प्रायः हर दिन दो-तीन भाषण देते थे। अतः गुडविन को अन्य किसी काम के लिए समय ही नहीं मिलता था। 1895-96 में स्वामी जी ने कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग पर जो भाषण दिये, उसके आधार पर उनके सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ बने हैं। स्वामी जी ने स्वयं ही कहा था कि ये ग्रन्थ उनके जाने के बाद उनके कार्यों का आधार बनेंगे। इन दिनों गुडविन छाया के समान उनके साथ रहते थे।

स्वामी जी भाषण देते समय किसी ओर लोक में खो जाते थे। कई बार तो उन्हें स्वयं ही याद नहीं आता था कि उन्होंने व्याख्यान या श्रोताओं के साथ हुए प्रश्नोत्तर में क्या कहा था ? ऐसे में गुडविन उन्हें उनके भाषणों का सार दिखाते थे। स्वामी जी ने उसकी प्रशंसा करते हुए एक बार कहा कि गुडविन ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। उसके बिना मैं कठिनाई में फँस जाता।

अपै्रल 1896 में स्वामी जी के लंदन प्रवास के समय भी गुडविन उनके साथ थे। जनवरी 1897 में वे स्वामी जी के साथ कोलकाता आ गये। गुडविन वहाँ सब मठवासियों की तरह धरती पर सोते तथा दाल-भात खाते थे। वे दार्जिलिंग, अल्मोड़ा, जम्मू तथा लाहौर भी गये। लाहौर में उन्होंने स्वामी जी का अंतिम भाषण लिखा। फिर वे मद्रास आकर रामकृष्ण मिशन के काम में लग गये। उन्होंने ‘ब्रह्मवादिन’ नामक पत्रिका के प्रकाशन में भी सहयोग दिया।

पर मद्रास की गरम जलवायु से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। अतः वे ऊटी आ गये। वहीं दो जून, 1898 को केवल 28 वर्ष की अल्पायु में उनका देहांत हो गया। स्वामी जी उस समय अल्मोड़ा में थे। समाचार मिलने पर उनके मुँह से निकला, ‘‘मेरा दाहिना हाथ चला गया।’’ ऊटी में ही स्वामी विवेकानन्द के इस प्रिय शिष्य का स्मारक बनाया गया है।

गुडविन इस लिखित सामग्री को ‘आत्मन’ कहते थे। शार्टहैंड में लिखे ऐसे हजारों पृष्ठ उन्होंने एक छोटे संदूक में रखकर अपनी मां के पास इंग्लैंड भेज दिये थे, जिनका अब कुछ भी पता नहीं है। इनमें स्वामी जी के भाषणों के साथ ही उनके कई भाषाओं में लिखे पत्र भी हैं।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश, धर्म और समाज की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वालों के मन पर ऐसे संस्कार उनकी माताओं ने ही डाले हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम में हंसते हुए फांसी चढ़ने वाले वीरों में भगतसिंह का नाम प्रमुख है। उस वीर की माता थीं श्रीमती विद्यावती कौर।

विद्यावती जी का पूरा जीवन अनेक विडम्बनाओं और झंझावातों के बीच बीता। सरदार किशनसिंह से विवाह के बाद जब वे ससुराल आयीं, तो यहां का वातावरण देशभक्ति से परिपूर्ण था। उनके देवर सरदार अजीतसिंह देश से बाहर रहकर स्वाधीनता की अलख जगा रहे थे। स्वाधीनता प्राप्ति से कुछ समय पूर्व ही वे भारत लौटे; पर देश को विभाजित होते देख उनके मन को इतनी चोट लगी कि उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को  देह त्याग दी।

उनके दूसरे देवर सरदार स्वर्णसिंह भी जेल की यातनाएं सहते हुए बलिदान हुए। उनके पति किशनसिंह का भी एक पैर घर में, तो दूसरा जेल और कचहरी में रहता था। विद्यावती जी के बड़े पुत्र जगतसिंह की 11 वर्ष की आयु में सन्निपात से मृत्यु हुई। भगतसिंह 23 वर्ष की आयु में फांसी चढ़ गये, तो उससे छोटे कुलतार सिंह और कुलवीर सिंह भी कई वर्ष जेल में रहे।

इन जेलयात्राओं और मुकदमेबाजी से खेती चैपट हो गयी तथा घर की चैखटें तक बिक गयीं। इसी बीच घर में डाका भी पड़ गया। एक बार चोर उनके बैलों की जोड़ी ही चुरा ले गये, तो बाढ़ के पानी से गांव का जर्जर मकान भी बह गया। ईष्र्यालु पड़ोसियों ने उनकी पकी फसल जला दी। 1939-40 में सरदार किशनसिंह जी को लकवा मार गया। उन्हें खुद चार बार सांप ने काटा; पर  उच्च मनोबल की धनी माताजी हर बार घरेलू उपचार और झाड़फंूक से ठीक हो गयीं। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार सुनकर उन्होंने दिल पर पत्थर रख लिया क्योंकि भगतसिंह ने उनसे एक बार कहा था कि तुम रोना नहीं, वरना लोग क्या कहेंगे कि भगतसिंह की मां रो रही है।

भगतसिंह पर उज्जैन के विख्यात लेखक श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने एक महाकाव्य लिखा। नौ मार्च, 1965 को इसके विमोचन के लिए माताजी जब उज्जैन आयीं, तो उनके स्वागत को सारा नगर उमड़ पड़ा। उन्हें खुले रथ में कार्यक्रम स्थल तक ले जाया गया। सड़क पर लोगों ने फूल बिछा दिये। इतना ही नहीं, तो छज्जों पर खड़े लोग भी उन पर पुष्पवर्षा करते रहे।

पुस्तक के विमोचन के बाद सरल जी ने अपने अंगूठे से माताजी के भाल पर रक्त तिलक किया। माताजी ने वही अंगूठा एक पुस्तक पर लगाकर उसे नीलाम कर दिया। उससे 3,331 रु. प्राप्त हुए। माताजी को सैकड़ों लोगों ने मालाएं और राशि भेंट की। इस प्रकार प्राप्त 11,000 रु. माताजी ने दिल्ली में इलाज करा रहे भगतसिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त को भिजवा दिये। समारोह के बाद लोग उन मालाओं के फूल चुनकर अपने घर ले गये। जहां माताजी बैठी थीं, वहां की धूल लोगों ने सिर पर लगाई। सैकड़ों माताओं ने अपने बच्चों को माताजी के पैरों पर रखा, जिससे वे भी भगतसिंह जैसे वीर बन सकें।

1947 के बाद गांधीवादी सत्याग्रहियों को अनेक शासकीय सुविधाएं मिलीं; पर क्रांतिकारी प्रायः उपेक्षित ही रह गये। उनमें से कई गुमनामी में बहुत कष्ट का जीवन बिता रहे थे। माताजी उन सबको अपना पुत्र ही मानती थीं। वे उनकी खोज खबर लेकर उनसे मिलने जाती थीं तथा सरकार की ओर से उन्हें मिलने वाली पेंशन की राशि चुपचाप वहां तकिये के नीचे रख देती थीं।

इस प्रकार एक सार्थक और सुदीर्घ जीवन जीकर माताजी ने दिल्ली के एक अस्पताल में एक जून, 1975 को अंतिम सांस ली। उस समय उनके मन में यह सुखद अनुभूति थी कि अब भगतसिंह से उनके बिछोह की अवधि सदा के लिए समाप्त हो रही है।

भारत में जिन महिलाओं का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग तथा देशभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें रानी अहल्याबाई होल्कर का नाम प्रमुख है। उनका जन्म 31 मई, 1725 को ग्राम छौंदी (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री मनकोजी राव शिन्दे परम शिवभक्त थे। अतः यही संस्कार बालिका अहल्या पर भी पड़े।

एक बार इन्दौर के राजा मल्हारराव होल्कर ने वहां से जाते हुए मन्दिर में हो रही आरती का मधुर स्वर सुना। वहां पुजारी के साथ एक बालिका भी पूर्ण मनोयोग से आरती कर रही थी। उन्होंने उसके पिता को बुलवाकर उस बालिका को अपनी पुत्रवधू बनाने का प्रस्ताव रखा। मनकोजी राव भला क्या कहते; उन्होंने सिर झुका दिया। इस प्रकार वह आठ वर्षीय बालिका इन्दौर के राजकुंवर खांडेराव की पत्नी बनकर राजमहलों में आ गयी।

इन्दौर में आकर भी अहल्या पूजा एवं आराधना में रत रहती। कालान्तर में उन्हें दो पुत्री तथा एक पुत्र की प्राप्ति हुई। 1754 में उनके पति खांडेराव एक युद्ध में मारे गये। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का भी देहांत हो गया। इस संकटकाल में रानी ने तपस्वी की भांति श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया; पर कुछ समय बाद उनके पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू भी चल बसे। इस वज्राघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यमार्ग पर डटी रहीं।

ऐसे में पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा। रानी ने लिखा कि यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी। और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी।

इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंगे्रजों के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया।

रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थीं। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थीं। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था; पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया।

धर्मप्रेमी होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाईं। काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया था। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का विकास हुआ।

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का पे्ररक उदाहरण है। इसीलिए एकात्मता स्तोत्र के 11वें श्लोक में उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा जैसी वीर नारियों के साथ याद किया जाता है।

हिन्दू धर्म और भारत की रक्षा के लिए यों तो अनेक वीरों एवं महान् आत्माओं ने अपने प्राण अर्पण किये हैं; पर उनमें भी सिख गुरुओं के बलिदान जैसा उदाहरण मिलना कठिन है। पाँचवे गुरु श्री अर्जुनदेव जी ने जिस प्रकार आत्मार्पण किया, उससे हिन्दू समाज में अतीव जागृति का संचार हुआ।

गुरु श्री अर्जुनदेव जी  विक्रमी सम्वत् 1638 को  गुरु गद्दी सौंप  गई ।  सिख धर्म के पांचवें  गुरु अर्जुन देव के काल में अमृतसर शहर सिखों के धार्मिक केंद्रबिंदु के रूप में उभर रहा था. बड़ी संख्या में सिख बैसाखी के पवित्र उत्सव पर वहां उपस्थित होते थे. गुरुजी ने एक और अभिनव परंपरा का सृजन किया था. इसमें प्रत्येक सिख अपनी कमाई का दसवां हिस्सा (जिसे ‘दसबंद’ कहा जाता था) गुरुजी के राजकोष में जमा करवाता था. इस राशि का उपयोग धर्म एवं समाज के उत्थान के विभिन्न कार्यो में किया जाता था.

इस बीच, धीरे-धीरे सिखों ने गुरु अर्जुन देव को ‘सच्च पातशाह (बादशाह)’ कह कर संबोधित करना आरंभ कर दिया था. सिख अनुयायियों की संख्या दिन दूना, रात चौगुनी बढ़ने लगी थी. इसलिए उनसे समाज में रूढ़िवादी  व कट्टर मुस्लिम समुदाय के लोग ईष्र्या करने लगे थे.  बादशाह जहांगीर भी गुरु अर्जुन देव के सिख धर्म के प्रचार-प्रसार से डर गया था. उसने गुरु के विरोधियों की बातों में आकर उनके विरुद्ध सख्त रुख अपनाने का मन बना लिया था. जहांगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन देव को गिरफ्तार कर लाहौर शहर लाया गया तथा वहां के राज्यपाल को गुरु को मृत्युदंड सुनाने का फ़रमान दे दिया गया.

इसके साथ ही अमानवीय यातनाओं का अंतहीन दौर चल पड़ा. लाहौर के वज़ीर ने गुरु अर्जुन देव को एक रूढ़िवादी सोच के व्यवसायी को सुपुर्द कर दिया. कहा जाता है कि उसने  गुरुजी को तीन दिनों तक ऐसी-ऐसी शारीरिक यातनाएं दीं, जो ना तो शब्दों में बयां की जा सकती हैं, ना ही वैसी कोई मिसाल इतिहास में ढूंढ़े मिलेगी. यातनाओं के दौरान गुरु अर्जुन देव को लोहे के धधकते हुए गर्म तवे पर बैठाया गया. इतने पर भी जब चंदू का मन नहीं भरा, तो उसने गुरुजी के सिर व नग्न शरीर पर गर्म रेत डलवायी. गुरुजी के सारे शरीर पर छाले व फफोले निकल आये.

ऐसी दर्दनाक अवस्था में ही गुरुजी को लोहे की ज़ंजीरों में बांधकर 30 मई सन 1606 ईस्वी में रावी नदी में फेंकवा दिया गया. इस प्रकार बलिदानियों के शिरोमणि गुरु अर्जुनदेव जी का  बलिदान 30 मई, 1606 को हुआ।

Source : sikhiwiki.org

देवातात्मा हिमालय अध्यात्म प्रेमियों की तरह खतरों के खिलाडि़यों को भी अपनी ओर आकृष्ट करता है।  8,848 मीटर ऊंचे, विश्व के सर्वोच्च पर्वत शिखर सागरमाथा (माउंट एवरेस्ट) पर नेपाली शेरपा तेनसिंग  तथा सर एडमंड हिलेरी  सर्वप्रथम चढ़ने वाले साहसी पर्वतारोही थे।

तेन्जिंग नॉरगे और एडमंड हिलेरी दक्षिण-पूर्वी पर्वत क्षेत्र में 8,504 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने तम्बू से निकलकर वह 29 मई को दिन के 11.30 बजे शिखर पर पहुंचे। उन्होने वहाँ फोटो खींचते और केक खाते हुए 15 मिनट बिताए तेन्जिंग नॉरगे ने​ एक श्रद्धालु बौद्ध की तरह चढ़ावे के रूप में प्रसाद अर्पित किया। तेन्जिंग नॉरगे को अपना जन्म दिवस पता नहीं था अतः एवरेस्ट विजय दिवस को ही जन्म दिवस मनाने लगे.

इस उपलब्धि के बाद उन्हें कई नेपालियों और भर्तियों द्वारा अनश्रुत नायक माना जाता है। सागरमाथा पर अब तक लगभग 5,000 सफल अभियान हो चुके हैं; फिर भी उस पहले अभियान की गरिमा कम नहीं हुई है।

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म ग्राम भगूर (जिला नासिक, महाराष्ट्र) में 28 मई, 1883 को हुआ था। छात्र जीवन में इन पर लोकमान्य तिलक के समाचार पत्र ‘केसरी’ का बहुत प्रभाव पड़ा। इन्होंने भी अपने जीवन का लक्ष्य देश की स्वतन्त्रता को बना लिया। 1905 में उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया। जब तीनों चाफेकर बन्धुओं को फाँसी हुई, तो इन्होंने एक मार्मिक कविता लिखी। फिर रात में उसे पढ़कर ये स्वयं ही हिचकियाँ लेकर रोने लगे। इस पर इनके पिताजी ने उठकर इन्हें चुप कराया।

सावरकर जी सशस्त्र क्रान्ति के पक्षधर थे। उनकी इच्छा विदेश जाकर वहाँ से शस्त्र भारत भेजने की थी। अतः वे श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति लेकर ब्रिटेन चले गये। लन्दन का ‘इंडिया हाउस’ उनकी गतिविधियों का केन्द्र था। वहाँ रहने वाले अनेक छात्रों को उन्होंने क्रान्ति के लिए प्रेरित किया। कर्जन वायली को मारने वाले मदनलाल धींगरा उनमें से एक थे।

उनकी गतिविधियाँ देखकर ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें 13 मार्च, 1910 को पकड़ लिया। उन पर भारत में भी अनेक मुकदमे चल रहे थे, अतः उन्हें मोरिया नामक जलयान से भारत लाया जाने लगा। 10 जुलाई, 1910 को जब वह फ्रान्स के मोर्सेल्स बन्दरगाह पर खड़ा था, तो वे शौच के बहाने शौचालय में गये और वहां से समुद्र में कूदकर तैरते हुए तट पर पहुँच गये।

तट पर उन्होंने स्वयं को फ्रान्सीसी पुलिसकर्मी के हवाले कर दिया। उनका पीछा कर रहे अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें फ्रान्सीसी पुलिस से ले लिया। यह अन्तरराष्ट्रीय विधि के विपरीत था। इसलिए यह मुकदमा हेग के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुँचा; जहाँ उन्हें अंग्रेज शासन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने तथा शस्त्र भारत भेजने के अपराध में आजन्म कारावास की सजा सुनाई गयी। उनकी सारी सम्पत्ति भी जब्त कर ली गयी।

सावरकर जी ने ब्रिटिश अभिलेखागारों का गहन अध्ययन कर ‘1857 का स्वाधीनता संग्राम’ नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। फिर इसे गुप्त रूप से छपने के लिए भारत भेजा गया। ब्रिटिश शासन इस ग्रन्थ के लेखन एवं प्रकाशन की सूचना से ही थर्रा गया। विश्व इतिहास में यह एकमात्र ग्रन्थ था, जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबन्धित कर दिया गया।

प्रकाशक ने इसे गुप्त रूप से पेरिस भेजा। वहाँ भी ब्रिटिश गुप्तचर विभाग ने इसे छपने नहीं दिया। अन्ततः 1909 में हालैण्ड से यह प्रकाशित हुआ। यह आज भी 1857 के स्वाधीनता समर का सर्वाधिक विश्वसनीय ग्रन्थ है।

1911 में उन्हें एक और आजन्म कारावास की सजा सुनाकर कालेपानी भेज दिया गया। इस प्रकार उन्हें दो जन्मों का कारावास मिला। वहाँ इनके बड़े भाई गणेश सावरकर भी बन्द थे। जेल में इन पर घोर अत्याचार किये गये। कोल्हू में जुतकर तेल निकालना, नारियल कूटना, कोड़ों की मार, भूखे-प्यासे रखना, कई दिन तक लगातार खड़े रखना, हथकड़ी और बेड़ी में जकड़ना जैसी यातनाएँ इन्हें हर दिन ही झेलनी पड़ती थीं।

1921 में उन्हें अन्दमान से रत्नागिरी भेजा गया। 1937 में वे वहाँ से भी मुक्त कर दिये गये; पर सुभाषचन्द्र बोस के साथ मिलकर वे क्रान्ति की योजना में लगे रहे। 1947 में स्वतन्त्रता के बाद उन्हें गांधी हत्या के झूठे मुकदमे में फँसाया गया; पर वे निर्दोष सिद्ध हुए। वे राजनीति के हिन्दूकरण तथा हिन्दुओं के सैनिकीकरण के प्रबल पक्षधर थे। स्वास्थ्य बहुत बिगड़ जाने पर वीर सावरकर ने प्रायोपवेशन द्वारा 26 फरवरी, 1966 को देह त्याग दी।

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कुपवाड़ा जिले के नौगाम सेक्‍टर में चार आतंकियों को घुसपैठ करते हुए देखा गया. उन पर लगातार नजर रखी जा रही थी. साबू पोस्‍ट पर तैनात हंगपन दादा को सूचित किया गया कि मीरा नार से साबू की तरफ चार आतंकियों की ‘हरकत’ देखी गई है. दादा को उनकी टीम के साथ मीरा नार की तरफ से निकल भागने वाले रूट को ब्‍लॉक करने को कहा गया. इसके बाद आतंकियों पर फायरिंग की गई. दादा आगे बढ़े और उन्‍होंने छिपे एक आतंकी को ढेर कर दिया. इसके बाद दादा ने अपने साथी से कहा कि मैं आगे जाता हूं, तुम मुझे सपोर्ट फायर देना. इसके बाद उन्‍होंने आगे बढ़ते हुए दूसरे आतंकी को भी खत्‍म कर दिया. इसके बाद टीमें दो टोली में बंट गई. इनमें एक हंगपन दादा की टोली थी. हवलदार दादा ने सबसे पहले लीड करते हुए तीसरे आतंकी को सामने से मार गिराया. लेकिन जब वे और आगे बढ़े तो चौथे आतंकी ने उन्‍हें पेट में गोली मार दी. थोड़ी देर बाद वे पेट पकड़कर दोबारा हिम्‍मत जुटाते हुए दोबारा खड़े होने की कोशिश की, लेकिन उन्‍हें दोबारा आतंकी की गोली लगी. उनकी इस कार्रवाई से चौथे आतंकी को भी ढेर कर दिया गया.

दादा की शहादत की याद में असम रेजिमेंटल सेंटर ने अपने मुख्य ऑफिस का नाम ‘हंगपन दादा’ रख दिया है. अरुणाचल प्रदेश भी राज्य में उनके नाम पर फुटबॉल और वॉलीबॉल टूर्नामेंट की शुरुआत हो चुकी है.

आज तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साहित्य हर भाषा में प्रचुर मात्रा में निर्माण हो रहा है; पर इस कार्य के प्रारम्भ में जिन कार्यकर्ताओं की प्रमुख भूमिका रही, उनमें हो.वे. शेषाद्रि जी (श्री होंगसन्द्र वेंकटरमैया शेषाद्रि) नाम शीर्ष पर है।

26 मई, 1926 को बंगलौर में जन्मे शेषाद्रि जी 1943 में स्वयंसेवक बने। 1946 में मैसूर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक पाकर उन्होंने एम.एस-सी. किया और अपना जीवन प्रचारक के नाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हेतु समर्पित कर दिया।

प्रारम्भ में उनका कार्यक्षेत्र मंगलौर विभाग, फिर कर्नाटक प्रान्त और फिर पूरा दक्षिण भारत रहा। 1986 तक वे दक्षिण में ही सक्रिय रहे। वे श्री यादवराव जोशी से बहुत प्रभावित थे। 1987 से 2000 तक वे संघ के सरकार्यवाह रहे। इस नाते उन्होंने पूरे भारत तथा विश्व के कुछ देशों में भी प्रवास किया।

कार्य की व्यस्तता के बाद भी वे प्रतिदिन लिखने के लिए समय निकाल लेते थे। वे दक्षिण के विक्रम साप्ताहिक, उत्थान मासिक, दिल्ली के पांचजन्य और आर्गनाइजर साप्ताहिक तथा लखनऊ के राष्ट्रधर्म मासिक के लिए प्रायः लिखते रहते थे। उनके लेखों की पाठक उत्सुकता से प्रतीक्षा करते थे। उन्होंने संघ तथा अन्य हिन्दू साहित्य के प्रकाशन के लिए श्री यादवराव के निर्देशन में बंगलौर में ‘राष्ट्रोत्थान परिषद्’ की स्थापना की। सेवा कार्यों के विस्तार एवं संस्कृत के उत्थान के लिए भी उन्होंने सघन कार्य किया।

शेषाद्रि जी ने यों तो सौ से अधिक छोटी-बड़ी पुस्तकंे लिखीं; पर उन्होंने ही सर्वप्रथम द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के भाषणों को ‘बंच ऑफ थॉट्स’  के रूप में संकलित किया। आज भी इसके संस्करण प्रतिवर्ष छपते हैं। इसके अतिरिक्त कृतिरूप संघ दर्शन, युगावतार, और देश बँट गया, नान्यः पन्था, मूल्यांकन, द वे, हिन्दूज अब्रोड डाइलेमा, उजाले की ओर.. आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। इन सबके कई भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। ‘तोरबेरलु’ को 1982 में कन्नड़ साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत किया।

शेषाद्रि जी की भाषण शैली भी अद्भुत थी। वे सरल एवं रोचक उदाहरण देकर अपनी बात श्रोताओं के मन में उतार देते थे। 1984 में न्यूयार्क (अमरीका) के विश्व हिन्दू सम्मेलन तथा ब्रेडफोर्ड (ब्रिटेन) के हिन्दू संगम में उन्हें विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया था। उनके भाषणों से वहां लोग बहुत प्रभावित हुए।

अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक श्रम के कारण उनका शरीर अनेक रोगों का घर बन गया। जब चैथे सरसंघचालक रज्जू भैया अपने खराब स्वास्थ्य के कारण अवकाश लेना चाहते थे, तो सब कार्यकर्ता चाहते थे कि शेषाद्रि जी यह दायित्व संभालें; पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है, अतः किसी युवा कार्यकर्ता को यह काम दिया जाये। अन्ततः सह सरकार्यवाह श्री सुदर्शन जी को यह दायित्व दिया गया। शेषाद्रि जी निरहंकार भाव से सह सरकार्यवाह और फिर प्रचारक प्रमुख के नाते कार्य करते रहे।

अन्तिम दिनों में वे बंगलौर कार्यालय पर रह रहे थे। वहाँ सायं शाखा पर फिसलने से उनके पैर की हड्डी टूट गयी। एक बार पहले भी उनकी कूल्हे की हड्डी टूट चुकी थी। इस बार इलाज के दौरान उनके शरीर में संक्रमण फैल गया। इससे उनके सब अंग क्रमशः निष्क्रिय होते चले गये।

कुछ दिन उन्हें चिकित्सालय में रखा गया। जब उन्हें लगा कि अब इस शरीर से संघ-कार्य सम्भव नहीं रह गया है, तो उन्होंने सब जीवन-रक्षक उपकरण हटवा दिये। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें संघ कार्यालय ले आया गया। वहीं 14 अगस्त, 2005 की शाम को उनका देहान्त हो गया।

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बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रत्येक देशवासी के मन में भारत माता की दासता की बेडि़याँ काटने की उत्कट अभिलाषा जोर मार रही थी। कुछ लोग शान्ति के मार्ग से इन्हें तोड़ना चाहते थे, तो कुछ जैसे को तैसा वाले मार्ग को अपना कर बम-गोली से अंग्रेजों को सदा के लिए सात समुन्दर पार भगाना चाहते थे। ऐसे समय में बंगभूमि ने अनेक सपूतों को जन्म दिया, जिनकी एक ही चाह और एक ही राह थी – भारत माता की पराधीनता से मुक्ति।

25 मई, 1885 को बंगाल के चन्द्रनगर में रासबिहारी बोस का जन्म हुआ। वे बचपन से ही क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आ गये थे। हाईस्कूल उत्तीर्ण करते ही वन विभाग में उनकी नौकरी लग गयी। यहाँ रहकर उन्हें अपने विचारों को क्रियान्वित करने का अच्छा अवसर मिला, चूँकि सघन वनों में बम, गोली का परीक्षण करने पर किसी को शक नहीं होता था।

रासबिहारी बोस का सम्पर्क दिल्ली, लाहौर और पटना से लेकर विदेश में स्वाधीनता की अलख जगा रहे क्रान्तिवीरों तक से था। 23 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली में वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभा यात्रा निकलने वाली थी। रासबिहारी बोस ने योजना बनाई कि वायसराय की सवारी पर बम फंेककर उसे सदा के लिए समाप्त कर दिया जाये। इससे अंग्रेजी शासन में जहाँ भय पैदा होगा, वहाँ भारतीयों के मन में उत्साह का संचार होगा।

योजनानुसार रासबिहारी बोस तथा बलराज ने चाँदनी चौक से यात्रा गुजरते समय एक मकान की दूसरी मंजिल से बम फेंका; पर दुर्भाग्यवश वायसराय को कुछ चोट ही आयी, वह मरा नहीं। रासबिहारी बोस फरार हो गये। पूरे देश में उनकी तलाश जारी हो गयी। ऐसे में उन्होंने अपने साथियों की सलाह पर विदेश जाकर देशभक्तों को संगठित करने की योजना बनाई। उसी समय विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान जा रहे थे। वे भी उनके साथ उनके सचिव पी.एन.टैगोर के नाम से जापान चले गये।

पर जापान में वे विदेशी नागरिक थे। जापान और अंग्रेजों के समझौते के अनुसार पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर भारत भेज सकती थी। अतः कुछ मित्रों के आग्रह पर उन्होंने अपने शरणदाता सोमा दम्पति की 20 वर्षीय बेटी तोसिको से उसके आग्रह पर विवाह कर लिया। इससे उन्हें जापान की नागरिकता मिल गयी। यहाँ तोसिको का त्याग भी अतुलनीय है। उसने रासबिहारी के मानव कवच की भूमिका निभाई। जापान निवास के सात साल पूरे होने पर उन्हें स्वतन्त्र नागरिकता मिल गयी। अब वे कहीं भी जा सकते थे।

उन्होंने इसका लाभ उठाकर दक्षिण एशिया के कई देशों में प्रवास कर वहाँ रह रहे भारतीयों को संगठित कर अस्त्र-शस्त्र भारत के क्रान्तिकारियों के पास भेजे। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध की आग भड़क रही थी। रासबिहारी बोस ने भारत की स्वतन्त्रता हेतु इस युद्ध का लाभ उठाने के लिए जापान के साथ आजाद हिन्द की सरकार के सहयोग की घोषणा कर दी। उन्होंने जर्मनी से सुभाषचन्द्र बोस को बुलाकर ‘सिंगापुर मार्च’ किया तथा 1941 में उन्हें आजाद हिन्द की सरकार का प्रमुख तथा फौज का प्रधान सेनापति घोषित किया।

देश की स्वतन्त्रता के लिए विदेशों में अलख जगाते और संघर्ष करते हुए रासबिहारी बोस का शरीर थक गया। उन्हें अनेक रोगों ने घेर लिया था। 21 जनवरी, 1945 को वे भारत माता को स्वतन्त्र देखने की अपूर्ण अभिलाषा लिये हुए ही चिरनिद्रा में सो गये।