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1947 में देश स्वतन्त्र होने के बाद 15 अपै्रल, 1948 को हिमाचल प्रदेश का एक केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में गठन हुआ। तब इसे एक दूरदर्शी तथा राजनीतिक सूझबूझ वाले नेता व कुशल प्रशासक की आवश्यकता थी। स्वतन्त्रता सेनानी वैद्य सूरत सिंह ने डा. यशवन्त सिंह परमार की योग्यता को पहचान कर पच्छाद क्षेत्र से उन्हें विधानसभा का चुनाव लड़ाया। यद्यपि जनता की इच्छा थी कि वैद्य जी स्वयं चुनाव लड़ें। चुनाव जीतने के बाद डा0 परमार हिमाचल के प्रथम मुख्यमन्त्री बने।

डा. परमार का जन्म चार अगस्त, 1906 को सिरमौर रियासत के ग्राम चन्हालग में हुआ था। उन्होंने एम.ए, एल.एल.बी. तथा लखनऊ विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त कर सिरमौर रियासत में जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा फिर दिल्ली में अनेक महत्वपूर्ण शासकीय पदों पर काम किया।

पहाड़ों में सड़क, बिजली, शिक्षा, व्यापार, उद्योग आदि का अभाव ही रहता है। छोटे-छोटे खेत होने के कारण खेती भी कुछ खास नहीं होती। लोग प्रायः सेना में या मैदानी भागों में ही नौकरी करते हैं। वे हर महीने अपने घर धनादेश (मनीआर्डर) से पैसा भेजते हैं, तब परिवार के बाकी लोगों का काम चलता है।

इन समस्याओं के बीच डा. परमार ने प्रदेश की शिक्षा, कृषि, बागवानी,यातायात, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में सुदृढ़ नींव डाली। इससे वह भी अन्य राज्यों की तरह प्रगति के पथ पर चल पड़ा।डा. यशवन्त सिंह परमार एक दूरदर्शी राजनेता व कुशल प्रशासक तो थे ही; मनसा, वाचा, कर्मणा वे ठेठ पहाड़ी भी थे। पहाड़ी संस्कृति उनके रोम-रोम में बसी थी।

नगरीय क्षेत्र में पहाड़ के लोगों का शोषण देखकर उन्होंने स्वयं को सगर्व पहाड़ी घोषित किया। प्रायः लोग पहाड़ी वस्त्र पहनने में शर्म अनुभव करते हैं; पर वे सदा लम्बी कमीज, चूड़ीदार पाजामा और लोइया आदि ही पहनते थे। उन्हें देखकर अन्य लोगों ने इसका अनुसरण किया। इस प्रकार डा. परमार ने पहाड़ी वेशभूषा को गौरव प्रदान किया।

डा. परमार अपनी बोलचाल में प्रायः हिमाचली भाषा-बोली का ही प्रयोग करते थे। उनका स्पष्ट मत था कि अपनी बात सब तक पहुँचानी है, तो स्थानीय बोली से अच्छी कोई चीज नहीं है। उन्होंने हिमाचली भाषा को देवनागरी में लिखने को प्रोत्साहन दिया। उनका मत था कि इससे हिन्दी को लाभ ही मिलेगा। पहाड़ी भाषा एवं लोक कलाओं के संरक्षण के लिए उन्होंने हिमाचल कला, संस्कृति व भाषा अकादमी की स्थापना की।

मुख्यमन्त्री बनने के बाद भी वे सदा मिट्टी से जुड़े रहे। उनके स्वागत में ग्रामीण लोग जब लोकनृत्य करतेे, तो वे भी उसमें शामिल हो जाते थे। लोकपर्व, मेले व तीज-त्योहारों आदि में वे प्रयासपूर्वक उपस्थित रहते थे। ग्रामीण क्षेत्र में वे असकली, सिड़कु, पटण्डे, लुश्के जैसे स्थानीय पकवानों की माँग करते और ग्रामीण जनों के बीच में बैठकर पत्तल पर ही भोजन करते थे। उन्होंने अपने लिए कोई सम्पत्ति एकत्र नहीं की। उनका पैतृक मकान गाँव में आज भी साधारण अवस्था में ही है।

सरलता, सादगी एवं परिश्रम की प्रतिमूर्ति, हिमाचल के निर्माता एवं हिमाचल गौरव जैसे सम्मानों से विभूषित डा. यशवन्त सिंह परमार ने 25वर्ष तक राज्य की अथक सेवा की। दो मई, 1981 को उनका देहान्त हुआ।

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यों तो दुनिया की हर भाषा और बोली में काव्य रचने वाले कवि होते हैं। भारत भी इसका अपवाद नहीं हैं; पर अपनी रचनाओं से राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाने वाले कवि कम ही होते हैं। श्री मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी भाषा के एक ऐसे ही महान कवि थे, जिन्हें राष्ट्रकवि का गौरव प्रदान किया गया।

श्री मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव (झाँसी, उ.प्र.) में 3 अगस्त, 1886 को हुआ था। सम्पन्न वातावरण में उनका बचपन सुखपूर्वक बीता। उन दिनों व्यापारी अपना व्यापारिक हिसाब-किताब प्रायः उर्दू में रखते थे। अतः इनके पिता ने प्रारम्भिक शिक्षा के लिए इन्हें मदरसे में भेज दिया। वहाँ मैथिलीशरण गुप्त अपने भाई सियाराम के साथ जाते थे।

पर मदरसे में उनका मन नहीं लगता था। वे बुन्देलखण्ड की सामान्य वेशभूषा अर्थात ढीली धोती-कुर्ता, कुर्ते पर देशी कोट, कलीदार और लाल मखमल पर जरी के काम वाली टोपियाँ पहन कर आते थे। वे प्रायः अपने बड़े-बड़े बस्ते कक्षा में छोड़कर घर चले जाते थे। सहपाठी उनमें से कागज और कलम निकाल लेते। उनकी दवातों की स्याही अपनी दवातों में डाल लेते; पर वे कभी किसी से कुछ नहीं कहते थे।

उन दिनों सम्पन्न घरों के बच्चे ईसाइयों द्वारा स॰चालित अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ते थे। अतः पिताजी ने इन्हें आगे पढ़ने के लिए झाँसी के मैकडोनल स्कूल में भेज दिया; पर भारत और भारतीयता के प्रेमी मैथिलीशरण का मन अधिक समय तक यहाँ भी नहीं लग सका। वे झाँसी छोड़कर वापस चिरगाँव आ गये। अब घर पर ही उनका अध्ययन चालू हो गया और उन्होंने संस्कृत, बंगला और उर्दू का अच्छा अभ्यास कर लिया।

इसके बाद गुप्त जी ने मुन्शी अजमेरी के साथ अपनी काव्य प्रतिभा को परिमार्जित किया। झाँसी में उन दिनों आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रेलवे में तारबाबू थे। उनके सम्पर्क में आकर गुप्त जी ने खड़ी बोली में लिखना प्रारम्भ कर दिया। बोलचाल में वे बुन्देलखण्डी में करते थे; पर साहित्य लेखन में उन्होंने प्रायः शुद्ध और परिमार्जित हिन्दी का प्रयोग किया। उनके साहित्य में हर पग पर राष्ट्र और राष्ट्रभाषा से प्रेम की सुगन्ध आती है।

गुप्त जी को अपनी भाषा, बोली, क्षेत्र, वेशभूषा और परम्पराओं पर गर्व था। वे प्रायः बुन्देलखण्डी धोती और बण्डी पहनकर, माथे पर तिलक लगाकर बड़ी मसनद से टिककर अपनी विशाल हवेली में बैठे रहते थे। उनका हृदय सन्त की तरह उदार और विशाल था। साहित्यप्रेमी हो या सामान्य जन,कोई भी किसी भी समय आकर उनसे मिल सकता था। राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति पा लेने के बाद भी बड़प्पन या अहंकार उन्हें छू नहीं पाया था।

यों तो गुप्त जी की रचनाओं की संख्या बहुत अधिक है; पर विशेष ख्याति उन्हें ‘भारत-भारती’ से मिली। उन्होंने लिखा है –

मानस भवन में आर्यजन, जिसकी उतारें आरती

भगवान् भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।।

मैथिलीशरण गुप्त जी के साहित्य पर हिन्दीभाषी क्षेत्र के सभी विश्वविद्यालयों में शोध हुए हैं। सभी साहित्यकारों ने उनके कृतित्व पर लिखकर अपनी लेखनी को धन्य किया है। भारत भारती के इस अमर गायक का निधन 12 दिसम्बर, 1964 को चिरगाँव में ही हुआ।

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आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय भारत में रसायन विज्ञान के जनक माने जाते हैं। वे एक सादगीपसंद तथा देशभक्त वैज्ञानिक थे जिन्होंने रसायन प्रौद्योगिकी में देश के स्वावलंबन के लिए अप्रतिम प्रयास किए।  ये आधुनिक भारत की पहली पीढ़ी के वैज्ञानिक थे जिनके कार्यों और आदर्शों से भारतीय विज्ञान को एक नई दिशा मिली। इन वैज्ञानिकों में आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का नाम गर्व से लिया जाता है। वे वैज्ञानिक होने के साथ साथ एक महान देशभक्त भी थे। सही मायनों में वे भारतीय ऋषि परम्परा के प्रतीक थे। इनका जन्म 2 अगस्त, 1861 ई. में जैसोर जिले के ररौली गांव में हुआ था। यह स्थान अब बांगलादेश में है तथा खुल्ना जिले के नाम से जाना जाता है। उनके पिता हरिश्चंद्र राय इस गाँव के प्रतिष्ठित जमींदार थे। वे प्रगितशील तथा खुले दिमाग के व्यक्ति थे। आचार्य राय की माँ भुवनमोहिनी देवी भी एक प्रखर चेतना-सम्पन्न महिला थीं।

आचार्य राय की अध्ययन में बड़ी रुचि थी। वे बारह साल की उम्र में ही चार बजे सुबह उठ जाते थे। पाठ्य-पुस्तकों के अलावा वे इतिहास तथा जीवनियों में अधिक रुचि रखते थे। ‘चैम्बर्स बायोग्राफी’ उन्होंने कई बार पढ़ी थी। वे सर डब्ल्यू. एम. जोन्स, जॉन लेडेन और उनकी भाषायी उपलब्धियों, तथा फ्रैंकलिन के जीवन से काफी प्रभावित थे। सन् 1879 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। फिर आगे की पढ़ाई मेट्रोपोलिटन कॉलेज (अब विद्यासागर कॉलेज) में शुरू की।

उसी समय प्रफुल्ल चंद्र के मन में गिलक्राइस्ट छात्रवृत्ति के इम्तहान में बैठने की इच्छा जगी। यह इम्तहान लंदन विश्वविद्यालय की मैट्रिक परीक्षा के बराबर माना जाता था। इस इम्तहान में लैटिन या ग्रीक, तथा जर्मन भाषाओं का ज्ञान होना जरूरी था। अपने भाषा-ज्ञान को आज़माने का प्रफुल्ल के लिए यह अच्छा अवसर था। इस इम्तहान में सफल होने पर उन्हें छात्रवृत्ति मिल जाती और आगे के अध्ययन के लिए वह इंग्लैंड जा सकते थे। आखिर अपनी लगन एवं मेहनत से वह इस परीक्षा में कामयाब रहे। इस प्रकार वे इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। नया देश, नए रीति-रिवाज़, पर प्रफुल्लचंद्र इन सबसे ज़रा भी चिंतित नहीं हुए। अंग्रेजों की नकल उतारना उन्हें पसंद नहीं था, उन्होंने चोगा और चपकन बनवाई और इसी वेश में इंग्लैंड गए। उस समय वहाँ लंदन में जगदीशचंद्र बसु अध्ययन कर रहे थे। राय और बसु में परस्पर मित्रता हो गई।

प्रफुल्ल चंद्र राय को एडिनबरा विश्वविद्यालय में अध्ययन करना था जो विज्ञान की पढ़ाई के लिए मशहूर था। वर्ष 1885 में उन्होंने पीएच0डी0 का शोधकार्य पूरा किया। तदनंतर 1887 में “ताम्र और मैग्नीशियम समूह के ‘कॉन्जुगेटेड’ सल्फेटों” के बारे में किए गए उनके कार्यों को मान्यता देते हुए एडिनबरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी0एस-सी0 की उपाधि प्रदान की। सन् 1933 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक तथा रेक्टर पं. मदन मोहन मालवीय ने आचार्य राय को डी0एस-सी0 की मानद उपाधि से विभूषित किया। वे देश विदेश के अनेक विज्ञान संगठनों के सदस्य रहे।

एक दिन आचार्य राय अपनी प्रयोगशाला में पारे और तेजाब से प्रयोग कर रहे थे। इससे मर्क्यूरस नाइट्रेट नामक पदार्थ बनता है। इस प्रयोग के समय डा. राय को कुछ पीले-पीले क्रिस्टल दिखाई दिए। वह पदार्थ लवण भी था तथा नाइट्रेट भी। यह खोज बड़े महत्त्व की थी। वैज्ञानिकों को तब इस पदार्थ तथा उसके गुणधर्मों के बारे में पता नहीं था। उनकी खोज प्रकाशित हुई तो दुनिया भर में डा. राय को ख्याति मिली। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण कार्य किया था। वह था अमोनियम नाइट्राइट का उसके विशुद्ध रूप में संश्लेषण। इसके पहले माना जाता था कि अमोनियम नाइट्राइट का तेजी से तापीय विघटन होता है तथा यह अस्थायी होता है। राय ने अपने इन निष्कर्षों को फिर से लंदन की केमिकल सोसायटी की बैठक में प्रस्तुत किया

 डा. राय ने स्वदेशी उद्योग की नींव डाली। उन्होंने 1892 में अपने घर में ही एक छोटा-सा कारखाना निर्मित किया। उन्होंने एक लघु उद्योग के रूप में देसी सामग्री की मदद से औषधियों का निर्माण शुरू किया। बाद में इसने एक बड़े कारखाने का स्वरूप ग्रहण किया जो आज “बंगाल केमिकल्स ऐण्ड फार्मास्यूटिकल वर्क्स” के नाम से सुप्रसिद्ध है। उनके द्वारा स्थापित स्वदेसी उद्योगों में सौदेपुर में गंधक से तेजाब बनाने का कारखाना, कलकत्ता पॉटरी वर्क्स, बंगाल एनामेल वर्क्स, तथा स्टीम नेविगेशन, प्रमुख हैं।

सन् 1922 के बंगाल के अकाल के दौरान राय की भूमिका अविस्मरणीय है। ‘मैनचेस्टर गार्डियन’ के एक संवाददाता ने लिखा था; “इन परिस्थितियों में रसायनविज्ञान के एक प्रोफेसर पी. सी. राय सामने आए और उन्होंने सरकार की चूक को सुधारने के लिए देशवासियों का आह्वान किया। उनके इस आह्वान को काफी उत्साहजनक प्रतिसाद मिला। बंगाल की जनता ने एक महीने में ही तीन लाख रूपए की मदद की। धनाढ्य परिवार की महिलाओं ने सिल्क के वस्त्र एवं गहने तक दान कर दिए। सैकड़ों युवाओं ने गाँवों में लोगों को सहायता सामग्री वितरित की। डॉ. राय की अपील का इतना उत्साहजनक प्रत्युत्तर मिलने का एक कारण तो बंगाल की जनता के मन में मौजूद विदेशी सरकार को धिक्कारने की इच्छा थी। इसका आंशिक कारण पीड़ितों के प्रति उपजी स्वाभाविक सहानुभूति थी, पर काफी हद तक उसका कारण पी. सी. राय का असाधारण व्यक्तित्व एवं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा थी। वह अच्छे शिक्षक के साथ एक सफल संगठनकर्ता भी थे।

आचार्य राय ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। गोपाल कृष्ण गोखले से लेकर गाँधी जी तक से उनका मिलना जुलना था। कलकत्ता में गांधी जी की पहली सभा कराने का श्रेय डा. राय को ही जाता है। राय एक सच्चे देशभक्त थे उनका कहना था;- “विज्ञान प्रतीक्षा कर सकता है, पर स्वराज नहीं“। वह स्वतंत्रता आन्दोलन में एक सक्रिय भागीदार थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के रचनात्मक कार्यों में मुक्तहस्त आर्थिक सहायता दी। उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था —”मैं रसायनशाला का प्राणी हूँ। मगर ऐसे भी मौके आते हैं जब वक्त का तकाज़ा होता है कि टेस्ट-ट्यूब छोड़कर देश की पुकार सुनी जाए“। लेकिन अफसोस! डा. राय देश को स्वतंत्र होते अपनी आँखों से नहीं देख सके।

शोध सम्बन्धी जर्नलों में राय के लगभग 200 परचे प्रकाशित हुए। इसके अलावा उन्होंने कई दुर्लभ भारतीय खनिजों को सूचीबद्ध किया। उनका उद्देश्य मेंडलीफ की आवर्त-सारिणी में छूटे हुए तत्वों को खोजना था। उनका योगदान सिर्फ रसायन विज्ञान सम्बंधी खोजों तथा लेखों तक सीमित नहीं है। उन्होंने अनेक युवकों को रसायन विज्ञान की तरफ प्रेरित किया। डा. राय ने एक और महत्त्वपूर्ण काम किया। उन्होंने दो खण्डों में ‘हिस्ट्री आफ़ हिन्दू केमिस्ट्री’ नामक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखा। इससे दुनिया को पहली बार यह जानकारी मिली कि प्राचीन भारत में रसायन विज्ञान कितना समुन्नत था। इसका प्रथम खण्ड सन् 1902 में प्रकाशित हुआ तथा द्वितीय खण्ड 1908 में। इन कृतियों को रसायनविज्ञान के एक अनूठे अवदान के रूप में माना जाता है।

ऐसे उदारमना विज्ञानी का 16 जून, 1944 को उनका देहावसान हो गया।

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बीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में एक मंच के रूप में कार्यरत कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था। पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर लाल-बाल-पाल नामक जो त्रयी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।

लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को रत्नागिरी, महाराष्ट्र के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में थी। वे भारत में अंग्रेजों के शासन को अभिशाप समझते थे तथा इसे उखाड़ फेंकने के लिए किसी भी मार्ग को गलत नहीं मानते थे। इन विचारों के कारण पूना में हजारों युवक उनके सम्पर्क में आये। इनमें चाफेकर बन्धु प्रमुख थे। तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने पूना के कुख्यात प्लेग कमिश्नर रैण्ड का वध किया और तीनों भाई फाँसी चढ़ गये।

सन 1897 में महाराष्ट्र में प्लेग, अकाल और भूकम्प का संकट एक साथ आ गया। लेकिन दुष्ट अंग्रेजों ने ऐसे में भी जबरन लगान की वसूली जारी रखी। इससे तिलक जी का मन उद्वेलित हो उठा। उन्होंने इसके विरुद्ध जनता को संगठित कर आन्दोलन छेड़ दिया। नाराज होकर ब्रिटिश शासन ने उन्हें 18 मास की सजा दी। तिलक जी ने जेल में अध्ययन का क्रम जारी रखा और बाहर आकर फिर से आन्दोलन में कूद गये।

तिलक जी एक अच्छे पत्रकार भी थे। उन्होंने अंग्रेजी में ‘मराठा’ तथा मराठी में ‘केसरी’ साप्ताहिक अखबार निकाला। इसमें प्रकाशित होने वाले विचारों से पूरे महाराष्ट्र और फिर देश भर में स्वतन्त्रता और स्वदेशी की ज्वाला भभक उठी। युवक वर्ग तो तिलक जी का दीवाना बन गया। लोगों को हर सप्ताह केसरी की प्रतीक्षा रहती थी। अंग्रेज इसके स्पष्टवादी सम्पादकीय आलखों से तिलमिला उठे। बंग-भंग के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के पक्ष में तिलक जी ने खूब लेख छापे। जब खुदीराम बोस को फाँसी दी गयी, तो तिलक जी ने केसरी में उसे भावपूर्ण श्रद्धा॰जलि दी।

अंग्रेज तो उनसे चिढ़े ही हुए थे। उन्होंने तिलक जी को कैद कर छह साल के लिए बर्मा की माण्डले जेल में भेज दिया। वहाँ उन्होंने ‘गीता रहस्य’नामक ग्रन्थ लिखा, जो आज भी गीता पर एक श्रेष्ठ टीका मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने देश को कर्मयोग की प्रेरणा दी।

तिलक जी समाज सुधारक भी थे। वे बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में वे सरकारी हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने जनजागृति के लिए महाराष्ट्र में गणेशोत्सव व शिवाजी उत्सव की परम्परा शुरू की, जो आज विराट रूप ले चुकी है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में उग्रवाद के प्रणेता तिलक जी का मानना था कि स्वतन्त्रता भीख की तरह माँगने से नहीं मिलेगी। अतः उन्होंने नारा दिया – स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे।

वे वृद्ध होने पर भी स्वतन्त्रता के लिए भागदौड़ में लगे रहे। जेल की यातनाओं तथा मधुमेह से उनका शरीर जर्जर हो चुका था। मुम्बई में अचानक वे निमोनिया बुखार से पीड़ित हो गये। अच्छे से अच्छे इलाज के बाद भी वे सँभल नहीं सके और एक अगस्त, 1920 को मुम्बई में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली।

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चटगांव शस्त्रागार कांड के नायक मास्टर सूर्यसेन का जन्मजन्म दिवस 22 मार्च, 1894 को चटगांव (वर्तमान बांग्लादेश) के नवपाड़ा ग्राम में हुआ था। शिक्षा पूरी कर वे अध्यापक बने; पर फिर इसे ठुकरा कर स्वाधीनता संग्राम में कूद गये।

‘मास्टर दा’ ने पूर्वोत्तर भारत में अपने क्रांतिकारी संगठन ‘साम्याश्रम’ की स्थापना की। 1924 में पुलिस ने इन्हें पकड़ कर चार साल के लिए जेल में डाल दिया। 1928 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में सुभाष बाबू के नेतृत्व में 7,000 जवानों की सैनिक वेष में परेड से प्रभावित होकर इन्होंने अपने दल को सशस्त्र कर उसका नाम ‘इंडियन रिपब्लिक आर्मी’ रख दिया।

धीरे-धीरे इस सेना में 500 युवक एवं युवतियां भर्ती हो गये। अब इसके लिए शस्त्रों की आवश्यकता थी। अतः 18 अपै्रल, 1930 की रात को चटगांव के दो शस्त्रागारों को लूटने की योजना बनाई गयी। मास्टर सूर्यसेन ने अपने दो प्रतिनिधि दिल्ली भेज कर चंद्रशेखर आजाद से संपर्क किया।

आजाद ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए अपनी शुभकामनाओं के साथ दो पिस्तौल भी उन्हें भेंट की। 18 अपै्रल को सब सैनिक वेश में निजाम पल्टन के अहाते में एकत्र हुए। दल के एक भाग को पुलिस एवं दूसरे को सैनिक शस्त्रागार लूटना था। पौने दस बजे मास्टर दा ने कूच के आदेश दे दिये।

सबने योजनानुसार काम करते हुए टेलिफोन के तार काटे, बंदरगाह जाकर वायरलैस व्यवस्था भंग की तथा रेल की पटरियां उखाड़ दीं। जो दल पुलिस शस्त्रागार पहुंचा, उसे देखकर पहरेदार को लगा कि वे कोई बड़े अधिकारी हैं। अतः उसने दरवाजा खोल दिया। उन्होंने पर्याप्त शस्त्र अपनी गाड़ी में भर लिये। विरोध करने वालों को गोली मार दी तथा शेष शस्त्रों पर तेल डालकर आग लगा दी। मास्टर सूर्यसेन ने यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहरा दिया।

दूसरा दल सैनिक शस्त्रागार पर जा पहुंचा। उसके नेता लोकनाथ बल बहुत गोरे-चिट्टे थे। उनकी वेशभूषा देखकर वहां भी उन्हें सैल्यूट दिया गया। शस्त्रागार के ताले तोड़कर शस्त्र लूट लिये गये। विरोध करते हुए सार्जेंट मेजर कैरल मारा गया; पर क्रांतिकारी पक्ष की कोई जनहानि नहीं हुई। सफल अभियान के बाद सब जलालाबाद की पहाड़ी जा पहुंचे। संचार व्यवस्था भंग होने से अगले चार दिन तक चटगांव का प्रशासन क्रांतिकारियों के हाथ में ही रहा।

22 अपै्रल को संचार व्यवस्था फिर से ठीक कर अंग्रेजों ने पहाड़ी को घेर लिया। इस संघर्ष में 11 क्रांतिकारी मारे गये, जबकि 160 ब्रिटिश सैनिक हताहत हुए। कई क्रांतिवीर पकड़े भी गये। मास्टर सूर्यसेन पर 10,000 रु0 का पुरस्कार घोषित किया गया; पर वे हाथ नहीं आये। अंततः गोइराला गांव के शराबी जमींदार मित्रसेन ने थानेदार माखनलाल दीक्षित द्वारा दिये गये प्रलोभन में फंसकर 16 फरवरी, 1933 को उन्हें अपने घर से पकड़वा दिया। क्रांतिवीरों ने कुछ दिन बाद उस जमींदार तथा थानेदार को यमलोक भेज दिया।

मुकदमे के बाद 12 जनवरी, 1934 उनकी फांसी की तिथि निश्चित हुई। फांसी के लिए ले जाते समय वे ऊंचे स्वर से वन्दे मातरम् का उद्घोष करने लगे। इससे जेल में बंद उनके साथी भी नारे लगाने लगे। इससे खीझकर जेल वार्डन मास्टर दा के सिर पर डंडे मारने लगा; पर इससे उनका स्वर और तेज हो गया। अंततः डंडे की मार से ही मास्टर जी का प्राणांत हो गया। क्रूर जेल प्रशासन ने उनके शव को ही फांसी पर लटकाकर अपना क्रोध शांत किया।

सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु गुरुनानक देव का जन्म  रावी नदी के किनारे तलवंडी नामक गाँव में 15 अप्रैल, 1469 में कार्तिक पूर्णिमा, संवत् 1 5 2 7 को हुआ था।  गुरु नानक जी अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक,  कवि,  देशभक्त और विश्वबंधु – सभी के गुण समेटे हुए थे।तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा।

7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्रापति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए। तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। गुरुनानक जी चारो ओर घूमकर उपदेश करने लगे जिनमे भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों पर उन्होंने भ्रमण किया.

इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। लोगों ने तत्कालीन इब्राहीम लोदी से इनकी शिकायत की और ये बहुत दिनों तक कैद रहे। अंत में पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब इनका छुटकारा हुआ।

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई । स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर 22 सितंबर 1539 ईस्वी को इनका परलोकवास हुआ। मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।

Source : http://www.sikhiwiki.org, https://en.wikipedia.org/wiki/Guru_Nanak

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स्वामी प्रणवानन्द (14 मई १८९६ – १९४१) का जन्म बंगाल के बाजितपुर गांव में हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। उनके बचपन का नाम बिनोद था। बचपन से ही वे गहन चिन्तन करते-करते ध्यान-मग्न हो जाते थे। उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया।

वे बाबा गंभीरनाथ जी के शिष्य थे। सन् १९१७ में उन्होने भारत सेवाश्रम संघ की स्थापना की। उनके अनुयायी उन्हे भगवान शिव का अवतार मानते हैं। जनवरी, 8 मई सन् 1941 में उनका देहावसान हो गया। उनके जन्मस्थान बाजितपुर में उनकी समाधि है।

श्रीमद् स्वामी प्रणवानन्द जी महाराज ने सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक लोकहितैषी संस्था भारत सेवाश्रम संघ के स्थापना 1917 में की थी. जिसमें संन्यासी और नि:स्वार्थी कार्यकर्ता भ्रातृभाव से कार्य करते हैं। सर्वांगीण राष्ट्रीय उद्धार इसका मुख्य उद्देश्य और संपूर्ण मानवता की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति इसका सामान्य लक्ष्य है. यह संयासियों और नि:स्वार्थ कर्मयोगियों की संस्था है जो मानवता की सेवा के लिये समर्पित है। इसका मुख्यालय कोलकाता में है तथा पूरे भारत तथा विश्व में कोई 46 अन्य केन्द्र हैं।

किसी दैवी आपदा, किसी सामाजिक मेले आदि के अवसर पर इसके संयासी कैम्प लगाकर सेवा और सहायता का कार्य आरम्भ कर देते हैं। भारत सेवाश्रम संघ मुम्बई के वासी गांव में कैंसर के रोगियों के लिये नि:शुल्क आवास एवं भोजनादि की व्यवस्था करता है। इसके साथ-साथ भारत सेवाश्रम संघ शिक्षा के प्रसार तथा आदिवासियो एवं वनवासियों के उत्थान के लिये सतत् उद्यमशील है।

इन दिनों राजनीति में सिद्धांतों के पालन की बात सुनकर लोग हंसते हैं; पर 29 फरवरी, 1896 को जन्मे मोरारजी रणछोड़जी देसाई ने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। गांधी जी के भक्त मोरारजी 1924 में अपनी सरकारी नौकरी को छोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में कूद पड़े। स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता के कारण उन्हें पांच वर्ष जेल में बिताने पड़े।

मोरारजी भाई अविभाजित बम्बई राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इससे पूर्व वे 1937 में बालासाहब खेर की कैबिनेट में भी मंत्री थे; लेकिन उन्होंने वहां अपना घर नहीं बनाया। वे सदा किराये के मकान में ही रहे।

जब उनके मकान मालिक ने उन पर मुकदमा किया, तो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उन्हें मकान छोड़ना पड़ा। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने उन्हें किराये पर एक मकान आवंटित किया। कैसा आश्चर्य है कि इसके बाद भी उनके विरोधी उन्हें अमरीका और पूंजीपतियों का दलाल कहकर आलोचना करते रहे।

प्रधानमंत्री नेहरू ब्रिटिश प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तकों की बिक्री का धन लंदन के बैंक में जमा करते थे। इस पर वित्तमंत्री मोरारजी ने उन्हें चेतावनी दी कि यह विदेशी मुद्रा कानून का उल्लंघन है, जिससे उन्हें जेल और अर्थदंड हो सकता है। अतः नेहरू जी को वह धन भारत में लाना पड़ा।

जब इंदिरा गांधी ने अपने दोनों अवयस्क पुत्रों राजीव और संजय को इंग्लैंड में शिक्षा हेतु भेजने के लिए शासन से विदेशी मुद्रा मांगी, तो वित्तमंत्री मोरारजी ने तत्कालीन कानूनों का हवाला देते हुए उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी।

मोरारजी शराब के घोर विरोधी थे। एक बार ब्रिटिश प्रधानमंत्री के स्वागत समारोह में वे इसी शर्त पर शामिल हुए कि वहां शराब नहीं दी जाएगी। उनके मुख्यमंत्री काल में सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव और बुल्गानिन जब मुंबई आये, तो वे अपने लिए शराब रूस से साथ ही लेकर आये।

1975 में इंदिरा गांधी के प्रयाग उच्च न्यायालय में चुनाव संबंधी मुकदमा हारने पर मोरारजी ने उन्हें त्यागपत्र देने को कहा; पर इंदिरा गांधी ने आपातकाल थोपकर मोरारजी सहित हजारों नेताओं को जेल में ठूंस दिया।

आपातकाल के बाद 1977 में जो सरकार बनी, उसमें उनके अनुभव को देखकर उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया। यद्यपि उस सरकार में अधिकांश कांग्रेसी ही थे, जो सदा कुर्सी के लिए लड़ते रहते थे। अतः वह सरकार अधिक नहीं चल सकी।

एक बार गृहमंत्री चरणसिंह और स्वास्थ्यमंत्री राजनारायण ने सार्वजनिक रूप से शासन की आलोचना की। यह मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के विरुद्ध था। अतः मोरारजी ने उनसे त्यागपत्र ले लिया। यद्यपि इससे जनता सरकार गिर गयी; पर उन्होंने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

मोरारजी भय से कोसों दूर थे। प्रधानमंत्री रहते हुए एक बार जोरहाट में उनका विमान धरती पर टकरा कर उलट गया; पर उन्होंने संतुलन नहीं खोया। वे शान्त भाव से विमान से उतरे, अपने कपड़े ठीक किये और आगे चल दिये। गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञता उनके मन, वचन और कर्म में समाई थी।

विदेशी कम्पनियों के विरोधी, लघु और ग्रामीण उद्योग के समर्थक, ‘भारत रत्न’ तथा पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से अलंकृत मोरारजी का 10 अपै्रल, 1995 को 99 वर्ष की आयु में देहांत हुआ।

सचिनदेव बर्मन का जन्म वर्ष 1 अक्टूबर, 1906 में त्रिपुरा हुआ। उनके पिता जाने-माने सितारवादक और ध्रुपद गायक थे। बचपन के दिनों से ही सचिनदेव बर्मन का रुझान संगीत की ओर था और वे अपने पिता से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लिया करते थे। इसके साथ ही उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।

अपने जीवन के शुरुआती दौर में सचिनदेव बर्मन ने रेडियो से प्रसारित पूर्वोतर लोक-संगीत के कार्यक्रमों में काम किया। वर्ष 1930 तक वे लोकगायक के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।

वर्ष 1944 में संगीतकार बनने का सपना लिए सचिनदेव बर्मन मुंबई आ गए, जहां सबसे पहले उन्हें 1946 में फिल्मिस्तान की फिल्म ‘एट डेज’ में बतौर संगीतकार काम करने का मौका मिला, लेकिन इस फिल्म के जरिए वे कुछ खास पहचान नहीं बना पाए।

इसके बाद 1947 में उनके संगीत से सजी फिल्म ‘दो भाई’ के पार्श्वगायिका गीता दत्त के गाए गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया…’ की कामयाबी के बाद वे कुछ हद तक संगीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।

सचिनदेव बर्मन ने करीब 3 दशक के सिने करियर में लगभग 90 फिल्मों के लिए संगीत दिया। उनके फिल्मी सफर पर नजर डालने पर पता लगता है कि उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ ही की हैं।

1951 में फिल्म नौजवान के गीत ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आए…’ के जरिए लोगों का मन मोहा। वर्ष 1951 में ही गुरुदत्त की पहली निर्देशित फिल्म ‘बाजी’ के गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे…’ में एस.डी. बर्मन और साहिर की जोड़ी ने संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया।

एस.डी. बर्मन और साहिर लुधियानवी की सुपरहिट जोड़ी फिल्म ‘प्यासा’ के बाद अलग हो गई। एसडी बर्मन की जोड़ी गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के साथ भी बहुत जमी। देवानंद की फिल्मों के लिए एसडी बर्मन ने सदाबहार संगीत दिया और उनकी फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बर्मन दा के पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में देवानंद के अलावा विमल राय, गुरुदत्त, ऋषिकेश मुखर्जी आदि प्रमुख रहे हैं।

बर्मन दा की फिल्म जगत के किसी कलाकार या गायक के साथ शायद ही अनबन हुई हो, लेकिन 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘पेइंग गेस्ट’ के गाने ‘चांद फिर निकला…’ के बाद लता मंगेशकर और उन्होंने एकसाथ काम करना बंद कर दिया। दोनों ने लगभग 5 वर्ष तक एक-दूसरे के साथ काम नहीं किया। बाद में बर्मन दा के पुत्र आर.डी. बर्मन के कहने पर लता मंगेशकर ने बर्मन दा के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए ‘मेरा गोरा अंग लई ले…’ गाना गाया।

संगीत निर्देशन के अलावा बर्मन दा ने कई फिल्मों के लिए गाने भी गाए। इन फिल्मों में ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा…’, ‘मेरे साजन है उस पार…’ और ‘अल्लाह मेघ दे छाया दे…’ जैसे गीत आज भी श्रोताओं को भाव-विभोर करते हैं।

एस.डी. बर्मन को 2 बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार से नवाजा गया है। एसडी बर्मन को सबसे पहले 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘अभिमान’ के लिए भी वे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजे गए।

फिल्म ‘मिली’ के संगीत ‘बड़ी सूनी-सूनी है…’ की रिकॉर्डिंग के दौरान एस.डी. बर्मन अचेतन अवस्था में चले गए। हिन्दी सिने जगत को अपने बेमिसाल संगीत से सराबोर करने वाले सचिन दा 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

संघ की प्रारम्भिक प्रचारकों में एक श्री वसंतराव कृष्णराव ओक का जन्म 13 मई, 1914 को नाचणगांव (वर्धा, महाराष्ट्र) में हुआ था। जब वे पढ़ने के लिए अपने बड़े भाई मनोहरराव के साथ नागपुर आये, तो बाबासाहब आप्टे द्वारा संचालित टाइपिंग केन्द्र के माध्यम से दोनों का सम्पर्क संघ से हुआ।

डा. हेडगेवार के सुझाव पर वसंतराव 1936 में कक्षा 12 उत्तीर्ण कर शाखा खोलने के लिए दिल्ली आ गये। उनके रहने की व्यवस्था ‘हिन्दू महासभा भवन’ में थी। यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का जाल भी फैलाया। आज का दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, अलवर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उस समय दिल्ली प्रांत में ही था। वसंतराव के परिश्रम से इस क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया।

वसंतराव के संपर्क का दायरा बहुत विशाल था। 1942 के आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही। गांधी जी, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, पुरुषोत्तमदास टंडन से लेकर हिन्दू महासभा, सनातन धर्म और आर्य समाज के बड़े नेताओं से उनके मधुर संबंध थे। कांग्रेस वालों को भी उन पर इतना विश्वास था कि मंदिर मार्ग पर स्थित वाल्मीकि मंदिर में होने वाली गांधी जी की प्रार्थना सभा की सुरक्षा स्वयंसेवकों को ही दी गयी थी।

10 सितम्बर, 1947 को कांग्रेस के सब बड़े नेताओं की हत्याकर लालकिले पर पाकिस्तानी झंडा फहराने का षड्यन्त्र मुस्लिम लीग ने किया था; पर दिल्ली के स्वयंसेवकों ने इसकी सूचना शासन तक पहुंचा दी, जिससे यह षड्यन्त्र विफल हो गया।

आगे चलकर वसंतराव ने श्री गुरुजी और गांधी जी की भेंट कराई। उन दिनों वसंतराव का दिल्ली में इतना प्रभाव था कि उनके मित्र उन्हें ‘दिल्लीश्वर’ कहने लगे। संघ पर लगे पहले प्रतिबंध की समाप्ति के बाद उनके कुछ विषयों पर संघ के वरिष्ठ लोगों से मतभेद हो गये। अतः गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर वे दिल्ली में ही व्यापार करने लगे; पर संघ से उनका प्रेम सदा बना रहा और उन्हें जो भी कार्य दिया गया, उसे उन्होंने पूर्ण मनोयोग से किया।

गोवा आंदोलन में एक जत्थे का नेतृत्व करते हुए उनके पैर में एक गोली लगी, जो जीवन भर वहीं फंसी रही। 1857 के स्वाधीनता संग्राम की शताब्दी पर दिल्ली के विशाल कार्यक्रम में वीर सावरकर का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने वसंतराव के संगठन कौशल की प्रशंसा कर उन्हें ‘वसंतराय’ की उपाधि दी। 1946 में उन्होंने ‘भारत प्रकाशन’ की स्थापना कर उसके द्वारा ‘भारतवर्ष’ और ‘आर्गनाइजर’ समाचार पत्र प्रारम्भ किये। विभाजन के बाद पंजाब से आये विस्थापितों की सहायतार्थ ‘हिन्दू सहायता समिति’ का गठन किया था।

वसंतराव के भाषण काफी प्रभावी होते थे। मराठीभाषी होते हुए भी उन्हें हिन्दी से बहुत प्रेम था। 1955 में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ उन्हीं की प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ। इसके लिए शास्त्री जी और टंडन जी ने भी सहयोग दिया। इसकी ओर से प्रतिवर्ष लालकिले पर एक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन कराया जाता था, जो अब शासकीय कार्यक्रम बन गया है।

1957 में उन्होंने दिल्ली में चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव जनसंघ के टिकट पर लड़ा; पर कुछ मतों के अंतर से वे हार गये। 1966 के गोरक्षा आंदोलन में भी उन्होंने काफी सक्रियता से भाग लिया। बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद कांग्रेस और साम्यवादियों ने संघ के विरुद्ध बहुत बावेला मचाया। ऐसे में वसंतराव ने दिल्ली के प्रतिष्ठित लोगों से मिलकर उनके सामने पूरा विषय ठीक से रखा। इससे वातावरण बदल गया।

अप्रतिम संगठन क्षमता के धनी और साहस की प्रतिमूर्ति वसंतराव का नौ अगस्त, 2000 को 86 वर्ष की आयु में देहांत हुआ।