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परमवीर चक्र कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया का जन्म 29 नवम्बर 1935 को शकरगढ़ के जनवल गाँव में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है। संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति सेना के साथ कांगो के पक्ष में बेल्जियम के विरुद्ध बहादुरी पूर्वक प्राण न्योछावर करने वाले योद्धाओं में कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया का नाम लिया जाता है जिन्हें 5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला में लड़ते हुए अद्भुत पराक्रम दिखाने के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया। वह उस समय केवल 26 वर्ष के थे।

गोरखा राइफल्स के कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया को संयुक्त राष्ट्र के सैन्य प्रतिनिधि के रूप  में एलिजाबेथ विला में दायित्व सौंपा गया था। 24 नवम्बर 1961 को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने यह प्रस्ताव पास किया था कि संयुक्त राष्ट्र की सेना कांगो के पक्ष में हस्तक्षेप करे और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग करके भी विदेशी व्यवसायियों पर अंकुश लगाए। संयुक्त राष्ट्र के इस निर्णय से शोम्बे के व्यापारी आदि भड़क उठे और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं के मार्ग में बाधा डालने का उपक्रम शुरु कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र के दो वरिष्ठ अधिकारी उनके केंद्र में आ गये। उन्हें पीटा गया। 3/1 गोरखा राइफल्स के मेजर अजीत सिंह को भी उन्होंने पकड़ लिया था और उनके ड्राइवर की हत्या कर दी थी। इन विदेशी व्यापारियों का मंसूबा यह था कि वह एलिजाबेथ विला के मोड़ से आगे का सारा संवाद तंत्र तथा रास्ता काट देंगे और फिर संयुक्त राष्ट्र की सैन्य टुकड़ियों से निपटेंगे।

5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला के रास्ते इस तरह बाधित कर दिये गए थे कि संयुक्त राष्ट्र के सैन्य दलों का आगे जाना एकदम असम्भव हो गया था। क़रीब 9 बजे 3/1 गोरखा राइफल्स को यह आदेश दिये गए कि वह एयरपोर्ट के पास के एलिजाबेथ विला के गोल चक्कर का रास्ता साफ करे। इस रास्ते पर विरोधियों के क़रीब डेढ़ सौ सशस्त्र पुलिस वाले रास्ते को रोकते हुए तैनात थे। योजना यह बनी कि 3/1 गोरखा राइफल्स की चार्ली कम्पनी आयरिश टैंक के दस्ते के साथ अवरोधकों पर हमला करेगी। इस कम्पनी की अगुवाई मेजर गोविन्द शर्मा कर रहे थे। कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया एयरपोर्ट साइट से आयारिश टैंक दस्तें के साथ धावा बोलेंगे इस तरह अवरोधकों को पीछे हटकर हमला करने का मौका न मिल सकेगा। कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया की ए कम्पनी के कुछ जवान रिजर्व में रखे जाएँगे। गुरबचन सिंह सालारिया न इस कार्यवाही के लिए दोपहर का समय तय किया, जिस समय उन सशस्त्र पुलिसबालों को हमले की ज़रा भी उम्मीद न हो। गोविन्द शर्मा तथा गुरबचन सिंह दोनों के बीच इस योजना पर सहमति बन गई।

कैप्टन गुरबचन सिंह सालारिया 5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला के गोल चक्कर पर दोपहर की ताक में बैठे थे कि उन्हें हमला करके उस सशस्त्र पुलिसवालों के व्यूह को तोड़ना है, ताकि फोजें आगे बढ़ सकें। इस बीच गुरबचन सिंह सालारिया अपनी टुकड़ी के साथ अपने तयशुदा ठिकाने पर पहुँचने में कामयाब हो गई। उन्होंने ठीक समय पर अपनी रॉकेट लॉन्चर टीम की मदद से रॉकेट दाग कर दुश्मन की दोनों सशस्त्र कारें नष्ट कर दीं। यही ठीक समय था जब वह सशस्त्र पुलिस के सिपाहियों को तितर-बितर कर सकते थे। उन्हें लगा कि देर करने से फिर से संगठित होने का मौका मिल जाएगा। ऐसी नौबत न आने देने के लिए कमर तुरंत कस ली।

उनके पास केवल सोलह सैनिक थे, जबकि सामने दुश्मन के सौ जवान थे। फिर भी,  प्राणो की परवाह किये बिना वह और उनका दल दुश्मन पर टूट पड़े। आमने-सामने मुठभेड़ होने लगी जिसमें गोरखा पलटन की खुखरी ने तहलका मचाना शुरू कर दिया। दुश्मन के सौ में से चालीस जवान वहीं ढेर हो गए लेकिन दुश्मन के बीच खलबली मच गई। और वह बौखला उठा तभी गुरबचन सिंह एक के बाद एक दो गोलियों का निशाना बन गए और वीरगति को प्राप्त हुए.

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‘साइकिल वाले पत्रकार’ श्री नारायण बालकृष्ण (बापूराव) लेले का जन्म 29 फरवरी, 1920 को जलगांव (महाराष्ट्र) में हुआ था। बचपन में वे स्वयंसेवक बने और 1940 में डा0 हेडगेवार के देहांत के बाद प्रचारक बन गये। इसी वर्ष उन्होंने मुंबई से बी.कॉम. की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी। उन्होंने सांगली, सोलापुर और फिर गुजरात के अमदाबाद, बड़ोदरा आदि में शाखा कार्य किया। लेखन में रुचि होने के कारण इस दौरान भी वे अनेक पत्रों में लिखते थे।

1948 में गांधी जी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लग गया। ऐसे में बापूराव ने अनेक गुप्त पत्रक निकालकर उनके वितरण का सुचारू तन्त्र बनाया। प्रतिबन्ध के बाद संघ योजना से अनेक पत्र-पत्रिकाएं तथा ‘हिन्दुस्थान समाचार’ नामक समाचार संस्था प्रारम्भ की गयी। इसका केन्द्र मुंबई बनाकर दादा साहब आप्टे तथा बापूराव लेले को यह काम दिया गया।

थोड़े ही समय में इसने पत्र जगत में प्रतिष्ठा बना ली। बापूराव की पत्रकारिता वृत्ति सदा जाग्रत रहती थी। एक बार नागपुर जाते समय मार्ग में रेल दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। चोट के बाद भी बापूराव ने पूरा विवरण लिखकर मुंबई के दैनिक ‘प्रभात’ को भेज दिया।

1953 में बापूराव दिल्ली बुला लिये गये। वे दिन भर साइकिल पर घूमकर समाचार जुटाते और देश भर में भेजते थे। शासकीय कार्यालयों, संसद और मंत्रियों के घर तक उनकी निर्बाध पहुंच थी। वे संघ के बड़े अधिकारियों की भेंट प्रधानमंत्री तक से करवा देते थे। संघ और शासन के बीच वे सेतु बनकर काम करते थे। वे पांच वर्ष तक ‘भारतीय प्रेस परिषद’ के सदस्य भी रहे।

काम की विशेष प्रवृत्ति के कारण वे अलग कमरा लेकर रहते थे। 1962 में नागपुर और पुणे से प्रकाशित होने वाले ‘तरुण भारत’ के दिल्ली संवाददाता का काम भी उन पर आ गया। एक मित्र ने उन्हें एक पुराना स्कूटर दे दिया। इससे उनकी गति बढ़ गयी।

वे 1963 में राष्ट्रपति डा0 राधाकृष्णन के साथ ब्रिटेन और 1966 में शास्त्री जी के साथ ताशकंद गये। 1975 के आपातकाल में पत्रकार होने के नाते उन पर पुलिस ने हाथ नहीं डाला। इसका लाभ उठाकर उनके आवास पर संघ के भूमिगत अधिकारी ठहरने लगे।

आपातकाल में शासन ने सब समाचार संस्थाओं को मिलाकर ‘समाचार’ नामक एक संस्था बना दी। 1977 में यद्यपि इन्हें फिर स्वतन्त्र कर दिया; पर तब तक हिन्दुस्थान समाचार को भारी आर्थिक हानि हो चुकी थी।

1980 में इंदिरा गांधी ने फिर सत्ता में आने पर योजनाबद्ध रूप से हिन्दुस्थान समाचार के आर्थिक òोत बंद कर दिये। 1982 में इस पर प्रशासक नियुक्त कर दिया और अंततः 1986 में यह संस्था ठप्प हो गयी; पर बापूराव हिन्दी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी के कई पत्रों में नियमित रूप से लिखते रहे।

बापूराव पत्रकार होते हुए भी मूलतः प्रचारक ही थे। उनकी षष्ठिपूर्ति पर सांगली के एक कार्यक्रम में उन्हें 61,000 रु0 भेंट किये गये। बापूराव ने बिना देखे वह थैली ‘तरुण भारत’ के लिए दे दी। धीरे-धीरे उनका शरीर थकने लगा। अतः उनके भतीजे उन्हें जलगांव ले गये।

1996 में दिल्ली में उनकी 75वीं वर्षगांठ मनाई गयी। अक्तूबर, 2001 में प्रधानमंत्री अटल जी ने अपने निवास पर उन्हें सम्मानित किया। इस अवसर पर संघ, भाजपा तथा हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े उनके सब पुराने मित्र उपस्थित थे। प्रसन्नता और उल्लास के वातावरण में सब उनके गिरते हुए स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे।

जलगांव लौटकर भी उन्हें चैन नहीं था। वे दिल्ली जाकर फिर काम प्रारम्भ करना चाहते थे; पर शरीर निढाल हो चुका था। 11 अगस्त, 2002 को मन के उत्साह एवं उमंग के बावजूद इस ऋषि पत्रकार ने संसार से विदा ले ली।

(संदर्भ – बापूराव लेले : व्यक्ति और कार्य, वसंत आप्टे)

चटगांव शस्त्रागार कांड के नायक मास्टर सूर्यसेन का जन्मजन्म दिवस 22 मार्च, 1894 को चटगांव (वर्तमान बांग्लादेश) के नवपाड़ा ग्राम में हुआ था। शिक्षा पूरी कर वे अध्यापक बने; पर फिर इसे ठुकरा कर स्वाधीनता संग्राम में कूद गये।

‘मास्टर दा’ ने पूर्वोत्तर भारत में अपने क्रांतिकारी संगठन ‘साम्याश्रम’ की स्थापना की। 1924 में पुलिस ने इन्हें पकड़ कर चार साल के लिए जेल में डाल दिया। 1928 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में सुभाष बाबू के नेतृत्व में 7,000 जवानों की सैनिक वेष में परेड से प्रभावित होकर इन्होंने अपने दल को सशस्त्र कर उसका नाम ‘इंडियन रिपब्लिक आर्मी’ रख दिया।

धीरे-धीरे इस सेना में 500 युवक एवं युवतियां भर्ती हो गये। अब इसके लिए शस्त्रों की आवश्यकता थी। अतः 18 अपै्रल, 1930 की रात को चटगांव के दो शस्त्रागारों को लूटने की योजना बनाई गयी। मास्टर सूर्यसेन ने अपने दो प्रतिनिधि दिल्ली भेज कर चंद्रशेखर आजाद से संपर्क किया।

आजाद ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए अपनी शुभकामनाओं के साथ दो पिस्तौल भी उन्हें भेंट की। 18 अपै्रल को सब सैनिक वेश में निजाम पल्टन के अहाते में एकत्र हुए। दल के एक भाग को पुलिस एवं दूसरे को सैनिक शस्त्रागार लूटना था। पौने दस बजे मास्टर दा ने कूच के आदेश दे दिये।

सबने योजनानुसार काम करते हुए टेलिफोन के तार काटे, बंदरगाह जाकर वायरलैस व्यवस्था भंग की तथा रेल की पटरियां उखाड़ दीं। जो दल पुलिस शस्त्रागार पहुंचा, उसे देखकर पहरेदार को लगा कि वे कोई बड़े अधिकारी हैं। अतः उसने दरवाजा खोल दिया। उन्होंने पर्याप्त शस्त्र अपनी गाड़ी में भर लिये। विरोध करने वालों को गोली मार दी तथा शेष शस्त्रों पर तेल डालकर आग लगा दी। मास्टर सूर्यसेन ने यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहरा दिया।

दूसरा दल सैनिक शस्त्रागार पर जा पहुंचा। उसके नेता लोकनाथ बल बहुत गोरे-चिट्टे थे। उनकी वेशभूषा देखकर वहां भी उन्हें सैल्यूट दिया गया। शस्त्रागार के ताले तोड़कर शस्त्र लूट लिये गये। विरोध करते हुए सार्जेंट मेजर कैरल मारा गया; पर क्रांतिकारी पक्ष की कोई जनहानि नहीं हुई। सफल अभियान के बाद सब जलालाबाद की पहाड़ी जा पहुंचे। संचार व्यवस्था भंग होने से अगले चार दिन तक चटगांव का प्रशासन क्रांतिकारियों के हाथ में ही रहा।

22 अपै्रल को संचार व्यवस्था फिर से ठीक कर अंग्रेजों ने पहाड़ी को घेर लिया। इस संघर्ष में 11 क्रांतिकारी मारे गये, जबकि 160 ब्रिटिश सैनिक हताहत हुए। कई क्रांतिवीर पकड़े भी गये। मास्टर सूर्यसेन पर 10,000 रु0 का पुरस्कार घोषित किया गया; पर वे हाथ नहीं आये। अंततः गोइराला गांव के शराबी जमींदार मित्रसेन ने थानेदार माखनलाल दीक्षित द्वारा दिये गये प्रलोभन में फंसकर 16 फरवरी, 1933 को उन्हें अपने घर से पकड़वा दिया। क्रांतिवीरों ने कुछ दिन बाद उस जमींदार तथा थानेदार को यमलोक भेज दिया।

मुकदमे के बाद 12 जनवरी, 1934 उनकी फांसी की तिथि निश्चित हुई। फांसी के लिए ले जाते समय वे ऊंचे स्वर से वन्दे मातरम् का उद्घोष करने लगे। इससे जेल में बंद उनके साथी भी नारे लगाने लगे। इससे खीझकर जेल वार्डन मास्टर दा के सिर पर डंडे मारने लगा; पर इससे उनका स्वर और तेज हो गया। अंततः डंडे की मार से ही मास्टर जी का प्राणांत हो गया। क्रूर जेल प्रशासन ने उनके शव को ही फांसी पर लटकाकर अपना क्रोध शांत किया।

सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु गुरुनानक देव का जन्म  रावी नदी के किनारे तलवंडी नामक गाँव में 15 अप्रैल, 1469 में कार्तिक पूर्णिमा, संवत् 1 5 2 7 को हुआ था।  गुरु नानक जी अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक,  कवि,  देशभक्त और विश्वबंधु – सभी के गुण समेटे हुए थे।तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा।

7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्रापति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए। तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। गुरुनानक जी चारो ओर घूमकर उपदेश करने लगे जिनमे भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों पर उन्होंने भ्रमण किया.

इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। लोगों ने तत्कालीन इब्राहीम लोदी से इनकी शिकायत की और ये बहुत दिनों तक कैद रहे। अंत में पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब इनका छुटकारा हुआ।

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई । स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर 22 सितंबर 1539 ईस्वी को इनका परलोकवास हुआ। मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।

Source : http://www.sikhiwiki.org, https://en.wikipedia.org/wiki/Guru_Nanak

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स्वामी प्रणवानन्द (14 मई १८९६ – १९४१) का जन्म बंगाल के बाजितपुर गांव में हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। उनके बचपन का नाम बिनोद था। बचपन से ही वे गहन चिन्तन करते-करते ध्यान-मग्न हो जाते थे। उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया।

वे बाबा गंभीरनाथ जी के शिष्य थे। सन् १९१७ में उन्होने भारत सेवाश्रम संघ की स्थापना की। उनके अनुयायी उन्हे भगवान शिव का अवतार मानते हैं। जनवरी, 8 मई सन् 1941 में उनका देहावसान हो गया। उनके जन्मस्थान बाजितपुर में उनकी समाधि है।

श्रीमद् स्वामी प्रणवानन्द जी महाराज ने सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक लोकहितैषी संस्था भारत सेवाश्रम संघ के स्थापना 1917 में की थी. जिसमें संन्यासी और नि:स्वार्थी कार्यकर्ता भ्रातृभाव से कार्य करते हैं। सर्वांगीण राष्ट्रीय उद्धार इसका मुख्य उद्देश्य और संपूर्ण मानवता की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति इसका सामान्य लक्ष्य है. यह संयासियों और नि:स्वार्थ कर्मयोगियों की संस्था है जो मानवता की सेवा के लिये समर्पित है। इसका मुख्यालय कोलकाता में है तथा पूरे भारत तथा विश्व में कोई 46 अन्य केन्द्र हैं।

किसी दैवी आपदा, किसी सामाजिक मेले आदि के अवसर पर इसके संयासी कैम्प लगाकर सेवा और सहायता का कार्य आरम्भ कर देते हैं। भारत सेवाश्रम संघ मुम्बई के वासी गांव में कैंसर के रोगियों के लिये नि:शुल्क आवास एवं भोजनादि की व्यवस्था करता है। इसके साथ-साथ भारत सेवाश्रम संघ शिक्षा के प्रसार तथा आदिवासियो एवं वनवासियों के उत्थान के लिये सतत् उद्यमशील है।

सचिनदेव बर्मन का जन्म वर्ष 1 अक्टूबर, 1906 में त्रिपुरा हुआ। उनके पिता जाने-माने सितारवादक और ध्रुपद गायक थे। बचपन के दिनों से ही सचिनदेव बर्मन का रुझान संगीत की ओर था और वे अपने पिता से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लिया करते थे। इसके साथ ही उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।

अपने जीवन के शुरुआती दौर में सचिनदेव बर्मन ने रेडियो से प्रसारित पूर्वोतर लोक-संगीत के कार्यक्रमों में काम किया। वर्ष 1930 तक वे लोकगायक के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।

वर्ष 1944 में संगीतकार बनने का सपना लिए सचिनदेव बर्मन मुंबई आ गए, जहां सबसे पहले उन्हें 1946 में फिल्मिस्तान की फिल्म ‘एट डेज’ में बतौर संगीतकार काम करने का मौका मिला, लेकिन इस फिल्म के जरिए वे कुछ खास पहचान नहीं बना पाए।

इसके बाद 1947 में उनके संगीत से सजी फिल्म ‘दो भाई’ के पार्श्वगायिका गीता दत्त के गाए गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया…’ की कामयाबी के बाद वे कुछ हद तक संगीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।

सचिनदेव बर्मन ने करीब 3 दशक के सिने करियर में लगभग 90 फिल्मों के लिए संगीत दिया। उनके फिल्मी सफर पर नजर डालने पर पता लगता है कि उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ ही की हैं।

1951 में फिल्म नौजवान के गीत ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आए…’ के जरिए लोगों का मन मोहा। वर्ष 1951 में ही गुरुदत्त की पहली निर्देशित फिल्म ‘बाजी’ के गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे…’ में एस.डी. बर्मन और साहिर की जोड़ी ने संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया।

एस.डी. बर्मन और साहिर लुधियानवी की सुपरहिट जोड़ी फिल्म ‘प्यासा’ के बाद अलग हो गई। एसडी बर्मन की जोड़ी गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के साथ भी बहुत जमी। देवानंद की फिल्मों के लिए एसडी बर्मन ने सदाबहार संगीत दिया और उनकी फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बर्मन दा के पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में देवानंद के अलावा विमल राय, गुरुदत्त, ऋषिकेश मुखर्जी आदि प्रमुख रहे हैं।

बर्मन दा की फिल्म जगत के किसी कलाकार या गायक के साथ शायद ही अनबन हुई हो, लेकिन 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘पेइंग गेस्ट’ के गाने ‘चांद फिर निकला…’ के बाद लता मंगेशकर और उन्होंने एकसाथ काम करना बंद कर दिया। दोनों ने लगभग 5 वर्ष तक एक-दूसरे के साथ काम नहीं किया। बाद में बर्मन दा के पुत्र आर.डी. बर्मन के कहने पर लता मंगेशकर ने बर्मन दा के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए ‘मेरा गोरा अंग लई ले…’ गाना गाया।

संगीत निर्देशन के अलावा बर्मन दा ने कई फिल्मों के लिए गाने भी गाए। इन फिल्मों में ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा…’, ‘मेरे साजन है उस पार…’ और ‘अल्लाह मेघ दे छाया दे…’ जैसे गीत आज भी श्रोताओं को भाव-विभोर करते हैं।

एस.डी. बर्मन को 2 बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार से नवाजा गया है। एसडी बर्मन को सबसे पहले 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘अभिमान’ के लिए भी वे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजे गए।

फिल्म ‘मिली’ के संगीत ‘बड़ी सूनी-सूनी है…’ की रिकॉर्डिंग के दौरान एस.डी. बर्मन अचेतन अवस्था में चले गए। हिन्दी सिने जगत को अपने बेमिसाल संगीत से सराबोर करने वाले सचिन दा 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

संघ की प्रारम्भिक प्रचारकों में एक श्री वसंतराव कृष्णराव ओक का जन्म 13 मई, 1914 को नाचणगांव (वर्धा, महाराष्ट्र) में हुआ था। जब वे पढ़ने के लिए अपने बड़े भाई मनोहरराव के साथ नागपुर आये, तो बाबासाहब आप्टे द्वारा संचालित टाइपिंग केन्द्र के माध्यम से दोनों का सम्पर्क संघ से हुआ।

डा. हेडगेवार के सुझाव पर वसंतराव 1936 में कक्षा 12 उत्तीर्ण कर शाखा खोलने के लिए दिल्ली आ गये। उनके रहने की व्यवस्था ‘हिन्दू महासभा भवन’ में थी। यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का जाल भी फैलाया। आज का दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, अलवर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उस समय दिल्ली प्रांत में ही था। वसंतराव के परिश्रम से इस क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया।

वसंतराव के संपर्क का दायरा बहुत विशाल था। 1942 के आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही। गांधी जी, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, पुरुषोत्तमदास टंडन से लेकर हिन्दू महासभा, सनातन धर्म और आर्य समाज के बड़े नेताओं से उनके मधुर संबंध थे। कांग्रेस वालों को भी उन पर इतना विश्वास था कि मंदिर मार्ग पर स्थित वाल्मीकि मंदिर में होने वाली गांधी जी की प्रार्थना सभा की सुरक्षा स्वयंसेवकों को ही दी गयी थी।

10 सितम्बर, 1947 को कांग्रेस के सब बड़े नेताओं की हत्याकर लालकिले पर पाकिस्तानी झंडा फहराने का षड्यन्त्र मुस्लिम लीग ने किया था; पर दिल्ली के स्वयंसेवकों ने इसकी सूचना शासन तक पहुंचा दी, जिससे यह षड्यन्त्र विफल हो गया।

आगे चलकर वसंतराव ने श्री गुरुजी और गांधी जी की भेंट कराई। उन दिनों वसंतराव का दिल्ली में इतना प्रभाव था कि उनके मित्र उन्हें ‘दिल्लीश्वर’ कहने लगे। संघ पर लगे पहले प्रतिबंध की समाप्ति के बाद उनके कुछ विषयों पर संघ के वरिष्ठ लोगों से मतभेद हो गये। अतः गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर वे दिल्ली में ही व्यापार करने लगे; पर संघ से उनका प्रेम सदा बना रहा और उन्हें जो भी कार्य दिया गया, उसे उन्होंने पूर्ण मनोयोग से किया।

गोवा आंदोलन में एक जत्थे का नेतृत्व करते हुए उनके पैर में एक गोली लगी, जो जीवन भर वहीं फंसी रही। 1857 के स्वाधीनता संग्राम की शताब्दी पर दिल्ली के विशाल कार्यक्रम में वीर सावरकर का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने वसंतराव के संगठन कौशल की प्रशंसा कर उन्हें ‘वसंतराय’ की उपाधि दी। 1946 में उन्होंने ‘भारत प्रकाशन’ की स्थापना कर उसके द्वारा ‘भारतवर्ष’ और ‘आर्गनाइजर’ समाचार पत्र प्रारम्भ किये। विभाजन के बाद पंजाब से आये विस्थापितों की सहायतार्थ ‘हिन्दू सहायता समिति’ का गठन किया था।

वसंतराव के भाषण काफी प्रभावी होते थे। मराठीभाषी होते हुए भी उन्हें हिन्दी से बहुत प्रेम था। 1955 में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ उन्हीं की प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ। इसके लिए शास्त्री जी और टंडन जी ने भी सहयोग दिया। इसकी ओर से प्रतिवर्ष लालकिले पर एक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन कराया जाता था, जो अब शासकीय कार्यक्रम बन गया है।

1957 में उन्होंने दिल्ली में चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव जनसंघ के टिकट पर लड़ा; पर कुछ मतों के अंतर से वे हार गये। 1966 के गोरक्षा आंदोलन में भी उन्होंने काफी सक्रियता से भाग लिया। बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद कांग्रेस और साम्यवादियों ने संघ के विरुद्ध बहुत बावेला मचाया। ऐसे में वसंतराव ने दिल्ली के प्रतिष्ठित लोगों से मिलकर उनके सामने पूरा विषय ठीक से रखा। इससे वातावरण बदल गया।

अप्रतिम संगठन क्षमता के धनी और साहस की प्रतिमूर्ति वसंतराव का नौ अगस्त, 2000 को 86 वर्ष की आयु में देहांत हुआ।

 

श्री श्यामलाल गुप्ता पार्षद जिन्होंने विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा गीत लिखा का जन्म दिवस.

डा. एनी वुड बेसेंट का जन्म एक अक्तूबर, 1847 को लंदन में हुआ था। इनके पिता अंग्रेज तथा माता आयरिश थीं। जब ये पांच वर्ष की थीं, तब इनके पिता का देहांत हो गया। अतः इनकी मां ने इन्हें मिस मेरियट के संरक्षण में हैरो भेज दिया। उनके साथ वे जर्मनी और फ्रांस गयीं और वहां की भाषाएं सीखीं। 17 वर्ष की अवस्था में वे फिर से मां के पास आ गयीं।

1867 में इनका विवाह एक पादरी रेवरेण्ड फ्रेंक से हुआ। वह संकुचित विचारों का था। अतः दो संतानों के बाद ही तलाक हो गया। ब्रिटिश कानून के अनुसार दोनों बच्चे पिता पर ही रहे। इससे इनके दिल को ठेस लगी। उन्होंने मां से बच्चों को अलग करने वाले कानून की निन्दा करते हुए अपना शेष जीवन निर्धन और अनाथों की सेवा में लगाने का निश्चय किया। इस घटना से इनका विश्वास ईश्वर, बाइबिल और ईसाई मजहब से भी उठ गया।

श्रीमती एनी बेसेंट इसके बाद लेखन और प्रकाशन से जुड़ गयीं। उन्होंने झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले मजदूरों की समस्याओं को सुलझाने के लिए अथक प्रयत्न किये। आंदोलन करने वाले मजदूरों के उत्पीड़न को देखकर उन्होंने ब्रिटिश सरकार के इन काले कानूनों का विरोध किया। वे कई वर्ष तक इंग्लैंड के सबसे शक्तिशाली महिला मजदूर यूनियन की सचिव भी रहीं।

वे 1883 में समाजवादी और 1889 में ब्रह्मविद्यावादी (थियोसोफी) विचारों के सम्पर्क में आयीं। वे एक कुशल वक्ता थीं और सारे विश्व में इन विचारों को फैलाना चाहती थीं। वे पाश्चात्य विचारधारा की विरोधी और प्राचीन भारतीय व्यवस्था की समर्थक थीं। 1893 में उन्होंने वाराणसी को अपना केन्द्र बनाया। यहां उनकी सभी मानसिक और आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान हुआ। अतः वे वाराणसी को ही अपना वास्तविक घर मानने लगीं।

1907 में वे ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ की अध्यक्ष बनीं। उन्होंने धर्म, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में पुनर्जागरण के लिए 1916 में ‘होम रूल लीग’ की स्थापना की। उन्होंने वाराणसी में ‘सेंट्रल हिन्दू कॉलेज’ खोला तथा 1917 में इसे महामना मदनमोहन मालवीय जी को समर्पित कर दिया। वाराणसी में उन्होंने 1904 में ‘हिन्दू गर्ल्स स्कूल’ भी खोला। इसी प्रकार ‘इन्द्रप्रस्थ बालिका विद्यालय, दिल्ली’ तथा निर्धन एवं असहाय लोगों के लिए 1908 में ‘थियोसोफिकल ऑर्डर ऑफ सर्विस’ की स्थापना की।

उन्होंने धार्मिक एवं राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार, महिला जागरण, स्काउट एवं मजदूर आंदोलन आदि में सक्रिय भूमिका निभाई। सामाजिक बुराइयां मिटाने के लिए उन्होंने ‘ब्रदर्स ऑफ सर्विस’ संस्था बनाई। इसके सदस्यों को एक प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे। कांग्रेस और स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने के कारण उन्हें जेल में भी रहना पड़ा। 1917 के कोलकाता अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। यद्यपि फिर लोकमान्य तिलक और गांधी जी से उनके भारी मतभेद हो गये। इससे वे अकेली पड़ गयीं। वे गांधीवाद का उग्र विरोध करते हुए कहती थीं कि इससे भारत में अराजकता फैल जाएगी।

डा. एनी बेसेंट एक विदुषी महिला थीं। उन्होंने सैकड़ों पुस्तक और लेख लिखे। वे स्वयं को पूर्व जन्म का हिन्दू एवं भारतीय मानती थीं। 20 सितम्बर, 1933 को चेन्नई में उनका देहांत हुआ। उनकी इच्छानुसार उनकी अस्थियों को वाराणसी में सम्मान सहित गंगा में विसर्जित कर दिया गया।

(संदर्भ  : केन्द्र भारती अक्तूबर 2006/विकीपीडिया)

श्रीराम मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने 1528 ई. में गिराकर वहाँ एक मस्जिद बना दी। इसके बाद से हिन्दू समाज एक दिन भी चुप नहीं बैठा। वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा।  23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखण्ड कीर्तन शुरू कर दिया। ‘विश्व हिन्दू परिषद्’ द्वारा इस विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व तक  76 बार श्री राम जन्म भूमि मुक्त कराने के प्रयास किये हिन्दुओं ने किये.  जिसमें देश के हर भाग से हजारो नर नारियों का बलिदान हुआ; पर पूर्ण सफलता उन्हें कभी नहीं मिल पायी।

कारसेवकों का बलिदान – 2 नवम्बर, 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार में कारसेवकों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक गोलियां चलार्इं थीं। अयोध्या के वासुदेव गुप्त, राजेन्द्र धरिकार, रमेश पाण्डेय और कोलकाता के दोनों कोठारी बंधुओं सहित अनेक कारसेवक इसमें शहीद हो गये थे।

लोगों में तत्कालीन केन्द्र और राज्य सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश देखा जा रहा था। यह आक्रोश उस बाबरी ढांचे के खिलाफ था, जो गुलामी का प्रतीक था। रामभक्त उसे किसी भी हालत में देखना नहीं चाहते थे। ढांचा 6 दिसंबर, 1992 को रामभक्त कारसेवकों द्वारा ढहा दिया गया।